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ग़ज़ाला तबस्सुम को सम्मान, उर्दू पर चिंतन

पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 23 अगस्त को कल्चर एंड लिटरेरी फ़ोरम ऑफ़ बंगाल की तरफ़ से उर्दू शिक्षाविदों, शायरों और लेखकों के एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें उर्दू भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए विचार-विमर्श किया गया। विमर्श के अलावा आसनसोल और आस-पास के इलाक़े के अनेक साहिबे किताब शायरों, अफ़सानानिगारों यानी कथाकारों और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने वाली शख़्सियतों को दुशाला और सम्मान चिह्न देकर सम्मानित किया गया।

सम्मानित किये गये व्यक्तित्वों की फ़ेहरिस्त में आब-ओ-हवा के संपादन मंडल में शामिल ग़ज़ाला तबस्सुम का नाम भी शामिल रहा। सम्मान के बाद ग़ज़ाला तबस्सुम ने मंच से इस सम्मेलन और उर्दू के प्रचार-प्रसार के संबंध में अपने विचार भी सभागार के साथ साझा किये।

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सम्मेलन में मुख्य रूप से इन मुद्दों पर चर्चा की गयी कि उर्दू मीडियम से पढ़ाई करने वाले छात्रों और उर्दू मीडियम में पढ़ाने वाले शिक्षकों को वर्तमान हालात में क्या-क्या परेशानियां होती हैं, इनसे कैसे निजात पायी जा सकती है। उर्दू मीडियम से पढ़े हुए छात्रों को रोज़गार तलाशने में किस तरह की परेशानियां होती हैं, इस पर भी चर्चा हुई।

उर्दू की आब-ओ-हवा

उर्दू शिक्षाविदों, लेखकों और शायरों के बीच विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकलकर आया उर्दू एक समृद्ध ज़ुबान है। उर्दू के चाहने वाले पूरी दुनिया में मौजूद हैं लेकिन उर्दू अब सिर्फ़ उर्दू वालों के दरमियान ही सीमित होती जा रही है। उर्दू में आयी किताबों के पाठक भी उर्दू जानने वाले ही होते हैं। उर्दू नहीं जानने वाले लोग बहुत-सी अच्छी किताबों का फ़ायदा नहीं उठा पाते हैं। यहां तक कि उर्दू ज़ुबान के माहिरीन और अच्छे लेखकों से भी अन्य ज़ुबान वाले वाक़िफ़ नहीं हैं, जिसका ख़ामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। अब बहुत ज़रूरी हो गया है कि उर्दू ज़ुबान की किताबों का हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन साथ-साथ हो। इससे किताबों, शायरों और लेखकों का दायरा बढ़ेगा, जिससे पाठक और लेखक दोनों लाभान्वित होंगे।

इस सम्मेलन की कामयाबी और ग़ज़ाला तबस्सुम के साथ अन्य साहित्यकारों, शिक्षाविदों के सम्मान पर आब-ओ-हवा की ओर से मुबारकबाद के साथ यह उल्लेख ज़रूरी हो जाता है कि आब-ओ-हवा का एक बड़ा मक़सद दरअसल ऐसी ही चिंताएं रही हैं। आब-ओ-हवा ब्लॉगज़ीन ने अपने क़रीब ढाई साला सफ़र में हिंदी और उर्दू के बीच एक पुल बनाने का काम किया है, वह भी बग़ैर भेदभाव या ज़ुबानों को अलग किये हुए। मशहूर अरूज़ी व अदीब डॉ. आज़म लिखित ‘उर्दू के शाहकार’ ब्लॉग के तहत अब तक उर्दू की 30 से अधिक किताबों को रोशनी में लाया जा चुका है।

अलावा इसके, हिंदी के साथ ही उर्दू के साहित्य को देवनागरी में लगातार यहां प्रकाशित किया जा रहा है। शायरी और नस्र, हर तरह के उर्दू साहित्य को देवनागरी के पाठकों के बीच ले जाने का काम आब-ओ-हवा निस्वार्थ भाव से कर रहा है, लगातार।

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