
- September 3, 2026
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उत्तम कुमार (03.09.1926-24.07.1980) की जन्म शताब्दी पर प्रसंगवश
भवेश दिलशाद की कलम से....
सार्वजनिक मूर्तिकला: यह पतन का दौर है?
आपने होयसाला राजवंश के शाहकार मंदिरों के बारे में सुना है? तक़रीबन हज़ार साल पुराने इन मंदिरों के निर्माण में कला, विज्ञान और दूरदर्शिता ने जिस ऊंचाई को छुआ है, आज तक उसे लेकर हैरानी देखी जाती है। कर्नाटक का हासन ज़िला भारत के उन कुछ हिस्सों में हैं, जो शिल्प के नायाब ख़ज़ाने से भरे पड़े हैं। एक तरह से इसे शिल्प और मूर्तिकला की बेहतरीन पाठशाला कहा जा सकता है। लेकिन यह ज़िला एकदम उलट वजह से चर्चा में तब आया, यहां गांधी भवन में 26 जनवरी 2023 को गांधी जी की एक झांकी का अनावरण हुआ तो लोगों ने देखा कि गांधी की प्रतिमा तो गांधी की प्रचलित और यादों में बसी हुई छवि से मेल ही नहीं खाती! सोशल मीडिया से लेकर कलाकारों तक, सभी ने निहायत अफ़सोस भी जताया और मज़ाक़ भी बनाया।
प्राचीन काल की भारतीय मूर्तिकला आज तक मिसाल बनी हुई है लेकिन समकाल की मूर्तिकला उस मक़ाम के अनुरूप तो ख़ैर है ही नहीं, उल्टे गालियां और झेल रही है। मूर्तिकला यदि एब्स्ट्रैक्ट फ़ॉर्म में नहीं है, किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व या प्रतीक को दर्शाने के मक़सद से है, तो उसकी पहली कसौटी यही है कि वास्तविक छवि से कितना मेल खाती है— “क्या सचमुच उसमें वह व्यक्ति दिखता है?” यदि ‘नहीं’ तो आलोचना सिर्फ़ प्रतिमा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सीधे उस कलाकार, चयन प्रक्रिया और कला-दृष्टि पर भी सवाल उठने लगते हैं।
किसी महान व्यक्ति की प्रतिमा पत्थर, धातु या फ़ाइबरग्लास से बनी एक आकृति भर नहीं होती; वह समाज की यादों, गौरव और तारीख़ का दृश्य रूप होती है। जब किसी राष्ट्रीय नायक, कलाकार, राजनेता या सांस्कृतिक प्रतीक की प्रतिमा की बात होती है, तो सबसे पहले दर्शक अपनी स्मृति की छवि उसमें साकार देखना चाहता है।

“लोग मूर्ति को इस तरह देखते हैं मानो वह किसी तस्वीर की हू-ब-हू नक़ल हो। यह असंभव है। मूर्तिकला का उद्देश्य व्यक्तित्व के सार को पकड़ना है, न कि किसी सपाट छवि को पुन: प्रस्तुत करना।”
बंगाल के चर्चित मूर्तिकार बिमल कुंडू के ये शब्द सुर्ख़ियों में आये क्योंकि कोलकाता में अभिनेता उत्तम कुमार की एक प्रतिमा को दोयम दर्जे का पाया गया है। हिंदी समाज में कई लोग इस तथ्य से अनजान हों कि उत्तम कुमार बांग्ला सिनेमा के महानायकों में शुमार हैं और 3 सितंबर 2026 को उनकी सौवीं सालगिरह बड़े स्तर पर मनायी जा रही है। पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने 24 जुलाई 2026 को जैसे ही प्रतिमा का अनवारण किया वैसे ही, सोशल मीडिया पर तो सिने-प्रेमियों ने इस प्रतिमा को ट्रोल किया ही, कला-जगत सार्वजनिक कला के पतन के लिए परेशान दिखा।
किसी का कहना है कलाकारों को वक़्त या बजट पर्याप्त नहीं दिया जाता तो किसी ने प्रतिमाओं के निर्माण में विशेषज्ञों को दरकिनार किये जाने के तथ्य बताते हुए कहा कि बड़ी ख़ामी उस सिस्टम में ही है, जो ऐसी परियोजनाओं को अंजाम देता है।
सार्वजनिक शिल्प के चर्चित विवाद
पिछले एक दशक में भारत में ऐसा कई दफ़ा हुआ, जहाँ प्रतिमाएँ वास्तविक छवि से पर्याप्त समानता (Likeness) नहीं होने के कारण विवादों में रहीं। इनमें से कुछ प्रतिमाएँ बदली गयीं, कुछ पर सुधार किये गये और कुछ सोशल मीडिया पर खिल्ली का विषय बन गयीं। एक गंभीर प्रश्न उठा कि क्या सार्वजनिक मूर्तिकला केवल सरकारी परियोजना बनकर रह गयी है, या कला की कसौटी प्रासंगिक है भी?
2017 में चेन्नई में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की प्रतिमा का अनावरण किसे याद न होगा। प्रतिमा सामने आते ही जनता, विपक्ष और कला-जगत से तीखी प्रतिक्रियाएँ आयीं। एक सुर में कहा गया चेहरे की बनावट, आंखों का आकार, मुस्कान और समूची छवि ही जयललिता से मेल नहीं खाती। आलोचना इतनी व्यापक रही कि अंततः नयी प्रतिमा स्थापित करनी पड़ी। यह वाक़या बताता है सार्वजनिक स्मृति में किसी लोकप्रिय नेता का चेहरा कितना गहराई से दर्ज होता है।
इसी प्रकार एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) की कुछ प्रतिमाओं को लेकर भी समय-समय पर कमो-बेश ऐसे ही सवाल उठे। कला समीक्षकों ने इसे केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि अध्ययन और मॉडलिंग की कमी माना।
महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमाओं को लेकर कतिपय अवसरों पर विवाद हुए। शिवाजी भारत के सर्वाधिक चित्रित और मूर्तिरूप में प्रस्तुत किये जाने वाले ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में हैं। इसलिए उनकी मूर्तियों में चेहरे की बनावट, शारीरिक अनुपात, घोड़े की मुद्रा, हथियारों का स्वरूप और ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर सभी की नज़र होती है। स्थानीय स्तर पर कुछ प्रतिमाओं की आलोचना इसलिए हुई कि उनमें ऐतिहासिक अध्ययन या शिल्प-कौशल का अभाव रहा।
साल 2022 में नये संसद भवन के शीर्ष पर स्थापित राष्ट्रीय प्रतीक—अशोक स्तंभ के सिंहों—को लेकर व्यापक बहस हुई। तकनीकी रूप से यह किसी व्यक्ति की प्रतिमा नहीं थी, फिर भी मूर्तिकला और प्रतीक-निर्माण की दृष्टि से यह विवाद महत्वपूर्ण था। अनेक कलाकारों, कला इतिहासकारों और विपक्ष ने कहा कि मूल सारनाथ के सिंहों की तुलना में नये सिंह अधिक आक्रामक और विकृत दिखते हैं। सरकार का अपना बचाव पक्ष रहा लेकिन बहस से साफ़ हुआ कि सार्वजनिक कला में तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि मूल कलाकृति की आत्मा बरकरार रखना अत्यावश्यक है।
मध्य प्रदेश की ये दो प्रतिमाएं
2025 में आदिवासी जननायक टंट्या मामा भील की प्रतिमा को तीखी आलोचना झेलना पड़ी। आरोप लगे कि कम लागत वाले फ़ाइबरग्लास का उपयोग किया गया, चेहरे की समानता संतोषजनक नहीं थी और प्रतिमा का समग्र शिल्प अत्यंत कमज़ोर था। विवाद इतना बढ़ा कि प्रशासन को जांच के आदेश देने पड़े। इस घटना ने सरकारी निविदा प्रणाली और सार्वजनिक कला परियोजनाओं की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किये।
भोपाल में राजा भोज की प्रतिमा भी कलाप्रेमियों से निगेटिव रिस्पॉन्स ही पाती रही है। हालांकि इसका अनावरण 2011 में हुआ था, फिर भी प्रतिमाओं के कलात्मक अपघटन के मुद्दे पर चर्चा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह प्रतिमा ऐसी मिसाल बनकर रह गयी, जिसे आलोचनाओं के बाद भी न तो बदला गया, न सुधार करवाये गये।
मेसी या ऋतिक, गुरुदेव या मार्क्स?
वर्ष 2026 में ही कोलकाता के लेकटाउन में अर्जेंटीना के फ़ुटबॉल खिलाड़ी लियोनेल मेसी (जो हाल ही संन्यास लेने के कारण चर्चा में हैं) की प्रतिमा तब चर्चा में रही, जब उसे विघटित करके हटाया गया। पिछले साल जब इसका अनावरण हुआ, कई फ़ुटबॉल प्रेमी निराश और ग़ुस्से में दिखे। कई टिप्पणीकारों ने इसे अभिनेता ऋतिक रोशन की प्रतिमा तक कह डाला था। सोशल मीडिया पर इसका जाने कितना मज़ाक़ उड़ा।
इसी साल त्रिपुरा में स्थापित रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिमा भी विवाद से नहीं बची। आलोचकों का कहना था प्रतिमा का चेहरा गुरुदेव से इतना अलग था कि कुछ लोगों ने उसे कार्ल मार्क्स समझ लिया। साहित्य और कला जगत में इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति माना गया। इस लेख में जिन त्रुटिपूर्ण प्रतिमाओं की चर्चा हुई, उनमें से कुछ के मूर्तिकारों के नाम विभिन्न ख़बरों/लेखों से इस तरह मिले हैं:
जयललिता : शिववरप्रसाद
संसद पर अशोक स्तंभ : सुनील देवरे/लक्ष्मण व्यास
मेसी : मोंटी पॉल
राजा भोज : प्रभात राय
दरअसल कुछ मामलों में इस तरह की प्रतिमाएं किसी कलाकार के किसी ख़ास नज़रिये की दलील से उचित हो भी सकती हैं, फिर भी यह सवाल उठता है कि ऐसी कलाकृतियां सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए वाजिब हो सकती हैं कि नहीं।
मूर्तिकला: स्थिति और सुझाव
इन तमाम मिसालों में एक समानता दिखायी देती है। आलोचना सिर्फ़ यह नहीं थी कि प्रतिमा सुंदर नहीं है, बल्कि यह कि वह उस व्यक्ति की पहचान, व्यक्तित्व और ऐतिहासिक स्मृति को भरोसेमंद ढंग से प्रस्तुत ही नहीं कर पाती। मूर्तिकला में इसे ‘लाइकनेस’ कहा जाता है। एक सफल सार्वजनिक प्रतिमा वही है, जिसे देखकर सामान्य व्यक्ति नाम पढ़े बग़ैर व्यक्तित्व को पहचान ले। कलाकार से सबसे पहली मांग यही तो होती है।
तो ये ख़ामियां क्यों? कला समीक्षकों की मानें तो कई सरकारी परियोजनाएँ सबसे कम लागत वाले ठेके के आधार पर दी जाती हैं, जहाँ कलात्मक गुणवत्ता की अपेक्षा समय और बजट को तरजीह मिलती है। दूसरा, कई कलाकारों को पर्याप्त संदर्भ सामग्री, त्रि-आयामी अध्ययन और ऐतिहासिक परामर्श उपलब्ध नहीं कराया जाता। तीसरा, प्रतिमा के अंतिम मॉडल का मूल्यांकन स्वतंत्र कला विशेषज्ञों द्वारा शायद ही कभी कराया जाता है। नतीजा होता है कि प्रतिमा सामने आते ही उसकी कमियाँ सार्वजनिक हो जाती हैं।
सार्वजनिक मूर्तिकला केवल निर्माण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी है। किसी राष्ट्र या समाज के नायकों की प्रतिमाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए विज़ुअल डॉक्युमेंट बनती हैं। यदि उनमें कलात्मक गुणवत्ता, ऐतिहासिक प्रामाणिकता और व्यक्ति की पहचान का ही अभाव होगा, तो वे जनकल्याणकारी कहला ही न सकेंगी।
भारत में मूर्तिकला की समृद्ध परंपरा हज़ारों बरस की है। ऐसे देश में सार्वजनिक प्रतिमाओं के निर्माण के लिए केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि कला, इतिहास, सौंदर्य-बोध के समन्वय की आवश्यकता है। इसके लिए कुशल मूर्तिकारों, कला इतिहासकारों और संबंधित विशेषज्ञों की समीक्षा को अनिवार्य बनाया जाये, तो संभव है भविष्य में हास्यास्पद व संदेहास्पद प्रतिमाओं की संख्या कम हो।
(चित्र परिचय: द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट के साथ उत्तम कुमार की विवादों में घिर गयी प्रतिमा का चित्र प्रकाशित किया था, यहां संदर्भ के लिए साभार)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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