
- October 11, 2026
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
नवी पिल्ले: न्याय की संघर्ष-यात्रा को नोबेल
शांति का अर्थ केवल युद्ध का समाप्त हो जाना नहीं है। शांति तब सार्थक होती है, जब हर व्यक्ति को न्याय मिले। कमज़ोर और वंचित लोगों के अधिकार सुरक्षित हों। शक्तिशाली व्यक्ति भी क़ानून के प्रति जवाबदेह हो।
दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद् नवी पिल्ले का जीवन इसी विचार का उदाहरण है। वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार घोषित हुए तो, उनका नाम चर्चा में आया। वास्तव में उनके जीवन और कार्य को समझना मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय न्याय की महत्ता को समझना है।
नवी पिल्ले का जन्म 1941 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। वे भारतीय तमिल मूल परिवार से हैं। उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था लागू थी। नस्ल के आधार पर लोगों के अधिकार तय होते थे। अश्वेत नागरिकों को अनेक बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जाता था। ऐसे वातावरण में नवी पिल्ले ने क़ानून की पढ़ाई की और वकालत को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं और राजनीतिक बंदियों के अधिकारों की पैरवी की। उनका विश्वास था कि क़ानून का वास्तविक उद्देश्य केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि अन्याय के शिकार लोगों को न्याय दिलाना है।
1995 में वे दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली पहली अश्वेत महिला न्यायाधीश बनीं। उसी वर्ष उन्हें रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में नियुक्त किया गया। रवांडा में 1994 के नरसंहार के दौरान लाखों लोग हिंसा के शिकार हुए थे। इस त्रासदी के ज़िम्मेदार लोगों को न्याय के सामने लाना, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बड़ी चुनौती थी।
नवी पिल्ले ने इस न्यायाधिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके कार्यकाल में यह सिद्धांत मज़बूत हुआ कि किसी समुदाय को नष्ट करने के उद्देश्य से की गयी यौन हिंसा भी नरसंहार के अपराध का हिस्सा हो सकती है। यह अंतरराष्ट्रीय न्याय के इतिहास में महत्वपूर्ण प्रगति थी।
इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। वर्ष 2008 में वे संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त नियुक्त हुईं और 2014 तक इस पद पर रहीं। इस दौरान उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और कमज़ोर समुदायों के अधिकारों जैसे विषयों पर काम किया। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था। मानवाधिकार किसी सरकार की कृपा से मिलने वाली सुविधाएँ नहीं हैं, वे प्रत्येक मनुष्य की गरिमा से जुड़े मूल अधिकार हैं।

इस सन्दर्भ में नवी पिल्ले के योगदान को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानून की भूमिका समझना ज़रूरी है। जब किसी देश में शक्तिशाली व्यक्ति को अपराध के लिए जवाबदेह नहीं बनाया जाता, तो पीड़ित का व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। यही स्थिति देशों के बीच भी पैदा हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय क़ानून युद्ध अपराधों, नरसंहार और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए ज़िम्मेदारी तय करने का आधार देता है। हालाँकि क़ानून अपने आप सभी युद्ध नहीं रोक सकता, लेकिन उसके बिना ताक़तवर देशों और व्यक्तियों की मनमानी पर अंकुश लगाना और कठिन हो जाता है।
नवी पिल्ले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील मामलों में भी काम किया है। उन्होंने इज़राइल और फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जाँच आयोग की अध्यक्षता की। म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के विरुद्ध कथित नरसंहार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के मामले में भी उनकी भूमिका रही है। इन मामलों में विभिन्न पक्षों के मत अलग-अलग हैं। इसलिए आरोपों, जाँच रिपोर्टों और न्यायालय के अंतिम निर्णयों के बीच अंतर समझना आवश्यक है। किसी जाँच रिपोर्ट को अपने आप अंतिम न्यायिक फ़ैसला नहीं माना जा सकता।
इस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया भी चर्चा का विषय बनी हुई है। वे लंबे समय से इस पुरस्कार पर अपना दावा जताते रहे हैं। 9 अक्टूबर को नवी पिल्ले के नाम की घोषणा के बाद ट्रंप ने पुरस्कार समिति के निर्णय की फिर आलोचना की। उन्होंने इसे निराशाजनक बताया और कहा कि उनके प्रयासों के बावजूद उन्हें यह सम्मान नहीं मिला। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, उन्होंने नॉर्वे की भी आलोचना की।
यह प्रसंग एक महत्वपूर्ण अंतर सामने लाता है। पुरस्कार पाने की इच्छा और उसके योग्य माने जाने के बीच फ़र्क होता है। ट्रम्प ने पिछले वर्ष भी पाकिस्तान जैसे देशों से स्वयं को सौदेबाज़ी करते हुए नामांकित करवाया था। नोबेल शांति पुरस्कार किसी व्यक्ति की राजनीतिक शक्ति या सार्वजनिक दावेदारी के आधार पर नहीं दिया जाता। निर्णय नॉर्वेजियन नोबेल समिति करती है। किसी शक्तिशाली नेता की नाराज़गी के बावजूद घोषित परिणाम को बदलने का कोई सार्वजनिक संकेत नहीं मिला है। इसे संस्थागत स्वतंत्रता और जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण दृष्टि से देखा जा सकता है।
नवी पिल्ले का जीवन हमें बताता है कि बदलाव के लिए हमेशा किसी सेना, सरकार या बड़े राजनीतिक पद की आवश्यकता नहीं होती। एक वकील की दलील, न्यायाधीश का निष्पक्ष निर्णय और पीड़ित के पक्ष में उठायी गयी आवाज़ भी इतिहास की दिशा बदलने में योगदान दे सकती है।
आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाएँ सामने आती हैं, तब उनकी जीवन यात्रा प्रासंगिक हो उठती है। यह हमें याद दिलाती है कि शांति केवल हथियारों के शांत हो जाने से स्थापित नहीं होती। इसके लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था, क़ानून का सम्मान और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा की रक्षा आवश्यक है।
न्याय के बिना शांति अधूरी है। जब कमज़ोर व्यक्ति को भी न्याय मिलने का भरोसा हो और शक्तिशाली व्यक्ति भी क़ानून से ऊपर न हो, तभी शांति की नींव मज़बूत होती है। नवी पिल्ले को मिला 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार इसी विचार को रेखांकित करता है। और ट्रंप की प्रतिक्रिया के बीच यह प्रसंग एक और सवाल छोड़ता है, क्या सम्मान का वास्तविक मूल्य उसे पाने की इच्छा में है, या उस काम में जिसके लिए दुनिया उसे याद रखती है?

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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