सिनेमा को ‘वैचारिक’ बनाने वाला पहला फ़िल्मकार

पहले विश्वयुद्ध के बीच रूस की क्रांति ने एक फ़िल्मकार को उभारा, जिसने पहली बार सिनेमा को वैचारिकी का माध्यम बनाने का सफ़र शुरू किया। इस सफ़र में वह...

‘मुल्क’ से बदलते सिनेमा का अनुभव

सिनेमा जगत में एक ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी आज़ादी का माहौल है तो दूसरी ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी पाबंदी का। इस बीच एक...

रंग-बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियाँ-9

नियमित ब्लॉग विवेक मेहता की प्रस्तुति…. रंग-बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियाँ-9               हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों...

ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?

नियमित कॉलम भवेश दिलशाद की कलम से…. ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?              महाकाव्यों का सबसे बड़ा विरसा होता है कि ये देश...

क्यों पढ़ना चाहिए ‘डेथ इन वेनिस’?

मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से…. क्यों पढ़ना चाहिए ‘डेथ इन वेनिस’? मैंने लगभग चार महीने पहले थॉमस मान कृत ‘द मैजिक माउंटेन’ पढ़ा था। वह लंबी अवधि...

हिंदी पत्रकारिता का भारत-बोध

ख़बरनामा:200… इस साप्ताहिक शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने...

शहीद के मान के लिए सैकड़ों धरने पर, प्रशासन मौन

प्रयागराज में एसआरएन अस्पताल के नामकरण को लेकर आंदोलन नौवें दिन भी जारी, क्या भुला दी जाएगी शहीद रोशन सिंह की कीर्तिगाथा? शहीद के लिए सैकड़ों ने किया प्रदर्शन,...
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