
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
भवेश दिलशाद की कलम से....
कॉर्पोरेट, पत्रकारिता, हिंदी
आपने कभी सुना दो धुर विरोधी पार्टियों मसलन कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन सरकार बना ली? राजनीति में नामुमकिन कुछ नहीं। फिर भी, यह विरोधाभासी है विचार के नज़रिये से। विचार से आशय कि राम-रावण एक पाले में हों तो? रामायण बनेगी ही क्या और कैसे? पत्रकारिता के कॉर्पोरेटीकरण की बात है तो कहानी का प्लॉट ही संदेहास्पद है।
कॉर्पोरेट एक व्यावसायिक कंपनी। एक सेक्टर की ऐसी कई कंपनियां मिलकर होती हैं उद्योग। कॉर्पोरेट यानी उद्योग की एक इकाई। कॉर्पोरेट से मुराद? निजी हित या स्वार्थ या लाभ के लिए बना एक समूह। आम बोलचाल में बाज़ार को तय करने वाला तंत्र कह लीजिए। इधर, पत्रकारिता का अर्थ है वह मूल्य, जो व्यापक समाज का हित चाहे। अभिव्यक्ति की सीमाओं को हर बार नये सिरे से परिभाषित करे। अब सोचिए दोनों एक-दूसरे के आड़े आने वाले सेक्टर और दोनों एक गठजोड़ में। इसे कहेंगे विडंबना।
इस विडंबना के त्रिकोण में आती है भाषा। भाषा बाज़ार को भी चाहिए, अभिव्यक्ति को भी। दोनों के हित और लक्ष्य अक्सर विपरीत। क्या हो सकता है लगातार इस टकराहट का नतीजा? ज़ाहिर है बाज़ार ताक़तवर है, जीत जाता है। पूंजीवाद/साम्राज्यवाद आसानी से समाजवाद/मानवतावाद को रौंदता है। संघर्ष से भाषा आवाज़ बन सकती है। गठजोड़ से भाषा दोयम दर्जे की होती चली जाती है।

पनपती है एक आडंबरपूर्ण भाषा। जो दिखती कुछ है, होती कुछ। राग तो अलापती है अभिव्यक्ति-अभिव्यक्ति का, लेकिन होती है कठपुतली। पत्रकारिता के कॉर्पोरेटीकरण की भेंट चढ़ चुकी हिंदी की गति भी जुदा नहीं। बल्कि कुछ भाषाओं के साथ तुलना में बदतर ही हो। हिंदी की गति या कहें कि दुर्गति, निष्कर्षों पर सीधे क्या पहुंचना। कुछ संदर्भों से होते हुए चलते हैं।
ख़बरों, बहसों पर आपने ग़ौर किया कि हिंदी पत्रकारिता के कॉर्पोरेटीकरण के बाद हादसा हुआ क्या?
मज़दूर, किसान, छात्र आदि
मज़दूरों के अधिकारों, आंदोलनों, हितों और शोषण से जुड़ी कितनी ख़बरें और बहसें याद हैं? कभी खोजिए पिछले कुछ सालों में देश भर में मज़दूर आंदोलनों का आंकड़ा। इसका पुष्ट और पूरा डेटा मिलना भी दूभर है। इसी साल नोएडा में मज़दूरों का बड़ा और लंबा आंदोलन चला। सूरत में भी एक आंदोलन तेज़ हुआ है। प्राथमिकता तो दूर, समाचार जगत में उसे स्पेस ही कहां मिला!
नये श्रम क़ानूनों पर क्या कोई बहस आपको याद है? समाचारों की दुनिया, या सड़क से संसद तक कोई बड़ी बहस याद हो?
अगस्त 2026 की बात करते हैं। चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ग़ज़ब कर दिया। ‘उद्योग’ की परिभाषा मानने की क़ानूनी बाध्यता ख़त्म कर दी। वह परिभाषा जो 1978 से चली आ रही थी। बेंच के तीन न्यायाधीशों ने कहा भी यह आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि 1978 वाली परिभाषा को शामिल किया जाये, लागू किया जाये ताकि मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
अब किसानों की बात कीजिए। उनके हित, आंदोलनों से जुड़े समाचारों की संख्या सोचिए। संख्या छोड़िए इनके कवरेज के नज़रिये देखिए। व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होते हैं किसान। हर तरह से दमन व्यवस्था करती है। कॉर्पोरेटी मीडिया व्यवस्था के नज़रिये से समाचार प्रस्तुत करता है। किसानों के नज़रिये से नहीं।
यही छात्र आंदोलनों के समय होता है।
यही शिक्षकों की मांगों के समय होता है।
यही महिला सुरक्षा के सवालों के समय होता है।
यही हर उस जगह होता है, जो व्यापक समाज का पक्ष है। या कहें कि समाज के जिन सेक्टरों का कॉर्पोरेटीकरण नहीं हुआ है। जिनका शोषण जारी रहता है।
पत्रकारिता है, व्यापक समाज की आवाज़ होना। और कॉर्पोरेटी होते ही पत्रकारिता व्यापक समाज की चीखों को अनसुना करने, दबाने के लिए ज़ोर लगाती है।
बलात्कार संबंधी मीडियाई भाषा की पड़ताल कीजिए। आम आदमी आरोपी है तब कवरेज देखिए। बलात्कार, यौन शोषण, हवस जैसा एक-एक शब्द तीव्रता के साथ सुनायी देगा। स्पष्टता के साथ दिखेगा। आपको संकोच होगा माता-पिता या बच्चों के बीच इसे कैसे सुनें, देखें, पढ़ें। अफ़ेसास कि बलात्कार एक उत्सवी समाचार-सा गूंजेगा। और आरोपी कथित धर्मगुरु है, कोई नेता है या पूंजीपति है तब?
समाचारों की प्लेसिंग भी भाषा का संकट है। आप किस ख़बर को कहां और कितना स्पेस देते हैं। भाषा यहां भी चुक जाती है। एक्सेल मीडिया समूह के सुभाष चंद्रा के कांड के चर्चे जितने ज़ोर से हो सकते हैं, क्या हो रहे हैं? इससे जुड़ी ख़बरों की भाषा देखिए। साफ़ दिख रहे अरबों रुपये के फ़्रॉड/अपराध के लिए ‘घोटाला’, ‘घपला’ जैसा शब्द तक समाचारों में नहीं है। अन्य उद्योगपतियों, कॉर्पोरेटियों के मामलों में भी इसी तरह भाषा क़ुर्बान होती रही।

यहां पत्रकारिता की भाषा संकटग्रस्त हो जाती है। प्रतिरोध की, न्याय की, संघर्ष की, विचार की, जवाब/हल खोजने की, अभिव्यक्त करने की भाषा नहीं रहती। एक सुविधाजनक चुप्पी की, मुंह मोड़ने की, प्रश्न ध्वस्त करने की, पीछे ले जाने की, छिछलेपन की बांझ भाषा बनकर रह जाती है।
मैनैजमेंट और इंजीनियरिंग
अब संदर्भ समाचारों के प्रस्तुतिकरण का। यहां दो बातें ग़ौरतलब हैं। कॉर्पोरेटी मीडिया में अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, यहां भाषा को कितनी आज़ादी है? उतनी ही कि आपको जेल में रखकर कहा जाये जितना चाहो चीखो, चिल्लाओ। पाबंदियां नीतियों के नाम पर आती हैं। नीतियां किस गठजोड़, किस मुनाफ़े और किस सियासत से बनती हैं? यह बात इशारे भर से समझी जा सकती है।
दूसरी बात कि ऐसे मीडिया की भाषा डिज़ाइन की गयी है। विज्ञापन की भाषा और एक होशमंद संपादकीय विभाग की भाषा का अंतर नहीं है। पत्रकार क्या नहीं बेच रहा? किसी गली की दुकान के समोसे से लेकर कंपनियों के उत्पाद और सेवाओं तक। यह तो बहुत बाहरी उदाहरण है। भीतर झांकने पर दिखता है बाज़ार ने अपने सतही मुहावरे विकसित कर लिये हैं और भाषा उनके भीतर ही क़ैद कर दी गयी है।
यह जो आये-दिन सांप्रदायिकता को लेकर जाने कितना कंटेंट मार्केट में फेंका जा रहा है। यह जो रोज़ाना पार्टियों की खींचतान को लेकर इतना मसाला है। यह जो हर घर में समर्थक बनाम विरोधी का माहौल है। यह जो सूचनाओं को छुपाना-दबाना जारी है। नैरैटिवों, एजेंडों को परोसने की भेड़िया धंसान मीडिया में चल रही है… इसके पीछे क्या है?
इसके पीछे पत्रकारिता का एक मैनैजमेंट है। पूंजीपतियों के हाथ में मीडिया है। पूंजीपति व्यवस्था के साथ गठजोड़ के बग़ैर पनप नहीं सकता। इसलिए व्यवस्था पर, नीतियों पर विमर्श, बहस ग़ायब हो जाती है।
पूंजीवाद चूंकि श्रम के शोषण से ही पनप सकता है इसलिए श्रम या कर्मचारी वर्ग के हित भी मुद्दा नहीं हैं। इसी तरह, अन्य शोषित पक्ष भी चर्चा से बाहर हैं।
आंदोलन भी सिद्ध नहीं हो पाते। एक मंत्री के इस्तीफ़े को जीत बता दिया जाता है। फिर लंबा सन्नाटा। असल मुद्दों का क्या हुआ? बदलाव के लिए, सुधार के लिए क्या हुआ? दूसरे मुद्दों पर जो आंदोलन चल रहे हैं, उनकी क्या गत है? तमाम बातों को जीत-हार वाली शब्दावली, डैमैज कंट्रोल वाले कंटेंट और ग़ैर-ज़रूरी हंगामे निगल जाते हैं।
सांप्रदायिकता, युद्ध, छद्म राष्ट्रवाद, नक़ली आंकड़ों से बने नैरैटिव, दलगत मतभेद को उकसावा और मनोरंजन जैसी प्रवृत्तियां मीडिया में उभरकर आती हैं। हर विषय मनोरंजन मात्र बना दिया जाता है। यह आड़ है मुख्य मुद्दों को अंधेरे कोने में धकेल देने के लिए।
यह समझने की बात है कि उद्योग की शह पर व्यवस्था या सत्ता किस तरह नीतियां बनाती है। और सत्ता या व्यवस्था की शह पर उद्योग किस तरह। दोनों एक-दूसरे के मुनाफ़े के लिए किस तरह कई तरह के छद्म रचते हैं।
इन्हीं छद्मों में से एक है पत्रकारिता और उसकी भाषा। मैं, इस लेख में कई जगह कई शोधों के हवाले दे सकता हूं। फिर सोचता हूं ये बातें इतनी अस्पष्ट हैं नहीं कि प्रमाणों की ज़रूरत पड़े। कुछ शोधों का ज़िक्र करता हूं, शीर्षक ही एक अंदाज़े के लिए काफ़ी हों:
- प्रमुख हिंदी अख़बारों के पहले पन्ने की बिज़नेस ख़बरों का कंटेंट विश्लेषण
- नवउदारवादी 21वीं सदी के भारत में हिंदी अख़बार
- प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के पैटर्न और प्रभाव
- भारत में हिंदी समाचार उद्योग में मीडियाई रुजहानों की प्रकृति और प्रक्रिया का अध्ययन
- फ़ैंटम जर्नलिज़्म
- सांस्कृतिक साम्राज्यवाद या स्थानीय आधुनिकता? ग्लोबल होते भारत के हिंदी अख़बार
इन शोधों के ज़िक्र की वजह है। एक और चिंता। शोध करने और करवाने वाले संस्थान कौन-से हैं? जब भी आप कोई शोध पढ़ें तो इस सवाल को नज़रअंदाज़ न करें। जैसे आप कोई शोध पढ़ रहे हैं, स्वास्थ्य पर खाद्य पदार्थों के प्रभाव के बारे में, पता कीजिए कि यह शोध किसने करवाया। शोध के पीछे कोई फ़ूड कंपनी है या फ़ार्मा कॉर्पोरेट। पता चलेगा यह शोध प्रामाणिक है या बाज़ारी चाल मात्र।
मीडिया की भाषा के संकट पर प्रामाणिक और गंभीर शोध न के बराबर हैं। इनमें से भी अधिकतर शोध मुखरता से कुछ भी कहने से बचते हैं। ज़ाहिर है इनके पीछे फ़ंडिंग की समस्याओं का अंदाज़ा हम लगा सकते हैं। इधर, कॉर्पोरेट दरअसल हिंदी पत्रकारिता का फ़ंडर भर नहीं है बल्कि हाईजैकर ही है।
छद्म एक से बढ़कर एक
हिंदी पत्रकारिता के 200 साल भी 2026 में हुए। कितने ही ग्रंथ छापे गये और कितने समारोह हुए। लगभग सब उत्सवधर्मी शोरो-ग़ुल और गौरव-गान के हंगामों की भेंट चढ़कर रह गये। बहुत कम यह चिंतन हो सका कि हिंदी पत्रकारिता की वास्तविक समस्याएं क्या रहीं; उसके सामने अब पतन की और विकराल स्थितियां क्या हैं; और उसकी प्रवृत्तियां क्या रहीं, जिन्हें आलोचनात्मक ढंग से समझा जा सके…
इस विषय में डिजिटल ब्लॉगज़ीन आब-ओ-हवा (aabohawa.org) पर लेखों की एक शृंखला एक संदर्भ की तरह मिलती है। इन लेखों में हिंदी पत्रकारिता की मूलभूत अवधारणाओं और यात्रा को आलोचकीय ढंग से विमर्श में लाया गया है।

हिंदी पत्रकारिता का संकट दरअसल मानसिकता के संकट के रूप में समझना होगा। हिंदी समाज की मानसिकता, हिंदी समाज का बाज़ार, हिंदी समाज का पिछड़ापन, हिंदी समाज की अवैज्ञानिक चेतना, इतिहास, भूगोल, सांस्कृतिक विघटन… ऐसे तमाम पहलुओं की एक समझ के बग़ैर हिंदी पत्रकारिता का बहुस्तरीय पतन समझ पाना मुमकिन नहीं है।
अब यह भी देखना चाहिए क्या यह सिर्फ़ हिंदी की ही गति है! पत्रकारिता के मूल्यों और कसौटियों पर कॉर्पोरेटीकरण से हर भाषा कमो-बेश पंगु होती चली गयी। थोड़ी-बहुत उम्मीदें स्थानीय पत्रकारिता और स्थानीय भाषा में अब हों तो हों।
अंग्रेज़ी की स्थिति के बरअक्स हिंदी पत्रकारिता का मुआयना एक अलग विषय है। फिर भी एक विचारणीय बिंदु मिलता है। दोनों भाषाओं में समाचार को उत्पाद की तरह बेचने वाले मीडिया संस्थान हिंदी समाज में बहुतेरे हैं। ग़ौरतलब यह कि एक तो हिंदी जितना कंटेंट अंग्रेज़ी से लेती है, उतना अंग्रेज़ी भी हिंदी से लेती है, ऐसा नहीं है। तो अनुवाद का एक सेक्टर खड़ा हो जाता है। बरसों से रहा है।
जिस मीडिया कॉर्पोरेट से दोनों भाषाओं में समाचार जारी हो रहे हैं, वहां दोनों के शीर्षक, प्रस्तुतिकरण, नज़रिये और ट्रीटमेंट आदि किस तरह अलग होते हैं। इस पर कुछ शोध भी मिलते हैं और आप ख़ुद देख सकते हैं। साफ़ समझ आता है, हिंदी और अंग्रेज़ी के एक ही कॉर्पोरेट मीडिया इकोसिस्टम में समाचार की आइडीअलॉजिकल भाषा अलग हो सकती है।
पूरी भाषा चौपट हो चुकी है। हमारा व्यापक समाज क्या है? महिला, मज़दूर, किसान, कर्मचारी, छोटे व्यापारी, छात्र, युवा, मध्यम वर्ग, पिछड़े, ग़रीब… पत्रकारिता क्या इनके पक्ष में खड़ी है? पत्रकारिता की भाषा क्या स्त्री की भाषा है? क्या मज़दूरों की भाषा है? या क्या वह युवाओं की भाषा है? या सिर्फ़ एक उन्मादी, एक बाज़ारी, एक सियासी भाषा है?
निष्कर्ष तक पाठक ख़ुद पहुंचें। मेरे विचार से, दरअसल हिंदी पत्रकारिता का जो बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेटीकरण की चपेट में आ चुका है और जिसे पत्रकारिता की मुख्यधारा कह दिया जाता है, उसे पत्रकारिता कहना छल है। पूंजी और सत्ता के गठजोड़ के विपक्ष में हो, पत्रकारिता तब है। गठबंधन का हिस्सा है, तो वास्तव में ‘फ़ैंटम जर्नलिज़्म’ है यानी ‘छद्म पत्रकारिता’। और इस पत्रकारिता की भाषा भी सिवाय एक ‘छद्म’ के और क्या! और हां, कॉर्पोरेट मीडिया का ही एक छद्म विस्तार है सोशल मीडिया कंटेंट। यह अलग विषय है, जिसे विस्तार से, अलग लेख में फिर कभी कुरेदा जाये तो बेहतर।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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