
इंद्रधनुष-12 (विशेष): कमलकांत सक्सेना
“कमलकांत की रचनाएं बहुत नहीं है, सिर्फ़ एक पुस्तक ‘ऋजुता’ नाम से उन्होंंने दी है। इससे उनका साहित्यिक मूल्य कम नहीं हो जाता। उन्होंने हिंदी को ऐसे कई नाम दिये हैं, जिनका आज साहित्य में अपना मुकाम है।” -प्रेम किरण
कमलकांत सक्सेना (5.10.1948-31.8.2012) खोजी पत्रकारिता के साथ ही साहित्य में अपने संपादन, आयोजनों, छुपी प्रतिभाओं को प्रकाश में लाने के अलावा और कुछ नवाचारों के लिए हमेशा याद रखने के क़ाबिल एक नाम रहे। ‘साहित्य सागर’, ‘नटवर गीत सम्मान’ व ‘राष्ट्रीय गीत उत्सव’ जैसे कई कारनामे उनकी पहचान रहे। उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि कमलकांत जी की अनेक रचनाएं पुस्तकाकार नहीं आ सकीं। अनेक रचनाएं पुरानी डायरियों, प्रिंट-आउट्स की फ़ाइलों में अब भी सुरक्षित हैं। आज विशेष दिन इसी ख़ज़ाने से उनकी अब तक अनपढ़ी रही कुछ रचनाएं, इनमें दो-एक नवगीत भी हैं। ग़ौरतलब यह भी कि इन रचनाओं को पढ़ते हुए लगने लगता है इनमें बात चालीस या पचास बरस पहले की है या आज ही की! आब-ओ-हवा के लिए भवेश दिलशाद की प्रस्तुति…

कमलकांत सक्सेना की 7 कविताएं
प्रोत्साहन
तुम कोई काम शुरू तो करो
यश और सफलता, श्री—संपन्नता
तुम्हारे चरणों में लोटा करेंगे…
देखो ना! सूरज ने ऊगना शुरू किया
उजाला बांटना शुरू किया
अब पूरा सौर्यमंडल/
सूर्य का लोहा मानता है
धरती का हर कण प्रकाशन की लालसा में
सूरज का मुंह ताकता है.
आज ‘वह’ उष्मा है, ऊर्जा है,
इष्ट है अभीष्ट है
सर्वशक्तिमान है, दिव्य है
क्योंकि ‘उसने’ ऊगने का ही सही
कोई काम शुरू तो किया…
तुम भी ‘कुछ’ करना शुरू करो
जो इष्ट है उसे स्वयं वरो
आज, जिन्हें तुम पूजते हो
कल, वे तुम्हें पूजा रकेंगे
तुम कोई काम शुरू तो करो.
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चलो—
मिट्टी का तेल लेने चलें
गेहूं या ज्वार लेने चलें
घर में शक्कर ख़त्म है, ले आएं
घी, चावल, ईंधन जुटाएं
और
कुछ मिले न मिले
कम से कम दुकान के मुख्य द्वार पर
कतार तो लगाएं!
कतार… एक लंबी कतार
एक ख़त्म न होने वाली कतार
जिसका शिकार करती है सरकार
जिस पर ज़ुल्म करता है व्यापार
न्याय, शिक्षा, धर्म, नीति सब मिलकर भी
मेरे देश को आंसू के सिवा कुछ दे न सके
एक ‘कतार’ का बोध दे दिया बस
इसका भावार्थ वे समझा न सके
क्योंकि जयचंदों की पूजा करने के दिन हैं
क्योंकि भामाशाहों की नीयत बदलने के दिन हैं
इसीलिए कहता हूं मैं बार—बार
जीत की लिये कामना, हाथ में लिये तलवार
चलो
कतारों को मिटा डालें
हर जन को सुख दें
जयंचदों का क़त्ल करें
भामाशाहों को पकड़—पकड़कर मारें
तब संभव है श्रमिकों के घर दीये जलें
हो सकता है भारत की माटी में सुमन खिलें
(1974)
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बिजली से संचालित
तीव्र गतिमान पंखे को देखकर
उसी जैसा जब
घूमने लगता है दिमाग़, तब
सारी दुनिया गोल दिखती है
चिकनी, सपाट, बेरंग
और ऐसी कि जिस पर नज़र ही न टिके
तब कहां ढूंढ़ पाएंगे
कुछ ऐसे पदचिह्न, जो अनुकरणीय हों
तब कहां देख पाएंगे
ऐसे भी दृश्य जो रमणीय हों
तब कहां गढ़ पाएंगे
ऐसे दिवास्वप्न जो प्रेरणा बनें
और तब कैसे सुन पाएंगे
ऐसा संगीत
जो सोयी हुई कोमल भावनाएं जगा दे
हम भी बुद्धिधारी समाज के प्रतिनिधि हैं
यह अहसास करा दे
यदि यह सब
ढूंढ़ना, देखना, गढ़ना, सुनना या महसूसना
ज़रूरी हो
तो दोस्तो और दुश्मनो
अपनी चेतना को जगाओ
भावना को कृष्ण का संदेश दो
साधना को राम का उपदेश दो
कल्पना को प्यार का आदेश दो
पंखे को रोक दो मत घुमाओ
बिजली से संचालित है
तीव्र गतिमान पंखा
पर तुमसे संयोजित है
महाशक्तिशाली बिजली
फिर काहे की चिन्ता!
सुंदर और संगीतमय जीवन जियो
जितनी क्षमता हो उतना अमृत पियो
(1977)
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विडंबना
हर महीने पहिला दिना आता है
किलकती हुई मधुर बोलियां लेकर
छलकती हुई प्राण प्यालियां लेकर
खनकती हुई चूड़ियां, मनुहार ले
और कभी रिक्त सी झोलियां लेकर
हर महीने पहिला दिन आता है.
अबकी, सूखे या कि अवर्षा के कारण/या
सत्तारूढ़ दल के आपसी झगड़ों के कारण
पहिली तारीख़ को वेतन नहीं मिला
किसी—किसी घर में चूल्हा नहीं जला.
मीठे—मीठे सपने कुम्हलाने लगे
हक़ीक़त पर सब विचारने लगे
जिसका प्रारंभ सुखद
अंत भी सुखद होता है
क्या होगा आगे? जब पहिला ही दिन फजीता है!
यों
ज़मीन और आदमी का निकट का रिश्ता है
पर ज़मीन महंगी है, आदमी सस्ता है
कुएं, झील, ताल, नदियां, समुद्र, बादल सब
रेत के घर ज्यौनार पर हैं
सड़कें, पुल, पुलिया, बांध, नहर, हरियाली
सरकारी काग़ज़ों पर हैं
साफ़—साफ़ दिखता निष्कपट
महीने का पहिला दिन ही गीला है/
आसमान इसलिए नीला है
क्योंकि उसमें दर्द की ऊंचादई है
सूरज इसलिए लाल अंगार है
क्योंकि उसने जलने की क़सम खायी है
चंद्रमा अपने आदमी से पराजित होकर
शायद अंधेरे में सिर मार रहा है
हर सितारा भयभीत भटककर
सुरक्षित घर ढूंढ़ता फिर रहा है
किरण—किरण क्रोधित, जलती है
अपने हाथ मलती है
विधाता/ताने सुन—सुनकर
बेकारी और बेगारी से ऊबकर
धरती के सीने पर मूंग दलता है
स्वयं के अस्तित्व को स्वयं छलता है
विवश, निस्पन्द, भावहीन धरा
शीतल उच्छ्वासें छोड़ती है
अपने कर्त्तव्य से मुंह मोड़ती है
पक्षी, पशु, कीट—पतंगे त्रस्त हैं
उष्मा से बचने में व्यस्त हैं
कल—युग/कलियुग की ऐसी रीति है
सीता को रावण से प्रीति है
आज
प्यार और विश्वास बेमानी हैं
त्याग और बलिदान अभिमानी हैं
भूख आज का आदर्श है
अपमान सहना एक आदत हर्ष है
कलाकार कृपण, कला कलमुंही
नकारात्मक भारतीय संस्कृति हुई
साहित्य माने स्वहित हो गया है
अमानव बढ़ गये/मानव सो गया है
और तो और
पूंजीपति/मंदिरों के निकट
श्मशान तक खींसें निपोरते हैं
अपने दरवाज़े पर पटल टांगते हैं
‘नो वैकैंसी’— रिक्त स्थान नहीं है
शायद यह हिंदुस्तान नहीं है
आख़िर
ईमान और सिद्धांतों की खाट पर क़ैद
दो हाथ और दो पैर पुतलों की
चेतना के असली बेटों की
यह चिरन्तन भीड़ कहां जाये?
कहां जाये? यह भीड़ कहां जाये?
उबलते हुए प्रश्नों का हृदय लेकर
हर महीने पहिला दिन आता है!
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दूरदर्शिता
जब कभी हम काफ़ी ऊंचाइयों पर होते हैं
अक्सर दूरदर्शी बन जाया करते हैं
देखते हैं सुदूर क्षितिज पर
फैली हुई उज्जवलता के मधुर दृश्य
भूल जाते हैं कि
अपने ही क़दमों के नीचे तम है
सपनों की दुनिया पर खड़े तो हैं
किंतु आदमियों में कहां हम हैं?
वे बुनियादी बौने, हिले भी तनिक
अपने अहम् को पहिचान कर, तो?
तो… शायद धरातल ही डगमगा जाये!
तो… शायद हमारा ‘हम’ विलुप्त हो जाये!
तब क्या होगा?
यह हम तब नहीं सोच पाते हैं
जब कभी हम काफ़ी ऊंचाइयों पर होते हैं।
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हर्ष
मैं, अब बहुत ख़ुश हूं
सचमुच बहुत ख़ुश.
इतना अधिक ख़ुश
कि कोई, सुन भर ले, तो
ईर्ष्या से झुंझला उठे
संभव है, बौरा ही जाये
देखे, तो पता नहीं क्या हो!
शब्दातीत है मेरी ख़ुशी.
फिर भी सुनो—
सुनो मेरे चारों ओर उजाला है
बहारें हैं/सुगंध और सुंदरता के
अपरम्पार अहसास हैं
गुंजन, गीत, संगीत, मीत
सब आसपास हैं
दीन—हीनता/भूख—ग़रीबी/प्यास विवशता
दुख—दर्दों की परिभाषाएं
लाखों युग पहिले की लोककथाएं हैं शायद
यहां चिरंतन/अनंत हर्ष के
अनगिन उपवन, मन—धन वाले झरने बहते हैं
कहते हैं
मरने के बाद यहां रहते हैं:
जैसे मैं हूं
जीवित—मृत—जीवित
सचमुच बहुत ख़ुश.
(1980)
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चारों तरफ़ पहरे
हवा गर बोल दे तो जुर्म!
अंधेरी कोठरी सीड़न भरी है
बंद रोशनदान है!
खिड़कियों पर धूल की परतें
उड़ रहे मकड़ियों के जाल
कर्कशा झींगुरों की तान है!
यहां रहकर जीवन गरल है
चेतना कुंठा भरी है
सृजन है ही नहीं
विचारों की नदी रेत बनकर रह गयी
क्या क़ैद जो इंसान है?
चारों तरफ़ तम है
आंख गर देख ले तो जुर्म!

बहुत उम्दा कविताएं हैं।
कतार….एक लंबी कतार
जिसका शिकार करती है सरकार
वाह, यह तो 21 वीं शताब्दी के 25 साल गुज़रने के बाद भी समसामयिक है।