
- August 14, 2026
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खुर्शीद मलिक की कलम से....
अगस्त 1947 से आज तक: आज़ादी का सफ़र
15 अगस्त 1947 को जब भारत ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आज़ादी हासिल की, तो यह केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि एक नये राष्ट्र का जन्म था। उस रात जब जवाहरलाल नेहरू ने संसद के केंद्रीय कक्ष में अपना ऐतिहासिक भाषण “Tryst with Destiny” दिया, तो पूरे देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। दिल्ली, बंबई और कलकत्ता की सड़कों पर लोग तिरंगा लहरा रहे थे और आज़ादी के नारे लगा रहे थे। हालांकि, यह ख़ुशी विभाजन के गहरे ज़ख़्मों से भी आहत थी। देश के विभाजन ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया और ख़ूनी दंगों को जन्म दिया। उस समय स्वतंत्रता दिवस का अर्थ था— क़ुर्बानी, विस्थापन और नये राष्ट्र के निर्माण का संकल्प।

स्वतंत्रता आंदोलन के महान सेनानी
आज़ादी के इस लंबे सफ़र की नींव उन अनगिनत क़ुर्बानियों पर टिकी है, जिनमें समाज के हर वर्ग और धर्म के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया।
मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी: टीपू सुल्तान और सिराजुद्दौला ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध शुरूआती और मज़बूत प्रतिरोध की नींव रखी। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राष्ट्र को एकजुट किया। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान (सरहदी गांधी) ने अहिंसा के दर्शन की रक्षा की, जबकि अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया। बेगम हज़रत महल और मौलाना बरक़तुल्लाह ने भी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। बहादुर शाह ज़फ़र और अली बंधुओं को कौन भूल सकता है?
ग़ैर-मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी: महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा को आंदोलन का हथियार बनाया। जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने जेलों में यातनाएँ सहीं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करके ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने छोटी उम्र में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देकर देशभक्ति का एक नया इतिहास रचा। सरदार वल्लभभाई पटेल ने आज़ादी के बाद देश को एकजुट किया, जबकि चंद्रशेखर आज़ाद और रानी लक्ष्मीबाई ने अंतिम सांस तक अंग्रेज़ों के सामने सिर नहीं झुकाया।
जनभावनाएँ तथा सामाजिक-आर्थिक बदलाव
आज़ादी के शुरूआती दौर में भावनाएँ सरल लेकिन गहरी थीं। क़ुर्बानियों को याद किया जाता था और मोहल्ले के स्तर पर सादगी से स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था। आज की नयी पीढ़ी के लिए 1947 एक ऐतिहासिक घटना है, जो किताबों और फ़िल्मों तक सीमित रह गयी है। अब स्वतंत्रता दिवस पर गर्व के साथ-साथ डिजिटल इंडिया, आर्थिक शक्ति और वैश्विक प्रतिष्ठा की भी अधिक चर्चा होती है।
आर्थिक रूप से, 1947 का ग़रीब और अकालग्रस्त भारत, जहाँ साक्षरता दर केवल लगभग 12 प्रतिशत थी, आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। सॉफ्टवेयर, दवा निर्माण (Pharma) और डिजिटल भुगतान (UPI) के क्षेत्र में देश वैश्विक स्तर पर अग्रणी है और साक्षरता दर 77 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव
आज़ादी के बाद से अब तक भारत का राजनीतिक वातावरण पूरी तरह बदल चुका है। शुरूआती दशकों में नेहरू के समाजवादी दृष्टिकोण और धर्मनिरपेक्षता के साथ कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। इसके बाद आपातकाल, क्षेत्रीय दलों के उदय और गठबंधन की राजनीति का दौर आया।
2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व में एक मज़बूत केंद्रीय नेतृत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदू सांस्कृतिक पहचान पर आधारित राजनीतिक विमर्श प्रभावी हुआ। अनुच्छेद 370 का हटना और राम मंदिर का निर्माण इस दौर के महत्वपूर्ण मोड़ रहे।
हालाँकि, हाल के आम चुनावों के परिणामों ने देश को फिर से गठबंधन की राजनीति की ओर ला खड़ा किया है, जो राजनीतिक संतुलन को दर्शाता है। आज राजनीतिक बहसें पहले की तुलना में अधिक ध्रुवीकृत हो गयी हैं। एक ओर विकास के दावे हैं, तो दूसरी ओर लोकतांत्रिक संस्थाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं।
राजनीति में गिरता स्तर और पार्टी-परस्ती
आज की राजनीति में सबसे बड़ी और चिंताजनक तब्दीली यह आयी है कि राजनीतिक बहसों में बौद्धिक गिरावट और व्यक्तिगत स्वार्थ अधिक स्पष्ट दिखायी देने लगे हैं। राजनेताओं में देश के सामूहिक विकास की अपेक्षा अपनी पार्टी के हितों की रक्षा और सत्ता हासिल करने की लालसा अधिक प्रमुख होती जा रही है।
देश के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं— जैसे ग़रीबी, बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता— को पीछे छोड़कर केवल चुनावी लाभ के लिए वैचारिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने देश के भविष्य के लिए अपने प्राणों की क़ुर्बानी दी थी, लेकिन अफ़सोस कि आज की राजनीति में “देश पहले” के बजाय “पार्टी पहले” का रुजहान बढ़ता जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
लोकतांत्रिक संस्थाएँ और सोशल मीडिया का प्रभाव
इस बदलते राजनीतिक माहौल का सबसे गहरा प्रभाव हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों पर पड़ा है। संसद, न्यायपालिका और मीडिया, जिन्हें लोकतंत्र के स्तंभ कहा जाता है, आज राजनीतिक दबाव और वैचारिक प्रभाव के सामने चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर उठने वाले सवाल लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले वर्गों के लिए चिंता का विषय हैं।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया ने जहाँ आम नागरिक को अपनी आवाज़ उठाने का मंच दिया है, वहीं यह राजनीतिक प्रचार, फ़ेक न्यूज़ और सामाजिक नफ़रत फैलाने का एक बड़ा माध्यम भी बन गया है। अब जनमत गहरे संवाद के बजाय ट्रेंड्स और एल्गोरिदम से प्रभावित हो रहा है, जिसने सामाजिक ताने-बाने को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आज का स्वतंत्रता दिवस और निष्कर्ष
आज भी लाल क़िले पर तिरंगा फहराना और प्रधानमंत्री का भाषण स्वतंत्रता दिवस समारोह का केंद्र हैं, लेकिन अब इसमें आधुनिक तकनीक, व्यापक सुरक्षा व्यवस्था और डिजिटल भागीदारी भी शामिल हो गयी है।
15 अगस्त 1947 से शुरू हुआ यह सफ़र साबित करता है कि आज़ादी कोई स्थायी मंज़िल नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
अतीत के मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम शहीदों की क़ुर्बानियों का वास्तविक सम्मान यही है कि हम राजनीति की गिरावट और पार्टीबाज़ी से ऊपर उठकर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करें, सोशल मीडिया का सकारात्मक इस्तेमाल करें और एक ऐसे एकजुट तथा न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए काम करें, जहाँ हर नागरिक स्वयं को वास्तव में स्वतंत्र और सुरक्षित महसूस करे।

ख़ुर्शीद मलिक
वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार। दूरदर्शन और जनसंपर्क विभाग के डायरेक्टर(रिटायर्ड) रह चुके हैं। इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो, प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ कम्युनिकेशन जैसी संस्थाओं की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके साथ कार्य अनुभव रहा है।
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