
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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नियमित ब्लॉग विवेक मेहता की प्रस्तुति...
रंग बिरंगी: राजनैतिज्ञों-साहित्यकारों की चुटकियां-10
हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को प्रस्तुत करने की इस शृंखला में पाठकों की रायशुमारी और भागीदारी की अपेक्षा है। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए और अगर आपके पास भी ऐसे क़िस्से/प्रसंगों की यादें हैं तो हमारे साथ साझा कीजिए अपना ख़ज़ाना …

हाथी से माचिस उठवाना
जोश मलीहाबादी अपने एक मित्र कुंवर महेंद्रसिंह बेदी का ट्रांसफ़र रुकवाने नेहरू जी के पास पहुँचे। नेहरू जी उन्हें अत्यंत प्यार से हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गये और पूछा, “क्या आप भी बेदी का ट्रांसफ़र रुकवाने के ख़्वाहिशमंद हैं?”
जोश ने कहा, “जी हाँ।”
नेहरू जी बोले, “यह डेमोक्रेटिक उसूल के ख़िलाफ़ है कि मैं इस कार्य में दख़ल दूँ।”
जोश ने कहा, “पंडितजी मैं जानता हूँ कि प्राइम मिनिस्टर से तबादला रुकवाने को कहना ऐसा है जैसे कोई हाथी से कहे ज़रा टेबल पर से माचिस उठा देना। लेकिन आज मैं हाथी से माचिस उठवाकर रहूँगा।”
नेहरूजी ख़ूब हँसे और तबादला… हाथी को माचिस उठानी पड़ी।
***
प्रधानमंत्री को भी…
एक बार जोश मलीहाबादी जब नेहरू जी से मिलने गये तो वे रफ़ी अहमद किदवई से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने जोश को आते देखा और वे अंदर कमरे में चले गये। जोश बहुत नाराज़ हुए। किदवई से बोले, “अब मैं यहाँ एक मिनट भी नहीं रुक सकता। उन्होंने मुझसे बात करना तो दूर, दुआ-सलाम तक नहीं की।”
इतने में नेहरू जी आ गये तो जोश मुँह मोड़कर खड़े हो गये।
नेहरू जी ने पूछा- “क्या बात है जोश साहब?”
जोश साहब मुँह मोड़कर ही खड़े रहे। तब किदवई जी ने पूरी बात नेहरू जी को बतलायी।
नेहरू जी जोश के पास पहुँचे और उनका हाथ पकड़कर उनके कान में बोले, “यार, प्रधानमंत्री को भी बाथरूम जाना पड़ता है।”
जोश का सारा ग़ुस्सा काफ़ूर हो गया।
***
डूबना
विष्णुकांत शास्त्री जब विधायक बने तो उन्हें आशीर्वाद देते हुए पंडित हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा- “याद रखिए, राजनीति में डूबने वाले की मनुष्यता प्रायः डूब जाती है जबकि साहित्य में डूबने वाला पार हो जाता है।”
***
नंगे बदन का अधिकार
एक बार पंडित हज़ारीप्रसाद द्विवेदी शांतिनिकेतन में गर्मी की एक शाम नंगे बदन खादी की छोटी धोती पहने घर के बाहर पढ़ रहे थे।
इतने में क्षितिमोहन सेन के साथ गुरुदेव रवींद्रनाथ आ गये। गुरुदेव को देखकर पंडित जी संकुचित होकर खड़े हो गये और उनके सम्मान के लिए अपनी छोटी धोती से ऊपर का बदन ढकने की चेष्टा करने लगे। लेकिन धोती इतनी छोटी थी कि ऊपर से खींचते तो नीचे से पैर उघड़ने लगते।
क्षितिबाबू ने कहा, “अरे पंडितजी काहे परेशान होते हैं। हमारे देश में संस्कृत पढ़े विद्वान और अंग्रेज़ी पढ़ी महिला को नंगे बदन रहने का पूरा अधिकार है।”
और ठहाका गूंज उठा।

विवेक मेहता
पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470
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