
- October 12, 2026
- आब-ओ-हवा
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पंकज निनाद सोनी की कलम से....
'उपद्रव' का नया टेंडर और लोकतंत्र का कबाड़खाना
जब भी इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, एक सवाल बड़ा सालता है कि आख़िर पानीपत की लड़ाइयों से लेकर प्लासी के युद्ध तक, और फिर दो सौ सालों की मुकम्मल ग़ुलामी तक, मुट्ठी भर अंग्रेज़ों ने इतने विशाल मुल्क पर राज कैसे कर लिया?
जवाब अंग्रेज़ों के बंदूक़-बारूद में कम, हमारे भीतर मौजूद ‘आंतरिक सहयोगियों’ के हुनर में ज़्यादा छिपा था। अंग्रेज़ों ने कोई बहुत अनोखी खोज नहीं की थी; उन्होंने बस स्थानीय मुख़बिरों, चाटुकारों और समाज को बाँटने वाली ताक़तों का ऐसा कुटीर उद्योग खड़ा किया जो दिन-रात देशवासियों को यह समझाने में जुटा था कि ‘गोरे साहब ही तुम्हारे असली माई-बाप हैं।’
आंदोलनों को बदनाम करना हो, सत्याग्रहियों के चरित्र पर कीचड़ उछालना हो, या शांतिपूर्ण भीड़ में पत्थर फिंकवाकर उपद्रव का ठीकरा बेचारों के सिर फोड़ना हो—यह सारा हुनर उसी दौर की देन है।
इतिहास का आधुनिक री-लॉन्च
अगर आप सोच रहे हैं यह दो सौ साल पुरानी बातें इतिहास के पन्नों में दफ़न हो चुकी हैं, तो आप इस दौर के सबसे मासूम नागरिक हैं।
आज के डिजिटल और ‘न्यू इंडिया’ के दौर में वही औपनिवेशिक हथकंडे नयी पैकेजिंग के साथ पेश किये जा रहे हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहले जो काम मुख़बिर और टिन की भोंपू लेकर किया जाता था, आज वही काम करोड़ों रुपये के बजट वाले ‘IT सेल’ और ‘गोदी मीडिया’ के वातानुकूलित स्टूडियो में होता है।
हालिया आंदोलनों के दौरान लाठियों, डंडों से भरे वाहन अगर दिख जाएं तो यह न सोचिएगा कि कोई मासूम व्यापारी होगा। या फिर बग़ैर नेमप्लेट वाली वर्दी पहने डंडेधारी दिख जाएं तो बग़ैर कुछ सोचे हुए ही आगे बढ़ जाइएगा क्योंकि इतनी अंधेरगर्दी थोड़े है कि पुलिस या सशस्त्र बल के अलावा छद्म वर्दीधारी भीड़ ‘छावनी’ या प्रतिबंधित बना दिये गये क्षेत्र में मौजूद हो। अगर सड़क किनारे अचानक पत्थरों से भरा ट्रक पार्क मिल जाये, तो हैरान मत होइए। वह किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी की लापरवाही नहीं, बल्कि ‘उपद्रव का सामान’ ऑन-डिमांड उपलब्ध करवाने की सुव्यवस्थित व्यवस्था है।

इसी बीच, अगर नगर निगम की गाड़ी शांतिपूर्ण आंदोलन स्थल के बीच सड़क पर कचरा उलीच दे और फिर कैमरा-दल चिल्लाने लगे कि ‘देखिए, इन देशद्रोहियों ने शहर को कितना गंदा कर दिया है’, तो इसे सफ़ाई कर्मचारियों की भूल मत समझिए—यह दृश्य-काव्य की वह विधा है जिसे आंदोलनों का चरित्र-हनन करने के लिए विशेष रूप से रचा गया है।
मीडिया का दिव्य कायाकल्प
इसी देश ने 2011 का वह दौर भी देखा है, जब दिल्ली के रामलीला मैदान में गांधीवादी टोपी पहने अन्ना हज़ारे बैठते थे और मीडिया का हर कैमरा उनके अनशन के साथ देश की सांसें गिनता था। तब सत्ता से सवाल पूछना देशसेवा थी और आंदोलन लोकतंत्र की ख़ूबसूरती।
लेकिन 2014 के बाद एक अलौकिक चमत्कार हुआ!
मीडिया ने अचानक अपनी पुरानी ज़िम्मेदारियाँ त्याग दीं और ‘सत्ता का रक्षक’ बनने की दीक्षा ले ली। बड़े-बड़े पूँजीपतियों के पैसे और केंद्रीय एजेंसियों के ‘प्रसादी’ चाबुक के दम पर मीडिया हाउसों का हृदय परिवर्तन कराया गया। नतीजा?
- अपनी जायज़ माँगों के लिए महीनों सड़कों पर कड़ाके की ठंड झेलने वाला किसान अचानक ‘खालिस्तानी’ और ‘आतंकवादी’ घोषित हो जाता है।
- हक़ माँगता युवा ‘उपद्रवी’ और ‘दिशाहीन’ बता दिया जाता है।
- और जो कोई सरकार की नीतियों से असहमत हो, उसके लिए ‘देशद्रोही’ का ठप्पा चौबीसों घंटे तैयार रहता है।
इतिहास में शायद यह पहला प्रयोग है जहाँ जनता को जनता के ही ख़िलाफ़ इतनी सफ़ाई से खड़ा कर दिया गया है। पड़ोसी को पड़ोसी से लड़ाने का जो सपना अंग्रेज़ों ने देखा था, आज का राजनीतिक तंत्र उसे पूरी निष्ठा और वैज्ञानिकता के साथ पूरा कर रहा है।
लोकतंत्र बनाम कॉरपोरेट-राज
अंग्रेज़ों के पास ईस्ट इंडिया कंपनी थी, आज के आधुनिक आक़ाओं के पास अपने चहेते कॉरपोरेट घराने हैं। तब भी मुख़बिरी और छद्म तरीक़ों से जन-आंदोलनों की रीढ़ तोड़ी जाती थी, आज भी पत्थरों की गाड़ियों, कचरे की ट्रॉलियों और ट्रोल आर्मी के ज़रिये जनाक्रोश को ‘कुचलने का टेंडर’ जारी किया जाता है।
पर इस पूरी पटकथा में सत्ताधीश एक छोटी-सी बात भूल जाते हैं—इतिहास गवाह है कि छल-प्रपंच, मीडिया का एकतरफ़ा प्रचार और मुख़बिरों की फ़ौज आंदोलनों की रफ़्तार को कुछ समय के लिए धीमा तो कर सकती है, लेकिन जब जनता का सब्र टूटता है, तो इतिहास की झाड़ू इन सारे छद्म ढाँचों को बुहारकर लोकतंत्र के कूड़ेदान में फेंक देती है।
कथनी-करनी का अंतर और नया नारा
सरकार के ‘समग्र स्वच्छता अभियान’ की पोल ऐसे ही वीडियो खोल रहे हैं, जहाँ जन-आंदोलन को नीचा दिखाने के लिए ख़ुद सरकारी मशीनरी ही गंदगी फैलाने का ज़रिया बन जाती है।
आम तौर पर जब हमारे मोहल्लों में कचरा गाड़ी आती है, तो एक मशहूर गाना बजता है:
“गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल!”
लेकिन जंतर-मंतर बंद के बाद दिल्ली के इस विडंबनापूर्ण दृश्य और व्यवस्था के दोहरे रवैये को देखकर जनता के मन में एक दूसरा ही करारा गीत जन्म लेता है:
“दाढ़ी वाला आया, घर से झाड़ू निकाल!”
कचरा सड़क पर गिराने वालों को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता का निर्णय जब आता है, तो सफ़ाई सबसे पहले सत्ता के गलियारों की होती है।

पंकज निनाद
पेशे से लेखक और अभिनेता पंकज निनाद मूलतः नाटककार हैं। आपके लिखे अनेक नाटक सफलतापूर्वक देश भर में मंचित हो चुके हैं। दो नाटक 'ज़हर' और 'तितली' एम.ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में भी शुमार हैं। स्टूडेंट बुलेटिन पाक्षिक अख़बार का संपादन कर पंकज निनाद ने लेखन/पत्रकारिता की शुरूआत छात्र जीवन से ही की थी।
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