
- September 14, 2026
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इस शृंखला में इस बार एक ऐतिहासिक स्टार की याद। उसका पूरा जीवन ही जैसे कई स्तरों पर एक सफ़रनामा रहा। अनुभवों का ख़ज़ाना और शोहरत का ज़माना और बदनामी- जैसे सब उसके नाम था। इस हॉलीवुड सितारे की फ़िल्म से भी ज़्यादा थ्रिलिंग दास्तान...
नियमित ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....
एरोल फ़्लिन: पर्दे के रॉबिनहुड की ड्रामाई ज़िंदगी
यूँ तो सिनेमा विश्वकथा में हम अधिकतर उन फ़िल्मकारों को इतिहास के पन्नों से निकालकर लाते हैं, जिन्होंने सिनेमा की नींव रखी और उसको एक विशाल वृक्ष बनाने में अपनी पूरी जान लगा दी। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे कलाकार भी हुए, जिन्होंने उस दौर के फ़िल्मकारों की कहानियों को सदियों के लिए अमर कर दिया।
एरोल फ़्लिन हॉलीवुड के उन सितारों में से थे, जिनकी ज़िंदगी उनकी फ़िल्मों से भी ज़्यादा रोमांचक थी। वे एक अभिनेता, साहसी यात्री, नाविक, लेखक और हॉलीवुड के सबसे प्रसिद्ध साहसी और दबंग नायकों में से एक बने। Captain Blood, The Adventures of Robin Hood और The Sea Hawk जैसी फ़िल्मों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्टार बना दिया।
लेकिन उनकी कहानी सिर्फ़ सफलता की नहीं है। उनके जीवन में ग़रीबी, समुद्री यात्राएँ, साहसिक अभियान, युद्ध, प्रेम-संबंध, विवाद, शराब, स्वास्थ्य समस्याएँ और बहुत कम उम्र में मृत्यु… सब कुछ शामिल था। आइए देखते हैं एक महानायक के जीवन यात्रा।
20 जून 1909 को एरोल लेस्ली थॉर्नटन फ़्लिन का जन्म आस्ट्रेलिया के तस्मानिया के होबार्ट में हुआ। उनके पिता थियोडोर थॉमसन फ़्लिन जीवविज्ञानी और समुद्री जीव-विज्ञान के विशेषज्ञ थे। माँ का नाम लिली मैरी यंग था। उनके पिता का शैक्षणिक कैरियर मज़बूत था और बाद में वे आस्ट्रेलिया के प्रमुख वैज्ञानिकों में गिने गये। एरोल का बचपन हालांकि पूरी तरह शांत नहीं था। उनका परिवार कई स्थानों पर रहा और बचपन से ही उनके भीतर समुद्र, प्रकृति और रोमांच के प्रति आकर्षण पैदा हो गया था।
स्कूल में एरोल बहुत अच्छे छात्र नहीं थे। उन्मुक्त स्वभाव था। वे नियमों को आसानी से स्वीकार नहीं करते थे और अक्सर मुश्किल में पड़ जाते थे। बचपन से ही उनका व्यक्तित्व कुछ ऐसा विकसित हुआ था, जो बाद में हॉलीवुड के लिए बिल्कुल सटीक साबित होने वाला था। स्कूल बदलते रहे और आख़िरकार सिडनी चर्च आफ़ इंग्लैंड ग्रामर स्कूल (Shore) से उन्हें निकाल दिया गया।
बचपन से ही विद्रोही स्वभाव वाले एरोल को किशोरावस्था में किसी सामान्य नौकरी या सुरक्षित जीवन में दिलचस्पी नहीं थी। 1927 में उन्होंने सिडनी की एक शिपिंग कंपनी में थोड़े समय के लिए ऑफ़िस वर्क किया। लेकिन जल्द ही उन्होंने न्यू गिनिआ जाने का फ़ैसला किया और यहीं से उनकी ज़िंदगी किसी एडवेंचर नॉवेल जैसी होने लगी।
न्यू गिनिआ में उन्होंने कोपरा, तंबाकू की बाग़बानी, गोल्ड प्रॉस्पैक्टिंग, बोट चार्टर व्यवसाय जैसे अलग-अलग काम किये। एक समय उन्होंने अपनी नाव सिरोको भी ख़रीदी और समुद्र के रास्ते न्यू गिनिआ की ओर एक लंबी यात्रा की। उनकी ज़िंदगी में ऐसा कोई एक स्थिर व्यवसाय नहीं था। सोने की खान के सपने पूरे नहीं हुए। व्यापारिक योजनाएँ सफल नहीं हुईं। लेकिन हर असफलता उन्हें एक नयी जगह ले जाती रही और शायद यही भटकता हुआ जीवन आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूँजी बना।
न्यू गिनिआ में रहते हुए एरोल ने केवल व्यापार नहीं किया। उन्होंने वहाँ के जीवन को देखा, यात्राएँ कीं और अपने अनुभव लिखे। उनकी सात महीने की यात्रा और न्यू गिनिआ के अनुभवों ने बाद में उनकी किताब ‘बीम एंड्स’ को जन्म दिया, जो 1937 में प्रकाशित हुई। उनके जीवन में समुद्र अब केवल उनके पिता के व्यवसाय का हिस्सा नहीं था। वह उनकी पहचान बन चुका था। सबसे दिलचस्प बात यह कि यह किताब पढ़ते हुए आपको वह एरोल मिलता है, जो हॉलीवुड नायक बनने से पहले की शख़्सियत था।
लेखक से स्टार बनने की यात्रा
फिर एक दिन उनके जीवन ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी उन्होंने शायद कल्पना भी नहीं की थी। आस्ट्रेलिया में फ़िल्म निर्देशक चार्ल्स शॉवल एक फ़िल्म बना रहे थे— In the Wake of the Bounty। फ़िल्म 1789 के प्रसिद्ध बाउंटी विद्रोह और उसके बाद पिटकैर्न द्वीप के जीवन पर आधारित थी। एरोल को फ़्लेचर क्रिस्टियन की भूमिका मिली। यह रुपहले पर्दे पर उनका पहला महत्वपूर्ण पदार्पण था। यह फ़िल्म उन्हें महानायक नहीं बना सकी। लेकिन कैमरे और उनके बीच एक सहजता बैठ गयी थी। वो एक तरोताज़ा चेहरे वाले और कसी क़द-काठी के व्यक्ति थे और कैमरे ने यही सहेज लिया था। वे घुड़सवारी और समुद्री जीवन के अभ्यस्त थे और सबसे महत्वपूर्ण उनके अंदर वह रोमांचकारी व्यक्तित्व था, जिसे हॉलीवुड कुछ ही वर्षों में दुनिया के सामने पेश करने वाला था।
इसके बाद एरोल ब्रिटेन चले गये। वहाँ उन्हें कुछ अभिनय के छोटे-मोटे अवसर मिले। उन्होंने थिएटर और फ़िल्मों में काम करना शुरू किया। लेकिन अभी भी वे एक बड़े स्टार नहीं थे। उनके अंदर जादू ज़रूर था, लेकिन हॉलीवुड तक पहुँचने के लिए उन्हें एक बड़ा अवसर चाहिए था।
1935 में एरोल अमेरिका पहुँचे और वॉर्नर ब्रदर्स के साथ काम करना शुरू किया। शुरूआत में उन्हें छोटे रोल मिले— जैसे मर्डर एट मोंटे कार्लो और द केस आफ़ द क्यूरियस ब्राइड। लेकिन वॉर्नर ब्रदर्स को जल्द ही समझ आ गया कि इस आदमी में कुछ ख़ास है। उसी वर्ष उन्हें एक ऐसी फ़िल्म मिली, जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी। “कैप्टन ब्लड फ़िल्म में उन्होंने पीटर ब्लड की भूमिका निभायी। एक डॉक्टर, जिसे ग़लत तरीक़े से अपराधी ठहराया जाता है और जो आगे चलकर समुद्री डाकू बन जाता है। इस फ़िल्म में एरोल की कसी क़द-काठी, आवाज़, मुस्कान, तलवार चलाने की कला दर्शकों को बेहद भा गयी। फ़िल्म सफल हुई और अचानक… हॉलीवुड को अपना नया एडवेंचर हीरो मिल गया।
इसके बाद उनकी फ़िल्में लगातार आने लगीं। द चार्ज आफ़ द लाइट ब्रिज ने उनकी एडवेंचर-स्टार छवि को मज़बूत किया। लेकिन वॉर्नर बंधुओं के पास एरोल के लिए उससे भी बड़ी योजना थी। फिर साल 1938 में आयी फ़िल्म द एडवेंचर आफ़ रॉबिनहुड, यह एरोल की पहचान बन गयी। वह रॉबिनहुड बने और उनके साथ ओलिविया डे हैविलैंड ने इस फ़िल्म में मेड मैरियन का किरदार निभाया। सिनेमाई रंगों की चमक, विशाल सेट्स, तलवार के बेहतरीन युद्ध दृश्य, परदे पर दौड़ते घोड़े, भव्य पोशाकें और एरोल का करिश्माई अंदाज़, सारी बातों ने मिलकर फ़िल्म को क्लासिक बना दिया। फ़िल्म को चार अकादमी पुरस्कार नामांकन मिले और यह आज भी सबसे लोकप्रिय और स्वैशबकलर फ़िल्मों में गिनी जाती है। अब एरोल फ़्लिन केवल अभिनेता नहीं, हॉलीवुड का एक चेहरा बन चुके थे।

इसके बाद एरोल का कैरियर ग्राफ़ तेजी से ऊपर गया। उन्होंने अलग-अलग शैली की फ़िल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फ़िल्मों की सूची इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है। 1941 तक एरोल की प्रतिभा जगज़ाहिर हो चुकी थी और बहुत हद तक उनके लिए वैसे ही किरदार लिखे जाते थे, जिनमें सुंदर चेहरा + साहसी शरीर + तलवार + घोड़ा + समुद्र + रोमांस होता। लेकिन वह केवल एक ही तरह के अभिनेता नहीं थे। बाद में जेंटलमैन जिम जैसी फ़िल्मों में उन्होंने अपनी ड्रामाई रेंज भी दिखायी।
ज़ाती ज़िंदगी का ज़ोरदार ड्रामा
फ़िल्मों ने उन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया था। इसी समय उनकी निजी ज़िंदगी भी चर्चा में रहती थी। ख़ासकर उनके कई रोमांटिक संबंधों और उनके रंगीन जीवन-शैली को लेकर। फिर अक्टूबर–नवंबर 1942 में अचानक उनका नाम एक गंभीर आपराधिक मामले में आ गया। एरोल की पेशेवर कामयाबी के साथ उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी भी अख़बारों की सुर्ख़ियां बनने लगी।
इस मामले में दो किशोर लड़कियाँ थीं: 17 वर्षीय बेटी हेनसेन मिडवेस्ट से कैलिफ़ोर्निया आयी थी और अपनी बहन से मिलने हॉलीवुड पहुँची थी। एक समय घर से गायब हो गयी। बाद में उसने बताया कि एक पार्टी के दौरान उसकी मुलाक़ात एरोल से हुई थी और एरोल ने उनके साथ ज़बरदस्ती की। घटना अभिनेता ब्रूस कैबट के घर की पार्टी की थी। दूसरी लड़की 16 वर्षीय पेगी सैटर्ली थी। उसने आरोप लगाया कि एरोल ने उसके साथ उसके याट पर लगातार दो रात ज़बरदस्ती की। यहीं से मामला बेहद गंभीर हो गया क्योंकि कैलिफ़ोर्निया में उस समय नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध को वैधानिक रूप से बलात्कार माना जा सकता था।
ट्रायल बेहद ड्रामाई था। यह कोई सामान्य आपराधिक मुक़दमा नहीं था, पूरे हॉलीवुड में सेलिब्रिटियों के गलियारों की नज़र इस पर थी। पूरे देश में लोग जानना चाहते थे: क्या हॉलीवुड का मशहूर रॉबिनहुड वास्तव में अपराधी है? लेकिन 1943 में एरोल को इस मामले में बरी कर दिया गया। यह भी हुआ कि बरी होने के बाद एरोल का कैरियर ख़त्म नहीं हुआ। हॉलीवुड ने एरोल को फिर स्वीकार कर लिया। लेकिन उनकी सामाजिक छवि हमेशा के लिए प्रभावित हो चुकी थी। अब इस रॉबिनहुड के साथ जुड़ चुका था शब्द, हॉलीवुड का बदनाम अय्याश।
और एक सितारे की यादें
एरोल की कुल 3 शादियाँ हुईं और 4 बच्चे। उनकी पहली पत्नी लिली डैमिट ने आपसी तनाव के चलते साल 1942 में तलाक लिया था, यह वही साल था, जब एरोल आपराधिक मुक़दमे से जूझ रहे थे। फिर नॉरा एडिंगटन उनके जीवन में आयी और यह शादी लगभग छह साल चली। एरोल का लगातार यात्रा में रहना, हॉलीवुड जीवन शैली, शराब और दूसरी महिलाओं से जुड़े उनके संबंधों की ख़बरों ने इस शादी को ख़त्म किया। एरोल और नॉरा की बेटियों में रॉरी विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने अपने पिता की यादों को किताब के रूप में दर्ज किया। द बैरन आफ़ मलोलैंड: अ डॉटर रिमेंबर्स एरोल फ़्लिन। यह किताब 1990s में प्रकाशित हुई और इसमें रॉरी ने एरोल को केवल हॉलीवुड स्टार के रूप में नहीं, बल्कि पिता के रूप में याद किया।
पैट्रिस वायमोर थी एरोल की तीसरी और आख़िरी पत्नी। उनकी कहानी एरोल की पिछली दो शादियों से काफ़ी अलग थी। दोनों का विवाह एरोल की मृत्यु तक क़ानूनी रूप से क़ायम रहा, हालांकि बाद के वर्षों में वे काफ़ी समय अलग-अलग रहते थे। पैट्रिस अभिनेत्री, गायिका और स्टेज कलाकार थीं। दोनों की मुलाक़ात एक फ़िल्म के सेट पर हुई थी।
1950s के अंत तक एरोल की सेहत काफ़ी ख़राब हो चुकी थी। उनका शरीर उस जीवन की क़ीमत चुका रहा था, जिसे उन्होंने वर्षों तक जिया था। शराब, ड्रग्स और लगातार ख़राब स्वास्थ्य ने उन्हें कमजोर कर दिया था। फिर अक्टूबर 1959 में वे कैनैडा गये और वहीं उनकी ज़िंदगी का अंतिम अध्याय लिखा गया। 14 अक्टूबर 1959 को वैंकूवर में एरोल की मृत्यु 50 वर्ष की आयु में हुई।
एरोल की मृत्यु का कारण दिल का दौरा दर्ज किया गया है लेकिन कैमरा उन्हें मरने नहीं देता। जब भी सिनेमा के पर्दे पर वह रॉबिनहुड तलवार उठाता है, मुस्कुराता है और शेरवुड जंगलों में दौड़ता है— एरोल फ़्लिन फिर से जीवित हो जाता है और शायद यही हॉलीवुड स्टार बनने की सबसे बड़ी क़ीमत और सबसे बड़ा पुरस्कार दोनों हैं… कि इंसान चला जाता है, लेकिन पर्दे पर रची हुई उसकी दुनिया हमेशा जीवित रहती है।

चारु शर्मा
फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680
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