हरियश राय, hariyash rai
सदियों से जन-मानस में शौर्य गाथा सुनाकर रग-रग में बिजली भर देने वाले आल्हा गायन ने कैसे दम तोड़ दिया? रोज़ी या कला के अंत: संघर्ष में घुटते लोक कलाकार की मन ही मन उठती चीखों की गूँज कभी ठहरकर सुनी है? तो सुनिए, वरिष्ठ कहानीकार हरियश राय की मर्मस्पर्शी यह कहानी पढ़कर... (शशि खरे-संपादक, कथा प्रस्तुति)

गूंज | हरियश राय लिखित कहानी

            उदय राज सहमते-सहमते अपने बैंक की ब्रांच के अंदर दाख़िल हुआ था। हालांकि वह रोज़ सहमते हुए ही दाख़िल होता है और हर पल सोचता रहता है कि कब इस झंझट से मुक्ति मिलेगी लेकिन मुक्ति मिलने के आसार दूर-दूर तक नहीं थे। आज ब्रांच पहुंचने में कुछ ज़्यादा ही देर हो गयी थी। साढ़े दस बज चुके थे और उसे दस बजे ब्रांच पहुंचना होता था। आज फिर मैनेजर उसे सुनाएगा, उसने मन ही मन सोचा।

आज रास्‍ते में वीआईपी मूवमेंट था, जिसके चलते लंबे वक़्फ़े तक ट्रैफ़िक बंद रखा गया, लिहाज़ा उसकी बाइक भी फंस गयी और फंसी इस तरह थी कि न वह आगे जा सकता था और न पीछे। कसमसाकर रह गया। जब रास्‍ता खुला तो किसी तरह बाइक को तेज़ दौड़ाते हुए बैंक पहुंचा था। अभी वह अपनी सीट पर ठीक ढंग से बैठा भी न था कि उसका मैनेजर उसके पास आया। उदय राज को लगा कि आज फिर मैनेजर उसे देर से आने का उलाहना देगा लेकिन मैनेजर ने ऐसा कुछ नहीं कहा केवल इतना कहा ‘तुम्‍हें आज दोपहर बारह बजे कोर्ट जाना है, अग्रवाल के हाउसिंग लोन का चैक लेकर। मालूम है न?’

‘जी सर, मालूम है’ उसने जवाब दिया। उसे इस बात का मलाल रहता था कि उसका मैनेजर उसे लापरवाह समझता है। अरे एक बार कोई ग़लती हो जाये तो ज़रूरी नहीं है कि वही ग़लती हर बार हो।

‘ठीक है, पर चेक देने से पहले सारे डॉक्‍यूमेंट्स ठीक से जांच कर लेना।’ मैनेजर ने हिदायत दी।
‘जी सर।’ उसने कहा और अपना कम्‍प्‍यूटर आन कर दिया।
‘पिछली बार की तरह ग़लती मत करना। इस बार सावधानी से काम करना।’ मैनेजर ने उसे पिछली ग़लती याद दिलाते हुए कहा।

पिछली बार एक बड़ी ग़लती हो गयी थी। एक पार्टी को उसने हाउसिंग लोन का चेक तो दे दिया था, लेकिन डॅाक्‍यूमेंट्स आधे-अधूरे ही लिये थे। बाद में उसे डॉक्‍यूमेंट्स पूरे करने के लिए बहुत भागदौड़ करनी पड़ी थी। मैनेजर ने उसकी इस ग़लती को कई-कई बार कई-कई लोगों से कहा था, जिसकी वजह से उदय राज को काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी। तब उसके साथियों ने कहा था, ‘अरे उदय राज जी आप कहां गुणा–भाग के चक्‍कर में फंस गये, अरे भाई कला के आदमी हो, कला की दुनिया में रहते।’

कुछ हद तक उसके साथियों की बातें सही थीं। वह तो नहीं आना चाहता था बैंक में, वह तो संगीत की दुनिया में जाना चाहता था पर हालात कुछ ऐसे थे कि उसे बैंक की नौकरी लेनी पड़ी। इसका उसे हमेशा मलाल रहता था कि वह जीवन में बनना कुछ और चाहता था, बन कुछ और गया।

‘नहीं इस बार ऐसी कोई ग़लती नहीं होगी। आप बेफ़िक्र रहें।’ कहकर उसने ब्रांच मैनेजर को आश्‍वस्‍त किया।

इससे पहले उदय राज कुछ और सोचता, उसका मोबाइल बज उठा। उसने नंबर देखा, अनजान नंबर था। उसने नहीं उठाया। आजकल अनजान नंबर उठाने में बहुत बड़ा रिस्‍क है। साइबर ठगों के जाल में कैसे फंस जाएं, कोई भरोसा नहीं। उदय राज उन दस्‍तावेज़ों की लिस्‍ट तैयार करने लगा, जो उसने अग्रवाल हाउसिंग लोन के डिसबर्समेंट के समय लेने थे।

एकाएक मोबाइल फिर बज उठा। उसने देखा वही नंबर था। उसने फिर भी फ़ोन नहीं उठाया और अपने काम में मशग़ूल रहा। अगले ही पल फिर से फ़ोन बजने लगा। उसने देखा वही नंबर था। फिर भी फ़ोन नहीं उठाया और अपना काम करता रहा। कुछ देर बाद उसी नंबर से फिर फोन आया, तब बेहद ग़ुस्‍से में आकर उसने फ़ोन उठाया और लगभग चीखते हुए कहा ‘हैलो’ ताकि सामने वाले को यह एहसास हो जाये कि वह ग़लत समय पर फ़ोन कर रहा है।

‘कौन! उदय राज बिटवा।’ उधर से एक कांपती हुई अनजानी सी आवाज़ आयी।

अपने नाम के आगे ‘बिटवा’ का संबोधन सुनकर उसे यक़ीन हो गया कि कोई स्‍पैम कॉल नहीं है और बात करने वाला कोई जानकार आदमी है।

‘हाँ, बोलो..’ इस बार उसकी आवाज़ में थोड़ी नम्रता थी।
‘हम परमेश्वर दयाल जी के यहां से रामप्रसाद बोल रहे हैं।’

परमेश्वर दयाल का नाम सुनते ही उसका सारा आक्रोश पल भर में हवा हो गया। आवाज़ में मिश्री सी घुल गयी।

‘हां बोलो काका। क्‍या बात है’, तब तक उदय राज ने अपने आप को संयत कर लिया था और मन ही मन सोच लिया था कि वह रामप्रसाद से बेहद शालीनता और नम्रता से बात करेगा।

‘परमेश्वर दयाल जी नहीं रहे।’ रामप्रसाद ने बेहद संक्षिप्त शब्‍दों में सूचना दी।
‘क्‍या! क्‍या कह रहे हो।’ उदय राज को यक़ीन नहीं आया कि वह क्‍या सुन रहा है।
‘हां भइया, परमेश्वर दयाल जी हमको छोड़ कर चले गये।’ मोबाइल पर उसे रोती हुई आवाज़ सुनायी दी।

सुनकर उदय राज को लगा गोया उसकी रगों में ख़ून ने दौड़ना बंद कर दिया हो।
‘कब?’ बड़ी मुश्किल से उसके मुँह से शब्‍द निकले।

‘आज सुबह ही। उनकी कॉपी में दो तीन लोगों के फ़ोन नंबर लिखे हुए थे। उसमें तुम्‍हारा भी एक नंबर था। मैने सोचा तुम‍को इत्तिला कर दूं।’ उसने रुंधे गले से कहा।

मोबाइल को कान से सटाये उदय राज गुमसुम सा हो गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा कि वह क्‍या कहे। उधर से आवाज़ आ रही थी लेकिन वह आवाज़ उसकी चेतना तक नहीं पहूंच पा रही थी। इतना समझ में आ गया उसे कि ग्यारह बजे परिवार के लोग गंगा के घाट ले जा रहे हैं, वहीं उन्‍हें उनकी चिता को अग्नि दी जाएगी।

फ़ोन बंद करते ही परमेश्वर दयाल का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूम गया। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जिस दिन वह परमेश्वर दयाल को याद न करता हो।

साठ-बासठ साल के परमेश्वर दयाल। हमेशा हल्‍के नीले रंग का कुर्ता, लाल पगड़ी और पगड़ी पर प्‍लास्टिक का पीला फूल टंगा रहता था। गले में रंगीन पत्थरों की माला और चेहरे पर रोबदार मूँछें रखने वाले परमेश्वर दयाल पूरे राज्य में आल्हा ऊदल की वीर कथाएं गा-गाकर सुनाते थे। पढ़े लिखे तो नहीं थे लेकिन एक कुशल गायक थे और चंदेल राजपूत आल्हा-ऊदल की वीरता की कहानियां पूरे तन-मन से, उल्‍लास और ओज के साथ इस तरह गाते कि सुनने वाले के मन में वीर रस का संचार होने लगता था। अपने गायन में वे सामाजिक मुद्दों और राजनीति के सवालों को भी ले आते थे। ये कहानियां अपने समय की सबसे लोकप्रिय कहानियां थीं। उनके मुंह से आल्‍हा-ऊदल की कहानियां सुनने के लिए आस-पास के गांवों से हज़ारों की संख्या में लोग समूह बनाकर आते थे और फ़र्श पर बैठकर उनसे कहानियां सुनते थे। आल्‍हा–ऊदल की कहानी सुनाते वक्‍़त परमेश्‍वर दयाल मोढ़े पर बैठकर गाते थे। गाने के साथ-साथ वे हाथों के इशारों और अपने चेहरे के भावों में वीरता का संचार करते थे। उनके साथी ढोल, चिमटा और नगाड़ा बजाते थे। ढोल, नगाड़े और चिमटे की लय उनकी कहानियों में जान डाल देती थी। जिससे सुनने वाले के मन में एक जोश और उमंग का संचार होता था। उनका कहानी सुनाने का अंदाज़ इतना दिलचस्‍प और मनोरंजक होता था कि आल्‍हा-ऊदल की वीरता की कहानियां सुनने वालों के दिलों में जाकर धंस जाती थी।

शहर में उनकी पहचान आल्‍हा-ऊदल के गायक के तौर पर होती थी। उनको सुनने के लिए भीड़ उमड़ती थी। जब नेताओं को अपनी चुनावी सभाओं में जनता को बुलाया जाना होता था तो नेता जी के आने से पहले परमेश्वर दयाल को बुलाते थे। वे वहां पहुंचकर आल्‍हा-ऊदल की कथा सुनाकर ऐसा समां बाँधते थे कि लोगों की रगों के ख़ून में उबाल आने लगता था।
परमेश्‍वर दयाल उदय राज के पिता के बड़े भाई थे।

उदय राज की पढ़ाई परमेश्‍वर दयाल के गायन से मिली कमाई से ही हुई थी। स्‍कूल की फ़ीस से लेकर किताबें और स्‍कूल ड्रेस तक ख़रीदना उन्‍हीं के भरोसे चलता था। उदय राज के अपने घर में इतनी ग़रीबी थी कि पढ़ाई-लिखाई का सवाल ही नहीं पैदा होता था। यह तो परमेश्‍वर दयाल के कहने से उसके किसान पिता ने उसे स्‍कूल भेजना शुरू किया, उसकी सारी पढ़ाई-लिखाई का ख़र्चा ख़ुद परमेश्‍वर दयाल ने उठाया। परमेश्वर दयाल ने अपनी जवानी के दिनों में उदय राज को पढ़ाया-लिखाया और काफ़ी समय तक आल्‍हा-ऊदल के गायन में अपने साथ जोड़े रखा। जब उदय राज भी आल्हा-ऊदल गाने लगा तो परमेश्वर दयाल ने कहा, ‘बचवा, इसमें कुछ नहीं रखा है, जाओ, कहीं और जाकर अपने दाना-पानी का इंतज़ाम कर लो।’

‘नहीं, मुझे तो आपके साथ ही गाना है।’ उदय राज का तर्क था।
‘बेटवा, अब आल्हा-ऊदल को जानने और समझने वाले वैसे लोग नहीं रहे, जो हमारे ज़माने में हुआ करते थे। पहले दाना-पानी का इंतज़ाम कर लो, फिर गाना हो तो गा लेना। कोई मना थोड़े ही है।’ उन्‍होंने बहुत स्‍नेह से समझाया था।

उनकी बात मानकर उदय राज ने नौकरी की खोज की और इम्‍तेहान दर इम्‍तेहान पास करते-करते बैंक में आ गये लेकिन मन उनका आल्हा-ऊदल में ही लगा रहा। अपने बैंक के साथियों को बड़े फ़ख़्र से बताते कि हम आल्हा-ऊदल की कथाएं सुनाते हैं।

पिछले कुछ समय से कुछ ऐसा हुआ कि लोगों ने आल्हा-ऊदल की कथाएं ही सुनना बंद कर दिया और इसके साथ ही परमेश्वर दयाल गुमनामी के अंधेरे में चले गये। जीवन भर आल्हा-ऊदल गायन में इतने मशग़ूल रहे कि अपने बारे में कभी नहीं सोचा। न शादी की और न ही कोई घर बनाया। पिता का दिया हुआ एक छोटा-सा घर था उसी में रहते थे। कभी किसी ने बुला लिया तो थोड़ा बहुत पारिश्रमिक मिल जाता था।

उदय राज को परमेश्वर दयाल के न रहने की ख़बर हज़म नहीं हो रही थी कि उसे जीवन का रास्‍ता दिखाने वाले, उसकी पढ़ाई-लिखाई पर ख़र्च करने वाले, पिता की तरह देखभाल करने वाले, दोस्‍त की तरह समझाने वाले परमेश्वर दयाल इस दुनिया में नहीं रहे। पर हक़ीक़त तो यही थी कि अब वे दुनिया में नहीं थे। उदय राज निढाल होकर अपनी कुर्सी पर पसर गया। गर्दन और सिर को कुर्सी की पीठ पर टिका दिया और आंखें बंद कर लीं। चेहरा एकदम गुमसुम हो गया। ऊपर से गुमसुम थे मगर दिल से रो रहे थे। एकाएक उनकी आंखों में परमेश्वर दयाल को चेहरा उभर आया।

बैंक में नौकरी लगने के बाद परमेश्‍वर दयाल एक दिन एकाएक बैंक में आ गये। उन्‍हें रंग बिरंगी धोती पहने और सर पर लाल पगड़ी व गले में रंगीन पत्थरों की माला पहने देख सब लोग अचम्‍भे में आ गये ये कौन शख़्स है, जो इस तरह ब्रांच के अंदर आ गया। उन्‍हें देखते ही उदय राज भी चौंक कर खड़ा हो गया था। पैर छूने के बाद कहा था, ‘अरे! काका आप यहां कैसे आये?’
‘काम ही कुछ ऐसा था।’
‘मुझे कहते, मैं ही आता।’
‘हमने सोचा तुम बिज़ी रहते हो हमईं हो आयें। तुम बहुत दिनों से गांव आये भी नहीं।’

यह सच था कि उदय राज काफ़ी दिनों से नहीं बल्कि दो साल से गांव नहीं गया था। अपने ही घर परिवार में इतना उलझा रहा कि जाना हो ही नहीं सका।

‘कहिए, कैसे आना हुआ।’ पूछा था उदय राज ने।
‘देख बचवा, सरकार हमारी पेंशन नहीं दे रही है। तुम किसी तरह हमारी पेंशन दिलवा दो। अब तुम तो बैंक में अफ़सर हो गये हो, तुम्‍हारी बात तो सुनी जाएगी।’ कहते हुए एक फ़ाइल उन्‍होंने उदय राज के सामने रख दी।

उन्‍हें इस तरह बात करते देख बैंकिंग हॉल में बैठे लोग हैरान रह गये कि ये रंग बिरंगे कपड़े पहने कौन आदमी है, जो बैंक में आकर अपनी पेंशन की बात करता है।

उदय राज ने फ़ाइल अपने हाथ में उठा ली। उस फ़ाइल को उलट-पलटकर देखा तो उसे पता चला कि इन्होंने दो-ढाई हज़ार की ओल्‍ड एज पेंशन के लिए सरकार से कई बार दरख़ास्तें दी थीं। कारपारेटर, एमएलए, एमपी सबके पत्र फ़ाइल में थे, लेकिन कुछ नहीं हो रहा था।

‘हम तो कई बार दफ़्तरों के चक्‍कर लगा आये हैं लेकिन कुछ नहीं हो रहा।’ उदय राज को अपनी फ़ाइल पढ़ते हुए देख कहा।

मालूम था उदय राज को कि परमेश्‍वर दयाल अपनी पेंशन के लिए कई-कई बार सरकारी दफ़तर के चक्‍कर लगा आये थे, लोगों से मिल कर आये थे लेकिन हर बार कोई न कोई आश्वासन उन्‍हें मिल जाता। हालांकि पेंशन की राशि दो-ढाई हज़ार रुपये ही होती थी लेकिन यह रक़म भी उनके लिए किसी कुबेर के ख़ज़ाने से कम न थी।

उनकी बात सुनकर उदय राज के साथ बैठै एक आदमी ने कहा। ‘काका, पेंशन तो पेंशन डिपार्टमेंट देता है, बैंक वाले नहीं देते।’

परमेश्‍वर दयाल ने उसकी बात सुनी और उसकी ओर मुख़ातिब होकर कहा, ‘जानते हैं बेटा, पर हम पिछले कई सालों से विभाग में पेंशन के लिए चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कोई सुध ही नहीं लेता। तुम लोगों की वहां जान-पहचान तो होगी न। उनसे कह सुन कर हमारा काम करवा दो बेटा।’ उनके शब्‍दों में एक याचना थी।

‘पर आपका तो आल्हा-ऊदल गायन में नाम है। हम सुने हैं आपका गायन। क्‍या जोश भरते है लोगों में आल्हा-ऊदल की कथा सुनाने में। सरकार भी आपको अपने कार्यक्रमों में बुलाती है।’
‘पहले बुलाती थी बेटा, पर अब कोई हमारी सुध नहीं लेता।’
‘अरे सरकार को बुलाना चाहिए। सरकार नहीं बुलाएगी तो कैसे ज़िंदा बचेगी आपकी कला।’
‘अब तो संस्‍कार भारती वाले आ गये। वे तो राम कथा सुनाते हैं और लोग सुनते हैं मन लगाकर। रात-रात जागकर। अब आल्हा-ऊदल कौन सुनेगा साहब। पहले तो फ़िल्‍मों में लोक संगीत होता था। अब वह भी बंद हो गया। हमारे जैसे न जाने कितने लोग बेकार हो गये।’

जानते थे उदय राज कि परमेश्वर दयाल और उनके साथियों को कोई पहचान नहीं मिली। आल्‍हा-ऊदल में अब किसी को कोई रुचि नहीं रही।

‘देखो काका! हमारा बैंक पेंशन जमा करता है लेकिन पैसा हमें सरकार ही देती है।’

उदय राज ने समझाने की कोशिश की।

‘वो तो ठीक है पर क्‍या तुम मेरी कोई मदद नहीं कर सकते।’ उन्‍होंने कहा था।

‘हां कर सकता हूं, ज़रूर करुंगा। मैं कल ही बैंक से छुट्टी लेकर आपके साथ पेंशन के दफ़्तर में चलूंगा। पता करेंगे आपकी फ़ाइल कहां रुकी हुई है और क्‍यों रुकी हुई है।’
‘ठीक है बचवा। उस समय उन्‍होंने कहा था और बैंक से चले गये थे।’

उसके बाद उदय राज ने पेंशन विभाग के कई चककर परमेश्वर दयाल के साथ लगाये, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। फिर अचानक परमेश्‍वर दयाल गुम हो गये। कई दिनों से उनकी कोई खोज ख़बर नहीं मिली। उदय राज भी अपने काम में मशग़ूल हो गये।

एक बार उदय राज ने परमेश्वर दयाल से उनके साथियों के बारे में पूछा था, ‘काका आपके साथी लाल दीवान, सत्‍ती दीन, निषाद चाचा कहां हैं आजकल?’ तो उन्‍होंने बेहद उदास होकर कहा था, ‘कहां होंगे बिटवा! ढोलक बजाने वाला लाल दीवान अब सब्ज़ियां बेच रहा है, तुम्‍हारे निषाद चाचा के फेफड़े खराब हो गये थे; वे मिस्‍त्री का काम करने लगे हैं और नगाड़ा बजाने वाला रामप्रसाद सड़क पर झाड़ू लगा रहा है।’

सुनकर हैरान रह गया था। उन्‍होंने आगे बताया था, ‘हमारी मंडली में एक राम रतन था। चिमटा बजाता था। आज उसके बेटे ही उसे दुत्‍कारते हैं, कहते है- हमें कोई हुनर सिखाया होता तो हम अपनी रोज़ी-रोटी तो कमा लेते। अब राम रतन हमारे गांव में ही एक पेड़ के नीचे बैठकर लोगों के बाल काट कर दो-चार पैसे कमा लेता है।’

कहते-कहते वह उदास हो गये। उस समय उन्‍होंने भारी मन से कहा था, ‘आल्हा ऊदल की गायकी न जाने किस आंधी में उइ़ गई।’

आज राम प्रसाद से उनके न रहने की ख़बर सुनकर बेहद विचलित हो गया उदय राज। आंखों के आगे बार-बार परमेश्वर दयाल का चेहरा आ जाता। वह भूल गया कि उसे आज क्‍या काम करना है। वह अनमने मन से अपनी सीट से उठा और बिना किसी से कुछ कहे बैंक से बाहर निकल आये। बाहर आकर बैंक के कम्‍पाउंड में खड़ी अपनी बाइक स्‍टार्ट की और बैंक के अहाते से बाहर निकल आया।

उसे बैंक से बाहर जाते हुए मैनेजर ने देखा और आश्‍वस्‍त हुआ कि आज उदय राज कोर्ट में समय से पहुंच जाएगा।

कुछ ही देर बाद उदय राज गंगा किनारे पर बने श्मशान घाट पर मौजूद था। लोगों का तांता लगा हुआ था। लोग रोते बिलखते उदास चेहरे लिये अपनों को अंतिम विदाई देने के लिए वहां आ रहे थे। श्मशान घाट की दीवारों पर संतों की वाणियां और गीता की इबारतें लिखी हुई थीं जिनका आशय यही था, ‘एक दिन तो सबने जाना है, यह तो सृष्टि का नियम है तो उदास क्‍यों रहते हो।’ वहां खड़े-खड़े लोगों को रोते-बिलखते देख कर उसके मन में भी जीवन के क्षणभंगुर होने का एहसास हुआ।

उदय राज ने घड़ी देखी। ग्यारह बजने में कुछ समय था। वह चुपचाप श्मशान घाट के गेट पर खड़ा हो गया। परमेश्वर दयाल का इंतज़ार करने।

कुछ ही देर में एक टेम्‍पो में परमेश्वर दयाल की अर्थी श्मशान घाट पर आ गयी। अर्थी को सफ़ेद कफ़न में लपेटा हुआ था और उसके गले में दो-तीन गेंदा के फूलों की मालाएँ थीं। अर्थी के साथ सत्‍ती दीन, रामनाथ कुशवाहा, श्याम किशोर, शिवकुमार और कुछ औरतें मातमी चेहरा लिये आयी थीं। उदय राज इन सबको जानता था। सब के सब परमेश्वर दयाल की आल्‍हा मंडली के सदस्‍य थे। कोई चिमटा बजाता था, कोई ढोलक तो कोई नगाड़ा।

उन लोगों ने परमेश्वर दयाल के शव को उतारकर वहां बने चबूतरे पर रख दिया। शव को चबूतरे पर रखते ही एक-दो लोग पंडित से बात करने के लिए गये और एक-दो लोग लकड़ी का इंतज़ाम करने के लिए गये।

जब सारी व्‍यवस्‍था हो गयी तो शव को उठाकर चिता के पास ले जाने लगे। उदय राज ने भी आगे बढ़कर परमेश्वर दयाल की अर्थी को कंधा दिया और धीरे-धीरे चलते हुए अर्थी को पहले से तैयार चिता पर लाकर रख दिया और देखते ही देखते आल्‍हा-ऊदल की कथा को ओज भरे स्‍वर में गाने वाले परमेश्वर दयाल की देह धूं-धूं करके जल उठी।

उदय राज के लिए वहां ज्‍़यादा देर रुकना मुश्किल हो रहा था। उसे बारह बजे कोर्ट भी पहुंचना था। लिहाज़ा उसने परमेश्‍वर दयाल की जलती देह को अंतिम प्रणाम किया और श्मशान घाट के बाहर जाने लगा।

जब उदय राज चलने लगा तो रामप्रसाद उसके पास आये उसके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, ‘अच्‍छा किया बिटवा तुम आ गये, उन्‍हें आग देने। तुमको बहुत याद करते थे आख़िरी सांस तक तुम्‍हारा ही नाम ले रहे थे।’

उदय राज ने कुछ नहीं कहा। केवल हाथ जोड़ दिये। और श्मशान घाट के पार्किंग स्‍टैंड की ओर जाने लगा वहां उसकी बाइक खड़ी थी। रास्‍ते में बाइक चलाते वक्‍़त उदय राज को महसूस हो रहा था कि वह परमेश्वर दयाल की चिता को आग देकर नहीं जा रहा बल्कि आल्हा-ऊदल के गायन की चिता को आग देकर जा रहा है।

कुछ ही देर में अपने आल्‍हा-ऊदल के गायन से, अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले परमेश्‍वर दयाल अपनी कला की तरह ख़ुद भी राख में तब्दील हो जाएंगे। उदय राज मन ही मन सोच रहा था कि वह उनकी कला को राख में तब्दील नहीं होने देगा। जिस काम को वह किशोरावस्‍था में छोड़ चुका था, उसे फिर से सीखेगा। वह सत्‍ती दीन, रामनाथ कुशवाहा, श्याम किशोर, शिवकुमार को इकट्ठा करेगा और फिर से आल्‍हा-ऊदल गायन शुरू करेगा। फिर से इस इलाक़े में आल्‍हा-ऊदल की कहानियों की गूंज सुनायी देगी।

हरियश राय, hariyash rai

हरियश राय

32 साल बैंकर रहते हुए उप-महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा समय लेखन में ही। उपन्यासों के साथ ही अनेक कथा संग्रह प्रकाशित। कुल मिलाकर क़रीब डेढ़ दर्जन पुस्तकें, जिनमें प्रतिनिधि कहानियों के संकलन भी। साथ ही सामयिक विषयों पर ‘भारत-विभाजन और हिंदी उपन्यास’, ‘सूचना तकनीक, बाज़ार एवं बैंकिंग’, ‘समय के सरोकार’, ‘शिक्षा, भाषा और औपनिवेशिक दासता’ जैसी पुस्तकें भी। 'उद्भावना' पत्रिका के भीष्म साहनी अंक का संपादन। कई सम्मान। संपर्क: 9873225505

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