
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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व्यंग्य रवि श्रीवास्तव की कलम से....
लोकतंत्र सुरक्षित है
वह मेरे पास आकर बैठ गया। हताश और उदास। राह चलते मुलाक़ात हो जाती थी। फ़ोन पर भी। लेकिन बहुत दिनों बाद घर आया था। उसे देखकर एकबारगी ऐसा लगा कि उसने यह क्या हालत बना रखी है। जैसे किसी ने चेहरे पर दो-चार थप्पड़ लगा दिये हों या फिर दो-चार जूते लगा दिये हों। भरपूर हाथ वाले। चेहरा ऐसा जैसे पानी उतर गया हो। आते ही उसने भाग्य-विधाता वाली नज़रों से देखा। जैसे मैं सचमुच उसका भाग्य-विधाता हूं। एक गिलास पानी पीकर कुछ बोलने की मुद्रा में आया। उसका हिलना-डुलना अच्छा लगा। मैं उसका पुराना साथी हूं। स्कूल के दिनों का। लेकिन रास्ते अलग-अलग। उसका या कहूँ उसके पिताजी का छोटा-मोटा धंधा था। वह धंधा इसका भी हो गया। साथ में नेतागिरी का भूत सवार था। बातचीत की पहल मैंने की। पूछा यह क्या हालत बना रखी है। क्या कोई विशेष परेशानी?
सोमेश की आँखें डबडबा गयीं। उसने डबडबायी आँखों से कहा- मेरे साथ वाले अपनी-अपनी नेतागिरी में बहुत आगे बढ़ गये। अख़बारों में फ़ोटो के साथ समाचार आने लगे हैं। ज़रूरत पड़ी तो सौ-पचास लोगों की रैली भी निकाल लेते हैं। छोटे-मोटे कार्यक्रम में अतिथि भी बनने लगे हैं। इतना कहते-कहते सोमेश की आँखों का पानी सूख गया। कुछ नॉर्मल हुआ। मैंने कहा इतनी-सी बात पर हताश होने की क्या ज़रूरत पड़ी। तुम्हारी समस्याएं तो मैं सुलझाता रहा हूँ। क्या मुझ पर विश्वास नहीं रहा? उसने तुरंत कहा ऐसी बात नहीं है, यार भाई। ग़लती मेरी ओर से हो गयी। वह मुझे यार भाई के संबोधन से ही पुकारता है। मैंने बात को और आगे बढ़ते हुए तुरंत कहा- आज कौन सा दिन है? उसने कहा शुक्रवार है। मैं एक मिनट रुककर कहा- आज से चौथे दिन से तुम्हारी शुभ यात्रा शुरू होगी। उसने मेरी और आशा भरी नज़रों से देखा। बोला- आप ज्योतिषी कबसे हो गये। मैंने कहा- ज्योतिषी नहीं हूँ। यह अनुभव का कमाल है। चौथे दिन क्या होगा- यह जानने की उत्सुकता उसके चेहरे पर नाचने लगी थी। मैंने कहा- चौथे दिन मंगलवार है। बजरंग-बली का दिन है। तुम क़रीब दो सौ पूरियां बनवाओ। पांच-सात किलो हलवा। अपने साथियों के साथ निकल पड़ो बड़े हनुमान जी के मंदिर में। जो बच जाये उसे लेकर नाके वाले हनुमान मंदिर में ले जाना। चार-चार, पांच-पांच पूरियां और हलवा भिखारियों को बांटना, एक फ़ोटोग्राफ़र साथ में रखना। प्रेस विज्ञप्ति और फ़ोटो ख़ुद पहुंचाना प्रेस में। आगे तुम ख़ुद समझदार हो। एक सप्ताह बाद आकर मिलना। इस बीच पत्नी चाय लेकर आ गयी। उसने लपककर पैर पड़े। चाय पीकर, वह विजेता की तरह बाहर निकला।

एक सप्ताह बाद सोमेश आया। मिठाई का डिब्बा लेकर। यह अप्रत्याशित था। उसने अपने हाथों से मुंह मीठा किया। ख़ुश था। युद्ध का एक छोटा-सा मोर्चा उसने जीत लिया। सोशल मीडिया में बहुत कुछ वायरल हो चुका। फिर भी वह मुझे दिखाने अख़बारों की कटिंग लेकर आया। फ़ाइल में तारीखों समेत। मैं उसके चेहरे पर तैरती मुस्कराहट देख रहा था, उसने कहा आप तो ज्योतिषियों के बाप निकले। ऐसा आइडिया बताया कि कई छुटभैये नेता चारों खाने चित्त हैं। मैंने कहा- अभी और देखते जाओ। तुम गौरीशंकर को जानते हो ना! उसने कहा क्यों नहीं विधायक जी, बेचारे इस बार मंत्री नहीं बन सके। लेकिन उनका भविष्य उज्ज्वल है।
वही तो मैं बताना चाहता हूं। अगले हफ़्ते में राजधानी जा रहे हैं। किसी भी ट्रेन से जाएँ, अपने शहर से होकर गुज़रेंगे। तुम पता लगाओ कौन-सी ट्रेन, कौन-सा डिब्बा, समय। अपने दस-पाँच साथियों को लेकर उनके कूपे में पहुँचना। शालीनता के साथ। उनसे प्लेटफ़ॉर्म पर आने का आग्रह करना। वे ज़रूर आएंगे। उनके नीचे आते ही फूल मालाओं से लाद देना। ज़िंदाबाद के नारे लगाना। बीच-बीच में सोमेश भैया ज़िंदाबाद के नारे लगवाना। फ़ोटोग्राफ़र साथ में रखना। एक-दो तस्वीर उनके क़रीब रहते हुए। एक दो तस्वीर कान में कुछ फुसफुसाते हुए। ताकि तुम्हारी निकटता पता चले। प्लेटफ़ॉर्म का मामला है। सब कुछ वहां अनुशासित हो। गौरी भैया यह स्वागत कभी नहीं भूलेंगे। इसकी उन्हें ज़रूरत है। राजधानी के अपने दो-चार मित्रों को ख़बर कर देना। वहां भी ऐसा ही स्वागत हो जाये। बीच-बीच में सोमेश भैया के नारे भी लगें। और हां राजधानी है ना, इसलिए मुख्यमंत्री ज़िंदाबाद के नारे लगाना मत भूलना। ये गुरुमंत्र देकर मैं चुप हो गया।
वह किसी महापुराण की तरह मेरी बातें सुन रहा था। सोमेश ने गुरुमंत्र लेकर चरण स्पर्श किये। मन नहीं भरा तो एक बार गले मिला, पूरी गर्मजोशी के साथ। मैंने एक सप्ताह बाद आने को कहा।
सोमेश समय पर हाज़िर हो गया। सोशल मीडिया ने उसकी पहचान बढ़ा दी है। अख़बार आज भी घर-घर पढ़ा जाता है। शहर इतना बड़ा नहीं कि चलते-फिरते आदमी की पहचान खो जाये। कामकाजी आदमी को सब जानते-पहचानते हैं। सोमेश एक और मोर्चा जीत चुका। उसका क़द बढ़ गया। चरण स्पर्श कर वह गुरुमंत्र पाने के लिए बैठ गया। अख़बार की कटिंग दिखाने लगा। अख़बार देखते हुए मैंने पूछ ही लिया तुम्हारा जन्मदिन कब है? इस अप्रत्याशित प्रश्न से वह थोड़ा हड़बड़ाया। फिर संयत होकर बोला अगले महीने की ग्यारह को। मैंने कहा- अभी लगभग एक माह बाक़ी है। अपना मिशन पूरा हो जाएगा।
सोमेश कुछ-कुछ आशय समझ चुका था। मैंने कहा जन्मदिन वैसा ही मनाना है, जैसा तुम्हारे दूसरे नेतागिरी करने वाले साथी। उनसे एक क़दम आगे ही रहना है। तैयारी शुरू कर दो। छोटा-सा शहर है। मेन रोड के अलावा गली-मोहल्ले का ध्यान रखना है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, कॉलेज, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा कुछ न छूटने पाये। सब जगह फ्लेक्स और छोटे-छोटे बोर्ड। जन्मदिन की बधाई वाला संदेश रहे। नेताओं की तस्वीर छापने में कोई परहेज़ नहीं करना। तुम युवा नेता हो। सबको तुम्हारे जैसे जोशीले नेता की ज़रूरत है। मंत्री, भूतपूर्व मंत्री, मुख्यमंत्री, पार्टी पदाधिकारी, मित्र, उद्योगपति, बुद्धिजीवी, गौरी भैया। स्थानीय विधायक कोई छूटने न पाये, सबका ध्यान रखना है। यही सफलता है। पूरे शहर में सोमेश का चेहरा दिखना चाहिए…
वह मेरी बात ध्यान से सुन रहा था। कुछ-कुछ डायरी में नोट कर रहा था। मैंने कहा- ख़र्च में कोताही मत करना। सब वसूल हो जाएंगे। जन्मदिन की एक यादगार पार्टी भी देना। अच्छी भीड़ जमा करना। देखने वालों का पसीना छूट जाये। हमेशा चार-पांच साथियों के साथ चलने की आदत डालना। बड़ी जगह आ गये तो दस-बीस युवा साथ में होना ही होना। गुरुमंत्र सुनकर संतुष्ट हुआ। पन्द्रह-महीने बाद चुनाव है। एक साल बाद सुगबुगाहट शुरू हो जाएगी। तुम्हें बड़ी ज़िम्मेदारी मिलेगी। ऐसी मैं आशा करता हूँ। उसका सीन छप्पन इंच तो नहीं हुआ, लेकिन छत्तीस ज़रूर हुआ। एक बड़े मिशन को पूरा करने वह पूरे आत्मविश्वास के साथ, आशीर्वाद लेकर निकल पड़ा।
पूरे शहर में सोमेश का चेहरा झाँकता नज़र आ रहा था। युवा हृदय सम्राट कहीं बैनर में, कहीं पोस्टर में। कहीं बड़े-बड़े फ्लेक्स में। जिधर से गुज़रते, जन्मदिन के बधाई संदेश दिखायी दे जाते। काम शत-प्रतिशत हुआ था। जन्मदिन की पार्टी का रिपोर्ट कार्ड एक नंबर था। यह अच्छी बात थी कि सोमेश का पूरा परिवार उसके साथ। उसके पिताजी व्यापारी। लाभ-हानि अच्छी तरह से समझते थे। अख़बारों में छोटे-मोटे विज्ञापन भी दिखे। गौरी भैया का विशेष आशीर्वाद मिला। वह बीच-बीच में मुझसे आशीर्वाद लेने आता रहा। मैं देख रहा हूं भारत का लोकतंत्र सोमेश जैसे युवाओं के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित है। उसे कहीं से कोई ख़तरा नहीं है। जो ख़तरे की बात करते हैं, झूठ बोलते हैं।

रवि श्रीवास्तव
व्यंग्यकार के रूप में पहचान। छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग एवं छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ से भी संबद्ध। अनेक पत्रिकाओं, काव्य संग्रहों व स्मारिकाओं का संपादन। 2002 में शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद से स्वतंत्र लेखन और साहित्यिक गतिविधियों में निरंतर सहभागिता।
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