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भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ जुड़ें ज़रूर।
दूर देस में लेखक-15....

यहां याद आती हैं अपनी मायूस हिंदी किताबें

              लंदन की ट्यूब में यात्रा करते हुए एक दृश्य बार-बार मेरा ध्यान आकर्षित करता है। डिब्बे में बैठे लोग अपने-अपने संसार में डूबे रहते हैं। कोई अख़बार पढ़ रहा है, कोई मोबाइल स्क्रीन पर झुका है, कोई बाहर भागती सुरंग की अंधेरी दीवारों को निहार रहा है। लेकिन इन सबके बीच कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं, जिनकी दृष्टि किताबों के पन्नों पर स्थिर रहती है। स्टेशन आते-जाते हैं, दरवाज़े खुलते-बंद होते हैं, यात्री बदलते रहते हैं, पर किताब और पाठक का यह संबंध निरंतर बना रहता है।

कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है ट्यूब की इस गतिशील दुनिया में किताब एक सूक्ष्म स्थिरता है। बाहर शहर की गति है और भीतर कोई व्यक्ति शांत भाव से किसी लेखक के साथ संवाद कर रहा होता है। न लेखक सामने होता है, न कोई मंच, न विमोचन समारोह, न कैमरे की चमक। फिर भी लेखक और पाठक के बीच एक आत्मीय संवाद निरंतर चलता रहता है।

यही दृश्य मन में हिंदी पुस्तकों के संसार की ओर ध्यान खींचता है। हमारे यहाँ भी पुस्तकें बड़ी संख्या में प्रकाशित होती हैं। लेखक लिखते हैं, प्रकाशक करते हैं, पुस्तक मेले होते हैं, विमोचन समारोह होते हैं, मंच सजते हैं और पुस्तकें सम्मानपूर्वक भेंट की जाती हैं। परंतु इस समूची गतिविधि के बीच एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है, किताब अंततः पाठक तक कितनी दूर पहुँच पाती है?

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हिंदी के साहित्यिक आयोजनों का एक परिचित दृश्य है। किसी लेखक की नयी पुस्तक का विमोचन हो रहा है। मंच पर वरिष्ठ साहित्यकार, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि उपस्थित हैं। लेखक अपनी पुस्तक दोनों हाथों से आगे बढ़ाता है। कैमरे चमकते हैं, तालियाँ बजती हैं। अगले दिन वही चित्र सोशल मीडिया पर दिखायी देता है। लेखक के चेहरे पर वर्षों की साधना के सार्वजनिक स्वीकार का संतोष झलकता है।

पर इसके बाद?

कई बार मुख्य अतिथि को भेंट की गयी पुस्तक मंच पर ही रह जाती है। इसका प्रत्यक्ष कारण राजनैतिक नेताओं या बड़े पद पर आसीन अनुपयुक्त असाहित्यिक लोगों से विमोचन करवाने का मोह होता है। तब पुस्तक कभी किसी मेज़ पर, कभी सभागार से बाहर निकलते ही किसी परिचित को सौंप दी जाती है और कभी वह किसी ऐसी अलमारी में पहुँच जाती है, जहाँ पहले से ही अनेक ‘सौजन्य प्रतियाँ’ अपने पाठक की प्रतीक्षा कर रही होती हैं।

लेखक को इसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। वह यह आशा करता है पुस्तक अवश्य पढ़ी जाएगी। शायद कभी कोई फ़ोन आये, “पुस्तक प्राप्त हुई, पढ़ी, अच्छी लगी।”

परंतु प्रायः ऐसा नहीं होता।

यह बात साधारण प्रतीत हो सकती है, किंतु लेखक के लिए यह केवल एक औपचारिक अपेक्षा नहीं होती। पुस्तक उसके लिए केवल मुद्रित पृष्ठों का संग्रह नहीं होती। उसमें उसका समय, उसकी रचनात्मक बेचैनी, काटे गये वाक्य, संशोधित पृष्ठ, अभिव्यक्ति की संतुष्टि और अनकही पीड़ा समाहित होती है। जब पुस्तक प्रकाशित होती है, तो लेखक को लगता है जैसे उसका एक वैचारिक अंश साहित्य संसार में प्रविष्ट हो गया हो।

इसलिए उसकी उपेक्षा कभी-कभी आर्थिक हानि से अधिक भावनात्मक क्षति बन जाती है।
और तब मन में एक व्यंग्यात्मक विचार उभरता है, हम पुस्तक को बुके की तरह क्यों देने लगे हैं?

बुके का सौंदर्य क्षणिक होता है; वह कुछ समय बाद मुरझा जाता है। जबकि पुस्तक का उद्देश्य मनुष्य के भीतर दीर्घकाल तक जीवित रहना है। बुके के साथ तस्वीर खिंचती है; पुस्तक के साथ जीवन की दिशा बदल सकती है।

इसलिए संभवतः हमारे साहित्यिक आयोजनों को यह सरल वाक्य आत्मसात करना चाहिए, बुके नहीं, बुक दीजिए। परंतु समस्या केवल मंच तक सीमित नहीं है। हिंदी प्रकाशन जगत में ‘सौजन्य प्रति’ एक स्थापित परंपरा बन चुकी है। लेखक अपनी पुस्तक मित्रों, वरिष्ठों, समीक्षकों और शुभचिंतकों को भेंट करता है। इसमें आत्मीयता और सम्मान की भावना निहित होती है, साथ ही यह अपेक्षा भी कि पुस्तक पढ़ी जाएगी।

किन्तु जब यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है और पाठकीय सहभागिता तक नहीं पहुँचती, तो शब्दों का यह सौजन्य अपनी प्रभावशीलता खोने लगता है। किताब विजिटिंग कार्ड बनकर रह जाती है।

कई बार लोग स्वयं पुस्तक की मांग करते हैं। लेखक प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक भेज देता है। फिर लंबे समय तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आती। लेखक यह भी नहीं जान पाता कि पुस्तक पढ़ी गयी या नहीं। वह पूछने से भी संकोच करता है, क्योंकि ऐसा करना कहीं आत्म-प्रशंसा की अपेक्षा जैसा न लगे।

यह सत्य है कि हर पुस्तक पढ़ी नहीं जा सकती, और हर पुस्तक पर प्रतिक्रिया मिलना भी संभव नहीं है। जीवन की व्यस्तताएँ, रुचियों की विविधता और समय की सीमाएँ इसके कारण हैं। फिर भी इतना तो संभव है कि यदि पुस्तक पढ़ने का अवसर न मिले, तो लेखक को यह अवगत करा दिया जाये कि “पुस्तक प्राप्त हुई है, अभी पढ़ नहीं पाया हूँ।”

और यदि पुस्तक पढ़ ली गयी हो, तो दो ईमानदार वाक्य भी लेखक के लिए किसी औपचारिक प्रशंसा से अधिक मूल्यवान हो सकते हैं।

लेखक को निरंतर प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती; वह केवल यह जानना चाहता है कि उसके शब्द किसी पाठक तक पहुँचे हैं।

इस संदर्भ में पाठक की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक पुस्तक खरीदना संभव नहीं, परंतु जिस पुस्तक को पढ़ने की वास्तविक इच्छा हो, उसे खरीदना लेखक के श्रम का सम्मान है। पुस्तक का मूल्य केवल काग़ज़, मुद्रण और जिल्द तक सीमित नहीं होता; उसमें लेखक का समय, संपादक का परिश्रम, डिज़ाइनर की दृष्टि, प्रकाशक का निवेश तथा संपूर्ण प्रकाशन प्रक्रिया शामिल होती है।

लंदन और अमेरिका के अंग्रेज़ी प्रकाशन जगत के अनुभव इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। पुस्तक मेलों और साहित्यिक आयोजनों में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वहाँ लेखक और पाठक के बीच एक सुव्यवस्थित पेशेवर तंत्र सक्रिय रहता है। लेखक के साथ संपादक, प्रकाशक, विपणन विशेषज्ञ, वितरक और एक महत्वपूर्ण कड़ी— लिटरेरी एजेंट उपस्थित रहते हैं।

साहित्यिक एजेंट लेखक की ओर से प्रकाशकों से संवाद करता है। वह पांडुलिपि का मूल्यांकन करता है, उसके संभावित पाठक वर्ग और बाज़ार की संभावनाओं को समझता है, उपयुक्त प्रकाशक से संपर्क करता है, प्रस्ताव प्रस्तुत करता है और अनुबंध की शर्तों पर लेखक की ओर से वार्ता करता है। कई बार अनुवाद, विदेशी संस्करण और अन्य अधिकारों की संभावनाएँ भी इसी माध्यम से विकसित होती हैं।

अमेरिका में साहित्यिक एजेंटों के लिए लगभग 15 प्रतिशत कमीशन सामान्य माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि एजेंट की आय लेखक की सफलता से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है। लेखक की पुस्तक सफल होती है तो एजेंट भी सफल होता है। इस प्रकार दोनों के हित स्वाभाविक रूप से परस्पर संबद्ध हो जाते हैं। वहां लिटरेरी एजेंट का काम पूरा स्वतंत्र व्यवसाय है।

यह व्यवस्था किसी आदर्श स्थिति का प्रतीक नहीं है। अंग्रेज़ी प्रकाशन जगत में भी अस्वीकृति, प्रतीक्षा, प्रतिस्पर्धा और बाज़ार की कठोर वास्तविकताएँ मौजूद हैं। प्रत्येक पांडुलिपि स्वीकार नहीं होती और प्रत्येक लेखक को एजेंट नहीं मिलता। फिर भी लेखक के पास एक पेशेवर मार्ग उपलब्ध होता है, जहाँ उसकी रचना को केवल प्रकाशन के लिए नहीं, बल्कि पाठक तक पहुँचने की संभावना के साथ देखा जाता है।

इसके विपरीत हिंदी के अनेक नये लेखकों के सामने एक भिन्न स्थिति है। उन्हें अक्सर यह भी विचार करना पड़ता है कि “पुस्तक प्रकाशित कराने में कितना व्यय होगा?”

यह अंतर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का भी है।

एक व्यवस्था में पांडुलिपि संभावित साहित्यिक संपदा मानी जाती है, जबकि दूसरी स्थिति में लेखक स्वयं प्रकाशन प्रक्रिया का ग्राहक बन जाने की स्थिति में आ जाता है।

हालाँकि हिंदी प्रकाशन जगत को केवल इस एक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। हिंदी में अनेक गंभीर और पेशेवर प्रकाशक हैं, जो संपादन, वितरण और विपणन में निवेश करते हैं तथा लेखकों को रॉयल्टी भी प्रदान करते हैं। संस्थागत स्तर पर भी रॉयल्टी की स्पष्ट व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में प्रकाशित मूल्य पर 15 प्रतिशत रॉयल्टी का प्रावधान है, और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की कुछ योजनाओं में भी लेखकों के लिए रॉयल्टी निर्धारित है। प्रभात प्रकाशन जैसे महत्वपूर्ण प्रकाशन गृह निरंतर रोचक साहित्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

अतः वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी में अच्छे प्रकाशक हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि लेखक, प्रकाशक, वितरक, पुस्तक-विक्रेता, पुस्तकालय, समीक्षक और पाठक, इन सभी के बीच वह सुदृढ़ और पेशेवर तंत्र कितना प्रभावी है, जो किसी उत्कृष्ट पुस्तक को उसके संभावित पाठक तक पहुँचा सके।

डिजिटल युग ने इस दिशा में कुछ नये अवसर प्रदान किये हैं। ई-बुक, ऑडियो-बुक, ऑनलाइन बिक्री, प्रिंट-ऑन-डिमांड और सोशल मीडिया ने लेखक को भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलने का माध्यम दिया है। परंतु इसके साथ एक नयी चुनौती भी उभरी है। पुस्तक का प्रकाशित होना सरल हुआ है, परंतु उसका पढ़ा जाना अधिक कठिन हो गया है।

आज पुस्तक की प्रतिस्पर्धा केवल अन्य पुस्तकों से नहीं है। उसके सामने मोबाइल, वीडियो सामग्री, सोशल मीडिया, वेब सीरीज़, पॉडकास्ट और सबसे महत्वपूर्ण— पाठक का सीमित समय जैसी चुनौती उपस्थित है।

इसलिए भविष्य में पुस्तक-संस्कृति को केवल लेखक और प्रकाशक की ज़िम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। लेखक को अपनी रचना के पाठक तक पहुँचने की चिंता करनी होगी, प्रकाशक को केवल मुद्रण नहीं बल्कि पुस्तक की यात्रा में सक्रिय निवेश करना होगा, और साहित्यिक संस्थाओं को पुस्तक को औपचारिक आयोजनों से निकालकर वास्तविक पाठकीय जीवन में स्थापित करना होगा।

इसी संदर्भ में, हिंदी के भविष्य की एक महत्वपूर्ण संभावना दिखायी देती है, साहित्यिक एजेंटों की एक सुदृढ़, विश्वसनीय और पेशेवर परंपरा का विकास।

हिंदी के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। यहाँ असंख्य कथाएँ, अनुभव और जीवन के विविध रंग उपलब्ध हैं। आवश्यकता ऐसे पेशेवर सेतु की है, जो लेखक की अभिव्यक्ति को उसके उपयुक्त पाठक तक पहुँचा सके।

यदि कोई साहित्यिक एजेंट किसी नये लेखक की पांडुलिपि का मूल्यांकन करे, उसकी संभावनाओं को पहचाने, आवश्यक संपादकीय सुझाव दे, उपयुक्त प्रकाशक से संपर्क स्थापित करे, अनुबंध और रॉयल्टी पर वार्ता करे तथा अनुवाद और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन की संभावनाएँ भी तलाशे, तो लेखक की स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन संभव है।

वर्तमान में सामान्य हिंदी लेखक स्वयं ही कमोबेश लेखन, संपादन, टंकण, प्रूफ़ रीडिंग, प्रकाशन व्यय, विपणन, वितरण आदि सारे कार्य करता दिखायी देता है, जो दुखद है।

भारत में साहित्यिक एजेंसियाँ इस दिशा में कार्य कर रही हैं और अनुवाद अधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन के क्षेत्र में कुछ सकारात्मक पहल भी दिखायी देती हैं। परंतु हिंदी के विशाल साहित्यिक परिदृश्य की तुलना में यह व्यवस्था अभी प्रारंभिक अवस्था में है। भविष्य में यह केवल एक व्यावसायिक संरचना नहीं, बल्कि हिंदी प्रकाशन जगत की एक आवश्यक आधारशिला बन सकती है।

तब संभवतः कोई युवा लेखक अपनी पांडुलिपि लेकर प्रकाशकों के दफ़्तरों के चक्कर लगाने के बजाय किसी साहित्यिक एजेंट के समक्ष बैठेगा। एजेंट उससे पूछेगा, “आपकी पुस्तक किस पाठक से संवाद करना चाहती है?”

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

क्योंकि प्रत्येक पुस्तक का कोई न कोई पाठक अवश्य है, कभी निकट, कभी दूर, कभी किसी अन्य देश में और कभी लेखक के जीवनकाल के बाद भी। समस्या यह नहीं है कि पाठक नहीं हैं; समस्या यह है कि कई बार पुस्तक और पाठक के बीच समुचित संपर्क स्थापित नहीं हो पाता।

फिर वही लंदन की ट्यूब का दृश्य स्मरण होता है… वहाँ पुस्तक पढ़ता हुआ व्यक्ति किसी लेखक का सम्मान नहीं कर रहा होता, न ही किसी औपचारिक आयोजन का हिस्सा होता है। वह केवल पढ़ रहा होता है। वह स्वयं की बौद्धिक भूख को आहार दे रहा होता है।

पुस्तक उसके हाथ में होती है और उसका समय पुस्तक के साथ होता है। संभवतः हिंदी पुस्तक संसार का भविष्य भी इसी सहज दृश्य में निहित है। जहाँ पुस्तकें केवल विमोचन के लिए नहीं, बल्कि पढ़े जाने के लिए प्रकाशित हों; जहाँ लेखक उन्हें वितरित करने के बजाय पाठक उन्हें खोजें; जहाँ प्रकाशक केवल मुद्रक न होकर पुस्तक यात्रा के सहयात्री बनें; जहाँ साहित्यिक एजेंट लेखक और प्रकाशक के बीच विश्वास का सेतु हों; और जहाँ पाठक पुस्तक को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि साहित्यिक सहभागिता के रूप में देखें। तब ‘सौजन्य प्रति’ भी अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त कर सकेगी, वह किसी अलमारी में उपेक्षित पुस्तक नहीं, बल्कि किसी मन तक पहुँची हुई रचना होगी।

और लेखक को अपनी पुस्तक भेंट करते समय यह संशय नहीं रहेगा कि वह कहाँ जाएगी। उसे यह विश्वास होगा कि पुस्तक की अपनी एक नियति है। वह अपने पाठक तक अवश्य पहुँचेगी।

लंदन की ट्यूब में पुस्तक पढ़ते हुए उन अनजान चेहरों को देखकर यह स्पष्ट हुआ कि पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका विमोचन नहीं, बल्कि उसका पाठ है। मंच पर तालियाँ क्षणिक होती हैं, कैमरे की चमक अल्पकालिक होती है, परंतु पाठक की चेतना में उतर गया एक वाक्य वर्षों तक जीवित रह सकता है।

किसी लेखक के लिए सबसे बड़ा सम्मान शायद यही है कि कोई अपरिचित व्यक्ति उसकी पुस्तक खोलकर पढ़ना आरंभ करे और कुछ समय बाद उसे यह अनुभव हो कि दुनिया पहले जैसी नहीं रही।

पुस्तक का वास्तविक विमोचन मंच पर नहीं होता। वह तब होता है, जब कोई पाठक उसका पहला पृष्ठ खोलता है। और संभवतः हिंदी की पुस्तकों को आज सबसे अधिक इसी क्षण की प्रतीक्षा है…. वास्तविक पाठक की।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

1 comment on “यहां याद आती हैं अपनी मायूस हिंदी किताबें

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