
- April 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
आशा भोसले: वर्जनाओं के विरुद्ध...
कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो एक या कुछ पीढ़ियों को न सिर्फ़ मुतास्सिर करते हैं बल्कि आकार तक देते हैं।
हम उस पीढ़ी के हैं, जिनकी जवानी से कुछ पहले तक रेडियो का मतलब आकाशवाणी था और टीवी का मतलब दूरदर्शन या डीडी चैनल्स। कैसेट और बाद में सीडी भी स्रोत बने, पर इस पीढ़ी की सांगीतिक परवरिश के दो बड़े स्रोत यही थे। 50 और उसके बाद के दशकों के मुख्य गायकों की आवाज़ें हमारे ज़ेह्नों और हमारे दिलों में रची-बसी रहीं।
सबकी अपनी पसंद हुआ करती थी। मुझे याद है मेरे आसपास किशोर कुमार के चाहने वाले हमेशा ज़ियादा थे। रफ़ी और मन्ना डे के मुरीदों में ज़ियादातर उम्रदराज़ हुआ करते थे। स्त्री स्वरों में तो एक ही आवाज़ का तक़रीबन एकछत्र राज था। गाहे-ब-गाहे कोई दूसरा नाम किसी की ज़बान पर आये तो आ जाये। इस माहौल में पनपते हुए, बहुत कुछ सुनते-गुनते हुए, बनती-बिगड़ती-बदलती पसंद के बाद जब हम ठीक से जवान हो गये, मुझे याद है तबसे मैंने अपने पसंदीदा गायकों के बारे में जब भी किसी से बात हुई तो रफ़ी और आशा भोसले का नाम लेने में कभी कोई हिचकिचाहट नहीं रही।
ज़ाहिर है दूसरे गायक भी मुझे बहुत पसंद रहे हैं। बल्कि एक अच्छी-ख़ासी लिस्ट है और कइयों में कोई न कोई बात ऐसी रही है, जिसने क़ायल किये रखा। फिर भी दिल है कि मानता नहीं और कुछ एक नामों पर बार-बार ख़ुद को लुटा आता। उन नामों में से एक हमेशा आशा भोसले रहा और रहेगा। फिर यूं भी होता है कि जिसे आप चाहते हैं, उसके बारे में जानना भी चाहते हैं, समझना भी।
जिस दौर में आशा की आवाज़ गूंजना शुरू हुई, वह एक बनी हुई परंपरा से मोहभंग का दौर था। देश, समाज और कलाजगत में एक बदलाव का समय। पुरानी ख़ास क़िस्म की आवाज़ों के एवज़ नयी ख़ास क़िस्म की आवाज़ें सुनने वालों के कानों में पड़ने लगी थीं। गायकी में मधुरता के सौंदर्य का वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक आदर्श बनाने के लिए कुछ भी योजनाबद्ध न हुआ होगा, ऐसा मानने को मन तैयार नहीं होता। और जब एक चरित्र खड़ा किया गया तो इसके आस-पास जो भी मानसिकता रही, उसे मैं उस वक़्त के सुगम-संगीत जगत के ब्राह्मणवाद की तरह समझ सकता हूं। हालांकि यह कम वक़्त में पनपा था, लेकिन यह इतनी जल्दी इतना रूढ़ होता गया कि इसे तोड़ना, इसका विरोध करना और इससे अलग सुर छेड़ना मुश्किल होता चला गया। यह विषय विस्तार चाहता है, पर इस ब्लॉग में ख़ास तौर से मैं आशा जी पर बात करना चाहता हूं, ऐसे कुछ ख़ास पहलुओं से।
आशा: तुमुल कोलाहल कलह में
आशा जी से कभी मुलाक़ात न हो सकी। मैंने उन्हें रेडियो, पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और बतकहियों के ज़रिये ही जाना। उनके गीत-संगीत और रागरंग से ही उन्हें महसूस किया। एक वार्ता में वह गुलज़ार और आर.डी. से तपाक से कह पड़ीं, “आप लोगों ने ज़ियादा कमाल की धुनें और नग़मे दीदी को ही दिये”! ईर्षा? कोई उलाहना? है भी तो आशा जी एक रिकॉर्डिंग में ऐसा कह गयीं, जिसे सदियों सुना जाता रहेगा!

उनके इस तपाकपन को कैसे समझा जाये? उनके पूरे कृतित्व को एकबारगी रीकलेक्ट करता हूं तो फिर लगने लगता है, क्या ग़ज़ब की क्रिएटिव एनर्जी रही होगी उनकी! बार-बार कुछ नया करने की इच्छा ने उन्हें कैसे-कैसे प्रयोगों की दुनिया का दीदार करवाया होगा! कितना कुछ उनके मन में रह गया होगा! ऊर्जा से लबरेज़ ऐसे मन को उन्होंने कैसे संभाला होगा! मुझे पता है ऐसे कलाकार जानलेवा तनहाई के शिकार होते हैं, तो उनकी तनहाई के क्या मायने रहे होंगे…
आशा: क़तरा-क़तरा मिलती है
सांसों के साथ खेलकर धुनों को सजाती रही आशा जी के लिए संगीत खेल नहीं रहा, लेकिन शायद ज़िंदगी किसी खेल से कम न रही हो। उन्होंने संगीत की तरह ही ज़िंदगी में भी नये प्रयोगों और तजरुबों करने का साहस दिखाया। 1950-60 के दशक का भारतीय समाज कोई बहुत तरक़्क़ीपसंद या ख़ास तौर से औरतों के लिए बहुत खुले मन का समाज तो नहीं था। ऐसे वक़्त में जात-बाहर शादी करना, उस शादी से कुछ ही सालों में अलग हो जाना, अलग होने के बाद भी उस शादी से मिले सरनेम को अपनाये रखना, प्रेम में पड़ना, प्रेम में पड़ने को स्वीकार करना, दूसरी शादी करना, वह भी कम उम्र के पुरुष के साथ..!
वर्जनाओं को तोड़ते रहने, अपने आप को एक मुश्किल सच के सामने खड़ा कर देने और जीवन के साथ प्रयोग करते रहने की उनकी एक अलग और लंबी दास्तान रही। एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी आशा जी के लिए क़दम-क़दम पर कितनी चुनौतियां रही होंगी और मुझे लगता है जब न रही होंगी तब उन्होंने ख़ुद ही रची होंगी और उनसे जूझी होंगी। इसे चंचलता नहीं मैं फ़ितरत कहना चाहूंगा, उनकी शख़्सियत की बनत का ताप था यह और यही ताप उनके संगीत में भी बराबर महसूस होता रहता है।
आशा: हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहां तक
उन्होंने गायकी की एक से एक विधा में ख़ुद को चुनौती दी, लक्ष्य तय किया और हासिल करने के लिए जी-जान से लग गयीं। न कभी फ़ॉर्म की फ़िक्र न भाषा और देश की सीमाओं की, उन्हें जैसे बस गाते चले जाना था, सब कुछ गुनगुना लेना था। झरने और नदी का संगीत क्या है, उन्हें जैसे सिर्फ़ यह नहीं देखना था बल्कि कुएं की अंधी गहराइयों में पानी का नाद क्या है, समन्दर के भीतर लहरें कौन-सा राग मथती हैं… जैसे वह सब कुछ जान लेना, पा लेना चाहती थीं!
तुलना करने वाले उनकी दीदी के बरअक्स उन्हें तोलते रहते हैं और ‘वह आत्मा थीं तो यह शरीर थीं’ जैसे जुमले उछाल देते हैं। अव्वल तो आशा जी की गायकी को सिर्फ़ शरीर समझना भूल है। बेशक उनके सुर आपकी रूह के तार झनझनाने की ताक़त रखते हैं। दूसरे, मुझे लगता है वह ऐसी किसी भी तुलना से परे थीं। महान कलाकार अतुलनीय ही होते हैं। आशा जी महान कलाकार थीं और रहेंगी। उन्होंने कला के अपने रास्ते और क़दमों के निशान बनाये, जिनसे आने वाली पीढ़ियों को बड़ी मदद भी मिली और आगे भी मिलती रहेगी।
हां, याद आया जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने अभिनय का रुख़ भी किया और ‘आई’ उर्फ़ ‘मां’ फ़िल्म में केंद्रीय किर्दार निभाया। कुल मिलाकर जोखम और साहस को आशा जी ने भरपूर जिया। संगीत हो या जीवन। कम्फ़र्ट ज़ोन में न फंसे रहने के लिए, समाज की हो या संगीत की – ब्राह्मणवादी मानसिकता से टकराने के लिए, एक बेबाक, बिंदास मन से जीने के लिए और एक अलहदा पहचान के सफ़र के लिए आशा भोसले हमेशा याद आएंगी।
जाने क्यूं मुझे सपाट, चौरस, बनी-बनायी और बोरिंग राह पर चलते रहने वाले यानी लकीर पीटने वाले जीवन कभी खींच पाये भी नहीं। जहां ऊबड़-खाबड़-सा कुछ है, जहां उतार-चढ़ाव बहुत हैं, बेचैनियां हैं, छटपटाहटें हैं यानी जहां ड्रामा भरपूर है, ज़िंदगी वहीं है और वही मुझे अज़ीज़ भी रही है। मुझे इस तरह आकार देने में आशा जी जैसी ज़िंदगियों का भी तो कितना हिस्सा रहा होगा… और उन्होंने आपको भी तो किसी तरह से ढाला होगा!

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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