
- August 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ और हिन्दी-उर्दू विवाद
हिन्दी के कालजयी उपन्यास ‘आधा गाँव’ के यशस्वी लेखक राही मासूम रज़ा का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। वर्तमान के राजनीतिक और सोंमाजिक माहौल को देखते हुए उपन्यासकार के अलावा एक विचारक के रूप में राही का व्यक्तित्व और उनका रचना-संसार अधिक प्रासंगिक हो गया है। राही का पूरा जीवन और लेखन सांप्रदायिकता के विरोध में, सामाजिक बँटवारे के विरोध में बीता। हिन्दू सांप्रदायिकता हो या मुस्लिम सांप्रदायिकता, ये हमेशा उनकी चिंता और विमर्श का विषय रहे।
राही का अलीगढ़ से अटूट भावनात्मक रिश्ता रहा। वे हमेशा कहते थे कि मेरी तीन माँएं हैं। एक नफ़ीसा बेगम, जिन्होंने जन्म दिया। अलीगढ़ यूनीवर्सटी को वो अपनी दूसरी माँ कहते थे, जिसने उन्हें पहचान दी और राही बनाया। तीसरी माँ वह गंगा को मानते थे। अपनी ‘वसीयत’ नामक लंबी नज़्म में लिखा था कि उनके मरने के बाद उन्हें गंगा माँ की गोद में सुला दिया जाये- ‘वह मेरी माँ है। वह मेरे बदन का ज़हर पी लेगी।’
बचपन में बीमारी के कारण राही की औपचारिक शिक्षा में व्यवधान हुआ। उन्होंने लगभग नौ साल के अंतराल के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सटी से बी.ए. और फिर एम.ए. (उर्दू) किया। उनकी पीएच.डी. का विषय था ‘‘दास्तान-ए-तिलिस्म होशरुबा में भारतीयता के तत्व’। उनका बहुचर्चित पहला उपन्यास ‘आधा गाँव’ 1966 में छपकर आ चुका था, जिसे उन्होंने अपने सबसे क़रीबी दोस्त कुँवरपाल सिंह को समर्पित किया। उन्होंने लिखा- ‘‘यह ‘आधा गाँव’ अपने पूरे दोस्त कुँवरपाल सिंह को भेंट करता हूँ क्योंकि अगर उनका साथ न होता तो शायद मैं यह कहानी लिख ही नहीं पाता।’’
कुँवरपाल जी के साथ उनकी दोस्ती अटूट रही और उनके जाने के बाद भी बनी रही। उनकी दोस्ती के बीच ‘आधा गाँव’ के लिखे जाने और छपने का क़िस्सा भी दिलचस्प है। यह पूरा प्रकरण कई बार कहा और लिखा जा चुका है। कुँवरपाल ने स्वयम् इसे विस्तार से अपने संस्मरणों की पुस्तक ‘सिरजे जिनने सपने’ में भी कहा है। बक़ौल कुँवरपाल, वो 1957 में पहली बार अलीगढ़ आये। उन्हें यूनिवर्सटी में बी.ए. में दाख़िला लेना था। वो उस क्षेत्र के एक बड़े किसान नेता मुंशी गजाधर सिंह का पत्र लेकर आये थे, जो उन्होंने राही के बड़े भाई प्रो. मूनिस रज़ा के लिए लिखा था। मूनिस रज़ा यूनिवर्सटी के भूगोल विभाग में प्रोफ़ेसर थे। मूनिस साहब तो मिले नहीं, घर पर राही साहब से मुलाक़ात हो गयी जिन्होंने उनके दाखि़ले में मदद की। दरअसल मुंशी गजाधर सिंह एक प्रभावशाली बड़े वामपंथी नेता थे और राही स्वयम् प्रगतिशील विचारधारा के थे और वामपंथी राजनीति के समर्थक थे। इस मुलाक़ात और फिर राही से दोस्ती के बारे में कुँवरपाल लिखते हैं- ‘‘हम लोगों के बीच विचार और कर्म के अतिरिक्त कोई समानता नहीं थी। भाषा और सांस्कृतिक रूप से हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। मैं देहात से एक किसान परिवार से था और राही एक प्रसिद्ध वकील के बेटे थे। वे उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे, मेरी खड़ी बोली पर भी ब्रजभाषा का व्यापक प्रभाव था। मेरे शीन-क़ाफ़ को दुरुस्त करने के बहुत दिनों तक प्रयास होते रहे (सिरजे जिनने सपने-पृ. 21)।’’ वामपंथी-प्रगतिशील विचारधारा और मूल्यों के लिए प्रतिबद्धता और संघर्ष दोनों के जीवन-उद्देश्य थे और इस रूप में दोनों ही सक्रिय थे और साथ थे।
1962 में, कहते हैं पहली बार अलीगढ़ में सांप्रदायिक दंगा हुआ। राही एम.ए. कर चुके थे और पीएच-डी कर रहे थे! वो यूनिवर्सटी के पास के शमशाद मार्केट इलाक़े में स्थित वली मंज़िल में अपने भाई मूनिस रज़ा और उनके परिवार के साथ रहते थे। कुँवरपाल अमीर निशा में अपने मित्र मुजीब रिज़वी के साथ रहते थे। इस बीच मुजीब रिज़वी दिल्ली चले गये। अमीर निशा विशुद्ध मुस्लिम इलाक़ा है। उस क्षेत्र में उनके कुछ वामपंथी मित्र भी रहते थे इसलिए उन्हें कोई ख़तरा महसूस नहीं हुआ। शहर में कई दिनों तक कर्फ़्यू लगा रहा। एक दिन कुछ देर के लिए कर्फ़्यू खुला तो राही मासूम रज़ा प्रकट हुए और कुँवरपाल को हुक्म देते हुए कहा कि दस मिनट में सामान समेटो और चलो मेरे साथ। कुंवरपाल के पूछने पर ‘‘उन्होंने दबंग अंदाज़ में कहा- बहस बाद में होगी, सामान उठाइए और चलिए’’ (संदर्भ- सिरजे जिनने सपने, पृ. 22)।
कुँवरपाल वली मंज़िल में राही के साथ चार साल रहे। मूनिस रज़ा तब तक दिल्ली जा चुके थे और दिल्ली यूनिवर्सटी में थे। उनका परिवार वली मंज़िल में ही, भीतरी हिस्से में रहता था। राही मित्र-मंडली में अपने गाँव गंगौली की बहुत बातें करते थे और क़िस्से सुनाया करते थे। विभाजन से पहले और बाद की स्थितियाँ, ज़मींदारी ख़त्म होने के बाद होने वाले सामाजिक परिवर्तन, राजनीति, जहाँ-तहाँ बिखरते सांप्रदायिकता के अँधेरे धब्बे, सत्ता और राजनीति में अवसरवादी चेहरे, पाकिस्तान का बनना और मुस्लिम परिवारों की टूटन और बिखराव। कुँवरपाल ने लिखा है कि हम लोगों ने कहा कि आप इन सभी को आधार बनाकर कोई उपन्यास क्यों नहीं लिखते। गद्य में उस समय तक राही का गंभीर लेखन नहीं था। निकहत पब्लिकेशन, इलाहाबाद से उस ज़माने में जासूसी दुनिया और रोमानी दुनिया प्रकाशित होती थीं। निकहत प्रकाशन के स्वामी अब्बास हुसैनी उनके परिचित और मित्र हुआ करते थे। उनके आग्रह पर राही रोमानी दुनिया के लिए अक्सर छद्म नामों से लिखा करते थे। राही ने स्वयम् लिखा है कि उनके लिए वह ‘‘एक रात में एक उपन्यास घसीट दिया करते थे’’ और उससे उनका ख़र्च निकल आता था।
बहरहाल मित्रों के साथ होने वाली इस बातचीत के बाद कुँवरपाल ने लिखा है, दूसरे दिन राही कुछ पन्ने लिखकर लाये। शीर्षक था- ‘एक ऊँघता शहर’ जो राही ने पढ़कर सुनाया। सबने बहुत स्वागत किया और कहा कि अब उपन्यास शुरू हो जाना चाहिए। ‘ऊँघता शहर’ उपन्यास की भूमिका के रूप में आया। राही बहुत तेज़ी से लिखते थे। कुँवरपाल बताते थे कि राही लिखते थे और सुनाते थे। दोनों उस समय साथ ही वली मंज़िल में थे। अक्सर विषयवस्तु पर दोस्तों के बीच बहस-मुबाहिसा भी होता। उसके कुछ हिस्से राही ने कुछ संपादकों और उर्दू पत्रिकाओं को भेजे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। कुँवरपाल ने उसके कुछ अंशों का हिन्दी में लिप्यंतरण कर उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कल्पना’ को भेजे जहाँ वे छपे। उन अंशों का बहुत स्वागत हुआ और पाठकों की सराहना मिली। इसके बाद तय हुआ कि इसे हिन्दी में छपना चाहिए…. उर्दू में छपा तो यूँ ही कहीं खो जाएगा। अब वो लिखते जाते थे और कुँवरपाल हिन्दी में मित्रों की सहायता से लिप्यंतरण करते जाते थे। उपन्यास की भाषा तो हिन्दुस्तानी है और संवाद उस इलाक़े में बोली जाने वाली भोजपुरी है। लिप्यंतरण करके कुंवरपाल राही को सुना भी देते, अंतिम स्वीकृति के लिए। राही अपने हिसाब से काट-छाँट भी करते रहते। काम पूरा होने के बाद कुँवरपाल ने उसके कुछ हिस्से कमलेश्वर को भेजे, जिनसे उनकी ख़तो-किताबत चलती रहती थी। उन्हीं दिनों कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और ओमप्रकाश जी ने मिलकर ‘अक्षर’ प्रकाशन शुरू किया था। कमलेश्वर को ‘आधा गाँव’ के वे हिस्से बहुत पसंद आये। उपन्यास एक नयी भावभूमि पर था और आज़ादी के बाद की बदलती परिस्थितियाँ, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के बीच निर्मित हो रहे वातावरण, गाँवों में ज़मींदारी ख़त्म होने के बाद बदल रही सामाजिक संरचना, उभरता हुआ मध्य वर्ग, शिक्षित हो रहा मुस्लिम युवा समाज और नये भारत में बन रही उनकी सोच… यह एक नया विषय था जिससे राही पाठकों को परिचित करा रहे थे। कुँवरपाल के बुलावे पर कमलेश्वर अलीगढ़ आये। वहीं उनका परिचय राही से हुआ। राही ने उपन्यास के कुछ और अंश पढ़कर सुनाये। कमलेश्वर बहुत प्रभावित हुए और उपन्यास की पांडुलिपि अपने साथ ले गये। इस तरह इसका पहला संस्करण ‘अक्षर’ प्रकाशन से छपकर आया।

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राही के जन्म शताब्दी वर्ष पर सभी छोटी-बड़ी साहित्यिक संस्थाएँ और संगठन उनके कृतित्व और व्यक्तित्व का स्मरण कर रहे हैं। महाभारत धारावाहिक के संवादों के ज़रिये राही हिन्दुस्तान के घर-घर में प्रतिष्ठित हो गये। अभी दिल्ली में अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के तत्वावधान में एक आयोजन हुआ। हम लोगों के मित्र और प्रतिष्ठित लेखक-उपन्यासकार विभूति नारायण राय भी उसमें आमंत्रित थे। उन्होंने बताया वहाँ एक आलेख पढ़ा गया। संदर्भ था ‘आधा गाँव’ में मुहर्रम का चित्रण, जिसका उपन्यास में व्यापक स्तर पर वर्णन किया गया है। दरअसल गंगौली में शिया बहुल आबादी रही है और मुहर्रम शिया समुदाय के लिए प्राण तत्व के समान माना जाता है। कहा जा सकता है उपन्यास की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के रूप में राही मुहर्रम का कई जगह विस्तार से वर्णन करते हैं। सेमिनार में पढ़े गये उस आलेख में, जिसकी प्रस्तोता अंजुमन का ही हिस्सा हैं, कहा गया कि मूल उर्दू पाठ में जो मर्सिये और नौहे थे, हिन्दी पाठ में उनको काट-छाँट दिया गया और इस तरह हिन्दी वालों ने राही के मूल उपन्यास को बदल दिया।
ये ‘हिन्दी वाले-उर्दू वाले’ की बहस बहुत पीड़ादायक है। जैसा विभूति जी ने बताया कि उन्होंने काफ़ी हद तक इसका जवाब, वहाँ अपने वक्तव्य में दे दिया था। कुंवरपाल ने अपनी पुस्तक ‘सिरजे जिनने सपने’ में विस्तार से लिखा है। स्वयम् मैंने अपनी पुस्तक ‘समय शिला पर’ में भी इस पूरे प्रकरण पर लिखा है, लेकिन उस सेमिनार की रिपोर्ट को सुनने के बाद लगा कि यह प्रकरण फिर से पाठकों के और साहित्य प्रेमियों के सामने आना चाहिए। इस हिन्दी बनाम उर्दू के झमेले से जब-तब राजनीति गरमायी है और न केवल साहित्यिक-सांस्कृतिक बल्कि सामाजिक माहौल को बिगाड़ने की कोशिश भी होती रही है। राही प्रारंभ में मूलतः शायर थे। ‘आधा गाँव’ के बाद उन्होंने आठ उपन्यास और लिखे तथा उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की। इसके साथ ही उनका एक चिंतक और विचारक का भी प्रखर रूप था। राजनीति, समाज, साहित्य, संस्कृति के सवालों पर उनकी अपनी सोच स्पष्ट हुआ करती थी जिस पर वो क़ायम रहते थे। इसीलिए एक ओर अगर उनके बड़ी संख्या में प्रशंसक थे तो दूसरी ओर विरोधियों की भी कमी नहीं थी। लेखन के साथ-साथ वे अपने निजी पत्रों में भी इन चिंताओं को लिखते रहते थे। उन्हें हिन्दुस्तानियत की तलाश थी। एक पत्र का ज़िक्र करना चाहती हूँ, जो उन्होंने कुँवरपाल को लिखा था- ‘‘यार, ये बताओ कि अमेरिकी साम्राज्यवाद हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने में सूत्रधार का काम नहीं कर रहा है क्या? इसमें देश के मल्टी नेशनल की कोई भूमिका नहीं है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जमाते-इस्लामी तथा विश्व हिन्दू परिषद् दोनों के हेडक्वार्टर अमेरिका में हैं। फ़र्क़ इतना है कि एक रास्ता वाया सऊदी अरब से आता है, दूसरा नेपाल से आता है। इस पर हम लोग क्यों नहीं सोचते’’ (पृ.-42, सिरजे जिनने सपने)।
उर्दू वाले राही के उर्दू के बारे में दिये गये बयानों से असहमत थे और अक्सर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते रहते थे। राही ने कई बार कहा और लिखा कि उर्दू को अगर बचाना है तो इसे देवनागरी लिपि में लिखा जाना चाहिए। इस बारे में वो बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि ‘‘भाषा केवल लिपि नहीं है।’’ उनका तर्क था कि- ‘‘लिपि और भाषा में बहुत अंतर है। यदि लिपि भाषा होती तो संस्कृत, हिन्दी, मराठी की लिपि तो देवनागरी है किन्तु भाषा बिल्कुल अलग है।’’ उन्होंने पंजाबी और सिंधी भाषा का उदाहरण भी दिया। पंजाबी पाकिस्तान में फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है तो भारत में गुरुमुखी में लिखी जाती है। उसी प्रकार सिंधी पाकिस्तान में फ़ारसी तो हिन्दुस्तान में देवनागरी में लिखी जाती है। इससे पंजाबी और सिंधी भाषा का चरित्र तो नहीं बदला’’ (संदर्भ- सिरजे जिनने सपने, पृ. 24)। ये भाषा संबंधी लंबे लेख उन्होंने ‘धर्मयुग’ में भी लिखे जो उर्दू वालों को बहुत नागवार गुज़रे।
राही के प्रति शायद यही नाराज़गी थी कि ‘आधा गाँव’ उनके सामने उर्दू में नहीं छप सका। अपने निधन से कुछ समय पहले उन्होंने कुँवरपाल को एक बार पत्र भी लिखा था कि इसे कहीं से उर्दू में छपवाओ। ज़रूरत हो तो वो इसके लिए पैसे भी देने को तैयार थे। ‘आधा गाँव’ की उर्दू में लिखी एक प्रति उन्होंने कुँवरपाल को सौंप रखी थी। (अपनी पीएच-डी की थीसिस- ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा में हिन्दुस्तानी अनासिर की एक प्रति भी वो कुँवरपाल को बंबई जाने से पहले दे गये थे)। कुँवरपाल ने कुछ उर्दू प्रकाशकों और संस्थानों से बात की लेकिन किसी ने सहमति नहीं दी। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू और ग़ालिब एकेडमी से भी संपर्क किया गया लेकिन बात नहीं बनी।
हिन्दी की पत्रिका ‘अभिनव कदम’ (सं. जयप्रकाश धूमकेतु) का राही मासूम रज़ा पर केंद्रित एक विशेषाँक उनकी पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर प्रकाशित हुआ, जिसके अतिथि संपादक कुँवरपाल सिंह थे। इसका भव्य लोकार्पण समारोह जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली में 2002 में हुआ। इसमें राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, अब्दुल बिस्मिल्लाह, असग़र वजाहत समेत कई हिन्दी, उर्दू के गणमान्य लेखक भी उपस्थित थे। हम लोग भी अलीगढ़ से गये थे। अध्यक्षता जामिया मिलिया के वाइस चांसलर शहिद मेहदी साहब ने की। वहाँ कुँवरपाल ने राही की ‘आधा गाँव’ को उर्दू में छपवाने की इच्छा का ज़िक्र किया तथा कहा कि अफ़सोस है कि कोई प्रकाशक उर्दू में छापने को तैयार नहीं। किसी को उपन्यास की विषय-वस्तु से असहमति थी तो किसी को उसमें मौजूद गालियों से जो उनके पात्र आपस की बोल-चाल में प्रयुक्त करते हैं। किसी को उर्दू भाषा पर उनके विचारों से असहमति थी। समारोह के बाद बातचीत के दौरान शाहिद मेहदी साहब ने जामिया मिलिया यूनीवर्सटी की ओर से उसे उर्दू में छपवाने का ज़िम्मा लिया। अलीगढ़ लौटकर कुँवरपाल ने उपन्यास की पांडुलिपि की फ़ोटो कॉपी कराई और उन्हें भेज दी।
कुछ समय बीतने के बाद जब शाहिद मेहदी साहब से संपर्क किया गया कि क्या प्रगति है तो उन्होंने बताया कि पांडुलिपि उनके ऑफ़िस से खो गयी है। कौन उनके ऑफ़िस से उठा ले गया, पता ही नहीं चला।
कुँवरपाल और मेरा एक बार मेरठ जाना हुआ। वहाँ विभूति नारायण राय जी से मुलाक़ात हुई! वो उस समय मेरठ रेंज में आई.जी. के पद पर पुलिस सेवा में थे। बातचीत के दौरान राही के ‘आधा गाँव’ पर चर्चा हुई और उसके उर्दू में न छप सकने की बात सामने आयी! उन्होंने फ़ौरन प्रस्ताव दिया कि उनके श्री रामानंद-सरस्वती पुस्तकालय ट्रस्ट से छप जाएगा। उन्होंने इसी ट्रस्ट के नाम पर आज़मगढ़ के पास जोकहरा गाँव में एक बड़े पुस्तकालय की स्थापना भी की है। हम लोगों के लिए यह बहुत ख़ुशी की बात थी। अलीगढ़ आकर हमने उन्हें ‘आधा गाँव’ की उर्दू की प्रति भिजवा दी। उस ज़माने में मेरठ यूनिवर्सटी के उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष विभूति जी के संपर्क में थे और अक्सर उनसे मिलने आते रहते थे। विभूति जी ने उनसे कहा कि वो प्रकाशन का काम देख लें…. प्रूफ़ वग़ैरह देखने में मदद कर दें।
उपन्यास छप गया लेकिन जब छपकर आया तो अजीब स्थिति थी। उपन्यास के कवर पर ट्रांसलेटर और एडिटर के रूप में उन सज्जन का नाम छपा था। उन्होंने सचमुच उपन्यास को संपादित कर दिया था। जहाँ-जहाँ उनको गालियाँ मिलीं, उन्हें हटा दिया गया था। उपन्यास का शुद्धिकरण हो गया था। लिहाज़ा, वह कटा-फटा उपन्यास…. उसकी कुछेक प्रतियाँ विभूति जी ने मित्रों को बाँटीं, बाक़ी अलमारी में बंद हो गयीं। तो, उर्दू वालों की नाराज़गी ख़त्म ही नहीं हुई।
एक बात और! लोग राही को सामासिक संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं लेकिन हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियत को लेकर, भारतीय संस्कृति को लेकर उनके यहाँ कोई द्वैत नहीं है। कोई दोहरापन उनके व्यवहार, राजनीति, सांस्कृतिक चिंतन और विचारों में नहीं है। वो कहते हैं कि ग़ालिब और मीर के साथ तुलसी, कबीर और सूर भी उनके पुरखे हैं। रामायण और महाभारत की पूँजी उनको भी विरासत में मिली है। तिलिस्म-ए-होशरुबा में वह भारतीयता के तत्व तलाशते हैं। पाकिस्तान की उर्दू कविता पर भारतीय प्रभाव और ‘उर्दू साहित्य की भारतीय आत्मा’ पर लंबे लेख लिखते हैं (संदर्भ: ख़ुदा हाफ़िज़ कहने का मोड़)। उसके बाद लगातार उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखने की वकालत करना और यह कहना कि भाषा केवल लिपि नहीं होती… बहुत लोगों की नाराज़गी का कारण तो बना। बहरहाल, वे उर्दू से हिन्दी में आ गये। ऐसा ही कुछ हुआ था कि प्रेमचंद भी उर्दू से हिन्दी में आये। हाँ! शायरी उन्होंने हमेशा उर्दू में की लेकिन अक्सर अपने ख़तों में वो नये शेर और नज़्म लिखकर भेजा करते थे, देवनागरी में। ‘चाँद तो अब भी निकलता होगा’’ लंबी नज़्म उन्होंने छपने से पहले हम लोगों को एक पत्र में लिखकर भेजी थी।
भाषा का सवाल अक्सर राजनीति के अखाड़ेबाज़ों के लिए एक मुद्दा रहा है। वर्चस्ववादी राजनीति के अनेक रूप होते हैं। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के सेमिनार में भी उर्दू-हिन्दी की बात उठाकर ‘आधा गाँव’ को विवादित करने की कोशिश की गयी है। वहाँ पढ़े पर्चे में कहा गया कि मूल उर्दू के पाठ से हिन्दी में लिप्यंतरण करते समय उसमें शामिल मर्सियों और नौहों का कुँवरपाल सिंह ने संक्षिप्तीकरण कर दिया। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के निदेशक महोदय का भी यह सोचना है कि कुँवरपाल सिंह ने राही पर दबाव डाला होगा कि हिन्दी के पाठकों के बीच लंबे नौहे और मर्सिये ठीक नहीं रहेंगे, अतः उन्हें काट-छाँट दिया जाये।
इस बारे में निवेदन है कि जिस समय राही यह उपन्यास लिख रहे थे, कुँवरपाल सिंह हिन्दी में रिसर्च स्कॉलर थे। राही एक प्रतिष्ठित और स्थापित लेखक थे, उम्र में उनसे बहुत बड़े थे! क्या राही का व्यक्तित्व ऐसा था कि वो अपने लेखन पर कोई दबाव झेलते? राही के व्यक्तित्व और स्वभाव को, उनके विचार और रचनाकर्म को समझने के लिए उनके उपन्यासों के अलावा उनके गद्य-लेखन को भी पढ़ा जाना चाहिए। अपनी मृत्यु से छह महीने पहले राही ने दो बड़े, मोटे पार्सल रजिस्टर्ड डाक से कुँवरपाल को भेजे। दो फ़ाइलों में बंद, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके लेख और टिप्पणियों की कटिंग्स थी। वे अनेक पत्रों के लिए नियमित कॉलम भी लिखते थे। इनमें साहित्य, संस्कृति, समाज और राजनीति के समसामयिक मुद्दे होते थे। शायद उन्हें अपनी बीमारी का आभास हो गया था। उन्होंने कुँवरपाल को लिखा कि अब तक का छपा हुआ सब तुम्हें भेज रहा हूँ, इनका जैसे चाहो, इस्तेमाल करना। दोनों फ़ाइलों में उस समय तक छपे विविध विषयों पर उनके लेख थे और टिप्पणियाँ थीं। बाद में धीरे-धीरे उन सबको पढ़ा गया और पूरी सामग्री व्यवास्थित की गयी, जो 2002 में तीन पुस्तकों के रूप में आयी। ‘लगता है बेकार गये हम’, ‘ख़ुदा हाफ़िज़ कहने का मोड़’ तथा ‘सिनेमा और संस्कृति’ पुस्तकें कुँवरपाल के संपादन में वाणी प्रकाशन से छपीं। इनमें कई लेख भाषा और संस्कृति पर, उर्दू भाषा और लिपि के सवाल पर, हिन्दुस्तानियत की संस्कृति पर हैं। इन लेखों में वो हिन्दू हो या मुस्लिम या अकाली… सभी तरह की सांप्रदायिकता और उसकी राजनीति पर भरपूर प्रहार करते हैं। वो आर.एस.एस., बाल ठाकरे की शिवसेना और जमाते-इस्लामी, सभी का खुलकर विरोध करते हैं। वो श्रीराम के साथ ही अल्लाह मियाँ के नाम भी ख़त लिखते हैं। अपने लेखों में वो आडवाणी जी की रथ-यात्रा पर सवाल उठाते हैं, इमरजेंसी पर सवाल उठाते हैं तो ज़ेड.आर. अंसारी, बनातवाला, सुलेमान सेठ, इमाम बुख़ारी और सैयद शाहबुद्दीन जैसे नेताओं की सोच और राजनीति की आलोचना भी करते हैं। इसीलिए बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक रहे तो दूसरी ओर कोई उन्हें गालियाँ देते हुए पेट में त्रिशूल भोंकने की बात को लिखता था तो कोई उन्हें मुस्लिम समाज का दुश्मन बताते हुए उनके विरुद्ध फ़तवा देता था। उनके इन लेखों को भी पढ़ा जाना चाहिए उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए।
अंत में निवेदन है कि जन्मशती के अवसर पर, अति उत्साह में, उन्हें व्यर्थ के विवादों में न घसीटा जाये। राही अपनी सोच में बहुत स्पष्ट और निडर थे। उनके लेखन और साहित्य की सार्थकता को रेखांकित किया जाना चाहिए जो आज की परिस्थितियों में पाठकों का- साहित्य प्रेमियों का मनोबल बढ़ाती है और हवा के विपरीत सोचने, लिखने वालों को साहस प्रदान करती है।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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