
- September 9, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
ग़ज़ाला तबस्सुम की कलम से....
किताबों की आब-ओ-हवा बना रही एक मुहिम
मोबाइल और स्क्रीन से पहले एक समय हुआ करता था, जब किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थीं। लोग ख़ाली समय में किताबें पढ़ते, उपन्यासों और कहानियों की दुनिया में खो जाते और कविताओं के साथ एहसास के समुंदर में गोते लगाते थे। सोशल मीडिया, छोटे-छोटे वीडियो और लगातार आती सूचनाओं ने पढ़ने की एकाग्रता को भी कम किया है। लेकिन बंगलुरु में एक पार्क है, जो टाइम मशीन से पीछे लौट जाने जैसा दृश्य दिखाता है।
मोबाइल पर पढ़ना सुविधाजनक ज़रूर है, लेकिन किताब के पन्ने पलटने और उसमें डूब जाने का आनंद अलग ही है। इसी आनंद में डूबने आजकल कुछ लोग बंगलुरू के कुब्बन पार्क का रुख़ करने लगे हैं।
बंगलुरु शहर के मध्य में स्थित यह पार्क यूं तो हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है लेकिन इन दिनों हर शनिवार प्रातः नौ बजे मोबाइल और रोज़मर्रा की भागदौड़ से उकताये कुछ लोग हाथों में किताबें, चटाई, दरी या फ़ोल्डिंग कुर्सियां लिये हुए आते दिखते हैं। ये सभी पार्क में जहां दिल चाहे और किसी भी पेड़ के साये के नीचे जगह मिल जाये बैठते हैं और पूरी तन्मयता से किताबों में डूब जाते हैं। कुछ लोग पेंटिंग या ओरिगैमी भी करते हैं, कुछ क्रोशिया वर्क भी करने आते हैं।
यूं तो दोपहर दो बजे तक यह मजमा रहता है लेकिन ठीक बारह बजे सभी लोग पार्क के सबसे विशाल और ख़ूबसूरत वर्षा वृक्ष के नीचे अपनी किताबें इकट्ठा करते हैं, एक ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ का हिस्सा बनते हैं। फ़ोटोग्राफी के बाद हिंदी, इंग्लिश के अलावा अन्य भाषाओं के पाठकों को कहा जाता है, अगर वो चाहें तो किताब और लेखक के बारे में बताएं ताकि अन्य लोग भी इसके बारे में जान सकें। कोई बाध्यता भी नहीं है।

उपरोक्त गतिविधि को कुब्बन रीड्स का नाम दिया गया है। इसकी शुरूआत योर कोट के संस्थापक हर्ष स्नेहांशु और उनकी मित्र श्रुति साह ने की। चार साल पहले संयोगवश हर्ष और श्रुति का पार्क में जाना हुआ। वहां के शांत वातावरण में साथ लायी किताबें उन्होंने पढ़ीं। उन्हें लगा वो यहां लाइब्रेरी, घर या अन्य किसी भी स्थान से ज़्यादा तमन्यता से और कम समय में किताब को पढ़ पाये। उन्होंने अपने अनुभव को इंस्टाग्राम पर साझा किया। लोगों से जुड़ने की अपील की।
धीरे-धीरे लोग कुब्बन रीड्स से जुड़ते गये और अब यहां हर शनिवार को क़रीब छह सौ लोग किताब पढ़ते हुए देखे जा सकते हैं। वहां आये पाठकों का मानना है “कैफ़े का बनावटीपन या लाइब्रेरी के सख़्त अनुशासन की बजाय नर्म हरी घास पर बैठकर या लेटकर पढ़ना ज्यादा सुकूनबख़्श है।” यहां कोई अनुशासन, नियम या सख़्ती नहीं है। कोई किसी भी समय आ या जा सकता है। पाठकों का कोई डेटा/रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। यह एक ग़ैर लाभकारी संस्था है, इसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है और न ही ब्रांडों को विज्ञापन देने की अनुमति है।
धीरे-धीरे पुस्तक प्रेमियों में यह मूवमेंट लोकप्रिय होने लगा। कम्युनिटी मूवमेंट के रूप में कुब्बन रीड्स तेज़ी से फैला और महज़ दस महीनों में कुब्बन रीड्स सत्तर शहरों और चार महाद्वीपों में फैल चुका है। आज भारत के सभी बड़े शहरों में विभिन्न नामों से पुस्तक प्रेमियों को इकठ्ठा कर रहा है जैसे हैदराबाद रीड्स, कोच्चि रीड्स, जुहू रीड्स इत्यादि। विदेशों में कुआलालंपुर रीड्स, सैन फ्रांसिस्को रीड्स, मेलबर्न रीड्स, पोर्ट ब्लेयर रीड्स इत्यादि।
बंगलुरु और कुछ बड़े शहरों में पाठकों की सुविधाओं के लिए कई अन्य पार्कों में इसकी ब्रांच भी चल रही हैं। इस मूवमेंट में कहीं कोई दिक़्क़त या क़ानूनी समस्या का सामना करना पड़ा? यह पूछने पर हर्ष बताते हैं “हां, कई पार्कों में घास पर बैठने अनुमति नहीं होती, वहां घास पर चटाई या दरी बिछाने पर ऐतराज़ है। कई जगह पुलिस वाले शंका की नज़र से भी देखते हैं। उन्हें लगता है किताबों के बहाने युवा ड्रग्स लेने के लिए इकठ्ठा होते हैं। या फिर किसी ख़ास तरह की किताबें पढ़ी जा रही हैं।” लेकिन ये समस्याएं इतनी बड़ी नहीं कि सुलझायी न जा सकें।
हर्ष का संबंध झारखंड के धनबाद से है, लेकिन आईआईटी दिल्ली से बीटेक करने के बाद बेंगलुरु में ही रहते हैं। अनेक मल्टीनैशनल कंपनियों के जॉब का ऑफ़र ठुकराने वाले हर्ष का साहित्य और कला से बचपन का नाता रहा है। उनका पालन-पोषण पुस्तकों और पुस्तक-प्रेमियों में बीच हुआ। हर्ष की दादी बिहार के इतिहास में हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने वाली पहली महिला थीं और नाना कॉलेज के प्रधानाचार्य। माता भी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थीं, जो अब सेवानिवृत हो चुकी हैं और पिता बैंक अधिकारी (सेवानिवृत्त) होने के बावजूद साहित्य से जुड़े हुए हैं। उनकी अलमारियों में टॉलस्टॉय, दोस्तोव्स्की, और चेखव जैसे लेखकों की किताबें रहीं। पुस्तकों से उनका यही प्रेम इस मूवमेंट को शुरू करने का कारण बना। उनकी दोस्त श्रुति साह का संबंध इलाहाबाद से है और वह भी किताबों की प्रेमी हैं।

इस मूवमेंट की लोकप्रियता से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बधाई दी। मूवमेंट से जुड़े लोगों की तादाद से पता चलता है कि आज भी किताबों से प्रेम करने वालों की कमी नहीं है। किताबों के प्रति लोगों में रुचि जगाने के लिए हर शहर में इस तरह के मूवमेंट की ज़रूरत है। स्कूल-कॉलेज के छात्रों को इससे जोड़ने की ज़रूरत है ताकि हमारी आने वाली नस्लें किताबों से प्रेम कर सकें।
कुछ दिन पहले ही हर्ष के पिता सुधांशु पाठक ने कुब्बन पार्क के वर्षा वृक्ष की विशाल पेंटिंग बनाकर वहां के पाठकों को समर्पित की। सुधांशु पाठक ने इस मूवमेंट की तारीफ़ तो की ही, साथ ही उन्होंने हमें यह बताकर एक और सुखद अनुभव दिया कि वह शुरू से ही आब-ओ-हवा के नियमित पाठक रहे हैं। आब-ओ-हवा परिवार इस मुहिम के लिए अपनी शुभकामनाएं और बधाइयां देता है।

ग़ज़ाला तबस्सुम
साहित्यिक समूहों में छोटी-छोटी समीक्षाएं लिखने से शुरू हुआ साहित्यिक सफ़र अब शायरी के साथ अदबी लेखन और प्रेरक हस्तियों के साथ गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ हो रहा है। एक ग़ज़ल संग्रह ने अदब की दुनिया में थोड़ी-सी पहचान दिलायी है। लेखन में जुनून नहीं, सुकून की तलाश है। आब-ओ-हवा के पहले अंक से ही जुड़े होना फ़ख़्र महसूस कराता है।
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पुस्तक प्रेमियों के लिए अच्छी ख़बर है।