
गूंज बाक़ी… सत्यजीत रे (02.05.1921-23.04.1992) की याद के दिन एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़। 1980 में नैशनल बुक ट्रस्ट से छपी किताब ‘सत्यजीत राय का सिनेमा’, लेखक चिदानंद दास गुप्ता और अनुवादक अवध नारायण मुद्गल। इस किताब में पाथेर पांचाली से चर्चा शुरू करने से पहले एक अध्याय है ‘पहचान की समस्याएं’। यह एक तरह से रे के सिनेमा में आगमन की भूमिका बताता है। धरोहर पुस्तक में शामिल इस विस्तृत लेख का एक अंश यहां साभार प्रस्तुत…
जब सिनेमा बेकरार था कि सत्यजीत रे आएं
1929 में, शिशिर कुमार भादुड़ी (बंगाली व्यावसायिक मंच के सुप्रसिद्ध अभिनेता) के भाई मुरारी को एक पत्र के जवाब में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सिनेमा पर कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उनका अनुवाद इस प्रकार होगा:
“कला में रूप प्रयुक्त माध्यमों के अनुसार बदल जाते हैं। मैं जानता हूं कि चलचित्र के बीच से जिस नयी कला के विकसित होने की अपेक्षा हो सकती थी, वह अभी उदित नहीं हुई है। राजनीति में हम स्वतंत्रता के लिए सक्रिय हैं, कला में भी हमें वही करना चाहिए। प्रत्येक कला उस दुनिया के भीतर जिसे वह रचती है, अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्र शेली प्राप्त करने की कोशिश करती है। अन्यथा स्वयं में आत्मविश्वास की कमी के कारण इसकी आत्माभिव्यक्ति अपस्तरीय रह जाती है। सिनेमा अब तक साहित्य के ग़ुलाम के रूप में काम कर रहा है क्योंकि अभी तक कोई ऐसा रचनाशील प्रतिभासंपन्न व्यक्ति सामने नहीं आया है, जो इसे इसकी ग़ुलामी से मुक्त करे। मुक्ति का यह काम आसान नहीं होगा क्योंकि काव्य, चित्रकला या संगीत में साधन महंगे नहीं होते जबकि सिनेमा में व्यक्ति को केवल रचनात्मकता की ही नहीं, बल्कि वित्तीय पूंजी की भी ज़रूरत होती है।
सिनेमा में महत्वपूर्ण चीज़ आकृतियों का प्रवाह होता है। इसकी दृश्य गति इतनी समृद्ध होनी चाहिए कि वह शब्दों के प्रयोग के बिना ही अपना पूर्ण अर्थ देने में सक्षम हो। जब एक भाषा का अर्थ लगातार दूसरी भाषा के द्वारा प्रकट किया जाता है, तो इससे केवल यह प्रदर्शित होता है कि पहली भाषा का प्रयोग कितना अशक्त है। संगीत अपने स्वरों के स्वायत्त प्रभाव से अपने आप को पूर्णता प्रदान करता है, बिना शब्दों की मदद लिये। ऐसा सिनेमा में क्यों नहीं हो सकता, आकृतियों के प्रवाह के साथ? यदि ऐसा नहीं होता तो इसका कारण रचनात्मकता का अभाव है- और उन सुस्त दर्शकों की असंवेदनशीलता, जो सस्ता रोमांच तलाश करते हैं क्योंकि उन्होंने आनंद का अधिकार अर्जित नहीं किया है।”
पहचान की कला जिसने भारत में साहित्य और अन्य कलाओं को नया जीवन दिया, सिनेमा में शुरू नहीं हुई थी और न इस माध्यम की समझ विकसित हुई थी। स्वयं फ़िल्म निर्माताओं के मन में उनके अपने काम के प्रति सम्मान का भाव नहीं था और उन्होंने फ़िल्मों को भावी पीढ़ियों की ख़ातिर सुरक्षित रखने के लिए भी बहुत कम काम किया था। सांस्कृतिक रूप से भी फ़िल्म निर्माता समुदाय अर्घविकसित था और उनके काम में उस रचनात्मकता की विशेष कमी थी, जो सांस्कृतिक बाधाओं को पार कर सकती और अन्य कलाओं में दिखायी देने वाले उच्च स्तरीय पूर्व-पश्चिम संश्लेषण का प्रतिनिधित्व कर सकती।

ज्यां रनोए (Jean Renoir) कहा करते थे, अपनी फ़िल्म “द रिवर” की योजना बनाने के लिए और फिर 1948-49 में कलकत्ता में उसके फ़िल्मांकन के लिए, अपने कलकत्ता प्रवास के दौरान उन्होंने सत्यजीत राय की पश्चिमी कला और सभ्यता की समझ को आश्चर्यजनक पाया। वस्तुतः राय की सांस्कृतिक विरासत का निर्माण भारतीय और पश्चिमी परंपराओं के समृद्ध सम्मिश्रण से हुआ था, जिसे टैगोर घराने के साथ निकटता और अपने दादा तथा पिता की रचनात्मक प्रतिभा से धार मिली। इसमें उन्होंने एक महत्वपूर्ण तार पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के प्रति जीवनपर्यंत लगाव से जोड़ा। शायद यही तत्व संरचना, रूप और लय की उनकी समझ का मुख्य निर्धारक था। ब्रिटिश और स्वातंत्र्योत्तर काल में भारत में सामाजिक और कलात्मक विकास के थिएटर की परंपरा में यह पश्चिमी और आधुनिक मूल्यों की उनकी समझ थी, जिसने सिनेमा के माध्यम में उनकी गहरी पैठ पैदा की और समान रूप से समृद्ध भारतीय परंपरा की समझ के साथ पश्चिम की समझ के सम्मिश्रण ने उनमें अपने लोगों के पुनः अन्वेषण की ललक स्वयं उनके लिए और अपने चुने गये माध्यम के लिए, जगायी। जब भी उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने फ़िल्म निर्माण कैसे सीखा, तो उनका उत्तर होता था: पश्चिम की फ़िल्मों को देख-देखकर।
जब लिंड्से एंडरसन ने राय के बारे में उनके रेत में घुटनों के बल झुक जाने की बात कही तो उन्होंने एक क्षेत्रीय यथार्थ से पाथेर पांचाली की मुठभेड़ में अभिव्यक्त एक सार्वभौमिक सत्य के साथ साक्षात्कार किया था। उस समय बंगाली गांव के बारे में राय का प्रत्यक्ष अनुभव बहुत कम था। वह गांव को प्रतीकात्मक व्याख्याओं और साहित्य में आये आदिरूप संबंधों के माध्यम से समझते थे। यह ग्राम्य समाज की उनकी जानकारी नहीं बल्कि उसे जानने की उनकी ललक थी, जिसने पर्दे पर इसे जीवन्त बना दिया। विभूति भूषण बंद्योपाध्याय ने, जो उस समय तक एक अज्ञात लेखक थे, अपने असाधारण प्रथम उपन्यास के लिए अपने स्वयं के अनुभवों का सहारा लिया। राय ने अपनी प्रथम फ़िल्म का निर्माण एक ऐसे अज्ञात फ़िल्म निर्देशक के रूप में किया, जो लेखक की तुलना में ग्राम्य जीवन या निर्धनता के बारे में बहुत कम जानता था। जो उन्होंने किया, वह उनकी अपनी शिक्षित शहरी मध्यवर्ग की कमोबेश पश्चिमीकृत पीढ़ी के लिए शेष आधी ज़िंदगियों के पुनः अन्वेषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हुआ। यह काम उन्होंने अनंत करुणा के साथ और ऐसी सिनेमाई भाषा में किया, जो भारत में अब तक अज्ञात थी।
पाथेर पांचाली सिनेमाई भाषा और इसकी भारतीयता दोनों ही दृष्टियों से पहले कहीं न दिखायी देने वाली पूर्णता और आवेग को दशाने वाले भारतीय सिनेमा की शुरूआत की प्रतीक बनी। इसने पहली बार सिनेमा पर पूर्व-पश्चिम संश्लेषण के दृष्टिकोण को आरोपित किया, उस संश्लेषण को जिसने परंपरागत कलाओं में नया जीवन संचार किया। आज के शिक्षित भारतीय को अपनी उस नाभि-नाड़ी की तलाश की ज़रूरत है, जो उसे स्वयं उसकी अपनी परंपरा और सामान्य आदमी के साथ जोड़े और उसे एक शरणार्थी होने से बचाये। राय की प्रथम फ़िल्म ने उसे अधिकार प्राप्त होने के अपराध बोध से मुक्त होने का रास्ता दिखाया। इनमें से बहुत-सी प्रवृत्तियां नये भारतीय सिनेमा का अंग बन गयी हैं और पहचान की कमी वाली व्यावसायिक फ़ार्मूला फ़िल्मों के विरुद्ध प्रतिवाद का अंग भी बन गयी हैं।
अखिल भारतीय फ़िल्में आज भी उपनामों, क्षेत्रीय वेशभूषाओं और भौगोलिक अवस्थितियों से बच सकती हैं और एक ऐसी सतही सर्व-साधारणता को बनाये रखती हैं जिसकी अपनी कोई जड़ें नहीं होतीं। ये फ़िल्में अभी भी नक़ल पर चलती हैं, इनमें मिथक या अतिनाटकीयता की सचेष्ट समझ नहीं है। ये केवल लोक रूपों की नक़ल मिला देती हैं, जो पारसी थिएटर के ग़ैर-व्याख्यात्मक प्रकार के प्रदर्शन और रवि वर्मा की पेंटिंग जैसे परिणाम देती हैं। ये दो प्रमुख तत्व हैं जो भारतीय दृश्य और अभिनय प्रदर्शन परंपरा में विच्छेद का कारण बने। यह रवि वर्मा के बाद ही है कि हमारी पेंटिंग में भारतीयता का सवाल उठा। रवि वर्मा उस बंग्ला स्कूल के भयंकर व्यक्ति थे, जिसने फीकी बुद्धिवादी ब्रिटिश पेंटिंग के प्रतिशोधक रूप का उतनी ही तीव्रता से विरोध किया जितना कि अपने ही स्कूल के पूर्व चित्रकारों के ललकपूर्ण पुनर्जागरण का किया। गगनेन्द्रनाथ, रवीन्द्रनाथ, विनोद बिहारी और राम किंकर के कामों ने परंपरावाद और साथ ही पश्चिमीकरण से नयी मुक्ति का अहसास कराया।
सिनेमा में फालके के बाद की धारा सामाजिक फ़िल्मों की ओर उस धर्म-पुराण से अलग हुई जिसे स्वयं फालके ने अपनाये रखा था। शांताराम और विनायक ने ऐसी फ़िल्में बनायीं जिनके स्वर में आधुनिकतावादी झुकाव परिलक्षित था। यह स्वर देश की उस आकांक्षा से जुड़ा हुआ था जो अपनी संस्कृति के समकालीनीकरण के लिए थी। इसके बावजूद एक माध्यम के रूप में सिनेमा की उनकी समझ अपर्याप्त थी। विविध प्रकार के सिनेमा के आधारभूत निर्माण तत्व के रूप में जीवन का यथार्थपरक अंश इसमें समाविष्ट नहीं हुआ। यथार्थ के ऊपर पौराणिकता वर्चस्व बनाये हुए थी। शैली और वक्तव्य की भारतीयता के साथ सिनेमा की यथार्थवादी शब्दावली के विलय को सत्यजीत राय के आगमन की प्रतीक्षा थी।
