
- September 8, 2026
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भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दूर देस में लेखक-18....
चर्च में मतदान केंद्र और ब्रिटिश लोकतंत्र की सहजता
लंदन में रहते हुए छोटी-छोटी बातें कभी-कभी भारत और ब्रिटेन के लोकतांत्रिक संस्कारों के बीच बड़ा अंतर दिखा देती हैं। आज ऐसी ही एक बात ध्यान आयी। यहाँ मतदान केंद्र किसी चर्च में भी बनाया जा सकता है।
कल्पना कीजिए, भारत में किसी मंदिर को मतदान केंद्र बना दिया जाये। मतदान शुरू होने से पहले ही सवाल उठने लगेंगे कि धार्मिक स्थल को चुनाव से क्यों जोड़ा गया, क्या इससे किसी दल या उम्मीदवार को लाभ होगा, धार्मिक भावनाएँ आहत होंगी या नहीं। बात मतदान से निकलकर राजनीति और टीवी बहस तक पहुँच सकती है।
लंदन में इसे अधिक व्यावहारिक ढंग से देखा जाता है। मतदान केंद्र के लिए ज़रूरी है कि मतदाता आसानी से पहुँच सकें और गोपनीय मतदान की व्यवस्था हो। इसलिए चर्च, स्कूल और सामुदायिक भवन जैसी जगहें भी मतदान केंद्र बन सकती हैं। भवन की धार्मिक पहचान से अधिक महत्व उसके सार्वजनिक उपयोग और सुविधा का है।

मतदान की प्रक्रिया भी सीधी है। मतदाता अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर जाता है, स्वीकृत फ़ोटो आईडी दिखाता है, मतपत्र लेता है, गोपनीय कक्ष में अपनी पसंद दर्ज करता है और मतपेटी में डाल देता है। इंग्लैंड में सामान्यतः मतदान केंद्र सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक खुले रहते हैं।
लेकिन लंदन की चुनाव व्यवस्था का शायद इससे भी अधिक दिलचस्प पहलू है, वोट कौन दे सकता है?
ब्रिटेन में पात्र कॉमनवेल्थ नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ है कि भारत का कोई नागरिक यदि ब्रिटेन में रह रहा है, आवश्यक पात्रता पूरी करता है और मतदाता के रूप में पंजीकृत है, तो वह ब्रिटिश चुनावों से केवल इसलिए बाहर नहीं हो जाता कि उसके पास ब्रिटिश नागरिकता नहीं है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक ब्रिटिश संसद के चुनाव के साथ स्थानीय चुनावों तथा ग्रेटर लंदन अथॉरिटी के चुनावों में भी मतदान कर सकते हैं।
और बात केवल वोट देने तक सीमित नहीं है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक ब्रिटिश नागरिकता के बिना चुनाव भी लड़ सकता है। ब्रिटिश संसद के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए 18 वर्ष की आयु पूरी होना और ब्रिटिश, आयरिश अथवा पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक होना ज़रूरी है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक वह है, जिसे ब्रिटेन में रहने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है या जिसके पास इंडेफ़िनिट लीव टू रिमेन है। अर्थात लंदन में रहने वाला कोई पात्र भारतीय नागरिक, ब्रिटिश नागरिक बने बिना भी निर्धारित शर्तें पूरी करके सांसद का चुनाव लड़ सकता है।
यानी यहाँ लोकतंत्र में भागीदारी का दायरा दिलचस्प रूप से व्यापक है। स्थानीय काउंसिल के चुनाव में वोट देने से लेकर ब्रिटिश संसद के लिए उम्मीदवार बनने तक, पात्रता पूरी करने वाला कॉमनवेल्थ नागरिक इसमें भाग ले सकता है।
हाँ, एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री को सीधे वोट नहीं दिया जाता। मतदाता अपने संसदीय क्षेत्र के सांसद को चुनता है। जिस राजनीतिक दल को हाउस ऑफ़ कॉमन्स में बहुमत मिलता है, राजा उसके नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं और वही प्रधानमंत्री बनता है।
ब्रिटिश राजनीति का एक और दिलचस्प पक्ष उसकी जवाबदेही है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रधानमंत्रियों को राजनीतिक दबाव, अपनी पार्टी के भीतर विरोध या किसी विवाद के कारण पद छोड़ना पड़ा और कई बार उसी दल का दूसरा नेता प्रधानमंत्री बना। यहाँ संसदीय दल और मीडिया की निगरानी सरकार के लिए लगातार चुनौती बनी रहती है।
लंदन में एक ही मतदाता लोकतंत्र के कई स्तरों में भाग ले सकता है। स्थानीय काउंसिल उसके मोहल्ले और स्थानीय सेवाओं से जुड़े फ़ैसले करती है। ग्रेटर लंदन अथॉरिटी के चुनाव में मेयर ऑफ़ लंदन और लंदन असेंबली के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हाउस ऑफ़ कॉमन्स के लिए सांसद चुना जाता है।
यानी लोकतंत्र यहाँ केवल संसद तक सीमित नहीं है। वह आपके घर के सामने की सड़क, स्थानीय सेवाओं और शहर की नीतियों तक विस्तारित है, भारत की ही तरह।
मुझे चर्च में बने मतदान केंद्र की बात इसलिए दिलचस्प लगी कि वह लोकतंत्र की एक मानसिकता भी दिखाती है। भारत में धर्म और सार्वजनिक जीवन का संबंध अधिक भावनात्मक और संवेदनशील है। ब्रिटेन में भी धर्म महत्वपूर्ण है, लेकिन चुनाव के दिन चर्च एक धार्मिक स्थल होने के साथ ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक सुविधा का स्थान भी बन सकता है।
शायद लोकतंत्र की सुंदरता इसी सहजता में है।
एक चर्च के शांत कमरे में कोई व्यक्ति आता है, अपनी पहचान बताता है, मतपत्र लेता है, अपनी पसंद पर निशान लगाता है और कुछ ही मिनटों में बाहर निकल जाता है।
लंदन की सड़कों पर लोकतंत्र आज मुझे संसद भवन से ज़्यादा वोटिंग सेंटर के इसी साधारण से दृश्य में मिला।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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