ऐन कार्सन, Anne Carson, nobel prize for literature
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

ऐन कार्सन को साहित्य के नोबेल के बाद

              नोबेल पुरस्कार जैसे बड़े सम्मान हमें केवल एक लेखक का नाम नहीं बताते। वे हमारे सामने साहित्य की एक नयी खिड़की खोलने में मदद करते हैं। इस वर्ष साहित्य का नोबेल पाने वाली कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन, प्रायः हिंदी पाठकों सहित मेरे लिए भी ऐसी ही एक खिड़की हैं।

पुरस्कार की घोषणा से पहले मैंने भी उन्हें कभी नहीं पढ़ा था। हिंदी के बहुत-से पाठकों के लिए उनका नाम नया है, लेकिन अब मन में जिज्ञासा है। आख़िर उनकी लेखनी में ऐसा क्या है कि दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान उनके नाम हुआ?

वे कौन-सी बातें हैं, जो हमें उनकी किताबों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करती हैं? निश्चित है कि अब हिंदी में अनुवादित उनका साहित्य भी जल्दी सुलभ होगा।

तब तक ऐन कार्सन को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि वे केवल कवयित्री नहीं हैं। वे निबंधकार, अनुवादक और प्राचीन यूनानी साहित्य की विदुषी हैं।

उनका जन्म 1950 में कनाडा के टोरंटो में हुआ। उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। लंबे समय तक विश्वविद्यालयों में प्राचीन साहित्य पढ़ाया। लेकिन उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने अपने अध्ययन को पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने प्राचीन कथाओं में आज के मनुष्य को खोजा।

8 अक्टूबर 2026 को स्वीडिश अकादमी ने उन्हें साहित्य का नोबेल देने की घोषणा की। अकादमी के अनुसार, उनका साहसी और मौलिक लेखन प्राचीन साहित्यिक परंपरा के साथ रचनात्मक संवाद करता है और समकालीन साहित्य के लिए नये रूप गढ़ता है। इस कथन में ही उनकी लेखकीय पहचान का सार छिपा हुआ है। वे पुरानी कथा को केवल दोहराती नहीं हैं। वे उसमें प्रवेश करती हैं। उसके पात्रों को आज के समय में ले आती हैं। फिर उनसे ऐसे प्रश्न पूछती हैं, जिनका संबंध हमारे अपने जीवन से है।

उनकी चर्चित पुस्तक Autobiography of Red यानी ‘लाल रंग की आत्मकथा’ को ही लीजिए। नाम पढ़कर लगता है कि शायद यह किसी व्यक्ति की आत्मकथा होगी। लेकिन यह पारंपरिक आत्मकथा नहीं है। यह पद्य में लिखा गया एक उपन्यास है। इसकी प्रेरणा प्राचीन यूनानी कवि स्टेसिकोरस की उस कथा में है, जिसमें गेर्योन नाम का लाल पंखों वाला एक विचित्र पात्र आता है। यूनानी मिथक में गेर्योन का सामना महान नायक हेराक्लीज़ से होता है। सामान्यतः यह कथा पराक्रम, संघर्ष और विजय के संदर्भ में याद की जाती है।

ऐन कार्सन इस कथा को एक बिल्कुल अलग दिशा देती हैं। वे गेर्योन को आधुनिक समय के एक किशोर के रूप में सामने लाती हैं। अब वह केवल पौराणिक राक्षस नहीं है। वह प्रेम करता है। आकर्षित होता है। संबंधों में चोट खाता है। अपने भीतर की पहचान और इच्छाओं से जूझता है। इस प्रकार हज़ारों वर्ष पुरानी कथा एक आधुनिक किशोर की भावनात्मक दुनिया में बदल जाती है।

ऐन कार्सन, Anne Carson, nobel prize for literature

यही इस पुस्तक का रोचक कथ्य है, जिसे परंपरा ने राक्षस के रूप में देखा, लेखिका उसके भीतर मनुष्य को खोजती हैं। जो पात्र कभी किसी नायक की विजय का हिस्सा था, वह अब अपनी कहानी का केंद्र बन जाता है। कथा का दृष्टिकोण बदलते ही उसका अर्थ बदल जाता है। यह केवल मिथक का पुनर्लेखन नहीं है। यह उस व्यक्ति की आवाज़ सुनने का प्रयास है, जिसे पुराने आख्यान में शायद बोलने का अवसर ही नहीं मिला था।

बने-बनाये खांचों से अलग सृजन

मुझे इसमें साहित्य की एक बड़ी संभावना दिखायी देती है। क्या हर कथा को हमेशा विजेता की आँखों से ही देखा जाना चाहिए? क्या पराजित, उपेक्षित और असामान्य समझे गये पात्रों के भीतर कोई दूसरी दुनिया नहीं होती? साहित्य का काम केवल स्थापित नायकों का गुणगान करना नहीं है। वह उन लोगों के मन में भी है, जिन्हें समाज आसानी से समझ नहीं पाता। गेर्योन के माध्यम से कार्सन इसी मानवीय जटिलता को लेकर लिखती हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐन कार्सन को नोबेल पुरस्कार केवल इसी एक पुस्तक के लिए नहीं मिला। यह सम्मान उनके समूचे साहित्यिक अवदान के लिए है।

Autobiography of Red उनकी सबसे चर्चित कृतियों में गिनी जाती है। उनकी पहली प्रमुख पुस्तक Eros the Bittersweet 1986 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने प्राचीन यूनानी साहित्य के सहारे प्रेम, इच्छा और विरह की प्रकृति पर विचार किया। प्रेम उनके लिए केवल सुखद अनुभूति नहीं है। उसमें दूरी भी है। अधूरापन भी है। किसी को पाने की इच्छा और उससे दूर रहने की बेचैनी भी है।

उनकी दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता साहित्यिक विधाओं की सीमाओं को तोड़ना है। हम सामान्यतः कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध और आलोचना को अलग-अलग खाँचों में रखते हैं। कार्सन इन खाँचों से सहजता से बाहर निकलती हैं। उनके यहाँ कविता में आलोचना आ सकती है। गद्य में काव्यात्मकता हो सकती है। किसी पुस्तक में इतिहास, दर्शन, अनुवाद और निजी स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित हो सकती हैं। वे यह मानकर नहीं चलतीं कि किसी विचार को व्यक्त करने के लिए एक ही पारंपरिक रूप पर्याप्त है।

उनकी पुस्तक Nox इसका असाधारण उदाहरण है। यह केवल सामान्य अर्थों में पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं है। इसे एक डिब्बेनुमा संरचना में प्रस्तुत किया गया, जिसमें खुलने वाले पन्नों पर तस्वीरें, पत्र, लिखित सामग्री और स्मृतियाँ जुड़ी हैं। इसके केंद्र में उनके भाई माइकल की मृत्यु और उससे जुड़ा उनका निजी शोक है। इसमें वे रोमन कवि कैटुलस की अपने मृत भाई के लिए लिखी गयी शोक-कविता का अनुवाद भी शामिल करती हैं।

यहाँ एक लेखक का निजी दुःख प्राचीन साहित्य से जुड़ जाता है। दो अलग-अलग समयों के भाई, दो अलग-अलग जीवन और शोक की एक साझा मानवीय अनुभूति। इस पुस्तक का रूप भी उसके कथ्य का हिस्सा बन जाता है। जैसे स्मृतियाँ किसी सीधी रेखा में नहीं लौटतीं, वैसे ही पुस्तक भी एक पारंपरिक क्रम में बँधी नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद बची हुई चीजें केवल वस्तुएँ नहीं होतीं। वे संबंधों के बचे हुए टुकड़े होती हैं।

ऐन कार्सन को कैसे समझें?

कार्सन के लेखन में प्राचीन यूनान बार-बार उपस्थित है। लेकिन वे अतीत को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनातीं। उनके लिए पुराना साहित्य आज के जीवन को समझने का नया माध्यम है। उनकी पुस्तक If Not, Winter में प्राचीन यूनानी कवयित्री सैफ़ो की बची हुई कविताओं के अंशों का अनुवाद है। सैफ़ो की अनेक रचनाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। उनके शब्दों के बीच रिक्त स्थान हैं। कार्सन इन रिक्तियों को छिपाने के बजाय उन्हें पाठ का हिस्सा बनाये रखती हैं।

इस प्रयोग का अर्थ बहुत गहरा है। साहित्य में जो बचा है, वह महत्त्वपूर्ण है। लेकिन जो खो गया है, उसकी अनुपस्थिति भी अर्थ रखती है। कभी-कभी मौन भी उतना ही बोलता है जितना शब्द। अधूरी पंक्ति पाठक को कल्पना करने का अवसर देती है। इस तरह अनुवाद केवल एक भाषा से दूसरी भाषा में शब्द ले जाने का काम नहीं रह जाता। वह समय, स्मृति और अनुपस्थिति से संवाद बन जाता है।

कार्सन की रचनात्मकता का एक और उदाहरण Norma Jeane Baker of Troy है। इसमें वे हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री मर्लिन मुनरो और प्राचीन यूनानी आख्यान की हेलेन ऑफ़ ट्रॉय के बीच एक रचनात्मक संबंध स्थापित करती हैं। एक ओर, आधुनिक लोकप्रिय संस्कृति का चमकता चेहरा है। दूसरी ओर, वह पौराणिक स्त्री है, जिसके सौंदर्य को युद्ध और विनाश की कथा से जोड़ दिया गया। दोनों के बीच संबंध स्थापित करके लेखिका सौंदर्य, स्त्री की छवि और उसके सामाजिक अर्थों पर विचार करने का अवसर देती हैं।

यही कारण है कि कार्सन को किसी एक साहित्यिक विधा में बाँधना कठिन है। वे शास्त्रीय विद्वान भी हैं और प्रयोगधर्मी रचनाकार भी। उनकी रचनाओं में ज्ञान कल्पना का विरोधी नहीं बनता। बल्कि ज्ञान कल्पना को नये रास्ते देता है। वे प्राचीन ग्रंथों को पढ़ती हैं, उनके शब्दों की जड़ों तक जाती हैं और फिर उनमें आधुनिक जीवन की धड़कन खोजती हैं।

उनकी शैली हर पाठक के लिए सहज हो, यह आवश्यक नहीं। उनके लेखन में संकेत हैं। संदर्भ हैं। प्रयोग हैं। कई बार पाठक को रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ती है।

अब कार्सन को कितने लोग पढ़ेंगे?

हर साहित्यिक कृति का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसे कितनी आसानी से पढ़ लिया गया। कुछ पुस्तकें हमें कहानी सुनाती हैं। कुछ हमारे भीतर प्रश्न जगाती हैं। कुछ हमारी पढ़ने की आदतों को ही बदल देती हैं।

ऐन कार्सन की उपलब्धि इसी तीसरी श्रेणी में दिखायी देती है। वे पाठक से यह अपेक्षा करती हैं कि वह केवल कथा का अर्थ ग्रहण न करे, बल्कि यह भी सोचे कि कथा कहने का तरीक़ा अर्थ को कैसे बदलता है। यदि कविता में उपन्यास लिखा जा सकता है, यदि किसी डिब्बे में स्मृतियों को पुस्तक का रूप दिया जा सकता है और यदि तीन हज़ार वर्ष पुराना मिथक आज के किशोर के प्रेम और अकेलेपन की कथा बन सकता है, तो साहित्य की संभावनाएँ हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक हैं।

हिंदी पाठकों के लिए भी यह परिचय उपयोगी हो सकता है। हमारे पास रामायण, महाभारत, पुराणों और लोक-कथाओं की विशाल परंपरा है। इन कथाओं को नये समय के प्रश्नों के साथ पढ़ने और उनके उपेक्षित पात्रों को नयी दृष्टि से देखने की अपार संभावना है। लेकिन ऐसा करते समय मूल कथा का अध्ययन, सांस्कृतिक संदर्भों की समझ और रचनात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन ज़रूरी है।

कार्सन का उदाहरण बताता है परंपरा से जुड़ने का अर्थ उसकी पुनरावृत्ति करना नहीं है। उससे प्रश्न करना भी एक प्रकार का संवाद है।

अब मेरे मन में उनकी पुस्तकें पढ़ने की इच्छा है। संभवतः Autobiography of Red से शुरुआत करना सबसे रोचक रहेगा। उसके बाद Eros the Bittersweet और Nox को पढ़ना चाहूँगा। इन पुस्तकों के अंग्रेज़ी संस्करण उपलब्ध हैं। गुणवत्तापूर्ण हिंदी अनुवाद की उपलब्धता की प्रतीक्षा रहेगी।

नोबेल पुरस्कार की घोषणा ने ऐन कार्सन को दुनिया भर में पाठकों तक पहुँचाया है, जो शायद अभी तक उनके नाम से परिचित तक नहीं थे। मेरे लिए भी यह पुरस्कार किसी परिचित लेखक की उपलब्धि पर प्रसन्न होने से अधिक, एक नयी साहित्यिक यात्रा का निमंत्रण है। पढ़ने की दुनिया में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई पुस्तक हमारे हाथ में पुरस्कार के कारण आती है, लेकिन उसके बाद हम लेखक को पुरस्कार से अलग करके पढ़ने लगते हैं।

अंततः साहित्य का असली सम्मान यही है। पुरस्कार किसी लेखक के दरवाज़े तक हमें पहुँचा सकता है। भीतर प्रवेश हमें स्वयं करना पड़ता है। ऐन कार्सन के बहाने मुझे फिर यही अनुभव हो रहा है कि साहित्य की दुनिया में अभी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे पढ़ना बाक़ी है। और एक पाठक के लिए इससे अधिक उत्साहजनक बात क्या हो सकती है कि हर नयी पुस्तक उसके सामने दुनिया को देखने का एक नया ढंग खोल दे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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