महात्मा गांधी, प्रस्तर कला, mahatma, gandhi, gandhi paintings, gandhi art
भवेश दिलशाद की कलम से....

लोकगीतों में गांधी

            बौद्ध स्तूप आपने सुने हैं, गया में बताते हैं गांधी की भस्म को सहेजने वाला एक स्तूप है। बुद्ध की तरह गांधी की प्रतिमाओं, चित्रों की कमी नहीं। किताबों की भी नहीं और गीत-कविताओं की भी नहीं। लेकिन लोकगीत की दुनिया में बुद्ध किसने कितने सुने हैं? जबकि गांधी वहां नायक रहे…

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महात्मा गांधी ने कहा था ‘लोकगीतों में धरती गाती है, पर्वत गाते हैं, नदियां गाती हैं, फसलें गाती हैं…’ फसलों, नदियों, पर्वतों और धरती ने गांधी को गाया है। ऐसे बिरले ही महापुरुष धरती पर हुए हैं, जिन्हें जीते-जी ही लोकगीतों में गाया गया। इस सिरे से यदि बात की जाये तो गांधी के निकट पूर्ववर्ती ज्योतिबा फुले की याद स्वाभाविक है। ज्योतिबा और सावित्री बाई के जीवन पर आधारित फ़िल्म ‘फुले’ 2025 में सिनेमाघरों में आयी थी, उसके कुछ एक दृश्यों में दिखाया गया कि ज्योतिबा की शान में लोक गायकों की मंडलियां उन्हें गाते हुई चलती थीं।

अब बुद्ध की चर्चा फिर छेड़ी जाये तो दो बातों पर सभी विद्वान सहमत नहीं हैं, पहली गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार हैं और दूसरी कि लोकगीतों वाला भाग्य उन्हें मिला हो। लेकिन ज़रा विचार करके देखिए कि क्या बुद्ध अपने समय के लोकगीतों में नहीं गाये गये होंगे! ​तो आख़िर कहां गयीं वे रचनाएं और उनकी यादें? इन सवालों को याद रखिए, एक दिलचस्प पहलू आगे है, फ़िलहाल चर्चा में बुद्ध और गांधी।

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भारत ही नहीं, दुनिया के कई विद्वानों ने बुद्ध और गांधी के बीच कई सिरों से समानता देखी है और तुलना की है। वस्तुतः ‘अप्प दीपो भवः’, सत्य और अहिंसा के दर्शन को चरितार्थ करने वाले इन दो महापुरुषों के जीवन की ‘बिटवीन द लाइन्स’ पढ़ने के लिए शोध भी चल रहे हैं। इस विषय में देवेंद्र सत्यार्थी का गांधीजी के साथ एक संवाद भी बेहद महत्वपूर्ण है, जिससे लोकगीतों में गांधी की व्यापकता को लेकर कई सिरे खुलते हैं।

हो बापू यो राज तमी ने पलटायो
साबरमती का रेवा वारा।
म्हं गानो बजानो कंई जाणा–
जंगल का रेवा वारा।

जीवन की ही तरह साहित्य के दो आधार माने गये हैं – लोक और शास्त्र। लोक साहित्य एक काल विशेष में रचे जाने के बावजूद अंतर्धारा की तरह बहता रहता है। चूंकि ये अक्सर समूह और समवेत स्वरों की परंपरा में रचे-बसे होते हैं इसलिए समय की नदी के समरूप लोकगीत बहते हैं। गांधी पर गोली चलाये जाने के बाद भी उनके विचार अमर हैं और स्वयं गांधी इन लोकधुनों में, गीतों में भारत के अंतर्मन तक पैठे हुए हैं, आज भी। लगातार इस विषय पर प्रकाशित हो रहे ग्रंथ इस बात की तस्दीक हैं।

अवधी, कुमायूंनी, भोजपुरी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हरियाणवी, पंजाबी से लेकर मराठी, उड़िया, तेुलुगू, असमिया तक कौन-सी ऐसी भाषा है, जिसकी लोक स्वर लहरियों में गांधी नहीं हैं! आपको यह बात भी हैरान कर सकती है कि लोकगीतों के कितने प्रारूपों में गांधी को गाया गया है। ऐसे गीत भी हैं, जो विवाह में गाये जाते हैं और गांधी उनमें दूल्हे की तरह दर्ज हैं। दादरा, टप्पा, बिरहा, लावणी, फाग, कजरी, आल्हा, चालीसा और भक्ति-गीतों जैसे अनेक रूपों में गांधी को ग्राम ही नहीं बल्कि वनों तक में गाया जाता रहा।

कई भाषाओं के लोकगीतों में गांधी किस तरह आख्यायित हुए, ऐसे विषयों पर अनेक लेख उपलब्ध हैं। गांधी दरअसल भूमि के जिस हिस्से पर पहुंचे, रुके या केवल गुज़र भी गये, हर उस जगह उनकी कीर्ति रह गयी, उनकी एक यादगार रह गयी। और फ़िराक़ के शब्दों में कहा जाये तो लोग क्या नस्लें ये फ़ख़्र करती रहीं कि उन्होंने गांधी को देखा था, सुना था या वो उनसे मिल सके थे। बल्कि यहां तक कि बापू के चरण हमारे देस, हमारे गांव पड़े थे। यही भाव लोक के कला पक्ष में भी विविधवर्णी आकार पाता रहा।

लोकगीतों में गांधी की और चर्चा से पहले यहां पहले कुछ महत्वपूर्ण, चर्चित और रोचक लोकगीत अंश उदाहरण के तौर पर:

1. यह लोकगीत एकाधिक रूपों में मिलता है, इसका निमाड़ी रूप अंश इस तरह है:
म्हारा चरखा को टूट नी तार, चरखा चालू रह ।
गांधी महातमा दूल्लव बण्या छे, दूलेण बणी सरकार ।
सबई स्वयंसेवक बण्या बराती, नाई बण्यो थानेदार ।
गांधी महातमा नेग म मचल्या, दायजा म मांगा सुराज ।

2. उड़िया लोकगीत का एक अंश:
गांधी महात्मा आसीले, कले देश स्वाधीन
कर्ण मंत्र देई गले है, का ताहार आन
रखीबा ताहार आन है, आस करीबा सेवा
मद निशा सब छाड़ आन है, आस सागेर जीवा।

3. तेलुगू लोकगीत का एक अंश:
राटमु ओड़ाकारम्मा, ओ अम्मालारा?
गांधी की जय अंचु दारामु तीयारे।
एकुलु रामसु इंटिकन्दम्मु, महात्मा गांधी प्रजल कंदम्मु।

4. हरियाणवी लोकगीत का एक अंश:
घर-घर लेडी चंदन रोवे, गांधी बनो गले का हार
घुटनन कर दिई गवरमेंट, अब वा के थोथे बाजे हथियार
बर्र तितैया जैसे चिटमन लागें, बेड़ा कौण लगावे पार?

5. एक भोजपुरी बिरहा लोकगीत का अंश:
गांधी के लड़इया नाहिं जितबे, रे फिरंगिया! चाहे कर केतना उपाय,
भल-भल मजवा उड़ौले ऐहि देसवा में
अब जइहैं कोठियां बिकाय।

6. गोमती प्रसाद विकल रचित गांधी चालीसा का एक अंश:
आजादी का अमर उजाला। चक्र सुदर्शन चरखा वाला।
सत्य अहिंसा समता वाला। अहसयोग आंदोलन वाला।
युग को राम-रहीम पढ़ाया। दया प्रेम का दीप जलाया।
विपुल वासना का विषपायी। सात्विक जीवन का अनुयायी।

7. राधेश्याम शांडिल्य रचित वर्णमाला गीत का अंश:
क से करमचंद के घर में
मोहन हुए पोरबंदर में।
ख से खादी के क्या कहने
बिछावें, ओढ़ें, कातें पहनें।
ग से गर्व संत ने छोड़ा
और प्रेम से नाता जोड़ां
घ से घड़ी लगाते बापू
काम समय पर करते बापू।

संथाली, बघेली, कोरकू, हलबी जैसी कई आदिवासी भाषाओं के लोकगीतों में गांधी की गूंज है। कई लोकभाषाओं में गांधी को देवता या अवतार की तरह निरूपित किया गया है। बस्तर में तो नशाबंदी के गीतों में भी महात्मा के संदेश गूंजे हैं।

लोक साहित्य के विद्वान रामनारायण उपाध्याय ने लिखा, ‘गांधी के आने और चले जाने के बाद लिखी गयी कविताओं की अपेक्षा उन लोकगीतों का अधिक महत्व है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष किया और गांधी के जीवन-काल में उनका संग-साथ निभाया’।

यह भी जानने योग्य तथ्य है कि 20वीं सदी में हिंदी के अनेक नामचीन और प्रतिष्ठित कवियों ने गांधी के जीते-जी ही कविताएं लिखी थीं। उनकी हत्या के बाद तो लगातार साहित्य रचा जाता रहा। निराला का प्रसंग पढ़ने में आता है कि बापू के साथ उनकी भेंट उनकी अपेक्षानुरूप नहीं रही थी, जिससे निराला खिन्न रहे थे। फिर भी, भले ही चुटकी ली हो पर निराला भी गांधी पर कविता लिखने से ख़ुद को रोक नहीं सके।

इसी प्रकार, उर्दू साहित्य के भी नामवर शायरों ने गांधी के लिए अपने क़लम तोड़ दिये थे। गांधी केंद्रित काव्य और शायरी की सुदीर्घ परंपरा दरअसल उन दावों को ही बल देती है कि गांधी लोक में गहरे व्याप्त रहे थे।

‘लोकगीत की रस्सी’ से बंधने पर क्या बोले थे गांधी?

फ़ैज़पुर कांग्रेस अधिवेशन के समय लोकगीतों को लेकर प्रसिद्ध लेखक और लोक साहित्य के अध्येता देवेंद्र सत्यार्थी ने गांधीजी के साथ एक संवाद किया था, जिसे बाद में उन्होंने अपने लेखों और भाषणों में भी बराबर याद किया, ये अंश इस विषय पर गांधी की निष्काम भावना को प्रदर्शित करते हैं:

सत्यार्थी – और कोई नेता तो अभी लोकगीत की रस्सी से नहीं बंधा बापू… भारत के लोकगीतों में बुद्ध का नाम कहीं भी सुनायी नहीं देता और यह बुद्ध की जन्मभूमि के लिए लज्जा की बात है।
गांधी – बुद्ध के व्यक्तित्व में तो इससे कुछ अंतर नहीं पड़ा। लोकगीत की रस्सी में बंधकर ही कौन सुख मिलता है!
सत्यार्थी – जब बौद्ध धर्म को भारत से देश-निकाला दिया गया होगा, तब लोकगीतों से भी बुद्ध का नाम निकाल दिया गया होगा…
गांधी – रस्सी आख़िर रस्सी है। मुझे बंधना नापसंद है। यह बात बुद्ध को भी नापसंद रही होगी।
सत्यार्थी – यह तो बहुत पक्की नज़र आती है। अब आप इस रस्सी से छूटने के नहीं।
गांधी – यह भी हो सकता है कि कल ही मैं धरती से उठ जाऊं और मेरे पीछे लोकगीत से मेरा नाम हटाकर कोई दूसरा नाम जोड़ दिया जाये! मुझे तो ख़ुशी ही होगी!
सत्यार्थी – बुद्ध का नाम निकालकर लोगों ने जो भूल की थी, अब नहीं दोहराएंगे।
गांधी – जब मैं हूंगा न तुम, तब कौन देखने आएगा?

आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को विश्वास नहीं होगा कि गांधी जैसा हाड़-मांस का कोई इंसान सच में पैदा हुआ था। इतिहास के दार्शनिक टाॅयनबी ने प्रेम की नैतिकता के उत्थान के मामले में गांधी को जीसस क्राइस्ट से भी आगे कहा था और कई चिंतकों ने गांधी को बुद्ध के समकक्ष खड़ा किया। माउंटबैटन ने लिखा था, ‘गांधी को इतिहास में क्राइस्ट और बुद्ध के समकक्ष रखा जाएगा’। ये सब नाम विद्वानों के हैं और लोक के मन में गांधी की छवि देवता या मसीहा की रही, तो इतने भारी-भरकम विचारों या शब्दों में नहीं बल्कि सीधे, भोले और सरस शब्दों व वाणी में।

संदर्भ स्रोत:
1. साबरमती आश्रम, अहमदाबाद की चित्र वीथिकाएं
2. महात्मा गांधी 125वां जन्मवर्ष समारोह समिति, भोपाल द्वारा प्रकाशित ग्रंथ ‘गांधी लोकगीत’
3. एस.एन. शुक्ल विवि, शहडोल के कुलपति मुकेश कुमार तिवारी संपादित ग्रंथ ‘महिमामंडित मध्यप्रदेश में महात्मा गांधी’

(लेखक का यह लेख न्यूज़18 पर 2 अक्टूबर 2022 को प्रकाशित हुआ था, जिसे कुछ संशोधनों के साथ यहां प्रसंगवश प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तर कलाकार अनिता दुबे की कलाकृति का चित्र)

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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