
- October 3, 2026
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ख़बरनामा:200... इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को, इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....
हिंदी पत्रकारिता में 'अल्पसंख्यक': संदिग्ध या नागरिक?
200 साल में हिंदी पत्रकारिता ने जो “जनता” तैयार की है, उसमें मुसलमान, ईसाई और सिख कहाँ, कब, कैसे और किस रूप में दिखते हैं? और दिखते भी हैं या नहीं? इस सवाल का जवाब बहुत ख़ुशनुमा नहीं मिलता। ये सारे समुदाय हिंदी समाज का ही हिस्सा हैं, सदियों से हैं, हमारे-आपके जैसे सामान्य इंसान हैं, हिंदी ख़बरों में भी हैं। मगर बहुसंख्यकों की तरह अपने साधारण जीवन और उसकी हक़ीक़त के साथ नहीं। ये दिखते हैं विवाद में, अपराध में, दंगे में, धर्मांतरण में, चुनाव में या राष्ट्रीय सुरक्षा के फ़ुटनोट में।
200 की उम्रदराज़ हिंदी पत्रकारिता ने अल्पसंख्यकों को ग़ायब नहीं किया क्योंकि कर नहीं सकती। पर हिंदी मीडिया ने उसे अलहदा रखा है, “दूसरा” बनाया है, विशेषणों से नवाज़कर उसे विशिष्ट पहचान दी है, बाक़ायदा उसकी स्टीरियोटाइपिंग की है।
हिंदी पत्रकारिता का इतिहास औपनिवेशिक छपाई, मिशनरी प्रेस, फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, प्रशासनिक भाषा-नीतियों, नये शिक्षित हिंदू उच्चवर्ग और बाज़ार से बनी-गढ़ी एक बहुस्तरीय जटिल प्रक्रिया का नतीजा है। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज ने हिंदी, उर्दू समेत कई भारतीय भाषाओं के व्याकरण, शब्दकोश व्यवस्थित किये। मिशनरी प्रेस भी इसमें शामिल थी। यानी हिंदी पत्रकारिता के शब्द पाठ के पीछे औपनिवेशिक संस्थाएँ थीं, फ़ारसी-अरबी असर था, उसके पाठक बहुल समाज का हिस्सा थे। उत्तर भारत में लंबे समय तक हिंदवी, हिंदुस्तानी, रेख़्ता, ब्रज, अवधी, फ़ारसी, तुर्की जैसी कई भाषिक परंपराएँ रही थीं। अमीर ख़ुसरो से लेकर जायसी, कुतुबन, मंझन, रहीम और रसखान तक अलग-अलग पृष्ठभूमि के रचनाकारों ने इसे आकार दिया था।
लेकिन जैसे-जैसे हिंदी सार्वजनिक भाषा के रूप में संगठित हुई, उसने बहुलताएँ उठाकर ताक़ पर रख दीं और इसे शुद्ध संस्कृतनिष्ठ प्रोजेक्ट के रूप में गढ़ने का फ़ैसला किया। 19वीं सदी के दूसरे हिस्से में हिंदी पत्रकारिता का शरीर ऊँची जातियों के शिक्षित पुरुषों, हिंदू सुधार आंदोलनों और उभरते राष्ट्रवादी सार्वजनिक क्षेत्र से गठित हुआ। यह वह नींव है, जिस पर 20वीं और 21वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता खड़ी हुई है।
राष्ट्र बना, बहुसंख्यक “हिंदी समाज” भी
हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रवाद को उत्तर भारतीय जनमानस में लायी। उसने औपनिवेशिक शोषण, अकाल, कर, नस्ली भेदभाव और आर्थिक लूट पर टिप्पणियाँ कीं, अंग्रेज़ी सत्ता से सवाल पूछे और “राष्ट्र” को पाठकों की कल्पना में बसाया। हिंदी पत्रकारिता ने जिस “हिंदी समाज” की रचना की, वह कई बार भाषिक से ज़्यादा सांस्कृतिक और सांस्कृतिक से ज़्यादा धार्मिक था। शोध बताते हैं हिंदी आंदोलन ने धीरे-धीरे हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान को एक-दूसरे से जोड़ने वाली वैचारिकी आगे बढ़ायी।

संस्कृतनिष्ठ हिंदी और फ़ारसी-अरबी शब्दावली के बीच चुनाव धीरे-धीरे सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करने लगा। नागरी बनाम फ़ारसी लिपि का सवाल सिर्फ़ तकनीकी नहीं था। यह असल में शिक्षा, रोज़गार, अदालत, नौकरशाही, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मामला था। हिंदी पक्ष ने देवनागरी और हिंदी को बहुसंख्यक हिंदू समाज के अधिकार, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता से जोड़ा, उर्दू को हिंदुओं और मुसलमानों ने मुस्लिम शैक्षणिक-सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ा। हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी को सार्वजनिक भाषा बनाने में भूमिका निभायी और इस कोशिश में उसने भाषा को धार्मिक पहचान के साथ बाँधने का काम किया। “हिंदी बनाम उर्दू” को उसने धीरे-धीरे “हिंदू बनाम मुसलमान” के राजनीतिक व्याकरण में बदला।
इसका राजनीतिक फ़ायदा था, एक संगठित पाठक, एक साझा भाषा और एक असरदार राष्ट्रीय पहचान। मगर इसकी क़ीमत भी थी, उर्दू को मुसलमानों की भाषा और हिंदी को हिंदुओं की भाषा समझने की प्रवृत्ति। भाषा का झगड़ा शब्दकोश से निकला, समुदाय की पहचान तक गया और पत्रकारिता उसकी वाहक बनी।
अल्पसंख्यक कहाँ थे?
अल्पसंख्यक हिंदी समाज में थे, हिंदी की पत्रकारिता के पाठक थे, लेखक थे, प्रकाशन संसार का हिस्सा थे, भाषिक संस्कृति के निर्माता थे और सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं में हिस्सेदार थे। मगर हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उनकी मौजूदगी बिखरी हुई, गौण या सहयोगी की है, मुख्य कथा के निर्माता की नहीं। यानी ये सवाल हैं कि…
- क्या वो पाठक थे, लेकिन संपादकीय नेतृत्व में कम दिखते थे?
- क्या वो लेखक थे, लेकिन हिंदी साहित्य या पत्रकारिता के इतिहास में उनकी पहचान किसी दूसरी भाषिक परंपरा के भीतर रख दी गयी?
- क्या वो ख़बरों के विषय थे, पर ख़बर तय करने वाले, रिपोर्ट करने वाले या विशेषज्ञ के रूप में कम दिखायी देते थे?
अगर हिंदी के साहित्यिक और भाषाई इतिहास में हिंदवी, रेख़्ता, हिंदुस्तानी, ब्रज, अवधी और उर्दू सब साझा दुनिया थी और इनके लोग लिख रहे थे और अगर औपनिवेशिक उत्तर भारत का प्रेस बहुभाषी था, तो फिर आधुनिक हिंदी सार्वजनिक क्षेत्र में विविधता इतनी कमज़ोर क्यों दिखती है? इसका एक जवाब हिंदी की आधुनिक राजनीतिक बनावट में मिलता है। 19वीं और 20वीं सदी में हिंदी को शिक्षा, प्रशासन, पहचान और राष्ट्रवाद का प्रश्न बनाया गया। इसलिए हिंदी पत्रकारिता की ग़ैर-समावेशिता का इतिहास केवल “मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह” की कहानी नहीं है।
विभाजन के साथ हिंदी और उर्दू की सांस्कृतिक राजनीति को नयी राष्ट्रीय सीमाएँ मिलीं। भारत में हिंदी का राष्ट्रीय/राजकीय विस्तार हुआ, पर यह भी बहुभाषी भारत के साथ लगातार घर्षण का विषय रहा। संविधान सभा की बहसों से लेकर 1960 के दशक के भाषा आंदोलनों तक हिंदी को पूरे भारत की एकमात्र राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
क्या हिंदी मीडिया का “अल्पसंख्यक” नागरिक भी है?
भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक कोई एकसमान समुदाय नहीं हैं। 2011 की जनगणना कहती है कि तब मुस्लिम आबादी क़रीब 14.2 प्रतिशत, ईसाई 2.3 प्रतिशत और सिख 1.7 प्रतिशत थे। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक होना और किसी राज्य में अल्पसंख्यक होना नहीं है। पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं, नगालैंड, मिज़ोरम और मेघालय में ईसाई बहुसंख्यक हैं। इसलिए “अल्पसंख्यक” की स्थिति भूगोल, राज्य और स्थानीय समाज से भी तय होती है।
यह बात हिंदी पाठक पर भी लागू है। हिंदी का पाठक केवल उत्तर प्रदेश या बिहार का हिंदू पाठक नहीं है। हिंदी पढ़ने वाला मुसलमान भी हिंदी समाज में है, हिंदी बोलने वाला सिख भी, हिंदी में पढ़ने-लिखने वाला ईसाई भी। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और दूसरे हिंदी-प्रभावित इलाकों में धार्मिक पहचानें एक-दूसरे से अलग-अलग अनुपात में मौजूद रही हैं इसलिए “हिंदी समाज” की कोई भी परिभाषा जो किसी एक धर्म के बहुसंख्यक अनुभव को सामान्य मानती है, अधूरी ही रहेगी।
लेकिन पत्रकारिता में किसी समुदाय की जनसंख्या और उसकी दृश्यता एक ही चीज नहीं होते। समुदाय के लाखों लोग समाज में हो सकते हैं और फिर भी हो सकता है कि वह समुदाय ख़बरों में ख़ास तौर पर तभी दिखे जब कोई दंगा हो, आतंकवाद का आरोप हो, धर्मांतरण का विवाद हो, चुनाव हो, धार्मिक जुलूस हो या कोई अपराध हो, तो यहाँ से प्रतिनिधित्व का सवाल शुरू होता है।
मान लें कि हिंदी मीडिया में किसी डॉक्टर की मौत की ख़बर दी गयी है। तो इसके कई महीन पहलू होंगे। अगर ख़बर में लिखा जाता है, “डॉक्टर की मौत”, तो वह मूलत: हिंदू सवर्ण पुरुष है और नागरिक है। अगर लिखा जाता है, “मुस्लिम डॉक्टर की मौत”, तो एक अल्पसंख्यक की पहचान उजागर की गयी है। हालाँकि कभी-कभी यह ज़रूरी हो सकता है अगर मौत का संबंध धार्मिक पहचान से हो। किसी अपराध में आरोपी मुस्लिम है, तो “मुस्लिम” लिखा जाता है, हत्या का आरोपी सिख है, तो “सिख युवक” लिखा जाता है, स्कूल में पढ़ाने वाला ईसाई है, तो “ईसाई शिक्षक” लिखा जाता है। इस तरह हेडलाइन में और ख़बर में पहचान को लेकर हिंदी मीडिया उसे संकेतक बनाता है, और धीरे-धीरे सामुदायिक छवि गढ़ता है।
मुसलमान: पहचान का संकट
आज़ादी के आंदोलन के दौरान हिंदी पत्रकारिता ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध किया, पर राष्ट्रवादी भाषा हमेशा धार्मिक रूप से निष्पक्ष नहीं थी। 1920 और 1930 के दशकों में हिंदी पत्रकारिता के कुछ हिस्सों के आर्य समाज, हिंदू महासभा और दूसरे हिंदू संगठनों से संबंधों का उल्लेख मिलता है। हिंदी प्रेस के मालिकों और संपादकों के एक वर्ग के इनसे निकट संबंध थे।
स्थायी संदिग्ध
बँटवारे ने इस संबंध को और मज़बूती दी। आज़ादी के बाद मुसलमान “राष्ट्र के नागरिक” से “राष्ट्र की समस्या” में बदले, कभी पाकिस्तान की याद की वजह से, कभी सीमा, कभी निष्ठा, कभी आबादी और कभी सांप्रदायिक हिंसा के चलते। उनके लिए नागरिकता का प्रमाण-पत्र बार-बार संपादकीय टिप्पणियों में दिखता था।
तब से अब तक बस फ़र्क इतना हुआ है कि हिंदी मीडिया में मुसलमान को कुछ नये फ़्रेम्स मिल गये हैं, जैसे आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध और पुलिस कार्रवाई, सांप्रदायिक दंगा और भीड़, जनसंख्या वृद्धि और डेमोग्राफ़िक ख़तरा, धर्मांतरण या लव जिहाद जैसे राजनीतिक मिथक, वोट बैंक, मदरसा, हिजाब, मस्जिद और धार्मिक पहचान। समस्या तब होती है जब ये मामले पूरे मुस्लिम समुदाय की प्रतिनिधि तस्वीर बनते हैं। एक अध्ययन में भारतीय ख़बर मीडिया में मुसलमानों के चित्रण में अपराध, संघर्ष, जबरन धर्मांतरण और आतंकवाद जैसे विषय प्रमुखता से मिले।
वैसे मुसलमान हिंदी मीडिया में दो तरह से दिखता है। आरोपी है तो धर्म के साथ, पीड़ित है तो बेनाम। हिंदी मीडिया मुसलमान के आरोपी होने पर उसकी पहचान उसके समुदाय से करता है, पीड़ित होने पर उसकी पहचान वह “भीड़” में घोलता है। यह हिंदी पत्रकारिता का वह गणित है, जिसके बाद नागरिक के बतौर उनकी बराबरी सिर्फ़ पाठ्य-पुस्तकों में ही बची है।
कोविड-19 के दौरान तबलीग़ी जमात की कवरेज पर एक अकादमिक अध्ययन ने हिंदी और अंग्रेज़ी के चार दैनिकों में मुस्लिम समूहों को “एंटी-नेशनल”, “सुपर-स्प्रेडर” और “जिहादी” जैसे शब्दों से जोड़ने वाली प्रवृत्तियों की पड़ताल की। अध्ययन में इसे “दूसरे” के निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा गया। सवाल तबलीग़ी जमात की गतिविधियों पर ख़बर करने का नहीं है। सवाल यह है कि एक ख़ास घटना के लिए इस्तेमाल की गयी भाषा कब पूरे समुदाय के लिए एक शॉर्टकट बन जाती है।
वोट बैंक
हिंदी मीडिया में मुसलमानों को समझने का एक और लोकप्रिय शॉर्टकट है मुस्लिम वोट बैंक। इस वाक्यांश को वहाँ इतनी बार दोहराया गया है कि उसके चलते मुसलमानों के समाज के भीतर के भेद, वर्ग, जाति, क्षेत्र, शिक्षा और राजनीतिक ख़याल सबका मुरब्बा बनाकर उन्हें एक ही फ़्रेम में क़ैद कर दिया गया है। मानो मुसलमान हिंदी बेल्ट में एक मोनोलिथ कल्चर हो, जिसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही पहचान हो, उसका धर्म।
2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में है, क़रीब 3.8 करोड़, पूरे देश के कुल मुसलमानों का तक़रीबन 22 फ़ीसद। मगर संख्या ज़्यादा होने का मतलब उनकी राजनीतिक इच्छा की एकरूपता नहीं है और इसका कोई सुबूत किसी सर्वे के बतौर नहीं मिलता। बुनकर, किसान, शहरी पेशेवर, छोटे दुकानदार, दलित मुसलमान, पिछड़े मुसलमान, शिया, सुन्नी, देवबंदी, बरेलवी, महिलाएँ और युवा, सभी को वोट बैंक कहना वैसा ही है, जैसे पूरे हिंदी क्षेत्र को एक पाठक कहना। हिंदी की चुनावी पत्रकारिता ने मुसलमान को नागरिकों से घटाकर सीटों के समीकरण में बदल दिया है।
मुस्लिम और जेंडर
समस्या पहचान के भीतर मौजूद विविधता मिटाने की भी है। “मुस्लिम महिला” लिखना कभी-कभी ज़रूरी है, लेकिन अगर हर ख़बर में उसकी पहली पहचान धर्म है, तो उसकी दूसरी पहचानें, काम, वर्ग, शिक्षा, क्षेत्र, भाषा, जाति, पेशा, उम्र, सब पीछे चले जाते हैं। क्या हिंदी मीडिया को यह स्वीकार है कि कोई मुसलमान औरत एक वकील हो सकती है, किसान हो सकती है, इंजीनियर हो सकती है, घरेलू कामगार हो सकती है, छात्रा हो सकती है, पत्रकार हो सकती है, वैज्ञानिक हो सकती है। अगर हाँ तो हिंदी मीडिया की ख़बरों में ऐसा दिखता क्यों नहीं?
इसी तरह “मुस्लिम पुरुष” कोई एक सामाजिक चरित्र नहीं है, उसी तरह जैसे कोई “हिंदू पुरुष” नहीं है। भारतीय मुसलमानों के भीतर जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, पंथ, शिक्षा और राजनीतिक विचारों की बड़ी विविधता है। लेकिन ख़बर में समुदाय को एक सामूहिक इकाई के रूप में पेश करना आसान होता है। व्यक्ति कठिन है, समुदाय आसान है। यहीं हिंदी पत्रकारिता में सरलीकरण और सुविधा कभी-कभी समाज की जटिलता को नुक़सान पहुँचाती है और उसकी स्टीरियोटाइपिंग में मदद करती है।
ईसाई: सेवा से शक तक
ईसाई समुदाय का हिंदी पत्रकारिता के संसार में प्रवेश अक्सर दो रास्तों से होता है। पहला है स्कूल, अस्पताल, नर्सिंग, मिशनरी सेवा और शिक्षा और दूसरे पर है धर्मांतरण, विदेशी फ़ंडिंग और सांस्कृतिक ख़तरे का बोर्ड। हिंदी मीडिया में दिक़्क़त वहाँ शुरू होती है, जब वह संस्था की आलोचना और समुदाय पर संदेह के बीच फ़र्क मिटा देती है। किसी स्कूल की नीति, किसी संस्था की फ़ंडिंग या किसी कथित धर्मांतरण की जाँच करना सही है, लेकिन उसे “ईसाई षड्यंत्र” में बदलना राजनीतिक भाषा है, ख़बर क़तई नहीं। जब मिशनरी या कॉन्वेंट स्कूल की फ़ीस, अस्पताल के श्रम-संबंध, चर्च की संपत्ति या समुदाय की सामाजिक गतिशीलता पर रिपोर्टिंग होनी चाहिए, तब बहस का केंद्र ख़बर में धर्मांतरण पर जाता है।

एक ख़बर की हेडलाइन थी, “प्रलोभन, प्रार्थना और फिर बवाल!: सभा की आड़ में चल रहा था धर्म परिवर्तन का खेल, तीन पादरियों समेत 11 गिरफ़्तार।” ख़बर में पुलिस कार्रवाई और धर्मांतरण की शिकायत के आधार पर हिरासत का ज़िक्र था। मगर आरोप की ख़बर करना और आरोप को सिद्ध तथ्य की तरह पेश करना दो अलग चीज़ें हैं।
ईसाई समुदाय को भी हिंदी मीडिया ने शायद ही कभी उसकी आंतरिक विविधता के साथ देखा हो। अगर किसी पाठक को हिंदी मीडिया की ख़बरों के ज़रिये ईसाई समुदाय की छवि बनानी हो, तो उसे कितने ऐसे संदर्भ मिलेंगे, जिनमें ईसाई सिर्फ़ भारत के सामान्य नागरिक हों? क्या उसकी ख़बरों में स्कूल चलाने वाला व्यक्ति, अस्पताल में काम करने वाली नर्स, छोटे शहर का शिक्षक, पूर्वोत्तर का किसान, केरल या गोवा से आया मज़दूर, हिंदी सीखने वाला ईसाई छात्र, ये सब दिखते हैं? इन सबको मिलाकर हिंदी मीडिया के पास एक ही शब्द है, मिशनरी, जो संपादकीय सरलीकरण होता है या फिर जान-बूझकर किया गया विवाद-केंद्रित चयन। ईसाई प्रतिनिधित्व की समस्या केवल नकारात्मकता की नहीं, उसकी ग़ैरमौजूदगी की भी है।
सिख: पगड़ी से ख़ालिस्तान तक
सिखों के साथ हिंदी मीडिया का संबंध अलग तरह की समस्या दिखाता है। सिखों की ख़बरें अक्सर पंजाब, किसान आंदोलन, ख़ालिस्तान, सीमा, सुरक्षा या धार्मिक विवाद के संदर्भ में मिलती हैं। ख़ालिस्तानी आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़ी ख़बरें निश्चित रूप से सार्वजनिक महत्व की हैं। किसी व्यक्ति या संगठन की गतिविधि को रिपोर्ट करना पत्रकारिता का काम है। लेकिन ख़ालिस्तानी और सिख समानार्थी शब्द कैसे हो गये?
दैनिक जागरण की एक ख़बर का शीर्षक था, “ख़ालिस्तानी आतंकी पन्नू ने फिर उगला ज़हर… पहलगाम हमले के बाद सिख सैनिकों से कहा…” इस ख़बर का विषय गुरपतवंत सिंह पन्नू का कथित संदेश और भारतीय सेना में सिख सैनिकों को संबोधित करने का उसका प्रयास था। ऐसी सुर्ख़ियों में “ख़ालिस्तानी” और “सिख सैनिक” के बीच संबंध ख़ुद ख़बर का हिस्सा है। लेकिन पढ़ने वाले के मन में इससे जो बड़ा सवाल बनता है वह अलग है, क्या हिंदी पत्रकारिता सिख समाज को उसके पूरे सामाजिक जीवन में देखती भी है?
सिख सैनिक है तो किसान भी है, व्यापारी है, प्रवासी है, खिलाड़ी है, संगीतकार है, विद्यार्थी है, डॉक्टर है, उद्योगपति है, मज़दूर है, कलाकार है और पंजाब से बाहर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाला एक सामान्य नागरिक भी है। उनका सामान्य नागरिक जीवन, कारोबार, पढ़ाई-लिखाई, प्रवास, महिलाओं का श्रम, युवाओं की आकांक्षाएँ और सिखबहुल छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था, हिंदी में कम ही ख़बर बनते हैं। पगड़ी दिख गयी, तो हिंदी के पत्रकार को लगता है कि चरित्र-चित्रण पूरा हो गया है। कई बार उनकी दाढ़ी और कृपाण पूरे समुदाय की जगह ले लेते हैं। अध्ययनों में सिखों को बाहरी प्रतीकों और रूढ़ छवियों तक सीमित किये जाने की बातें सामने आ चुकी हैं। हिंदी ख़बरों में वह सिर्फ़ एक अल्पसंख्यक पहचान है। इसलिए सिख प्रतिनिधित्व की समस्या केवल “नकारात्मक कवरेज” नहीं है, संदर्भ के छोटे होने की भी है।
सांप्रदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग
200 साल की हिंदी पत्रकारिता का एक पहलू यह है कि वह हिंसा को अक्सर घटना की तरह और समुदायों को दृश्य सामग्री की तरह पेश करती है। मसलन, “दो समुदायों में तनाव” जैसी भाषा कई बार हिंसा की असमानता को छिपा लेती है। कौन मरा, किसकी दुकान जली, किसने हमला किया, किसने प्रशासन को बुलाया, किसकी एफ़आईआर दर्ज हुई, ये सवाल “तनाव” शब्द के नीचे जान-बूझकर छिपाये जाते हैं।
पीड़ितों की धार्मिक पहचान छिपायी जाती है। हिंदी पत्रकार का तर्क होता है कि इससे तनाव नहीं बढ़ेगा। हो सकता है यह सावधानी हो, लेकिन जब यह सावधानी केवल अल्पसंख्यक पीड़ितों को लेकर अपनायी जाती है और बहुसंख्यक पीड़ितों की पहचान को भावनात्मक विस्तार दिया जाता है, तब संयम भी पक्षपाती हो जाता है।
दूसरी ओर, आरोपी की धार्मिक पहचान को बिना संदर्भ उजागर करना सनसनी पैदा करता है। प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया सांप्रदायिक विवादों पर ख़बरों में उचित तथ्य-जाँच, सावधानी और संयम की बात करता है। मगर यह नियम बस काग़ज़ पर है, स्क्रीन पर उसका पोस्टमॉर्टम उसी तरह होता है जैसा हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक बनावट में दर्ज है।
अल्पसंख्यकों की कवरेज में शब्द बस शब्द नहीं रहते। वे संदिग्धता के छोटे-छोटे उपकरण होते हैं। “मुस्लिम युवक” कई बार अपराध की ख़बर में इतनी आसानी से आता है जैसे धर्म घटना की वजह हो, “ईसाई मिशनरी” को “धर्मांतरण गिरोह” बनाने में सिर्फ़ दो शब्द ख़र्च होते हैं, “सिख प्रदर्शनकारी” को “ख़ालिस्तानी” बनाने में एक आरोप काफ़ी है, “मुस्लिम भीड़” भी बराबर सुनायी देता है, लेकिन उसकी राजनीतिक प्रस्तुति संदर्भ के अनुसार अलग हो सकती है।
इसी तरह तुष्टिकरण, कट्टरपंथी, राष्ट्रविरोधी, घुसपैठिया, जनसंख्या विस्फोट, धर्मांतरण माफ़िया, ये हिंदी पत्रकारिता के सिर्फ़ शब्द नहीं हैं। अमूमन ये तथ्य से ज़्यादा निष्कर्ष हैं। इन्हें पत्रकार उद्धरण चिह्नों में नहीं रखते बल्कि यूँ इस्तेमाल करते हैं जैसे कोर्ट का फ़ैसला हों। एक ख़बर में “आरोप” को “सत्य” की तरह लिखना भाषाई ग़लती नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह का नतीजा है। और जब आरोप किसी धार्मिक समुदाय से जुड़ा हो, तो उसकी सामाजिक क़ीमत व्यक्ति से कई गुना बड़ी हो जाती है।
प्रतिनिधित्व और न्यूज़रूम
2011 की जनगणना के आधार पर देखें, तो मुसलमानों को हिंदी पत्रकारिता में ज़रूरी दृश्यता मिलनी चाहिए, पर दृश्यता और प्रतिनिधित्व अलग-अलग चीज़ें हैं। हो सकता है मुसलमानों की ख़ूब चर्चा हो, पर वो बोलते कम दिखें। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें किसी व्यक्ति के बारे में लगातार चर्चा हो पर उसे ही बातचीत में न बुलाया जाये।
एक और अहम सवाल है, हिंदी मीडिया की ख़बरों में आवाज़ किसकी है? किसी मुस्लिम मुद्दे पर एक मौलाना को बुला लेना मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है, किसी सिख मुद्दे पर किसी सिख धर्मगुरु को बुलाना सिख प्रतिनिधित्व नहीं है, ईसाई विवाद पर किसी पादरी को बुलाना ईसाई समाज की आवाज़ को जगह देना नहीं होता। समुदाय के भीतर भी वर्ग, जाति, क्षेत्र, शिक्षा, लिंग, पीढ़ी और राजनीतिक विचारों की विविधता होती है। एक मुस्लिम महिला का ख़याल किसी मौलाना से अलग हो सकता है। एक दलित सिख की सामाजिक स्थिति किसी जाट सिख की स्थिति से अलग हो सकती है। एक आदिवासी ईसाई का अनुभव किसी महानगरीय ईसाई पेशेवर से अलग हो सकता है।
दूसरी बात, प्रतिनिधित्व का सवाल केवल छपी हुई ख़बरों का भी नहीं है, न्यूज़रूम के गठन का भी है। 2019 में ऑक्सफ़ैम इंडिया और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट ने 50 मीडिया संस्थानों के न्यूज़रूम और उनके कॉन्टेंट में सामाजिक प्रतिनिधित्व की पड़ताल की थी। हालाँकि यह अध्ययन धार्मिक अल्पसंख्यकों के न्यूज़रूम प्रतिनिधित्व का सर्वे नहीं था। लेकिन यह एक बड़ा संपादकीय प्रश्न ज़रूर खड़ा करता है कि जिस न्यूज़रूम में सामाजिक अनुभवों की विविधता ही सीमित हो, वहाँ ख़बरों के चयन और भाषा में विविधता ख़ुद-ब-ख़ुद और कैसे आ जाएगी? क्या ऐसे में एक ही तरह के लोगों के बीच सामाजिक अनुभव केंद्रित होने से ब्लाइंड स्पॉट पैदा नहीं होंगे। इसलिए यह सिर्फ़ प्रतिनिधित्व का मामला नहीं है।
दूसरी बात, हिंदी न्यूज़रूम्स में अगर ग़लती से कोई मुस्लिम, ईसाई या सिख पत्रकार आ गया है, तो उसे अक्सर “उसके अपने समुदाय” की ख़बरों तक सीमित रखा जाता है। बहुसंख्यक पत्रकार को सामान्य राष्ट्रीय पत्रकार माना जाता है, अल्पसंख्यक पत्रकार को समुदाय-विशेष का संवाददाता। यही वह झीनी-सी दीवार है जो भेदभाव को नियुक्ति-पत्र की भाषा में नहीं, काम बाँटने की भाषा में दर्ज करती है। नतीजा यह कि मुस्लिम समुदाय पर ख़बर लिखने के दौरान पुलिस अफ़सर, हिंदू संगठन, मंत्री और टीवी पैनलिस्ट उपलब्ध रहते हैं, मुस्लिम नागरिक सबसे अंत में याद आता है। ईसाई समुदाय पर रिपोर्टिंग में पादरी या सरकारी अधिकारी बोलते दिखते हैं, स्थानीय ईसाई महिला, नर्स, शिक्षक या विद्यार्थी नहीं। सिखों के मामले में बहस में राजनीतिक प्रवक्ता आते हैं, छोटे शहर का सिख व्यापारी या छात्र कैमरे से दूर होता है।
उत्तर भारत की असंवेदनशीलता
हिंदी पट्टी में अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी रहती है और सदियों लंबा साझा इतिहास है। फिर भी इस इलाक़े की पत्रकारिता में अल्पसंख्यकों के जीवन के प्रति एक विचित्र दूरी दिखती है। यह दूरी भौगोलिक नहीं, अक्सर सामाजिक है। पत्रकार उसी शहर में रहता है, उसी बाज़ार से गुज़रता है, उसी अस्पताल में इलाज कराता है, पर ख़बर लिखते समय उसका देखा-जाना समुदाय अचानक “दूसरा” बन जाता है। मोहल्लों की साझी अर्थव्यवस्था, साझा बोली, साझा स्कूल, साझा श्रम और साझा संकटों के बावजूद ख़बर का फ्रेम अलगाव पैदा करता है।
पाठक को बताया जाता है कि शहर में “हिंदू क्षेत्र” और “मुस्लिम क्षेत्र” हैं, पर यह नहीं बताया जाता कि दूध कौन पहुँचाता है, कपड़े कौन सिलता है, रिक्शा कौन चलाता है और किराया किससे लिया जाता है, कौन किसके साथ कहाँ मिलकर काम करता है।
हिंदी पत्रकारिता ने उत्तर भारत के समाज को कई बार उसी तरह पढ़ा है, जैसे नक्शा बनाने वाला सड़क के किनारे रहने वालों को नहीं, केवल सड़क को देखता है। आबादी दिखती है, पर उसमें धड़कता हुआ जीवन नहीं दिखता।
हिंदी पत्रकारिता ने कई बार अल्पसंख्यकों के पक्ष में भी आवाज़ उठायी है, लेकिन केवल अच्छे संपादकीयों से रुख़ तय नहीं होता। यह रुख़ उसके मौन, शब्दावली और ग़ैर-मौजूदगी से ज़्यादा तय होता है। किसी समुदाय के पक्ष में लिखे गये कुछ अच्छे लेख उस दीर्घकालीन संरचना को रद्द नहीं करते, जिसमें वही समुदाय अमूमन संदिग्ध, पीड़ित या अनुपस्थित रहता है। हिंदी पत्रकारिता की समस्या यह नहीं कि उसने कभी समावेशी लेख नहीं लिखे। समस्या यह है कि उसने समावेशिता को स्थायी संपादकीय स्वभाव नहीं बनाया है।
हिंदी टीवी: “दूसरा” ग्राफ़िक बना
प्रिंट में हेडलाइन तो टेलीविज़न में हेडलाइन के साथ चेहरा, आवाज़, संगीत, ग्राफ़िक्स, टिकर, एंकर का स्वर और बहस का मंच भी आता है। इससे अल्पसंख्यक पहचान की प्रस्तुति और अधिक नाटकीय हो जाती है। “जिहाद” शब्द के साथ किसी समुदाय का चेहरा बार-बार दिखाना, “ख़ालिस्तान” के साथ सिख पगड़ी को दिखाना, “धर्मांतरण” के साथ चर्च या पादरी को दिखाना।
टीवी में दृश्य शब्दों के साथ मिलकर अर्थ बनाते हैं। इसलिए टीवी पत्रकारिता में यह भी देखना चाहिए कि किसे स्क्रीन पर दिखाया, किसे बोलने दिया, किसे चिल्लाने दिया, किसकी बात काटी, किसे विशेषज्ञ बनाया, किसे आरोपी दिखाया, किस समुदाय को बार-बार एक ही प्रकार के विज़ुअल्स से जोड़ा गया? यहीं से “प्रतिनिधित्व” एक तकनीकी शब्द नहीं रह जाता। वह एक प्रोजेक्ट बनता है, जो सार्वजनिक कल्पना को गढ़ता है।
हिंदी डिजिटल: रूढ़ियों की री-पैकेजिंग
हिंदी में डिजिटल पत्रकारिता ने इन ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों का उत्पादन सस्ता बना दिया है। पहले सांप्रदायिक शीर्षक के लिए संपादकीय बैठक की ज़रूरत पड़ती थी। अब इसकी ज़रूरत नहीं। पुराने फ़्रेम नये शब्दों में लौटे हैं, जैसे, “जनसंख्या” अब ग्राफ़िक है, “धर्मांतरण” अब वायरल वीडियो है, “मोहल्ले का तनाव” लाइव लोकेशन है, “संदिग्ध युवक” क्लिकबेट है और “समुदाय की प्रतिक्रिया” अब ट्रैंडिंग हैशटैग है।

डिजिटल माध्यम ने अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व के नये मौक़े दिये हैं तो बहुत-सी नयी चुनौतियाँ भी। डिजिटल युग ने समस्या ख़त्म नहीं की। अब हेडलाइन का फ़ैसला कोई संपादक नहीं करता। एसईओ, प्लेटफ़ॉर्म एल्गोरिद्म, थंबनेल, रिकमंडेशन सिस्टम, एंगेजमेंट रेट, सोशल मीडिया शेयरेबिलिटी करते हैं। और आउटरेज अक्सर साधारण ख़बर से ज़्यादा तेज़ी से फैलते हैं। आज “दूसरा” बनाने का तरीक़ा बदल गया है।
तो हिंदी पत्रकारिता हमेशा “दूसरा” गढ़ती है?
असल में समस्या कहीं ज़्यादा जटिल है। एक ही पत्रकारिता में लोकतांत्रिक विस्तार और सांस्कृतिक बहिष्करण दोनों रहे हैं। सवाल सिर्फ़ मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों का नहीं, “सामान्य” का है। असल में किसे “सामान्य” माना गया? हिंदी पत्रकारिता ने किसे “जनता” कहा, किसे “समुदाय” कहा, किसे “मामला” कहा और किसे “राष्ट्रीय हित” के नाम पर चुप कराया, यही उसके लोकतांत्रिक चरित्र का असल लेखा-जोखा है।
अगर हिंदू ख़बर में केवल “व्यक्ति” है और मुसलमान बार-बार “मुस्लिम व्यक्ति”, तो क्या इस पत्रकारिता का चरित्र लोकतांत्रिक हो सकता है। अगर सिख व्यक्ति को “सिख युवक” और ईसाई को “ईसाई युवक” कहना हेडलाइन के लिए आकर्षक माना जाता है, पर हिंदू व्यक्ति को केवल “युवक” कह दिया जाता है, तो भाषा ख़ुद एक हायेयार्की बनाती है।
इसलिए हिंदी पत्रकारिता के 200 साल का सबसे कठिन प्रश्न शायद यह नहीं है कि उसमें “अल्पसंख्यकों को कितनी जगह मिली?” सवाल यह है कि उन्हें हिंदी “जनता” बनने के लिए कितनी बार अपनी धार्मिक पहचान के साथ ख़बर में आना पड़ा? और क्या हिंदी पत्रकारिता ऐसा सार्वजनिक संसार बना पायी जिसमें मुसलमान, सिख और ईसाई “अल्पसंख्यक” होकर भी केवल अल्पसंख्यक न रहें बल्कि सामान्य नागरिक, पाठक, लेखक, पत्रकार, विशेषज्ञ और ख़बर के स्वाभाविक पात्र बन सकें? क्योंकि “अल्पसंख्यक” मनुष्य की पूरी पहचान नहीं है, वह महज़ एक राजनीतिक और सांख्यिकीय श्रेणी है।
तो क्या हिंदी पत्रकारिता मुसलमान को “मुस्लिम” होने से मुक्त कर सकती है? एक अजीब-सा सवाल लग सकता है, मगर 200वें साल में ज़िम्मेदारी यही है। मुसलमान, सिख, ईसाई और सभी अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित करना नहीं, बल्कि उन्हें केवल उसी पहचान तक सीमित न रखना। जहाँ प्रासंगिक न हो, वहाँ व्यक्ति को केवल समुदाय का प्रतिनिधि बनाकर न पेश करना।
हिंदी पत्रकारिता की असली समावेशिता शायद उसी दिन पूरी होगी जब वे ख़बर में होंगे, क्योंकि वो हिंदी समाज में तो हैं।

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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