निर्मला श्रीवास्तव, nirmala shrivastav
तेजनारायण श्रीवास्तव की कलम से....

निर्मला: एक स्त्री या कई स्त्रियों की कहानी

          नाम में ही जैसे एक सहजता है, एक निर्मलता। और उनके व्यक्तित्व को जानने पर लगता है कि यह नाम उन्हें यूँ ही नहीं मिला होगा। उनके जीवन को पीछे मुड़कर देखने पर उसमें एक ऐसी स्त्री दिखायी देती है, जिसने अपने समय की सामाजिक मर्यादाओं के भीतर रहते हुए भी जीवन के कई महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लिये। उसने अभावों को शिकायत नहीं बनने दिया, ज़िम्मेदारियों को बोझ नहीं माना और परिवार के भविष्य के लिए समय से पहले सोचने का साहस किया।

तीन बहनों में मझली निर्मला (02.09.1962-11.03.2024) बचपन से ही माता-पिता की आज्ञाकारिणी और पढ़ाई में मेधावी थीं। हायर सेकेंडरी की पढ़ाई चल ही रही थी कि मात्र सत्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया। उस समय लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज की सोच आज जैसी नहीं थी। विवाह के बाद पढ़ाई जारी रखना तो और भी असामान्य बात थी।

तहसील स्तर के एक छोटे-से शहर में पली-बढ़ी निर्मला विवाह के बाद ऐसे गाँव में पहुँचीं, जहाँ जीवन की मूलभूत सुविधाएँ भी बहुत सीमित थीं। न पक्की सड़क, न बिजली, न आने-जाने के साधन। मिट्टी के कच्चे मकान और दूर-दूर तक फैला ग्रामीण परिवेश। आने-जाने के लिए बैलगाड़ी ही प्रमुख साधन थी।

आज की पीढ़ी के लिए इन परिस्थितियों की कल्पना करना भी कठिन है। लेकिन लगभग पचास वर्ष पहले यही सामान्य ग्रामीण जीवन था।

निर्मला ने उस गाँव में पहुँचकर सबसे पहले क्या किया।

न ससुराल के किसी सदस्य से अभावों की चर्चा की और न पति से कहा कि उन्हें कैसी जगह पर लाया गया है। उन्होंने परिस्थितियों को देखा, समझा और चुपचाप अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। यह चुप्पी कमज़ोरी की नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को समझते हुए जीवन को स्वीकार करने की थी।

ससुराल में परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। सुविधाएँ कम थीं, लेकिन संबंधों की गर्माहट थी। निर्मला ने सुविधाओं की कमी को संबंधों के बीच नहीं आने दिया।

विवाह के बाद पहली विदाई पर जब वे मायके पहुँचीं, तब उनके मन में अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने की इच्छा थी। उन्होंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा देने की बात रखी। यह छोटी-सी इच्छा उस समय एक बड़ा निर्णय थी। सौभाग्य से ससुराल पक्ष ने उनकी इच्छा का सम्मान किया और उन्हें पढ़ाई पूरी करने की अनुमति दे दी।

निर्मला ने इस अवसर को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने पूरे मनोयोग से पढ़ाई की और हायर सेकेंडरी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।

यह उनकी पहली उपलब्धि थीऔर शायद यही उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण पहचान भी थी कि वे परिस्थितियों को स्वीकार करती थीं, लेकिन अपने विकास के अवसरों को छोड़ती नहीं थीं।

उस समय संचार के साधन भी सीमित थे। मोबाइल फ़ोन की तो कल्पना भी नहीं थी और सामान्य टेलीफ़ोन भी हर घर में उपलब्ध नहीं होता था। पति-पत्नी के बीच पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। इसी बीच पति की नियुक्ति सहायक शिक्षक के पद पर हो गयी।

निर्मला श्रीवास्तव, nirmala shrivastav

लगभग एक वर्ष बाद निर्मला दूसरी विदाई पर ससुराल लौटीं। इस बार वे केवल बहू बनकर नहीं लौटी थीं; वे अपनी शिक्षा पूरी कर चुकी थीं। लेकिन उनकी उपलब्धि ने उनके व्यवहार में कोई अहंकार नहीं पैदा किया। वे उसी सहजता से परिवार में घुल-मिल गयीं।

यहीं से उनके व्यक्तित्व की असली कहानी शुरू होती है।

समर्पण, जो केवल त्याग नहीं था

भरा-पूरा परिवार था—सास, ससुर, जेठ, जिठानी, ननद और अन्य सदस्य। ऐसे परिवार में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता। निर्मला ने किसी से अपनी जगह माँगी नहीं; अपने व्यवहार से बना ली।

वे सभी को यथोचित सम्मान देतीं। परिवार के लिए भोजन बनाना, सबको प्रेम से खिलाना और उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।

उनका समर्पण केवल काम करने तक सीमित नहीं था। उसमें संबंधों को निभाने की समझ थी।

वे जानती थीं कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने से नहीं बनता। उसके लिए एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना पड़ता है।

निर्मला के जीवन में त्याग कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं था। वह उनकी दिनचर्या में सहज रूप से उपस्थित था।

परिवार के सभी सदस्यों के भोजन कर लेने के बाद स्वयं भोजन करना, तीज-त्योहार और व्रत-उपवास पूरी श्रद्धा से करना ये उनके जीवन के सामान्य व्यवहार थे।

बच्चों के प्रति उनका स्नेह तो जैसे उनके व्यक्तित्व का सबसे कोमल पक्ष था। माँ के रूप में उन्होंने बच्चों को केवल पाला नहीं, बल्कि उनके भविष्य की चिंता भी की।

यही चिंता आगे चलकर उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण निर्णय बनी।

जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आर्थिक कठिनाइयाँ आयीं, पारिवारिक परिस्थितियाँ बदलीं, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं। लेकिन निर्मला ने कठिन समय में धैर्य नहीं छोड़ा।

उनकी ख़ासियत यह थी कि वे स्वयं परेशान होकर भी पति को ढांढ़स देती थीं।

यह साहस किसी भाषण में दिखायी देने वाला साहस नहीं था। यह रोज़मर्रा के जीवन में चुपचाप जारी रहने वाला साहस था—जब कोई स्त्री परिस्थितियों से लड़ते हुए भी घर के बाक़ी लोगों को टूटने नहीं देती।

गृहिणी का शिक्षक बनने का निर्णय

निर्मला के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उन्हें महसूस हुआ कि केवल पति के वेतन पर बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन होगा।

उन्होंने समस्या को केवल समस्या की तरह नहीं देखा। उन्होंने समाधान के बारे में सोचा।

गृहकार्य और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच समय निकालकर उन्होंने शिक्षक पद की परीक्षा की तैयारी की। विवाह के लगभग दस वर्ष बाद वे ग्रामीण क्षेत्र में ही सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त हुईं।

यह निर्णय अपने आप में महत्वपूर्ण था।

उस समय ग्रामीण समाज में पर्दा-प्रथा और बड़ों की मान-मर्यादा का विशेष महत्व था। निर्मला ने इन मर्यादाओं का सम्मान करते हुए नौकरी की ज़िम्मेदारी निभायी। उन्होंने परिवार से अलग होकर नहीं, परिवार के साथ चलते हुए आत्मनिर्भरता हासिल की।

उनका शिक्षक बनना केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं था। यह उस स्त्री का अपने भीतर की क्षमता को पहचानना था, जिसने परिस्थितियों को स्वीकार तो किया था, लेकिन अपने सपनों को पूरी तरह छोड़ा नहीं था।

निर्मला के व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उनकी दूरदर्शिता थी।

पति के माता-पिता चाहते थे कि बेटा-बहू गाँव में ही रहें। गाँव में थोड़ी-बहुत खेती भी थी और परिवार की जड़ें भी वहीं थीं। यह सोच अपने समय और परिस्थितियों के हिसाब से स्वाभाविक थी।

लेकिन निर्मला बच्चों के भविष्य को देख रही थीं। उन्होंने परिवार को समझाया कि बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए शहर में रहना आवश्यक है। उन्होंने किसी से संघर्ष नहीं किया, किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाये बिना अपनी बात रखी और धीरे-धीरे सभी को सहमत किया।

अंततः पति-पत्नी दोनों का शहरी क्षेत्र में स्थानांतरण संभव हुआ।

समय ने साबित किया कि निर्मला की चिंता सही थी।

बच्चों को उच्च शिक्षा के अवसर मिले और वे अपने जीवन में व्यवस्थित हो सके।

किसी माँ की दूरदर्शिता का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है कि उसके आज के निर्णय का लाभ उसके बच्चों का आने वाला कल उठाये।

धर्म जीवन-पद्धति था

निर्मला की धार्मिक प्रवृत्ति उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। वे नियमित रूप से प्रातः लगभग पाँच बजे उठतीं। योग और ध्यान करतीं। टीवी पर बाँके बिहारी जी के दर्शन हाथ जोड़कर खड़े होकर करतीं। प्रवचन सुनने के बाद ही अपने गृहकार्य में लगतीं।

शाम को आसपास होने वाले सत्संग में जाना, मोबाइल पर दादा भगवान के प्रवचन सुनते हुए भोजन बनाना और श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का नियमित पठन-पाठन करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा।

लेकिन उनकी धार्मिकता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी।

किसी बुज़ुर्ग का सम्मान करना, अतिथि का स्वागत करना, रिश्तेदारों की आवभगत करना, पति की सुविधा का ध्यान रखना और परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना भी उनके लिए धर्म का ही विस्तार था।

शायद इसी कारण उनकी आस्था जीवन से अलग कोई कर्मकांड नहीं बनी, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति बन गयी।

निर्मला के जीवन को केवल ‘आदर्श नारी’ कहकर समाप्त कर देना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा।

उनके जीवन की सबसे बड़ी ख़ूबी यह कि उन्होंने अपने समय की सीमाओं के भीतर रहते हुए भी अपने लिए और अपने परिवार के लिए रास्ते बनाये।

उन्होंने अभाव देखे, लेकिन अभावों को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया।
उन्होंने परिवार की मर्यादाएँ निभायीं, लेकिन अपनी शिक्षा नहीं छोड़ी।
उन्होंने गृहस्थी संभाली, लेकिन आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी क़दम बढ़ाया।
उन्होंने पति का साथ दिया, लेकिन बच्चों के भविष्य के बारे में अपनी स्वतंत्र सोच भी रखी।
उन्होंने धर्म को अपनाया, लेकिन उसे केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने अपने निर्णयों को परिवार के विरुद्ध खड़ा किये बिना परिवार के हित में बदलने की कोशिश की।

यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।

आज का समय बदल गया है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, शिक्षा का विस्तार हुआ है, स्त्री की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है। फिर भी पारिवारिक संबंधों में तनाव, छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, आपसी असहमति और अलगाव की स्थितियाँ दिखायी देती हैं।

संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवारों ने ले लिया है। जीवन अधिक सुविधाजनक हुआ है, लेकिन कई बार संबंधों में धैर्य और सहनशीलता कम दिखायी देती है।

ऐसे समय में निर्मला का जीवन हमें पीछे लौटने के लिए नहीं कहता। वह हमें उन जीवन-मूल्यों की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है, जिन्हें आधुनिकता के साथ भी बचाये रखना ज़रूरी है—सम्मान, संवाद, धैर्य, सहयोग, समर्पण, आत्मनिर्भरता और परिवार के भविष्य के प्रति ज़िम्मेदारी।

निर्मला की कहानी किसी एक स्त्री की कहानी भर नहीं है। यह उस पीढ़ी की अनेक महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने बहुत कम सुविधाओं में परिवारों को सँवारा, बच्चों को आगे बढ़ाया और अपने हिस्से के सपनों को भी चुपचाप जिया।

निर्मला की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी बड़े मंच पर प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने बस जीवन जिया—पूरी ज़िम्मेदारी, धैर्य और आत्मीयता के साथ।

और कई बार जीवन की सबसे बड़ी कहानियाँ वही होती हैं, जिन्हें कोई लिखने नहीं बैठता।

निर्मला ऐसी ही एक कहानी हैं।

तेजनारायण श्रीवास्तव, tej narayan shrivastava

तेजनारायण श्रीवास्तव

शिक्षण कार्य से सेवानिवृत्त होने के बाद विदिशा में रहते हैं। साहित्य पठन-पाठन और लेखन में रुचि। पत्र-पत्रिकाओं के लिए समसामयिक विषयों पर लेखन।

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