dracula diary by shashi khare on independence day
डायरी शशि खरे की कलम से....

स्वतंत्रता की खोज में

             दिनांक 08/08/26 समय प्रात: 04.10

             वह पीछे आकर खड़ा हो गया। हवा के एक तेज़ झोंके में उसका गाउन मुझसे टकराया। पलटकर देखा तो कोई नहीं था। किस माहौल में हम जी रहे हैं कि हवा का हर झोंका ड्रैकुला के गाउन का स्पर्श लगता है। लेकिन वह था।

azadi ka audit, independence day, स्वतंत्रता दिवस

मेरे रजिस्टर में लिखे शीर्षक ‘स्वतंत्रता’ शब्द को नुकीले नाख़ूनों वाली हथेली से ढंककर टेबल पर बैठ गया। मैं बोली एक तो वैसे ही जवाब नहीं सूझ रहा है, स्वतंत्रता माने क्या… और तुमने वह शब्द तक अपने ख़ूनी पंजे से ढंक दिया।

हर प्रश्न का जवाब उसकी आँखों में आ जाता था, परन्तु आज वह बोल पड़ा- इंसान नहीं  जानता स्वतंत्रता के माने क्या! स्वतंत्रता के लिए पावर होना चाहिए। समझीं? पावर के कारण ही प्रत्येक सरकार मनमानी कर पाती है। पावर हाथ में हो तो धरती पर कुछ भी करने की स्वतंत्रता अपने आप मिल जाती है।

और यदि किसी को किसी भी तरह की ग़ुलामी मंज़ूर नहीं तो?

वह व्यंग्य से मुस्कराता बोला था- स्वतंत्रता और शक्ति का संबंध बहुत गहरा और पेचीदा है। मानसिक शक्ति के बिना, मानसिक स्वतंत्रता दूसरों के विचारों या दबावों का शिकार बन जाती है।

आम आदमी के सिर पर सैकड़ों चिंताएँ भय बनकर बैठ जाती हैं। वह निजी, पारिवारिक और सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपनी स्वतंत्रता को भाँति-भाँति से गिरवी रखता है।

-मैंने टोका उसे- इन मामूली बातों को जाने दो ड्रैक! पूर्वी देशों में विशेषकर भारत में स्वतंत्रता की अवधारणा बहुत गहरी व्यापक और प्राचीन है। यूरोपीय देशों में आज़ादी को मुख्य रूप से बाहरी बंधनों से मुक्ति (क़ानून, परंपरा, राजा या राज्य से आज़ादी) के रूप में देखा गया है। भारत में स्वतंत्रता को आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर परिभाषित किया गया है। आध्यात्मिक स्वतंत्रता मोक्ष और मुक्ति का लक्ष्य रखती है। अर्थात् संसार के चक्र से भौतिक और मानसिक बंधनों से पूरी तरह छूट जाना।

ड्रैकुला जी अगर आप यहाँ के होते तो मुक्ति-मोक्ष को समझते और आपकी उम्र 500 वर्ष नहीं होती। ख़ैर कोई बात नहीं, इस हालत में आप भौगोलिक और भाषाई बंधनों से आज़ाद हैं।

ड्रैकुला ने पूछा- तो कब जन्मी ये स्वतंत्रता की संकल्पना? कब समझ आयी इंसान को?

-बहुत प्राचीन समय से। राजा निरंकुश या पूर्णत: स्वतंत्र नहीं होता था। यदि राजा स्वेच्छाचारी  हो तो प्रजा को अधिकार था उसे बदलने का। परन्तु यह स्वतंत्रता पल्लवित तब होगी, जब आम नागरिक भी अनिवार्य रूप से चरित्रवान हो, सदाचारी हो, राज्य के नियमों, सामाजिक मर्यादाओं का पालन करता हो, कर्मठ हो। कितनी आकर्षक मूल्यवान इच्छा है ना? नागरिक सदाचारी, कर्मठ हो; ऐसा होगा तो अपने वोट के अधिकार का सदुपयोग करेगा… और अच्छे लोगों की ही सरकार बनेगी, बहुत सी समस्याएँ, घोटाले पैदा ही नहीं होंगे।

ड्रैकुला ने टोका था, इतने पुराने वक़्त में भी मत जाओ… बस ज़रा जिज्ञासा जाग गयी थी कि कब ये भाव जागा इंसान में।

ड्रैकुला की आँखें कुछ ज़्यादा ही चमक उठीं, बोला- तुम्हें याद है मैंने ट्रांसिल्वेनिया से अपने 50 ताबूतों को लंदन मंगाने के लिए एक-एक नियम का पालन किया था।

dracula diary by shashi khare on independence day

—हाँ, सारा भ्रष्टाचार नियमों का पालन करते हुए ही होता है। व्यक्ति के जीवन को सुविधाजनक व सुरक्षित बनाने के लिए राज्य अनिवार्य तत्व साबित होता है… तो उसके नियमों के बंधन में बंधना भी ठीक ही है। बस एक चीज़ बहुत खटकती है। तुमने तो ग़ुलामी का दौर भी देखा होगा ड्रैक? उस वक़्त की दासता और आज हमारे यहां जो कर लिये जाते हैं, करदाता से उसमें अंतर ज़्यादा नहीं है।

मनुष्य के हृदय में स्वतंत्रता की चाहत जितनी तीव्र है वह उतनी ही, सामाजिक बंधन, रीति-रिवाजों का बंधन, परिवार की शर्तें, राज्य के नियम-क़ानून व शर्तें आदि की ज़ंजीरों में जकड़ी हुई है।

बहुत सारी परतंत्रता लोगों ने आगे बढ़कर स्वीकार की हैं। बहुत तरह की परतंत्रताएँ अपनाकर बुद्धिहीन स्वयं को गर्वित महसूस करते हैं, जैसे विभिन्न पारिवारिक उत्सवों

में फ़िज़ूलख़र्ची। भेड़ ने अपनी चाल ख़ुद तय की है। आदमी ने अपनी इच्छा से भेड़चाल को अपना स्वभाव बना लिया है… मेरी बातों से ड्रैकुला को कोई खेद हो नहीं रहा था, कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था। मैंने खीझते हुए कहा तुम क्या समझो, सुखी-स्वस्थ जीवन जीने के लिए पर्यावरण और धरती को हानि पहुँचाये बग़ैर हम कितनी आर्थिक समृद्धि, कितनी तकनीकी सुविधाएँ जुटाएँ, यह सोचने-समझने की स्वतंत्रता हमने खो दी है।

भाषा की ग़ुलामी, रहन-सहन, जीवन-शैली की नक़ल की ग़ुलामी, हमारे रीति-रिवाजों पर ईवेंट वालों की मनमर्ज़ी की ग़ुलामी, धर्म के सत्व रूप पर छाये पाखंड की ग़ुलामी… साँस-साँस पर बंधन है। जन्म से मृत्यु तक आदमी अनेकानेक मानसिक और सामाजिक ग़ुलामियों में जकड़ा है।

प्रत्येक नये स्वतंत्रता दिवस पर हम याद करते हैं कि हमें सचमुच स्वतंत्रता की आवश्यकता है। एक सुकरात थे, जिन्होंने स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण तक दे दिये थे। और आज विश्व में ऐसे शासन हैं, ऐसी सत्ताएँ हैं, जो उन पर सवाल उठाने पर प्राण तक ले लेती हैं। बेचारी स्वतंत्रता कहाँ घर बसाये?

ड्रैक तुम अक्सर आ जाते हो, मुझे अच्छे भी लगने लगे हो क्योंकि अपनी कम कहते हो, मेरी ज़्यादा सुनते हो। तुम कभी-कभी मेरी बातों पर बहुत सहमत होते हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम भी अपनी आज़ादी मेरे अधीन कर दो।

– बाद में सोचकर बताता हूँ। सूरज निकले उससे पहले किसी का ख़ून पीकर आता हूँ।

– किसका?

– अब अशुद्ध ख़ून, ख़राब लोगों का ख़ून नहीं पीता, मुझे भी बीमार होने से बचना है, किसी सत्याचरण, परमार्थी, सवाल पूछने वाले, हिसाब मांगने वाले, आज़ाद इंसान का ही ख़ून पियूंगा।

शशि खरे, shashi khare

शशि खरे

ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।

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