mohandas karamchand gandhi, ucl, गांधी की लंदन यात्रा
भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दर देस में लेखक-16....

गांधी की लंदन यात्राएँ

             लंदन की किसी सड़क पर चलते हुए कभी यह ख़याल आता है कि इसी शहर में एक समय मोहनदास करमचंद गांधी भी रहते थे। इतिहास अचानक बहुत अपना-सा लगने लगता है। आज जिस गांधी को हम धोती, लाठी और अहिंसा के पर्याय के रूप में याद करते हैं, लंदन ने उन्हें उस रूप में पहली बार नहीं देखा था।

यहाँ आने वाला युवक एक संकोची गुजराती था, जिसकी उम्र अभी उन्नीस वर्ष भी नहीं हुई थी और जिसका सपना था क़ानून पढ़कर बैरिस्टर बनना।

सितंबर 1888 में मोहनदास पहली बार इंग्लैंड पहुँचे। 29 सितंबर को वे साउथैम्प्टन पहुँचे और 6 नवंबर को इनर टेम्पल में क़ानून की पढ़ाई के लिए पंजीबद्ध हुए। इनर टेम्पल लंदन के उन ऐतिहासिक संस्थानों में है, जहां से बैरिस्टर बनने की परंपरा जुड़ी हुई है। गांधी ने अपना क़ानूनी प्रशिक्षण पूरा किया और 27 मई 1891 को उन्हें बार में बुलाया गया।

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इसी दौरान उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में भी क़ानून के लिए पंजीकरण कराया। यूसीएल के अनुसार उनका वहाँ अध्ययनकाल 1888 से 1889 के बीच था।

लंदन पहुँचकर युवा मोहनदास कुछ समय तक अंग्रेज़ भद्र पुरुष बनने की कोशिश करते रहे। अच्छे कपड़े पहनना, टोपी लगाना, नृत्य सीखना, वायलिन बजाना और फ़्रेंच सीखना उनके शुरूआती लंदन जीवन का हिस्सा था। उनकी उस युवावस्था की तस्वीर मन में बनती है, तो हमारे नोट पर छपे गांधी से उसका मेल बैठाना मुश्किल लगता है।

पिकाडिली सर्कस के आसपास उन्हें युवा रूप में देखने वालों ने उन्हें सूट-बूट, टोपी और हाथ में छड़ी के साथ देखा होगा। गांधी के अपने संस्मरणों और उनके लंदन प्रवास के विवरणों से भी उनके इस दौर की झलक मिलती है। कौन सोच सकता था यही युवक आगे चलकर अंग्रेज़ी साम्राज्य को सबसे बड़ी नैतिक चुनौती देने वाला व्यक्ति बनेगा।

शाकाहारी भोजन ने उन्हें परेशान किया। उन्होंने अपनी माँ को वचन दिया था कि वे मांस-मदिरा से दूर रहेंगे। लंदन में उनके लिए शाकाहारी भोजन खोजना आसान नहीं था। एक समय उन्हें पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण भूखा भी रहना पड़ा। अंततः उन्हें एक शाकाहारी रेस्तराँ मिला और फिर वे लंदन वेजिटेरियन सोसायटी से जुड़े। यहाँ भोजन उनके लिए केवल स्वाद या आवश्यकता का विषय नहीं रहा, बल्कि नैतिकता और आत्म-संयम से जुड़ा प्रश्न बन गया।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया, बहसें सुनीं, धर्म और दर्शन पर विचार किया और धीरे-धीरे अपने ही संस्कारों को नये ढंग से समझने लगे।

यह शायद गांधी की पहली लंदन यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष था। वे पश्चिम को समझने आये थे और इसी कोशिश में उन्होंने भारत को भी नये ढंग से समझना शुरू किया।

1891 में क़ानून की पढ़ाई पूरी करके वे भारत लौट गये। लेकिन लंदन से उनका रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। वे 1906, 1909 और 1914 में फिर ब्रिटेन आये। तब वे वही संकोची क़ानून विद्यार्थी नहीं थे। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के अधिकारों के संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व को बदल दिया था। अब वे अपने लोगों की आवाज़ लेकर ब्रिटिश सत्ता के सामने खड़े होने लगे थे। 1906 में वे भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में ब्रिटेन आये थे।

1909 की यात्रा विशेष रूप से दिलचस्प है। इस बार गांधी दक्षिण अफ़्रीका से ब्रिटेन आये और ब्रिटेन में भारतीयों के प्रश्न को लेकर सक्रिय रहे। लेकिन इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक प्रसंग उनके इंग्लैंड से दक्षिण अफ़्रीका लौटते समय सामने आया। नवंबर 1909 में Kildonan Castle जहाज़ पर उन्होंने हिन्द स्वराज लिखा।

जिस पश्चिमी आधुनिकता को समझने के लिए कभी वे लंदन आये थे, अब उसी आधुनिक सभ्यता की सीमाओं पर वे सवाल उठा रहे थे। उनके भीतर एक नया गांधी जन्म ले रहा था।

1914 में वे फिर इंग्लैंड आये। संयोग देखिए, इसी समय प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया। गांधी ने भारतीय स्वयंसेवकों के लिए एक फ़ील्ड एंबुलेंस यूनिट के गठन में भूमिका निभायी और स्वयं नर्सिंग तथा प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण लिया। उस समय तक उनका विश्वास था कि ब्रिटेन के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते भारतीयों के अधिकारों की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

फिर आया 1931।

अब गांधी केवल किसी क़ानून की पढ़ाई करने वाले युवक नहीं बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में लंदन आये। इस बार उनके शरीर पर न सूट था, न टाई, न चमकते जूते। साधारण धोती, चादर और हाथ में लाठी थी।

जिस शहर में कभी युवा मोहनदास ने अंग्रेज़ों जैसा दिखने की कोशिश की थी, उसी शहर में अब गांधी अपनी भारतीय पहचान को ही अपनी सबसे बड़ी ताक़त बनाकर खड़े थे।

रहने के लिए उन्होंने कोई आलीशान होटल नहीं चुना। वे पूर्व लंदन के Bow इलाक़े में स्थित किंग्स्ले हॉल में रहे। सामाजिक कार्यकर्ता और शांति समर्थक म्यूरिल लेस्टर ने उन्हें वहाँ रहने का निमंत्रण दिया था। गांधी ने भी स्पष्ट रूप से इच्छा व्यक्त की थी कि वे ऐसे स्थान पर रहना चाहते हैं, जहाँ वे पूर्वी लंदन के आम और ग़रीब लोगों के बीच रह सकें।

गांधी 12 सितंबर से 5 दिसंबर 1931 तक किंग्स्ले हॉल से जुड़े रहे। यद्यपि गोलमेज़ सम्मेलन की बैठकों के निकट होने के कारण 21 सितंबर को उनका कामकाजी कार्यालय 88 नाइट्सब्रिज में स्थानांतरित कर दिया गया था। वे हर दिन किंग्स्ले हॉल लौटते थे। उनका छोटा-सा कमरा ऊपर की मंज़िल पर था। सुबह वे आस-पास की गलियों में टहलते और स्थानीय लोगों से मिलते। लोग उन्हें देखने आते, बच्चे कौतूहल से उन्हें देखते और पत्रकार उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते।

एक तरफ़ लंदन के राजसी कमरों में भारत के संवैधानिक भविष्य पर बातचीत चल रही थी, दूसरी तरफ़ ईस्ट एंड के एक साधारण सामुदायिक केंद्र में धोती पहने गांधी आम लोगों के बीच बैठे मिलते थे।

इसी यात्रा में उनकी मुलाक़ात चार्ली चैप्लिन से भी हुई। 22 सितंबर 1931 का वह दृश्य कितना अनोखा रहा होगा। एक तरफ़ दुनिया का महान हास्य कलाकार और दूसरी तरफ़ दुनिया को अहिंसा का रास्ता दिखाने वाला नेता। दोनों ने आधुनिक सभ्यता और मशीनों के प्रभाव जैसे प्रश्नों पर बातचीत की। गांधी हेरिटेज पोर्टल भी 22 सितंबर 1931 को गांधी और चैप्लिन की मुलाक़ात की पुष्टि करता है।

गांधी लंकाशायर भी गये। वहाँ कपड़ा उद्योग से जुड़े मज़दूरों और टेक्स्टाइल उद्योग के लोगों से मिले। भारतीय स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश कपड़ा उद्योग पर उसके प्रभाव के कारण वहाँ बेरोज़गारी और असंतोष की स्थितियाँ थीं। फिर भी गांधी ने मज़दूरों से खुलकर बात की। वे अपनी बात छिपाते नहीं थे और सामने वाले की पीड़ा सुनने से भी पीछे नहीं हटते थे।

यही उनकी ख़ासियत थी। वे ब्रिटिश शासन के विरोधी थे, ब्रिटिश मनुष्य के नहीं। वे व्यवस्था से असहमति रखते थे, व्यक्ति से दुश्मनी नहीं।

1931 का लंदन केवल गोलमेज़ सम्मेलन का लंदन नहीं था। गांधी ने यहाँ राजनेताओं से बातचीत की, विद्यार्थियों से संवाद किया, मज़दूरों से मिले और आम लोगों के बीच रहे। वे ब्रिटिश सत्ता से भारत की स्वतंत्रता की बात कर रहे थे, लेकिन साथ ही ब्रिटिश समाज के सामान्य लोगों के साथ संवाद का पुल भी बना रहे थे।

गांधी की लंदन यात्राओं में मुझे सबसे अधिक आकर्षित करने वाली बात यही लगती है कि पहली यात्रा और उनकी अंतिम ब्रिटेन यात्रा के बीच 43 वर्ष का अंतर था। इन 43 वर्षों में केवल एक व्यक्ति की उम्र नहीं बढ़ी थी, उसका पूरा व्यक्तित्व और उसकी सोच बदल गयी थी।

1888 में मोहनदास लंदन से सीखने आये थे।
1931 में गांधी लंदन को आईना दिखाने आये।

पहली बार वे अंग्रेज़ी समाज में स्वयं को ढालने की कोशिश कर रहे थे। आख़िरी बार वे अपनी भारतीय पहचान के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के सामने खड़े थे।

पहली बार उनके हाथ में क़ानून की किताबें थीं। आखिरी बार हाथ में लाठी थी। लेकिन उस लाठी के पीछे करोड़ों भारतीयों की उम्मीद खड़ी थी। वह केवल सहारे की लाठी नहीं थी, वह अहिंसा और आत्मबल का प्रतीक बन चुकी थी।

यही लंदन और गांधी की कथा का सबसे सुंदर पक्ष है। यह केवल एक महापुरुष की यात्राओं का विवरण नहीं, एक मनुष्य के भीतर हुए वैचारिक परिवर्तन की कहानी है।

एक ऐसा युवक जो कभी लंदन में अंग्रेज़ जेंटलमैन बनने की कोशिश कर रहा था, उसी शहर में चार दशक से कुछ अधिक समय बाद अपनी सादगी, अपनी धोती और अपनी अहिंसा के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधियों के सामने खड़ा था।

लंदन ने मोहनदास को केवल क़ानून नहीं सिखाया था। उसने उन्हें प्रश्न करना सिखाया था। और शायद प्रश्नों की वही आदत आगे चलकर उन्हें अपने समय की सबसे बड़ी सत्ता से प्रश्न करने का साहस दे गयी।

यह मोहनदास से गांधी बनने की यात्रा थी।

और शायद, इसी अर्थ में, गांधी की लंदन यात्रा केवल लंदन की यात्रा नहीं थी। यह एक मनुष्य के अपने भीतर लौटने की यात्रा थी।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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