
- September 5, 2026
- आब-ओ-हवा
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अपने नवाचारी प्रयासों के लिए पुरस्कृत एक स्कूल शिक्षिका से सृजनधर्मी शिक्षक प्रमोद दीक्षित मलय ने की ख़ास बातचीत कि कैसे एक विद्यालय की सूरत बदलती है, कैसे बुझी आंखों में सपने उड़ानें भरते हैं... शिक्षक दिवस पर पढ़िए एक ख़ास बातचीत।
आसिया फ़ारूक़ी: बच्चों के सतरंगी सपनों का एक नाम
वह अप्रैल के दूसरे पखवारे की एक तेज़ दोपहर थी। सूरज आग के गोले बरसा रहा था। सड़क और गलियों को पार करता खादी का अंगौछा सिर पर बांधे मैंने फ़तेहपुर के प्राथमिक विद्यालय अस्ती के लोहे के बड़े फाटक को पारकर घने पेड़ की छाया में बाइक खड़ी की ही थी कि ठीक बायीं ओर सीमेंटेड ईंटों के छोटे से मैदान के पार राज्य अध्यापक पुरस्कार 2019 एवं वर्ष 2023 का राष्ट्रीय अध्यापक पुरस्कार प्राप्त गौरवर्णी आकर्षक व्यक्तित्व एवं संकल्पशक्ति की धनी शिक्षिका आसिया फ़ारूक़ी को बरामदे में खड़े पाया, जो बच्चों के साथ किसी गतिविधि में सहभागी थीं। बाइक की आवाज़ से सभी की लय टूटी और नज़रें मेरी ओर मुड़ गयीं। एक अपरिचित को विद्यालय में देख उनकी आंखों में सवालों के चिह्न उभर आये थे। शिक्षिका बरामदे से उतरतीं कि मैं उन तक पहुंच गया। नमस्कार की मुद्रा में दो जोड़ी हाथ परस्पर जुड़ गये थे। मैंने परिचय देकर आने का उद्देश्य बताया।

हम प्राथमिक विद्यालय अस्ती के प्रधानाध्यापक कक्ष में बैठ चुके थे और कांच के दो स्वच्छ गिलासों में रसोइया बड़े आदर के साथ पानी रख गयी। कक्ष की हर दीवार विद्यालय के प्रति शिक्षिका की मेहनत, समर्पण, लगन एवं आत्मीयता का ललित गान सुना रही थीं। व्यक्तिगत और विद्यालय की उपलब्धियों के प्रमाणपत्र, सम्मान एवं प्रशस्ति पत्र, शील्ड एवं ट्रॉफ़ियां बहुत क़रीने से दीवारों और आलमारियों में सजे हुए थे। मैंने लगभग आधे गिलास पानी से गला तर करके सवाल किया कि इस बदलाव की शुरूआत कहां से और कैसे हुई।
आसिया फ़ारूक़ी थोड़ी देर चुप रहीं, मानो विद्यालय विकास की कहानी का वह सिरा खोज रही हों, जहां से मिशन शुरू हुआ था। समय की चादर की सलवटों को हटा सामने की खिड़की से चमकते आसमान पर नज़रें टिकाये बोलीं, “विद्यालय का पहला दिन बहुत डरावना एवं हतोत्साहित करने वाला था। पूरे परिसर में कूड़े का ढेर और उसमें भूख का हल तलाशते जानवरों के झुंड, बरामदे में बैठे अपना भविष्य नशे के धुंए में उड़ाते दिशाहीन युवा। पहला दृष्टि में विद्यालय तो कहीं दिखा ही नहीं। तभी अंदर से एक संकल्प जगा, इस कूड़े के ढेर से ही ऐसा विद्यालय उगाना है, जिसकी सुगंध से सारा समाज महक जाये, जिसके प्रकाश से युवा जीवन की सही राह खोज सकें, शिक्षा के गारे से बच्चों की मज़बूत बुनियाद निर्मित हो और युवा लड़कियां एवं महिलाएं हुनर के साथ स्वावलंबी बन परिवार की सामर्थ्य बनें।”
स्वल्पाहार आया और मैंने पूछा, “आज का यह चमकता हुआ परिवेश देखकर कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि यहां कभी गंदगी, दुर्गंध और कूड़े का जमावड़ा रहा होगा। इस चुनौती से कैसे जीतीं? आसिया के चेहरे पर गम्भीरता के भाव उमड़े, आंखें स्थिर-सी हुईं और माथे पर लकीरें उभरीं। दार्शनिक अंदाज़ में बोलीं, सवाल जीत-हार का नहीं बल्कि चुनौतियों से जूझने की दृढ़ता का है। ऊंचाई पर चढ़ने के रास्ते कभी आसान नहीं होते पर संकल्प के धनी चोटियों के शीश झुका ही देते हैं। एक अकेली शिक्षिका के लिए लड़ना सहज नहीं था पर क़दमों को ठहरना पसंद न था। घरों का कूड़ा डालने और यहां जमघट लगाने से मना करने पर धमकियां मिलीं, ईट-पत्थर मारे गये, स्कूटी पंक्चर की गयी, हैंडपम्प ख़राब किया, रास्ता रोका गया पर ज़िद थी परिवेश बदलने की, तो ट्रैक्टरों से कूड़ा समतल करवाया, गड्ढे भरवाये। ऊपर से मिट्टी डलवायी। पानी भरवाया। ईंटें मंगवाकर क्यारियां बनवाईं, बेल और फूलों के पौधे रोपे, वृक्षारोपण किया। भवन की मरम्मत कर पेंट-पुताई करवायी तो लगा विद्यालय सांसें लेने लगा है। लगातार अभिभावकों से सम्पर्क करके नामांकन कराया, सहयोग हेतु वॉलेंटियर तैयार किये।”
आगे बोलतीं कि मेरे सवाल ने उनकी दिशा मोड़ दी, “वॉलेंटियर वाली बात मैं समझा नहीं?” वह मुस्कुराईं जैसे पहाड़ी झरना हंस पड़ा हो, “जब मैं यहां आई तो 7-8 बच्चे ही थे, आज 250 से ऊपर हैं। जब विद्यालय और बच्चों को प्रति समर्पण, आत्मीयता और मधुरता का भाव और अपने काम से प्यार हो तो नये-नये विचार पनपते हैं। नामांकन बढ़ा लेकिन मुझ एकल शिक्षिका के लिए पांच कक्षाएं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ संभालना कठिन था, तो समाज से आह्वान किया कि स्नातक उत्तीर्ण लड़कियां स्वेच्छा और सीखने-सिखाने के भाव से वॉलेंटियर के रूप में विद्यालय में समय दे सकती हैं। ख़ुश हूं कि दो-तीन लड़कियां आगे आईं।”
वह लगातार बोले जा रही थीं, उनके पास विद्यालय बदलाव के क़िस्सों की पोटली थी। मैं कोई भी सवाल करता तो वह पोटली से उसका उत्तर वाला क़िस्सा निकाल लेतीं।
उनके पास मानो हर सवाल का जवाब हाज़िर था। चुनौतियों की आंच से उनका प्रदीप्त चेहरा चमक रहा था, जिसके आभामंडल में उनके किये कार्य चमचमा रहे थे। अस्ती की महिलाओं को रोज़गार से जोड़ने के लिए सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, सॉफ़्ट ट्वायज़ एवं पपेट निर्माण, सजावटी सामान बनाने हेतु हरेक साल अलग-अलग कार्यशालाएं कीं। महिलाओं को मशीन और कच्चा माल उपलब्ध कराया। आज वे लड़कियां और महिलाएं आर्थिक रूप से समर्थ हो परिवार की सहायक बनी हैं। समाज द्वारा प्रति वर्ष 500 से अधिक खिलौने, झोले और अन्य सजावटी सामान खरीदा जाता है। विद्यालय के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम की ड्रेस सिलना, झालर, पर्दें, डोर मैट बना सहयोग करती हैं।
मुस्लिम आबादी के इलाक़े में काम करना कठिन था। जागरूकता के लिए विद्यालय में सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थाओं की गोष्ठियों द्वारा जीवन में बालिका शिक्षा का महत्व, महिला हिंसा, पुलिस मदद, एम्बुलेंस, फ़ायर ब्रिगेड, हेल्पलाइन नंबर और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। फलत: 90 ड्रॉपआउट बालिकाओं का नामांकन हुआ। इस कार्य हेतु राज्य स्तर पर मिशन शक्ति पुरस्कार मिला। विद्यालय के ग्रुप में 70 से अधिक कला, क्राफ़्ट, योग, संगीत आदि में कुशल सहयोगी महिलाएं और लड़कियां जुड़ी हैं जो समय-समय पर वॉलेंटियर के रूप में काम करती हैं।”
कक्ष के वातावरण में उनकी मेहनत, कर्तव्यनिष्ठा और जिजीविषा की कहानियां तैर रही थीं। उनका बोलना जारी था, “बाल मेले में माताएं बच्चों के साथ स्टॉल लगाती हैं। विद्यालय में सर्व धर्म सद्भाव हेतु हर त्योहार मनाते हैं। हिंदू-मुस्लिम सभी बच्चे एक-दूसरे के साथ ख़ुशियां बांटते हैं। ईद की सेवइयां हैं तो होली की गुझिया भी। बालिका शिक्षा के बढ़ावा हेतु पांचवीं कक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाली दो बालिकाओं को हरेक वर्ष मार्च में साइकिल उपहार देते हैं ताकि आगे की पढ़ाई सुगम हो सके।”
अभिभावकों, विद्यार्थियों, वॉलेंटियर में से सर्वोच्च सहयोगी को पुरस्कृत करते हैं। आगे वह कक्षाओं को दिखाते हुए कहती हैं सीखने-सिखाने के लिए ख़ुशियों भरा माहौल आवश्यक है। शिक्षक की नौकरी एक ज़िम्मेदारी है- समाज निर्माण की। कक्षाओं में भारत का भविष्य पल रहा है, हम शिक्षकों को उन्हें सही दिशा देनी है। बच्चे संभावनाओं से भरे हुए खिलते हुए पुष्प हैं, उनकी सुगंध चहुंओर बिखेरने में शिक्षकों का मदद करना कर्तव्य है। इसलिए प्रत्येक शनिवार को ग्रीन और रेड ड्रेस के साथ बच्चे नो बैग डे मनाकर कला-क्राफ्ट और बागवानी का काम करते हैं। सब्ज़ियों की क्यारियों की देखभाल एवं परिसर स्वच्छ करते हैं, यह भी तो सीखना ही है। आगे बुधवार के दिन बच्चों के लिए सफ़ेद ड्रेस का प्रबंध समुदाय के सहयोग से हो गया है। निश्चित रूप से आसिया फ़ारूक़ी बच्चों की आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजाये रही हैं।
बातचीत करते दो घंटे से ऊपर हो चुके थे। मैंने विदा लेना चाही तो वह मुझे उस कक्ष में ले गयीं, जो शिक्षण अधिगम सामग्री से भरा हुआ था। यह सब बच्चों के सहयोग से बनाया गया था, जिसका कक्षा शिक्षण में प्रयोग करते हैं। वहां रचनात्मक कौशल खिलखिला रहा था, जिन्हें नन्हे हाथों ने गढ़ा था। विद्यालय से जब मैं वापस चला तो महसूस किया कि नवाचारी प्रयासों की एक उजाली रेखा मेरे पीछे चली आयी है, जिसमें बच्चों का मृदुल हास्य घुला हुआ है।

प्रमोद दीक्षित मलय
प्रमोद दीक्षित मलय की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि वह क़रीब एक दर्जन पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से अनुभूति के स्वर, पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता, विद्यालय में एक दिन, यात्री हुए हम आदि शामिल हैं। कविता, गीत, कहानी, लेख, संस्मरण, समीक्षा और यात्रावृत्त लिखते रहे मलय ने रचनाधर्मी शिक्षकों के स्वैच्छिक मैत्री समूह 'शैक्षिक संवाद मंच' स्थापना भी 2012 में की।
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अदभुत व्यक्तित्व