markandeya, cartoon, sahityakar
नियमित ब्लॉग विवेक मेहता की प्रस्तुति....

रंग-बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियाँ-9

              हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को प्रस्तुत करने की इस शृंखला में पाठकों की रायशुमारी और भागीदारी की भी अपेक्षा है। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए और अगर आपके पास भी ऐसे क़िस्से/प्रसंगों की यादें हैं तो हमारे साथ साझा कीजिए अपना ख़ज़ाना…

markandeya, cartoon, sahityakar

अनुवाद का अनुवाद

मार्कंडेय ने अमरकांत से कहा, “देख रहा हूँ आजकल हिंदी में अनूदित साहित्य बड़े चाव और सम्मान से पढ़ा जाता है।”

“ऐसा करो मार्कंडेय, तुम्हारी जो कहानियाँ रूसी में अनुवाद होकर छपी हैं, उनका फिर से हिंदी में अनुवाद करवाकर छपवा दो, लोग तुम्हें भी चाव और सम्मान से पढ़ने लगेंगे।” अमरकांत ने सुझाया।

(इस वर्ष मार्कंडेय का शताब्दी वर्ष चल रहा है।)

***

खेद सहित रचना वापस

धर्मवीर भारती तथा श्रीकांत जोशी एक स्टॉल पर चाय पी रहे थे। एक युवा लेखक ने अपने साथी से कहा, “देखो, वो रहे ‘धर्मयुग’ के संपादक। चलो, जल्दी चलो। उनसे ऑटोग्राफ़ ले लें। नहीं तो चले जाएँगे।”

“क्यों जल्दी करते हो, एक रचना भेज दो। ऑटोग्राफ़ सहित वापस आ जाएगी”- उसके भुक्तभोगी लेखक साथी ने कहा।

(मध्य प्रदेश के मंदसौर में जन्मे ‘अनुत्तर योगी: तीर्थंकर महावीर’ के लेखक, वीरेंद्र कुमार जैन के लिखे व्यंग्य का अंश)

***

लेखक का पत्र संपादक को

प्रियवर संपादक जी
सादर अभिवादन।
आपकी रचना लौटाने वाली ‘स्लिपें’ हमारे पास बहुत अधिक संख्या और मात्रा में एकत्रित हो गयी हैं। हमें खेद है कि हम इनका किसी भी प्रकार का उपयोग कर सकने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं (रद्दीवाला भी इन्हें नहीं खरीदता)। अतः आपको उक्त स्लिपें लौटायी जा रही हैं, जिससे कि अन्य लेखकों की रचनाओं के लिए आप इनका उपयोग कर सकें। इसे आप अपनी संपादन-कला के महत्त्व पर किसी प्रकार का आक्षेप न समझें।
धन्यवाद।

संलग्न:
१ किलो वापसी स्लिपें

भवदीय
लेखक

***

पीकर देखिए

डॉ. रांगेय राघव सिगरेट बहुत पिया करते थे। एक बार डॉ. राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने उनका ध्यान सिगरेट की बुराइयों की ओर दिलाया और इस पर उन्होंने एक लेख भी लिखकर डॉ. रांगेय राघव को दिखाया। पढ़कर डॉ. रांगेय राघव ने कहा, “रचना बहुत अच्छी है, किंतु आप सिगरेट पीकर देखिए, वह इससे भी अच्छी है।”

***

काश, हम भी!

राजभाषा विधेयक के विरोध में श्री सुमित्रानंदन पंत, श्रीमती महादेवी वर्मा और सेठ गोविंददास आदि हिंदी के लगभग सभी साहित्यकारों ने पद्मभूषण आदि अलंकरण लौटा दिये। यह समाचार सुनकर दिल्ली के एक रस-मर्मज्ञ आलोचक ने अपने एक मित्र से कहा, “काश! मुझे भी ‘पद्मभूषण’ मिला होता, तो मैं भी लौटा देता।”

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!