अंक – 54
  • August 14, 2026
  • आब-ओ-हवा
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अंक – 54

आब-ओ-हवा – अंक - 54

भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की एक और ख़ास कड़ी- जिसमें ग्राउंड रिपोर्ट, विश्लेषण, चिंतन, व्यंग्य, डायरी, प्रतिक्रिया, संस्मरण आदि के ज़रिये चर्चा है देश की, देश की फ़िक्र की, देश के इतिहास की और कला, साहित्य की… हिंदी पत्रकारिता के 200 बरस होने के मौक़े पर अनुभवी पत्रकार के क़लम से एक नयी शृंखला। हिंदी के मशहूर एवं सम्मानित लेखक से ख़ास बातचीत और अपने तेवरों, प्रासंगिकताओं और वैचारिकताओं के साथ साहित्य, कला, परिवेश पर 15 नियमित ब्लॉग्स (चार ब्लॉग स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में) और विश्व साहित्य, लेखन और ग़ज़ल की क्लास, किताबों की बातें, सिनेमा की ख़ास कहानियां और…

नया साप्ताहिक सिलसिला: ख़बरनामा-200

फ़न की बात

आज़ादी का ऑडिट

मुआयना

ब्लॉग : हम बोलेंगे (संपादकीय)
ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?: भवेश दिलशाद

ब्लॉग : बियॉण्ड द ब्रेन
एआई को प्लीज़ थैंक्स कहना छोड़िए: ए. जयजीत

ब्लॉग : तत्वान्वेषण
किस बंकर में जाये परमाणु ख़तरे से डरी धरती?: विवेक रंजन श्रीवास्तव

ब्लॉग : Truth in हेल्थ
प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ के मन में: डॉ. आलोक त्रिपाठी

सिनेमायने

ब्लॉग : 25 बरस 25 फ़िल्में
‘मुल्क’ से बदलते सिनेमा का अनुभव: मानस

ब्लॉग : सिनेमा: विश्वकथा
सिनेमा को ‘वैचारिक’ बनाने वाला पहला फ़िल्मकार: चारु शर्मा

ग़ज़ल रंग

ब्लॉग : जो है सो है
हिंदी ग़ज़ल के गिरोह की भावना: ज्ञानप्रकाश पांडेय

ब्लॉग : राज़ल: लौ और धुआं
सात दशक बाद भी रही आस की आस: आशीष दशोत्तर

किताब कौतुक

ब्लॉग : क़िस्सागोई
राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ और हिन्दी-उर्दू विवाद: नमिता सिंह

ब्लॉग : उर्दू के शाहकार
जंग-ए-आज़ादी, आज़ादी और उर्दू शायरी: डॉ. आज़म

सदरंग

नया ब्लॉग : प्रतिच्छाया
इतिहास बकवास है!: सलीम सरमद

ब्लॉग : लेखन क्या है?
लेखन: दस्तावेज़ीकरण नहीं, जीवन प्रवाह: डॉ. संजीव

ब्लॉग : तह-दर-तह (विश्व साहित्य)
क्यों पढ़ना चाहिए ‘डेथ इन वेनिस’?: निशांत कौशिक

ब्लॉग : चींटी के पर
सिकंदर के देश में-2: रति सक्सेना

ब्लॉग : रंग-बिरंगी
नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-9: विवेक मेहता

3 comments on “अंक – 54

  1. हमेशा की बहुरंगा
    आपकी मेहनत नजर आ रही है

  2. भारत से कैलिफोर्निया चली आई और वह आबोदाना वहीं छूट गया; पर शशी खरे जी ने वहाँ की “आबोहवा” भेज दी। लगा, गहरी साँसें लेकर उसकी ठंडक कलेजे तक पहुँचा लूँ। धन्यवाद शशी! गौरवान्वित हो रही हूँ कि तुमने एक बुद्धिजीवियों वाली पत्रिका मुझे दी। अभी केवल उलटा पलटा है। पढ़ूँगी और पढ़वाऊँगी।

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