लंदन की लाइब्रेरी, पुस्तकालय, library in london
भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दूर देस में लेखक-20....

किताबों की दुनिया में बच्चों की पहली दस्तक

             लाइब्रेरी में वीकली बेबी स्टोरी टाइम मेरे लिए एक नया अनुभव है। किताबों से मेरा पुराना रिश्ता है, लेकिन किताबों की दुनिया में इतने छोटे बच्चों को इस तरह अपनी मां के साथ आते, बैठते, सुनते और आनंद लेते देखना मेरे लिए सचमुच कुछ नया था। कई ग्रैंड पैरेंट्स भी मेरी तरह उपस्थित थे। सामने किताबों से भरी अलमारियाँ थीं, बीच में बच्चे और उनके माता-पिता बैठे थे और एक कोने में कहानी सुनाने की तैयारी चल रही थी। मुझे लगा, यह केवल कहानी सुनाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि बच्चों और किताबों की पहली दोस्ती का उत्सव है।

लंदन की इस लाइब्रेरी में सप्ताह का एक दिन विशेष रूप से बहुत छोटे बच्चों के लिए है। उम्र इतनी कि कुछ बच्चे अभी ठीक से चलना भी नहीं सीख पाये हैं, कुछ गोद में हैं, कुछ ज़मीन पर बैठे-बैठे अपनी दुनिया में मगन हैं। उनके माता-पिता भी उनके साथ उसी उत्सुकता से शामिल होते हैं। कहानी सुनाने वाली महिला के हाथ में किताब है, लेकिन कहानी केवल किताब के शब्दों से नहीं चलती। उसमें आवाज़ का उतार-चढ़ाव है, हाथों के इशारे हैं, छोटे-छोटे प्रश्न हैं, कभी कोई खिलौना है तो कभी बच्चों से कोई ध्वनि निकलवाने का प्रयास।

किसी बच्चे का ध्यान कुछ क्षण के लिए किताब पर टिकता है, फिर वह सामने बैठे दूसरे बच्चे को देखने लगता है। कोई खिलौने की ओर हाथ बढ़ाता है, कोई अचानक उठकर चल पड़ता है। किसी को कहानी से ज़्यादा अपने पास बैठे बच्चे की टोपी आकर्षित कर रही है। लेकिन यही तो इस उम्र की कहानी है। यहाँ किसी बच्चे से चुपचाप बैठकर पूरी कहानी सुन लेने की अपेक्षा नहीं है। वह जितना ग्रहण कर सके, उतना ही उसका अपना अनुभव है।

लंदन की लाइब्रेरी, पुस्तकालय, library in london

मुझे इस पूरे दृश्य में सबसे सुंदर बात यह लगी कि यहाँ पढ़ने की शुरूआत पढ़ना सीखने से पहले हो रही है।

बच्चा अभी अक्षर नहीं पहचानता, शब्दों का अर्थ नहीं जानता, शायद कहानी का कथानक भी उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। फिर भी वह किताब के साथ एक रिश्ता बना रहा है। वह सीख रहा है कि किताब हाथ में ली जाती है, उसके पन्ने पलटे जाते हैं, उनमें चित्र होते हैं और उनसे कोई कहानी निकलती है। धीरे-धीरे यही अनुभव आगे चलकर पढ़ने की आदत में बदल सकता है।

लाइब्रेरी का वातावरण भी इस अनुभव को सहज बनाता है। चारों ओर किताबों की कतारें हैं। बड़े लोगों के लिए अलग-अलग विषयों की किताबें और बच्चों के लिए रंग-बिरंगी चित्र-पुस्तकें। एक ओर शांत गलियारे हैं, दूसरी ओर बच्चों की खिलखिलाहट। मुझे लगा, लाइब्रेरी केवल किताबें रखने की जगह नहीं है। वह समुदाय के मिलने की जगह भी है।

भारत में भी हमारे यहाँ कहानी सुनाने की समृद्ध परंपरा रही है। दादी-नानी की कहानियाँ, पंचतंत्र, लोककथाएँ, रामायण-महाभारत के प्रसंग—बच्चे पुस्तकों से पहले अक्सर आवाज़ के माध्यम से कहानी की दुनिया में प्रवेश करते रहे हैं। अंतर इतना है यहाँ उस परंपरा को सार्वजनिक पुस्तकालय की व्यवस्थित गतिविधि के रूप में देखना दिलचस्प लगा।

और शायद इसीलिए यह बेबी स्टोरी टाइम मुझे केवल बच्चों का कार्यक्रम नहीं लगा। यह माता-पिता के लिए भी एक संदेश है—बच्चे को मोबाइल या स्क्रीन देने के बजाय कभी किताब दीजिए, उसके साथ बैठिए, चित्र देखिए, कुछ पढ़िए, कुछ अपनी ओर से गढ़िए। बच्चा हर शब्द समझे, यह ज़रूरी नहीं; ज़रूरी यह है कि वह आपके साथ उस अनुभव में शामिल हो।

आज जब बच्चों की दुनिया बहुत जल्दी स्क्रीन से भर जाती है, तब सप्ताह में एक दिन लाइब्रेरी में कहानी सुनने का यह छोटा-सा आयोजन बहुत बड़ा सांस्कृतिक काम करता दिखाई देता है। यहाँ बच्चे किताब को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, आनंद की वस्तु के रूप में पहचान रहे हैं।

मुझे एक और बात सोचने पर मजबूर करती है। हम अक्सर शिक्षा की शुरूआत स्कूल से मानते हैं। वास्तव में शिक्षा उससे बहुत पहले शुरू हो जाती है—गोद में, घर में, बातचीत में, लोरी में और कहानी में। शायद बेबी स्टोरी टाइम उसी आरंभिक शिक्षा का एक सुंदर सार्वजनिक रूप है।

कहानी ख़त्म हुई तो बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में लौट गये। कोई खिलौने की ओर गया, कोई माँ की गोद में, कोई किताबों की अलमारी की ओर। लेकिन मुझे लगा कि उनके बीच एक अदृश्य धागा जुड़ चुका है—कहानी का धागा।

मैं लाइब्रेरी से बाहर निकलते हुए सोच रहा था कि किताबों की इन लंबी कतारों में आज शायद कुछ नये पाठक जन्म ले रहे हैं। अभी वे अक्षर नहीं पढ़ सकते, लेकिन किताबों को देखकर उनकी आँखों में जो चमक है, वही तो पढ़ने की पहली पंक्ति है।

लंदन में लाइब्रेरी का यह साप्ताहिक बेबी स्टोरी टाइम मुझे इसलिए याद रहेगा कि यहाँ मैंने किताबों को पढ़ते हुए नहीं, बल्कि किताबों से दोस्ती करते हुए देखा।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

1 comment on “किताबों की दुनिया में बच्चों की पहली दस्तक”

  1. अपनों के साथ बच्चों को ,देर तक बैठने -रहने का सुख भी समय का उद्देश्य पूर्ण उपयोग भी , बहुत प्यारे आयोजन की चर्चा की आपने।

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