
- September 4, 2026
- आब-ओ-हवा
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शिक्षक दिवस के अवसर पर संस्मरण ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....
सबसे शिक्षण धर्म कठोरा
पाँच सितंबर को वैसे मेरा जन्मदिन होता है। इस बार साठवां है। मेरे पापाजी इस संयोग से बहुत प्रसन्न रहते थे कि मेरा जन्मदिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म के ही दिन है। वह चाहते थे कि यह दिन अलग ढंग से मनाया जाये, भारतीय कैलेंडर के अनुसार भी मेरा जन्मदिन राधाअष्टमी को होता है।
पापाजी मुझे म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित अफ़सर बनते देखना चाहते थे। वह स्वयं भी एक स्वनिर्मित अधिकारी सम व्यक्तित्व थे। यूं वह पहले शिक्षक ही थे और तो और वह मेरे भी शिक्षक थे। मैं प्राथमिक शाला काँकर का विद्यार्थी था और वह वहाँ दो शिक्षकों में से एक थे। मैं शिक्षकों के परिवार का हिस्सा हूं। मेरे दोनों चाचाजी भी शिक्षक बिरादरी के रहे। अब भी हम दो भाई और मेरी भार्या शिक्षक हैं और दोनों अनुज वधुएँ भी सरकारी स्कूलों के श्याम-पटों पर लिखते-लिखते पढाती हैं।
तो पापाजी की इच्छानुसार मैं अफ़सर नहीं बना। नियति की अपनी योजनाएं होती हैं। मैं शिक्षक बन गया। आज लगता है, शिक्षक बनने की मेरी यात्रा शायद नौकरी मिलने के दिन शुरू नहीं हुई थी। उसका आरंभ तो बहुत पहले हो चुका था। शाहनगर की ग्यारहवीं कक्षा में, जब मुझे उदय वीर शर्मा मिले थे। एक ऐसे शिक्षक, जिसने भीतर कुछ जगा दिया था।
उदय वीर शर्मा ने मुझे अंग्रेज़ी पढ़ायी थी। अहा कितना प्रवाह था उस एकाकी व्यक्तित्व में। वह अंग्रेज़ी के भीतर जैसे बसते थे। जब वह अंग्रेज़ी बोलते तो उन्हें सुनना अपने आप में एक दृश्य होता। शब्दों पर उनका अधिकार मुझे आकर्षित करता था। उन्हीं दिनों मेरे भीतर अंग्रेज़ी बोलने और अनुवाद करने की रुचि पैदा हुई। आज समझ में आता है अच्छे शिक्षक का प्रभाव पाठ्यक्रम से बहुत आगे जाता है। वह विद्यार्थी को अपनी रुचि का एक बीज दे देता है। वह बीज कब अंकुरित होगा, शिक्षक को भी पता नहीं होता।
शर्मा जी मुझसे बहुत स्नेह करते थे। अपने कमरे में बुलाकर अच्छी चाय बनाकर पिलाते। उनके कमरे में रामकृष्ण, शारदा मां और स्वामी विवेकानंद की बड़ी तस्वीरें लगी थीं। विवेकानंद की अनेक किताबें उनके पास थीं। वे उनके भक्त थे। उन्हीं से मैंने जाना कि शून्य की खोज से जुड़ी प्रसिद्ध कहानी उतनी सरल और सच नहीं है, जितनी हमें बता दी जाती है।
एक-दो बार वे मुझे अपने साथ कटनी भी ले गये। एक बार उन्होंने पूछा, “कुछ खाएगा?” मैंने कहा, “हां… डोसा।
वे ख़ूब हंसे। फिर मुझे डोसा खाते हुए बहुत ख़ुश होकर देखते रहे। एक दिन उन्होंने पूछा—
“सच बताना—तू क्या बनना चाहता है?”
मैंने संकोच से कहा—
“अभिनेता।”
वे फिर हंसे।
उस समय मैं नहीं जानता था कि जीवन मुझे किस दिशा में ले जाएगा। शायद उन्हें भी नहीं मालूम था कि जिस लड़के के सपने में अभिनेता था, वह आगे चलकर शिक्षक बन जाएगा।
फिर हम बिछड़ गये।
कक्षा पास हुई। पिताजी का तबादला हुआ और हम भी तिनकों की तरह एक जगह से दूसरी जगह उड़ते चले गये।
लगभग दस वर्ष बाद शायद बीना स्टेशन पर वे मुझे दिखायी दिये। मैंने पास जाकर पूछा—
“आप यू.वी. शर्मा सर हैं?”
“हां।”
“मैं ब्रज हूं… शाहनगर में पढ़ता था।”
उन्होंने मुझे पहचान लिया, लेकिन वे कुछ खोये-खोये से लगे। मैं काफ़ी देर उनके पास खड़ा रहा। मेरे भीतर पुरानी स्मृतियां थीं, लेकिन उनके चेहरे पर उनकी वैसी प्रतिध्वनि नहीं थी। वह मुलाक़ात मेरे भीतर रह गयी।

शायद उसी दिन मैंने यह जाना कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संबंध समय से बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन स्मृति दोनों तरफ़ बराबर नहीं रहती।
इसीलिए आज जब कोई पुराना विद्यार्थी मेरे पास आकर कहता है— “सर, मैं फलां… आपने मुझे पढ़ाया था”— तो मैं उसे पहचानने की पूरी कोशिश करता हूं। अगर तुरंत याद न आये तो भी उससे बात करता हूं, उसके चेहरे में अपने पुराने विद्यार्थी को खोजता हूं। मैं नहीं चाहता कि कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक के सामने खड़ा होकर अपनी पहचान अकेले तलाशता रहे।
मेरे भीतर शिक्षक का बीज था, लेकिन उसे पेशे का रूप लेने में समय लगा। पहले मैंने बी.एससी. के बच्चों को गणित पढ़ाया।
गणित पढ़ाते हुए मुझे यह अनुभव हुआ कि किसी विषय को जानना और उसे किसी दूसरे तक पहुंचा पाना दो अलग क्षमताएं हैं। विषय का ज्ञान शिक्षक को विद्वान बना सकता है, लेकिन विद्यार्थियों तक पहुंचने की कला ही उसे शिक्षक बनाती है।
फिर भोपाल के एक निजी स्कूल में गणित पढ़ाने लगा। वहां एक दिलचस्प घटना हुई। बच्चों को मेरा गणित पढ़ाना जितना पसंद नहीं था, अंग्रेज़ी पढ़ाना ज़्यादा पसंद था। मेरे लिए यह सुखद विडंबना थी। जिस अंग्रेज़ी के प्रति मेरी रुचि किशोरावस्था में पैदा हुई थी, उसकी जड़ें उसी पुराने शिक्षक तक जाती थीं।
शायद तब पहली बार मैंने महसूस किया कि उदय वीर शर्मा मेरे भीतर अभी भी पढ़ा रहे हैं।
बाद में मैंने भौतिकी पढ़ाना शुरू किया। विषय बदलते रहे, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली—कक्षा के सामने खड़े होकर बच्चों से संवाद करने का आनंद।
फिर वह दिन आया, जब सरकारी स्कूल में गणित शिक्षक के रूप में मेरी नियुक्ति हुई। मेरी पोस्टिंग रुसल्ली साहू में हुई। यह विदिशा से बहुत दूर था। शहर की सुविधाओं से दूर, मिट्टी और गंवई जीवन के बीच एक सरकारी स्कूल। बाहर से देखने पर शायद वहां बहुत कुछ कम था— संसाधन कम, सुविधाएं कम, संभावनाएं अनिश्चित।
लेकिन बच्चों के भीतर कुछ भी कम नहीं था। उनकी आंखों में वही जिज्ञासा थी, जो किसी बड़े शहर के बच्चे की आंखों में होती है।
यहीं मैंने अध्यापन को नौकरी से अलग करके देखना शुरू किया। मैंने गिजूभाई को पढ़ा। ‘पलाश’ पढ़ी। बाद में ‘शैक्षिक विमर्श’ भी पढ़ता रहा। अनेक अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण लिये। शिक्षा की नयी विधियों को समझने लगा।
धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि शिक्षक का काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। बच्चे को सीखने के लिए तैयार करना है। और उससे भी पहले, उसे यह विश्वास दिलाना है कि वह सीख सकता है।
इसलिए मैंने कभी सामान्य ढंग से नहीं पढ़ाया। गतिविधियों का सहारा लिया, संवाद किया, बच्चों को शामिल किया। मुझे कक्षा में केवल उत्तर देने वाले बच्चे नहीं चाहिए थे; सवाल करने वाले बच्चे चाहिए थे, तभी मैंने जाना कि शिक्षक होना कितना रचनात्मक काम है। एक ही पाठ को बीस बच्चों तक पहुंचाने के बीस रास्ते हो सकते हैं।
और जब कोई बच्चा अचानक कहता है— “अच्छा, अब समझ आया!” तो शिक्षक के लिए उससे सुंदर क्षण बहुत कम होते हैं।
अध्यापन करते-करते मेरा रिश्ता शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़ता गया। मैंने अनेक शिक्षक प्रशिक्षण लिए और बाद में स्वयं भी शिक्षकों को प्रशिक्षित करने लगा। यह काम मुझे बहुत आनंद देता रहा। प्रशिक्षण में मुझे सबसे अच्छा लगता था कुछ देर के लिए शिक्षक को शिक्षक नहीं रहना पड़ता। हम गतिविधियां करते, खेलते, हंसते, छोटे बनते और फिर उसी अनुभव से कोई शैक्षिक संदेश निकालते।
मेरा विश्वास था जो शिक्षक स्वयं सीखने की ख़ुशी महसूस नहीं करता, वह बच्चों को सीखने की ख़ुशी नहीं दे सकता।
मैंने मॉड्यूल लेखन भी किया। शैक्षिक विषयों पर पढ़ा और लिखा। प्रशिक्षणों में मेरा संवाद थोड़ा साहित्यिक और थोड़ा दार्शनिक रहा। शायद यही वजह थी कि मेरी भाषा में होने वाली बातचीत लोगों को पसंद आती थी। मुझे लगता रहा शिक्षा केवल तकनीक नहीं है। उसमें मनुष्य को समझने की ज़रूरत है। कभी-कभी गणित का सवाल हल करते हुए भी बच्चे के जीवन का कोई सवाल सामने आ जाता है। कभी भाषा पढ़ाते-पढ़ाते आदमी अपने ही जीवन की भाषा समझने लगता है शिक्षण मेरे लिए धीरे-धीरे विषय से बढ़कर जीवन-दृष्टि बनता गया। समय बीता और मैं प्राचार्य बन गया।
पद बदल गया। ज़िम्मेदारियां बढ़ गयीं। लेकिन मैंने कक्षा नहीं छोड़ी। एक-दो पीरियड लेना अब भी जारी रखा क्योंकि मुझे लगता है कि प्राचार्य होना प्रशासनिक ज़िम्मेदारी है, शिक्षक होना जीवन की ज़िम्मेदारी।
मैंने गणित, हिंदी और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर किया। बी.एड. किया। अनेक अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण लिये। शिक्षकों को प्रशिक्षित किया। मॉड्यूल लिखे। पढ़ता रहा और सीखता रहा।लेकिन इन सबके बीच मेरा सबसे प्रिय परिचय आज भी वही है— मैं शिक्षक हूं।

अल्बेर कामू की अपने शिक्षक को लिखी चिट्ठी का भाव मुझे अक्सर याद आता है। उसमें एक विद्यार्थी अपने शिक्षक को इसलिए याद नहीं करता कि उसने उसे कोई पाठ पढ़ाया था, बल्कि इसलिए कि शिक्षक ने उसके भीतर जीवन की संभावना को पहचाना था। शिक्षक की असली उपलब्धि शायद यही है। यह पत्र यहाँ है। यह पत्र कामू ने नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद लिखा था।
19 नवंबर 1957
प्रिय मॉन्स्यूर जर्मेन,
इन दिनों अपने चारों ओर मची हलचल को थोड़ा थम जाने दिया, ताकि आपसे अपने हृदय की गहराइयों से बात कर सकूँ।
मुझे अभी-अभी एक ऐसा सम्मान प्रदान किया गया है, जो मेरे लिए बहुत बड़ा है। ऐसा सम्मान, जिसे मैंने न कभी चाहा था, न उसके लिए कोई प्रयास किया था। लेकिन जब मुझे यह समाचार मिला, तो अपनी माँ के बाद सबसे पहला ख़याल आपका ही आया।
आपके बिना, उस छोटे और निर्धन बच्चे की ओर स्नेह से बढ़े आपके हाथ के बिना, आपकी शिक्षा और आपके उदाहरण के बिना— यह सब कुछ कभी संभव नहीं हो पाता।
मैं इस तरह के सम्मानों को बहुत अधिक महत्त्व नहीं देता। लेकिन कम-से-कम यह अवसर तो मिलता है कि मैं आपको बता सकूँ कि मेरे लिए आप तब क्या थे और आज भी क्या हैं; और यह विश्वास दिला सकूँ कि आपके प्रयास, आपका काम और उसमें धड़कता आपका उदार हृदय आज भी आपके उन छोटे स्कूली बच्चों में से एक के भीतर जीवित है— उस बच्चे में, जो वर्षों बीत जाने के बावजूद आपका कृतज्ञ शिष्य बना रहा है।
मैं खुले ह्दय से आपको गले लगाता हूँ।
-अल्बेयर कामू
वह विद्यार्थी के भीतर कुछ ऐसा छोड़ जाये जो उसके चले जाने के बाद भी काम करता रहे।शायद उदय वीर शर्मा सहित कुछ प्रिय शिक्षकों ने मेरे भीतर वही छोड़ा था। भाषाओं में अंग्रेज़ी के प्रति प्रेम, किताबों के प्रति जिज्ञासा, विचारों के प्रति खुलापन और विद्यार्थी के प्रति स्नेह। उनकी दी हुई चाय का स्वाद भी शायद उसी विरासत का हिस्सा है।
तुलसी की पंक्ति याद आती है – सबसे सेवक धर्म कठोरा… मैं इसे अपनी तरह से शिक्षा की दुनिया में कहना चाहता हूं:
सबसे शिक्षण धर्म कठोरा
शिक्षक होना कठिन है। हर दिन किसी दूसरे के भविष्य के सामने खड़ा होना पड़ता है। बच्चे की असफलता में उसका आत्मविश्वास बचाना पड़ता है। उसकी जिज्ञासा को जीवित रखना पड़ता है। कभी उसे गणित सिखाना होता है, कभी भाषा, कभी विज्ञान और कभी केवल यह भरोसा देना होता है कि वह भी कुछ बन सकता है। मुझे अपने अनेक शिक्षक याद आ रहे हैं। प्राथमिक पढाने वाले सुरेश तिवारी गुरुजी, माध्यमिक के खैरा जी, कुरवाई में कटारे सर, पन्ना के चक्रवर्ती जी, निवाड़ी में आभा दुबे, विदिशा में डांगे सर और बी.एड. भोपाल में थे एक डी.पी.एस. परमार और दीदार सिंह जी।
मैं अभिनेता नहीं बन सका। शायद अच्छा ही हुआ। जीवन ने मुझे एक ऐसी भूमिका दे दी जिसमें हर साल नये पात्र आते हैं, हर कक्षा एक नया मंच होती है और हर विद्यार्थी अपने साथ एक अनलिखी कहानी लेकर आता है। मैं अभी भी प्राचार्य हूं। लेकिन भीतर से वही शिक्षक हूं, जो किसी बच्चे के चेहरे पर समझ की पहली चमक देखकर ख़ुश हो जाता है।

ब्रज श्रीवास्तव
कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।
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धन्यवाद।
श्री ब्रज श्रीवास्तव समकालीन साहित्य का एक सम्मानीय नाम है वह कविता,कहानी,संस्मरण लेखन में एक मंजे हुए रचनाकार के रूप में पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं।आपके शिक्षक रूप से तो मैं ज्यादा परिचित नहीं हूँ,किंतु आपके साथ ही आपके पिताजी,चाचाजी की सहजता,सरलता और मुख्य रूप से बच्चों पर लिखी रचनाओं ने भी काफी प्रभावित किया है। आपकी क़लम से साहित्य की सेवा अनवरत सेवा होती रहेगी एसी कामनाओं के साथ-साथ जन्म दिन और शिक्षक दिवस की आत्मीय शुभकामनाएं
शिक्षण कार्य को आपने शिक्षण धर्म कहा , जो एक कवि हृदय समर्पित शिक्षक की ही सोच हो सकती है। शिक्षण कार्य वास्तव में ही बहुत कठोर होता है, इसमें धैर्य के साथ बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए बच्चों के दिल में अपनी छाप छोड़ना होती है।
मैं आपके साथ लगभग एक सत्र ही रहा । इतने समय में ही आपकी बच्चों के हृदय में जो सम्मान घर कर रहा था,उसे मैंने अनुभव किया है।
आपके संस्मरण व शिक्षक दिवस के दिन ही आपके जन्मदिन की कोटि कोटि शुभकामनाएं।
बहुत ही संदेशपरक प्रेरणादायक संस्मरण…
शिक्षक यात्रा में जहां व्यक्तित्व उजागर होता हैं वही एक शिक्षक की जिम्मेदारी दायित्व की मौन धमक भी….
सही हैं.. शिक्षण से ज्यादा शैक्षणिक गतिविधियाँ ही पाठ्यक्रम को रोचक बनाती हैं….एक विशेष बात… शिक्षक अपने आचरण और मूल्यों से विद्यार्थियों के लिए आदर्श बनता हैं.. क्योकि विशिष्ट तकनीकि,क्षमता, संचार कौशल के साथ संवाद कौशल में भी पारंगत होना एक कुशल शिक्षक का विशेष गुण होता हैं… लेकिन यह भी सच है… सबसे कठिन शिक्षक धर्म कठोरा…
बहुत-बहुत बधाई, भाई!
शिक्षक का जीवन भी अलग ही होता है । वो अपने छात्रों के मन मे हमेशा के लिए रह जाते है ।मुझे भी याद आ गए अपने शिक्षक। जब बच्चों को पढ़ाती थी तो जो विषय पढ़ाती उन विषयों के शिक्षक मेरे कान में जो कहते जाते वही मैँ बोलती जाती थी ।
बहुत बढ़िया लिखा । जनमदिन की बहुत बधाई ब्रज जी ।
मन मोह लेने वाला संस्मरण।