
गूंज बाक़ी… इस बार इस सिलसिले में स्व. राधिका प्रसाद वर्मा ‘नटवर’ जी की जयंती (20.08.1920) के अवसर पर एक स्मृति विशेष। कमलकान्त सक्सेना द्वारा संपादित प्रतिष्ठित मासिका पत्रिका ‘साहित्य सागर’ में सुरेंद्र भारद्वाज लिखित यह अंश सितंबर-2012 के अंक में प्रकाशित हुआ था…
बस जेइ औटपाय
बहुत दिन बाद स्कूटर पर घूमने का मन हो आया था। मैंने स्कूटर निकाला और किक लगायी। एक-दो-तीन-चार-पाँच… परन्तु वह स्टार्ट नहीं हुआ। मुझे आश्चर्य था, अपने हाफ़-किक स्टार्ट स्कूटर की इस ज़िद पर! दुखीलाल जी शायद यह नज़ारा देख रहे थे।
वे मेरे पास आये और बोले, ‘क्या बात है? इतनी रात स्कूटर पर कहाँ जाना है? कोई ज़रूरी काम है क्या, जो इतना परेशान हो रहे हो?’ मैंने कहा, ‘नहीं, ज़रूरी काम तो नहीं है, बस। ऐसे ही लेकिन ये स्टार्ट क्यों नहीं हो रहा?’ दुखीलाल जी ने शंका ज़ाहिर की, ‘पेट्रोल है भी कि नहीं?’
मुझे उनका सवाल जँचा। मैंने पेट्रोल टैंक का ढक्कन खोला और देखने की कोशिश की परन्तु अँधेरे में पेट्रोल की स्थिति नज़र नहीं आयी। तो, मैंने जेब से माचिस निकाली और जैसे ही जलाने लगा, दुखीलाल जी ने मेरा हाथ हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘यह क्या ‘औटपाय’ कर रहे हो?’ मेरे हाथ तो वहीं के वहीं रहे लेकिन चेहरा प्रश्नवाचक चिह्न की तरह दुखीलाल जी की ओर टँगा रह गया।
मैंने स्कूटर पर घूमने जाने का विचार छोड़कर अपनी जिज्ञासा शान्त करना उचित समझते हुए दुखीलाल जी से पूछा, ‘ये क्या कहा आपने, ‘औटपाय’? मेरे लिए बिल्कुल नया शब्द है ये। क्या मतलब होता है इसका?’
दुखीलाल जी को जैसे मन-माफ़िक काम मिल गया था। उनके चेहरे का उत्साह इस बात का परिचायक था कि हमेशा की तरह वे ज्ञान बाँटने को उत्सुक हैं। बोले, ‘मैंने कहा, ये क्या औटपाय कर रहे हो ? औटपाय या उटपाय का मतलब है ऐसा काम, जिससे उसे करने वाले को ही क्षति हो और वह हास्य का कारण बन जाये। कभी-कभी इसका परिणाम दुखद और त्रासद भी हो सकता है।’

दुखीलाल जी ‘औटपाय’ की व्याख्या में ऐसे खोये हुए थे, उँगलियों में दबी सिगरेट कब अन्तिम अवस्था में पहुँच गयी, उन्हें पता ही नहीं चला। जब उँगलियाँ जलने लगीं तो वे तिलमिला उठे और मुझे हँसी आ गयी। मेरे मुँह से अनायास निकल गया, ‘जे ई ए औटपाय।’
उन्हें शायद धूम्रपान पर इस टिप्पणी से ऐतराज़ था। आदतन उन्होंने मुझे घूरकर देखा और बोले, ‘जो हम कह रहे हैं, वो सुनो।’
दूखीलाल जी ने औटपाय शब्द की व्युत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘इस शब्द की व्युत्पत्ति ऊँट की करवट से हुई होगी।’ उन्होंने इस बारे में अपनी साहित्यिक ज्ञान संपदा की झलक दिखाते हुए बताया कि सुप्रसिद्ध रचनाकार स्वर्गीय राधिकाप्रसाद वर्मा ‘नटवर’ ने इस सम्बन्ध में कई चुटीले दोहों की रचना की जैसे:
बीछू लाई हाथ पै, सूँघन लागी ताय
काटै खाओ नाक पै, बस जेइ औटपाय
‘अब भी समझ में नहीं आया हो तो उन्हीं का एक दोहा और सुन लो.’ दुखीलाल जी ने यह कहते हुए पूरे अभिनय के साथ एक दोहा और सुनाया:
कुएँ मुड़ेरे बैठि कैं, पाँव दए लुढ़काय
पीठ मलावैं सौत सैं, बस जेइ औटपाय
उनके इस उदाहरण पर मुझे आश्वस्त होना ही पड़ा और मैंने कहा, ‘मैं समझ गया औटपाय का मतलब।’
‘तो बताओ, क्या समझे?’ दुखीलाल जी ने एक परीक्षक की तरह सवाल किया। मैंने कहा, ‘मैं समझ गया कि आप आये-दिन जो करते रहते हैं, वही औटपाय है।’
‘मैं …! मैं …! मैं क्या करता हूँ …? ‘ मेरी बात पर दुखीलाल जी इस तरह सकपकाये, जैसे चोर की दाढ़ी में तिनका दिख गया हो।
मैंने बताया, ‘कल जब आप साईकिल के साथ दौड़ते-दौड़ते जा रहे थे और मैंने कहा था कि साईकिल पर बैठ क्यों नहीं जाते? तो आपने क्या जवाब दिया था? यही न कि मैं जल्दी में हूँ … टाइम नहीं है …!’ मेरी बात का तो शायद उन्हें बुरा नहीं लगा परन्तु मेरी हँसी उन्हें फिर अखर गयी।
बोले, ‘देखिए, मैं तो आपके ही कहने पर एक अज्ञात शब्द की व्याख्या कर रहा था। परन्तु आप हैं कि हर बात को मज़ाक़ में ले जाते हैं।’
मैं समझ गया कि दुखीलाल जी को मेरी बात का इतना बुरा तो लगा ही है कि वे मुझे बुरा-भला कहने ही वाले हैं। इसलिए मैंने उन्हें बहलाने और बात बदलने के उद्देश्य से कहा, ‘आप ‘नटवर’ जी के ‘औटपाय’ वाले दोहे सुना रहे थे, एकाध और हो जाये।’
मेरी इस बात पर दुखीलाल जी का ग़ुस्सा उबलने से पहले ही ठण्डा हो गया और उन्होंने फिर साभिनय कहा:
ओछे टट्टू बैठि कैं, पाँव दए लटकाय
खुरी करावैं खार में, बस जेइ औटपाय
इससे पहले कि मैं उनसे कुछ और पूछता, उन्होंने आदतन ख़ुद ही पूछ लिया, ‘क्या समझे? नहीं समझे? समझोगे भी नहीं!’
