दिव्या जैन, divya jain
मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर एक विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का यादगार कथानक लिख चुके हस्ताक्षरों की कहानी, उन्हीं की जुबानी। इस सिलसिले में दूसरी दास्तान एक स्वतंत्र चेता स्त्री की, जिसने मुश्किल जीवन जीते हुए सरोकारों की पत्रकारिता में श्रीवृद्धि की और प्राण-प्रण से सक्रिय हैं।
दिव्या जैन की कलम से....

मेरे भीतर की स्त्री

           (एक)
           ज़िन्दगी के कई पड़ावों से गुज़रते हुए एक स्त्री को स्त्री होने का अहसास शायद अनगिनत बार होता है- कभी अच्छे तो कभी बुरे अर्थ में। कभी यह बहुत हल्का होता है और कभी तीखा। कई बार यही असहनीय हो जाता है, चुभता है, दर्द देता है। मुझे लगता है कि जब स्त्री होने के अनुभव के साथ मजबूरी या लाचारी जैसे अहसास हो जाएं, तब यदि उसका परिवार उस कठिन परिस्थिति में उसके साथ खड़ा रहता हो, तो जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी मुसीबतों में अकेले होने का अहसास ख़त्म तो नहीं होता मगर कम हो जाता है। वह ताक़त के साथ खड़ी हो पाती है। लेकिन अमूमन स्थितियाँ इसके उलट होती हैं और इसीलिए स्त्रियाँ अपने आपको बेहद अकेला पाती हैं। वे अपने स्त्री होने के ज़बरदस्त अहसास के तले दब जाती हैं, और अपने स्त्री होने को ताउम्र कोसती रहती हैं।

दिव्या जैन, divya jain, mere hisse ka qissa

मैं भी स्त्री होने के अहसास से गुज़री हूं। इसने प्रफुल्लता का अहसास कराया है, वहीं गहरी पीड़ा का भी। हम समाज में बहुत सारी पारिवारिक, सामाजिक, पेशेवर भूमिकाओं में आते-जाते रहते हैं। इन भूमिकाओं को बरतते हुए अगर समानता का बर्ताव मिलता रहे तो स्त्री होने का अहसास हल्का हो जाता है। जैसे कि हम हमेशा याद नहीं रखते कि हम सांस ले रहे हैं या हमारी त्वचा क्या महसूस कर रही है। मैंने अपने लंबे जीवन में स्त्री का अकेलापन भी महसूस किया है। मगर एक पत्रकार व लेखक के रूप में मेरा सामाजिक जीवन भी रहा है। इस दौरान बहुत-सी स्त्रियों के भीतर झांकने का मौक़ा मिला।

आज मुझे लगता है ये स्त्रियां कभी चुपके-से मेरे भीतर दाख़िल होती गयीं। मेरी स्त्री के भीतर मैं अकेली नहीं हूं। बहुत सारी स्त्रियां हैं। उनके अधूरे स्वप्न हैं। उनकी आवाज़ें हैं। कातर स्वर में पुकारती हुई, हंसती हुई, गाती हुई। मुसीबतों के पहाड़ से लड़ते हुए तो कभी टूटते हुए। मेरे भीतर को अब इन स्त्रियों की आवाजाही से अलग नहीं किया जा सकता। कई बार जब मैं ख़ुद को अकेला महसूस करने लगती हूं या बिखरने लगती हूं तब इन स्त्रियों की मार्मिक गाथाएं मेरे भीतर बोलने लगती हैं। मेरी ज़िंदगी के अंधेरे कोनों से उभरती हुई इन स्त्रियों की आंखें मुझे ताक़त दे जाती हैं।

सच पूछिए तो कभी-कभी लगता है मुझे अपने बारे में सोचने का वक़्त ही नहीं मिला। ऐसा क्यों हुआ? यह सवाल जब मैं अपने आपसे पूछती हूँ तो भीतर से जवाब मिलता है कि संघर्ष करना ही तुम्हारी नियति है। जिस परिवार में पली-बढ़ी, वहाँ भाई-बहनों में मेरा नंबर छठा है? और मुझसे दस साल छोटी मेरी बहन लवलीना, जो कि मानसिक रूप से भिन्न-क्षम रही, जन्म से ही।

संघर्ष हर मनुष्य के जीवन में होता है बल्कि संघर्ष के बिना जीवन संभव ही नहीं है। मैं अपनी बात कहूँ तो छोटी बहन की मानसिक भिन्न-क्षमता की वजह से मुझे मेरे जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन मेरे भीतर एक ऐसी शक्ति है, साहस है, हिम्मत है जिसके बूते अपने आपको संभाल लेती हूँ। अपने मनोबल को टूटने से बचाने का लगातार प्रयास करती हूं। वरना अपने आप को संभालना ही मुश्किल से जाये तब छोटी बहन को कैसे संभालूं, यह प्रश्न हर बार मेरे सामने रहा।

मेरे सामने कितनी भी चुनौतियां हों, पर क़िस्मत कम से कम एक जगह अच्छी रही। मेरी परवरिश एक ऐसे परिवार में हुई है, जहाँ शुरू से ही बेटे और बेटी के बीच कोई भेदभाव नहीं था। जिस वातावरण में हम भाई-बहन पले-बढ़े वहाँ किसी को कम-ज़्यादा प्यार या शिक्षा-दीक्षा मिली हो, ऐसा माता-पिता की ओर से नहीं हुआ। हालांकि समय के चलते स्थितियाँ, परिस्थितियाँ, माहौल आदि बदलते जाते हैं और उन्हीं के मुताबिक़ व्यक्ति अपने आपको ढालने की कोशिश करता है। फिर यह बात भी है कि हम सिर्फ़ अपने परिवार में ही तो बड़े नहीं होते। आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदार और इन सबसे बाहर का समाज भी हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा होते हैं और वहाँ लड़के-लड़की का भेद साफ़ देखने में आता था।

मैंने अपने बचपन को याद करने की जब-जब कोशिश की, तो लगा कि छोटे होने का अहसास मुझे कभी नहीं हुआ। साल दर साल कहां बीत गये, पता ही नहीं चला। अचानक बड़े हो जाने का और ज़िम्मेदारियों का बोझ सर पर होने का अहसास गया और वह ही लगातार बना रहा। मेरे बड़े होते-होते तक मेरे से बड़े भाई-बहनों की शादियाँ हो गयीं या फिर वे अपना कैरियर बनाने की दिशा में आगे बढ़ गये। मेरे सामने कई कठिनाइयाँ थीं लेकिन इनका मुक़ाबला भी मुझे ही करना था। मेरे पिताजी एम.ए. थे लेकिन मेरी मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं। इसलिए अपने जीवन के अनुभवों से मेरी मां के मन में एक बात स्पष्ट थी कि सभी बच्चों को पढ़ाना-लिखाना है। लगभग सभी भाई-बहनों ने एम.ए. किया। कई मुश्किलों के बावजूद मैंने भी एम.ए. किया।

           (दो)
           जब समाजशास्त्र में एम.ए. किया था तब थोड़ा-बहुत अध्ययन देह-व्यापार से जुड़ी महिलाओं पर किया था। उनसे संबंधित किताबें पढ़ी थीं। तबसे इन महिलाओं के जीवन के बारे में जानने की प्रबल इच्छा थी। इन महिलाओं का एक अलहदा संसार है, जिसका हमारे तथाकथित सभ्य समाज से कोई वास्ता नहीं होता है। वर्ष 1992 में जब मैं ‘पीपल्स हेल्थ ऑर्गनाइजे़शन’ नामक संस्था से जुड़ी थी, तब एड्स जैसी भयानक लाइलाज बीमारी को लेकर इन महिलाओं के बीच जाने का मौक़ा पहली बार मिला था। देह-व्यापार से जुड़ी इन महिलाओं को इस रोग से बचाने के लिए संस्था ‘सहेली’ प्रोजेक्ट चला रही थी। ये अनुभव अभी तक की मेरी ज़िंदगी की मध्यवर्गीय निश्चिंतताओं और अस्मिता को झकझोर देने वाले थे।तब इन इलाक़ों के प्रति मेरे मन में ख़ौफ़ था। दिमाग़ में कई तरह के प्रश्न उठ रहे थे, क्या करूंगी, कैसे जाऊंगी इन इलाक़ों में? प्रश्न भीतर से उठे थे और जवाब भी भीतर से ही मिला कि मैं भी एक स्त्री हूँ और मुझे स्त्रियों के बीच जाना है, उनके जीवन के बारे में जानना है तो हिचक कैसी? बिना वहाँ जाये, उनसे बात कैसे हो सकती है? इस बात को समझते हुए भी मन में यह बात आयी थी कि मैं संस्था के अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरह सफ़ेद कोट पहनकर इन बस्तियों में जाऊं ताकि लोग साफ़ तौर पर समझ पाएं कि इन गणिकाओं से मिलने कोई संभ्रान्त व जागरूक समाजसेविका आयी है। लेकिन ‘सहेली’ में काम करने के इरादे ने मुझे इस हिचक से उबार लिया। इसी दौरान की ऊहापोह के बीच मेरा स्त्री होने का अहसास आकार लेने लगा।

दिव्या जैन, divya jain

मुझे याद आता है तब स्त्रियों की समस्याओं को उजागर करने की दिशा में कोई ठोस काम करने की चाह मेरे भीतर बलवती होने लगी। बात क़रीब 1993 की है। साल भर मेरे मन में चिंतन-मनन चलता रहा। अन्ततः महिलाओं से जुड़ी त्रैमासिक पत्रिका निकालने की इच्छा मेरे मन में बैठ गई। इसके पीछे 1990 में घटी एक और घटना थी, जिसने मुझे इतना उद्वेलित किया था कि सामाजिक मुद्दों पर लिखना चाहने लगी थी। घटना दहेज से संबंधित थी। एक पत्रकार की हैसियत से मेरी भूमिका, घटना से संबंधित सच्चाइयों को समाज के सामने लाना थी और यह काम मैंने किया। इसके अच्छे-बुरे परिणामों को झेला लेकिन उस घटनाक्रम से गुज़रते हुए जो अनुभव मुझे मिले वे आगे चलकर काफ़ी उपयोगी साबित हुए। इन अनुभवों ने मध्यवर्गीय अंतर्द्वंद्वों से उबारने में भी मेरी मदद की।

उसी दौरान इन महिलाओं के लिए एक पत्रिका निकालने की योजना बनी, जिसका नाम रखा गया ‘सखी सहेली’। संपादन का कार्यभार मुझे ही सौंपा गया। इन स्त्रियों के जीवन पर लिखने का अर्थ था इनसे रूबरू होना, इनकी ज़िंदगी में झांकना। मेरे लिए उनका विश्वास जीतना ज़रूरी था। पहले पहल तो संस्था की मोबाइल वैन में अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ही लाल बत्ती इलाक़ों में गयी। और तब किसी भी लड़की के साथ बात करने का साहस भी नहीं जुटा पा रही थी। लिपे-पुते चेहरों, रंगीन लिबासों में सुसज्जित इन शोषित, दुखी लड़कियों को देखकर मन द्रवित हो उठा था। तीसरी बार जब पाववाला स्ट्रीट में माया ताई के साथ गयी तो मोना से मुलाक़ात हुई। अपने बारे में बताते हुए, भरसक कोशिश करने पर भी वह सहज न रह सकी। अपनी दर्द-भरी दास्तान सुनाते-सुनाते वह फफक-फफककर रो पड़ी। अपने आपको संयमित करते हुए मोना ने मुझसे पूछा- ‘दीदी, आप दोबारा कब आएंगी?’ मैंने कहा बहुत जल्द ही आऊंगी।

उस दिन मेरे भीतर की स्त्री मानो पहली बार जाग गयी थी। मोना के जीवन की दास्तान ने मुझे भी रुला दिया और कहीं भीतर तक झकझोर दिया था। बड़ी मुश्किल से मैं अपने आपको संयत कर पायी। बस उस दिन से उस जैसी अन्य लड़कियों से मिलने का सिलसिला चल पड़ा।

1994 में राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता के रविवारीय, ‘सबरंग’ में देह-व्यापार में लगी इन स्त्रियों के जीवन पर केंद्रित ‘बदनाम ज़िंदगियाँ’ नामक स्तंभ लिखने के लिए मुझसे कहा गया। तब मैंने इस काम को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। समाज से कटे और फिर भी समाज के ऐन बीचो-बीच बसने वाले इस हिस्से का दर्द मुझे बांटना था, जिसे समाज से कोढ़ियों की तरह का बर्ताव मिलता है। इनका जीवन तड़क-भड़क और अँधेरे की दोहरी पटरी पर घिसटता है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात मेरे लिए यह थी कि मैं कैसे इन स्त्रियों के भीतर की, दिल की बातें जान पाऊं। इन स्त्रियों के बारे में लिखने का अर्थ था इनके जीवन की खाई में झांकना। आख़िर क्या थे इनके दुःख, इनकी पीड़ा, इनकी मजबूरी जो इन्हें इस राह पर घसीट ले आयी, जहाँ केवल तन ही तन था, पर मन कहीं नहीं।

इनकी कहानियाँ, इन्हीं की ज़ुबानी जब सुनीं, तो मन में प्रश्न उठने लगे कि एक स्त्री का स्त्री होना क्या सिर्फ़ एक अभिशाप है? एक स्त्री का स्त्री होना क्या सिर्फ़ पाप है? इन औरतों के बारे में सोचती हूं तो समझ में आता है ये ऐसी अंधी गलियाँ हैं, जिनसे लौटने की कोई राह नहीं होती। मन में प्रश्न उठता है ये औरतें अपने जिस्म के साथ, बिना अपनी मर्ज़ी के इतना अत्याचार कैसे सह लेती हैं?

अभी लिखते हुए मुझे जाने कितने नाम याद आ रहे हैं। इन तमाम कहानियों की एक किताब ‘हव्वा की बेटी’ भी प्रकाशित हुई। आशा की बात बताती हूं। जब मैं उससे मिली थी वह केवल 24 साल की थी और वह उकता चुकी थी इस व्यवसाय से और जीवन से, उसका शरीर कमज़ोर हो गया था, हो जाना एकदम वाजिब था। आशा के दिल की बातें उसी के शब्दों में:

“मैं अहमदनगर की रहने वाली हूँ। सातवीं कक्षा तक पढ़ पायी, यही बड़ी बात है। गांव में तो अधिकतर मां-बाप बच्चों को पढ़ाते ही नहीं और लड़कियों को तो ख़ासकर पढ़ाते ही नहीं हैं। हमारा खेत था, मैं खेत पर काम करने लगी। घर का काम अलग। मुझे लगने लगा था एक लड़की की ज़िंदगी में मेहनत, मज़दूरी और संघर्ष के अलावा कुछ नहीं। दिन बीतते गये। मेरी शादी की बातें होने लगीं। जल्द ही मुझे शादी से संबंधित बातें भी समझा दी गयीं। तब मेरे भीतर बहुत कुछ चल रहा था, जो मैं किसी को भी नहीं बता सकी। मेरी शादी कर दी गयी, बिना मेरी मर्ज़ी जाने। मैं तब 18 की थी। वहीं गांव में ही ससुराल थी। वहाँ भी खेत में ही काम करना पड़ता। सबेरे पांच बजे से रात बारह बजे तक। इसके बावजूद कभी सास मारती तो कभी मेरा पति। शादी करवाकर मां-बाप ने फ़र्ज़ पूरा कर दिया था। मुझे सुलगते नरक में धकेलकर जैसे अपना बोझ हल्का कर लिया था।

शादी के दो साल बाद भी जब बच्चा नहीं हुआ तो सास और पति मुझे बांझ कहकर ज़लील करते। सब दोष जैसे मेरा ही था, क्या मेरे मर्द में कोई दोष नहीं हो सकता था? लेकिन उनको मैं ऐसा बोल तो नहीं सकती थी। जैसा जीवन मैं गांव में जी रही थी, उससे थक गयी थी। तब अपनी एक सहेली के साथ मुंबई आ गयी। सोचा था मुंबई बड़ा शहर है यहां ज़रूर मुझे कोई अच्छा काम मिल जाएगा। लेकिन नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। अच्छा काम तो नहीं मिला, ऊपर से मेरी ग़रीबी और मजबूरी के कारण मुझे बाज़ार का रास्ता दिखा दिया गया। हम औरतों के साथ ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का जवाब है किसी के पास? आज मैं ख़ासी वेश्या बन गयी हूं।”

मेरे लिए इन स्त्रियों की कथा सुनना हिला देने वाला अनुभव था, उनके जीवन में चुनाव करने की गुंजाइश ही नहीं थी। चाहे आशा हो या कोई भी औरत, यदि शादी के दो साल बाद तक बच्चा न हो तो उसे बांझ करार दिया जाता है। सवाल यह है कि ऐसे में उसे पीड़ा देना, उलाहना देना कहाँ तक जायज़ है? आशा जब मुंबई में रहकर वेश्यावृत्ति के साथ जुड़ी, तो चार साल के भीतर उसने तीन बार गर्भपात करवाया। काश उसके भीतर की बात कोई समझता। सालों बीत गये लेकिन आशा नहीं समझ पायी है, औरत होने का अर्थ।

बहरहाल, मेरे भीतर लगातार इन स्त्रियों को लेकर चिंतन-मनन चलता रहा था। हर रोज़ एक नयी कहानी जब मेरे सामने आती थी, तो लगता था यह तो दर्द की, पीड़ा की अन्तहीन यात्रा है, और अनजाने ही मैं भी इस यात्रा का हिस्सा बन गयी थी। इनकी पीड़ा मेरी भी पीड़ा थी और इसीलिए पूरे एक साल तक हर हफ़्ते वेश्या जीवन के इस पीड़ा भरे भयानक सच को मैं लोगों के सामने लाती रही, अपनी कलम के माध्यम से।

भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में मुझे ऐसा लगता है जब तक पुरुष अपने में बदलाव नहीं लाएंगे तब तक स्त्रियों का शारीरिक, मानसिक शोषण, उत्पीड़न होता रहेगा। औरतें किसी भी वर्ग की क्यों न हों, उनके प्रति पुरुषों का व्यवहार और नज़रिया समानता का होना चाहिए।

समाज के निम्न तबक़े की स्त्रियों की बात करें तो वे कड़ा संघर्ष करती हैं। परिवार का गुज़ारा चलाने के लिए। मैं ऐसी कई स्त्रियों से मिली हूँ जो ऐसे-ऐसे काम करती हैं जो अमूमन पुरुषों के कहे जाते हैं। इन स्त्रियों ने साबित कर दिखाया वे किसी भी क़िस्म का काम कर सकती हैं। मुझे ख़याल आता है राजस्थान के रहगर समाज के लोगों का, जो चेम्बूर की ठक्करबापा कॉलोनी में रहते हैं। जूते गांठने के पेशे से महिलाएं पूर्णतया जुड़ी हैं। लेकिन कितनी ही कर्मठ और मेहनती हों, उन्हें पुरुषों की तुलना में पैसा कम मिलता है और लगातार उनका दमन होता है। ऐसी ही कहानियां बीड़ी बनाने वाली लड़कियों और महिलाओं की भी है, याद आती रहती है।

           (तीन)
           जब कभी भी मैं अपने आपको बहुत अकेली पाती, तो लगता कैसे संभाल पाऊंगी अपने आपको और छोटी बहन को जो कि पूरी तरह से मुझ पर निर्भर- मानसिक रूप से भिन्न-क्षम और उम्र दराज़ भी। ऐसे समय मुझे मेरी एक दोस्त चंदा असानी की बात बहुत याद आती। वह कहती थी ‘मैं अकेली कहां हूँ, दुनिया की तमाम स्त्रियां मेरे साथ हैं और मैं उनके साथ हूँ। हम एक-दूसरों का दर्द बांटते है और आपसी सरोकार रखते हैं।’

दिव्या जैन, divya jain

चंदा की बात से मैं सहमत हूँ इसलिए कि मेरे जीवन में भी कई अत्यंत संघर्षशील और कर्मठ स्त्रियों का साथ रहा है। संघर्षरत इन महिलाओं से जुड़ने की मेरी जो यात्रा ‘सखी सहेली’ व जनसत्ता में कॉलम से शुरू हुई थी, वह ‘संगिनी’ तक गयी। 1994 में संगिनी नाम से पत्रिका का पहला अंक निकाला। उसी साल तीन और अंक निकाले। एक साल बाद पत्रिका पंजीकृत हुई और उसे ‘अंतरंग संगिनी’ नाम मिला। स्त्री संघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में पत्रिका स्थापित हुई। अंतरंग संगिनी की विशेषता यह थी कि किसी एक सामाजिक समस्या या मुद्दा उठाकर, उसे विषय बनाकर विशेषांक निकालना, ताकि पाठक को किसी एक समस्या विशेष पर विस्तृत जानकारी मिल सके।

मेरे भीतर उन दिनों कितना चिंतन-मनन चलता रहा होगा कि स्त्रियों से जुड़े कितने सारे मुद्दे सामने आये और मेरी यह यात्रा 18 सालों तक लगातार चलती रही। बेशक इस यात्रा में मेरे साथ कई स्त्रियाँ जुड़ीं और इस यात्रा को अपने गन्तव्य तक पहुंचाया। इन अठारह सालों की यात्रा में कई विषयों पर अंक निकाले गये मेरे द्वारा या अतिथि संपादकों द्वारा। बाल किशोरी, आदिवासी महिला जीवन, चालीस पार की औरतें, विचाराधीन क़ैदी महिलाओं की समस्याएं, सांप्रदायिक हिंसा और महिलाएं, एकल स्त्री: त्रासदी और ताक़त जैसे विषयों की सूची लंबी है।

‘एकल स्त्री: त्रासदी और ताक़त’… मैं भी तो अकेली हूँ। मुझे ऐसा लगता है स्त्री जब अकेली होती है तब उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह तो सच है जब उसे कोई विकल्प या रास्ता नज़र नहीं आता है तब वह टूटती है, बिखरती है, निराश हो जाती है और कइयों बार मर जाने तक की बात सोच लेती है। मेरी अपनी बात कहूं तो, मेरे जीवन की अब यही दास्तान है। मेरे भाई पवन कुमार जैन की मृत्यु के बाद मैं एकदम अकेली हो गयी। हम भाई-बहन साथ थे, तो एक-दूसरे का दुख-सुख तो साझा कर लेते थे। वे मुझसे तीन साल बड़े थे। उनका साथ होना मेरे लिए बहुत मायने रखता था।

मेरे साथ भिन्न-क्षम मेरी छोटी बहन, जो सालों से पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर भी हो रही। ऐसे में उसकी देखभाल करते हुए अपने आपको भी संभालना कितना कठिन रहा, यह केवल मैं ही समझ सकती हूं। मैंने अपने आपको कइयों बार बहुत ज़्यादा असहाय, निराश और अकेला पाया है। वृद्ध माता-पिता तथा छोटी बहन की देखभाल में जीवन का इतना लंबा अरसा बीत गया कि कुछ समझ में ही नहीं आया। अपने लिए बहुत कुछ करने का समय नहीं मिला, ऐसा लगता है। ऐसे में कई बार जीवन बहुत निरर्थक लगता है। कई बार बहुत मायूस हुई तब लगा कि यह जीवन रहे न रहे तब भी क्या फ़र्क पड़ेगा। लेकिन फिर एक नया सवेरा आने पर नयी उम्मीद की किरणों के प्रकाश में कुछ अच्छा होने की आशा में फिर से नयी ऊर्जा के साथ जुट गयी.. रोज़-ब-रोज़ के कामों में।

मेरे अपने जीवन में जहां तक पारिवारिक समस्याओं की बात थी, पवन भाई की समतावादी विचारधारा होने के कारण मुझे उनका बहुत ज़्यादा सहयोग मिलता था। हम दोनों भाई-बहन ने शादी नहीं की थी इसलिए इस लिहाज़ से भी हम एक ही धरातल पर थे। हमारे माता-पिता क़रीब पंद्रह सालों तक बीमार रहे। पिताजी क़रीब छह साल तक और मां नौ साल तक बिस्तर पर रहीं। उनकी बीमारियाँ जटिल भी थीं। ऐसे में अगर मुझे भाई का सहयोग नहीं मिल पाता तो शायद मुझे इस सेवा-टहल के काम में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। लेकिन भाई के सहयोग से मैं सेवा में लगी रही कई सालों तक लगातार।

माता-पिता की उस लम्बी बीमारी के दौर में मेरे भीतर की स्त्री ने मानो अपने बारे में, अपने सपनों के बारे में सोचना ही छोड़ दिया था। शायद अपने बारे में सोचने की गुंजाइश ही नहीं बची थी। मन गाहे-बगाहे फिर भी सपने देखता होगा लेकिन उससे कुछ हासिल नहीं होता था, यह मैं जानती थी।

उन दिनों जिंदगी बहुत बिखर-सी गयी थी और इस बिखरी हुई ज़िंदगी को फिर से सहेजना संवारना मुझे बहुत ही मुश्किल लग रहा था। ज़िंदगी में ठहराव-सा आ गया था। सब कुछ पीछे छूटता-सा लग रहा था। समय था कि तेज़ गति से निकला जा रहा था। ऐसे में अपने लिए कुछ करने की बात तो दूर, पड़ोस में या रिश्तेदारों के यहाँ किसी अच्छे-बुरे प्रसंगों पर भी मां को अकेली छोड़कर जाना संभव ही नहीं हो पाता था।

जब हमारे सामने कोई लक्ष्य होता है तो हम हमारा पूरा ध्यान उस लक्ष्य को पूरा करने में लगा देते हैं। लेकिन हमारे सामने जो लक्ष्य था वह तो माता-पिता की लगातार कई सालों तक सेवा-टहल करते रहने का था, जो काफ़ी कठिन था। लेकिन हम (भाई और मैं) यह काम कर पाये इसकी एक वजह यह भी थी कि हम लोगों ने शादी नहीं की थी। इसकी वजहें जो भी रही होंगी, वह तो एक अलग ही मुद्दा है। मगर यह ज़रूर है कि माता-पिता की बीमारी की वजह से हमने शादी नहीं की थी, ऐसा बिलकुल नहीं था।

मैंने विवाह नहीं किया यह एक हक़ीक़त है। लेकिन ऐसा नहीं है कि एक उम्र में विवाह का या अपना परिवार बसाने का ख़याल ही मेरे मन में न आया हो। प्रेम के उजाले और गरमाहट ने एक समय मुझे भी छुआ था और कुछ सपने रचे थे, जो शायद हर लड़की के भीतर कभी न कभी रूप लेते हैं। वजहें चाहे जो भी रहें पर हर सपना साकार नहीं हो पाता। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसे संयोग और विडंबनाएं उपस्थित हुईं कि वह प्रेम अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाया। किन्तु हर व्यक्ति के प्रेम की अनुभूति की तरह मेरे लिए भी प्रेम से गुज़रना एक विशिष्ट और सघन अनुभव था। यह संबंध विवाह में परिणत नहीं हो सका, बल्कि मुझे लंबे एकाकी जीवन की ओर ले गया, बावजूद इसके मेरे भीतर उस व्यक्ति के प्रति कोई स्थायी आक्रोश का भाव नहीं रहा।

ऐसी परिस्थितियों- जिन पर मेरा कोई वश नहीं था- ने मुझे गहरी पीड़ा अवश्य दी किन्तु एक ओर अपने लेखन-संपादन के काम और दूसरी ओर वृद्ध होते माता-पिता की देखभाल की ज़िम्मेदारियों के चलते मुझे अपने जीवन के अकेलेपन आदि पर सोचने की मोहलत नहीं मिली। यह अच्छा था या बुरा, मैं नहीं जानती। इतना तय है कि महज़ विवाह के लिए विवाह कर लेने की मजबूरी मैंने नहीं जानी। एक स्वतंत्र चेता स्त्री होने के नाते मेरा एक व्यक्तित्व था और है, इसलिए दूसरे का व्यक्तित्व मेरे लिए उतनी ही अहमियत रखता है।

जीवन में कौन-से निर्णय हमने सोचकर लिये और कितनी बातें अनायास हमसे जुड़ती गयीं, कहना मुश्किल है। विवाह नहीं किया, नहीं हुआ जो कुछ भी हुआ उसे दरकिनार करते हुए मैंने सोचा कि तब भी ज़िंदगी को खोजा जा सकता है, तराशा जा सकता है। मेरे अपने एकाकीपन को अन्य स्त्रियों के एकाकीपन के साथ जोड़कर देखा तो जान पायी कि एक स्त्री कितनी समस्याओं से जूझती हुई एक मुक़ाम तक पहुंच पाती है। अपनी तमाम उलझनों के बीच मैंने यह काम अपने लेखन के माध्यम से किया।

अपने अकेलेपन की दास्तान से मैं फिर अंतरंग संगिनी के ‘एकल स्त्री: त्रासदी और ताक़त’ पर केंद्रित अंक पर आती हूं। इस अंक में हमने अविवाहित, तलाक़शुदा या विधवा स्त्रियों की न केवल पीड़ा या त्रासदी की बात की है, बल्कि उनके समस्त अनुभव हैं, जिनसे उन्होंने अपने अकेलेपन को एकांत में ढालने की कोशिश की। ऐसा कर सकने पर वे बहुत ख़ुश हैं। ऐसी स्थिति अपने लिए पैदा करने में उन्हें बेहद संघर्ष करना पड़ा है, यह भी सच है। कुछ औरतों ने बदलते समय के साथ अपने आप को बदला है। वे अपने आपको बेबस और लाचार नहीं समझतीं।

ख़ुद मेरे अकेले होने के जो भी अनुभव हैं, उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है और बहुत कुछ सीखना बाक़ी है। एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आई है कि एक अकेली स्त्री अपने अकेले होने की स्थिति को स्वीकार लेती है तो उसके लिए हर मुश्किल स्थिति से गुज़रना थोड़ा आसान हो जाता है। ऐसा करना कठिन तो होता है लेकिन असंभव नहीं होता। अपने आपको पीड़ा से, दुख से बचाने के लिए मैं भी सकारात्मक सोच और दृष्टिकोण अपनाने की भरसक कोशिश करती रही हूं। आगे के शब्द इसकी गवाही ज़रूर देंगे…

(इस आत्मकथ्य का दूसरा भाग अगले अंक में)

22 comments on “मेरे भीतर की स्त्री

  1. स्त्री के जीवन में आए उतार – चढ़ाव और संघर्ष का बयान करता आत्मकथ्य है आपका। बहुत लोगों के लिए प्रेरणादायी भी है।अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।

  2. “एक स्तंवत्र चेता स्त्री होने के नाते मेरा एक व्यक्तित्व था और है और इसीलिए दूसरे का व्यक्तित्व भी मेरे लिए उतनी ही अहमियत रखता है।”
    मेरे देखे-दिव्या जी की अब तक की जीवन यात्रा का सार,निचोड़ यह पॉइंट है जो जीवन का सम्मान और दिशा देने वाला है। जीवन हमें जो कुछ देता है वह सब सकारण है जो हमें बूंद-बूंद भरता जाता है।
    अहोभाव!

  3. स्त्री होना और फिर उस स्त्री तत्त्व को जीना और यदि एकल स्त्री हो तो उसके जीवन और संघर्ष का बदला स्वरुप कितना अलग होता है। यह दिव्या जैन जी के इस आत्मकथात्मक लेख को पढ़कर समझ पाया। शिक्षित परिवार में शिक्षित स्त्री अन्य सामान्य या अशिक्षित स्त्रियों के कैसे अधिक समर्थ और विचारवान होती है, यह भी इस लेख को पढ़कर भान होता है। इसलिए स्त्री का शिक्षित होना अति आवश्यक है। दिव्या जी का जीवन प्रेरक है। उसे पढ़कर या जानकार संघर्ष के लिए एक ऊर्जा प्राप्त होती है। इनकी चर्चित कृति हव्वा की बेटी मैंने पढ़ी है, नगर वधुओं की मार्मिक और व्यथित करने वाली कहानी है। यह दिव्या जी के अपने दायित्त्व के प्रति निष्ठा को भी दिखाता है। इनकी दूसरी कृति ख़ुदी को कर बुलंद… भी मैंने पढ़ी है, वह भी एकल स्त्रियों की जिजीविषा और संघर्ष पर है। अगर मैं एक वाक्य में कहूँ तो स्त्रियों के लिए दिव्या जैन जी का जीवन एक मार्गदर्शक है। क्योंकि उनका जीवन परिवारिक और सामाजिक दायित्त्व के साथ, स्वयं को अपने ढंग से जीने, अपनी शर्तों पर जीने का साहस और हुनर देता है, भले उसके लिए कीमत चुकानी पड़े।

  4. मैंने अभी दिव्या जी के आत्मकथ्य “मेरे हिस्से का किस्सा” पढ़ा। उनका कथ्य उनके अकेलेपन और स्त्री होते हुए भी बीमार माता-पिता और मानसिक रूप से भिन्न क्षम बहन की ज़िम्मेदारियां निभाते हुए भी कितनी ही महिलाओं के दर्द को समझते हुए आवाज़ उठाने की बात को दर्शाता है । आम तौर पर शादीशुदा महिलाओं के पति पत्नी के मायके के दुख तकलीफों को दयनीय दृष्टि से भले ही देखें पर उनकी ज़िम्मेदारी लेना उनका कर्तव्य नहीं होता। ऐसे में स्त्री को अपने मायके के दुख देख कर भी चुप रहने की विवशता से गुज़रना पड़ता है भले ही वो कमाऊ भी न सौ । ऐसे में लीक से हट कर दिव्या जी ने बहुत ही सार्थक और हृदय को झिंझोड़ देने वाले विषयों पर बहुत सजग दृष्टि से लिखा है । साधुवाद और इतनी हिम्मत और साहस वाली दिव्या जी को मेरा शत-शत नमन ।

  5. दिव्या जी का यह आत्मकथ्य वाक़ई हम सबके लिए प्रेरणा है..

  6. जीवन मे संघर्ष होता ही है,तुमने नारी के जीवन की समस्याओ को बहुत ही सही व सटीक तरिके से रखने का प्रयास किया।सभी चुनोतियो का सामना सकारात्मक सोच के साथ करना बहुत बङी बात है,तुम्हरी इस हिम्मत व साहस को मेरा वंदन ।

  7. जीवन मे संघर्ष होता ही है,तुमने नारी के जीवन की समस्याओ को बहुत ही सही व सटीक तरिके से रखने का प्रयास किया।सभी चुनोतियो का सामना सकारात्मक सोच के साथ करना बहुत बङी बात है,तुम्हरी इस हिम्मत व साहस को मेरा वंदन ।

  8. दिव्या जैन द्वारा आलेखित ‘मेरे हिस्से का किस्सा’ पढकर अचंभा हुआ कि कैसे कोई व्यक्ति ईतनी सारी मुश्किलोंसे झूझ कर अपने मकसद को पूरा भी कर सकता है और समाज उपयोगी ईतने सारे कार्य कर सकता है।
    माता-पिता की लंबे समय तक चली हुई बीमारी, लवलीना की सार-संभाल – ईन सब दिक्कतों के बावजूद भी उतना कुछ कर पाना कितना मुश्किल है ये हम समझ सकते हैं। दिव्याजी को अनेक अनेक धन्यवाद।

  9. यह बात सन 1988 की है कि जब मैं दिव्या जी को पहली बार मिला था। हुआ कुछ ऐसा था कि हमारे हुमड जैन समाज की एक लड़की अंजू शाह को उसकी ससुराल वालों ने खूब मारा पीटा और उसे बिल्डिंग के टेरेस से नीचे फेंक दिया था।
    तब समाज के कुछ वरिष्ठ लोगों ने मुझे इस मामले में पुलिस के साथ सहयोग करने के लिए कहा था और अंजू के पति को सख्त से सख्त सजा दिलवाने की जिम्मेदारी भी मुझे सौंपी थी। तब मैं अंजू के पिता और उसके परिवार के सभी लोगों से मिला था और उन्हें कहा था कि इस व्यक्ति को जेल भिजवाने की जिम्मेदारी मेरी है। यह काम मैंने समाज के अन्य वरिष्ठ जनो के साथ मिलकर किया। उसके माता पिता 6 महीने तक और वह कई सालों तक जेल में रहा। यह घटना मुंबई के उपनगर विले पारले में घटी थी।
    मैं एक सप्ताह के बाद जब घटना स्थल पर पहुंचा तो वहां मेरी एक सामाजिक कार्यकर्ता ज्योतिबहन से मुलाकात हुई, कई अखबारों में इस घटना की रिपोर्टिंग हुई थी। तभी मेरी मुलाकात दिव्या जी से हुई थी। हम सभी ने मिलकर इस घटना के विरोध में एक मोर्चा निकला था। उस एरिया के लोगों ने हमें बहुत अच्छा सहयोग दिया था, हमारा उद्देश्य यही था कि समाज में ऐसी कोई घटना नहीं होनी चाहिए।
    दिव्या जी उन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम कर रही थीं। उन्होंने तब कुछ गुजराती अखबारों तथा साप्ताहिक हिंदी और अंग्रेजी अखबार ब्लिट्ज में भी अंजू शर्मा की नृशंस हत्या को लेकर विस्तृत रिपोर्ट लिखी थी। उन दिनों दिव्या जी मिलना होता रहता था।
    कई सालों तक हम नहीं मिले, लेकिन छह महीने पहले हमारे समाज के एक कार्यक्रम में उनसे मुलाकात हुई। तब उनके बारे में उनसे बहुत कुछ जानने को मिला। दो दिन पहले उन्होंने मुझे अपना आत्मकथ्य भेजा, पढ़कर मैं स्तब्ध रह गया। मैं इसे उनकी शौर्यगाथा कहूंगा जो कई महिलाओं को प्रेरित करेगी।
    ने केवल अपने परिवार के लिए बल्कि समाज के लिए भी उन्होंने जो काम किया है वह तारीफे काबिल है। उनके संघर्ष, साहस और हिम्मत की मैं दाद देता हूं। आज इस उम्र में भी जिस तरह वे महिलाओं के हित में काम कर रही हैं, लेखन द्वारा अपना योगदान दे रहीं है, मैं निशब्द हूं।
    अगली कड़ी का इंतजार है।

  10. दिव्या जी ने अपनी पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि के साथ अपने आत्मकथ्य में अपने एकाकीपन को अन्य स्त्रीयों के एकाकीपन के साथ जोड़कर स्त्रीयों की समस्याओं को गहरे तक उतरकर स्वंय अनुभव किया है। दिव्या जी की पत्रिका ‘अंतरंग संगिनी’ के सभी विशेषांकों में नारी की सभी आंतरिक समस्याओं का मुद्दा बनाकर विशेष जानकारी उपलब्ध कराई है। उनका जीवन व व्यक्तित्व प्रेरक है। स्वंय का जीवन उनका संघर्षमय रहा फिर भी सोच सकारात्मक बनी रही। वे एक स्वतंत्र, शक्तिशाली, साहसी स्त्री हैं/

  11. मैंने कल मेरे comments दिव्या जी के बारे में पोस्ट किए किये थे। पर कंहा गए पता नही चला। आज दुबारा भेजूंगा।

  12. ‘हिम्मत मरदा मददे खुदा” यह कहावत दिव्या जैन जी पर अक्षर-अक्षर सत्य बैठती है। घर-बाहर,परिवार-समाज और स्वंय के आंतरिक झंझावात,व्यथा की अनकही परतों को महसूस करते हुए भी अपने दम पर इन्होंने 18-साल ‘अंतरंग संगिनी’ पत्रिका चलाई। नारी होने के नाते दिव्या जैन जी ने नारियों की व्यथा-कथा को ज्यों का त्यों पाठकों के समक्ष पेश कर दिया। अपने माता-पिता की जी-जान लगाकर सेवा की ।अपनी छोटी बहन लवलीना की तो इन्होंने माँ की तरह देखभाल किया,मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ।
    इन तरह के विपरीत परिस्थितयों के मकड़जाल को तोड़कर इन्होंने एक सजग पत्रकार होने का परिचय दिया।हम सभी को इनसे सीखना चाहिए। सभी की, की गई सेवाओं का यह फल है कि, दिव्या जैन जी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की।
    अभी भी अपनी लेखनी से नारियों को न्याय दिलाने का कार्य ये करती आ रहीं हैं।
    समाज में दो-चार भी इस तरह के लोग हों तो समाज,परिवेश और देश की सोच बदलते देर नहीं लगेगी,यह मेरे अपने विचार हैं।
    मृदुला मिश्रा

  13. Autobiography of Divya Jain symbolises great resilience and creative genuine of woman fired by quest for dignity and humanity. Her sensitive portrayal of her life’s journey brings to the fore her courage of conviction.

    Prof. Vibhuti Patel

  14. मेरे भीतर की स्त्री पढ़कर लगा शायद हर उस नारी के जीवन में संघर्ष होता है जो संवेदनशील और जिम्मेदार है।अन्य भाई बहन जिम्मेदारी से मुक्त रहे, आपने संघर्ष किया और उस संघर्ष से आपको नारी जीवन के कई पहलुओं से साक्षात्कार हुआ,उनकी पीड़ा ने आपको दर्द के साथ साथ मानसिक संबल भी दिया।संघर्षों में तपकर आपके अंदर की स्त्री खरा सोना बनकर निखर गई है।यह हम सबके साथ त्रासदी है कि हमारे भीतर एक लड़की सदैव जीवित रहती है।आपको कोटिशः बधाई।अगले अंक की प्रतीक्षा है।

  15. दिव्या जी ,आपने जो कठिन जीवन जिया ,जिन मुश्किलों से गुजरीं कोई कमजोर लड़की होती तो टूट जाती मगर आपने खुद को संभाले रखा ।अपने माता पिता और बहन की सेवा की और अपने जीवन को भी उत्तरोत्तर प्रगति की ओर उन्मुख रखा ।यह सचमुच सराहनीय है।खुशकिस्मत हूं कि आप मुझे जानती हैं और मैं आपको।आप ने अपना समय और जीवन दूसरी दुखी पीड़ित महिलाओं के लिए दे दिया एक तरह से।अपनी पत्रिकाओं के अंक भी उन पर निकाले।यह साहस और हिम्मत का काम है।आपसे प्रेरणा मिलती है।

  16. दिव्या जी ,आपका आत्मकथ्य पढ़कर लगा आपने कितना कठिन जीवन जिया ।कितनी मुश्किलों से गुजरीं मगर टूटी नहीं ।मजबूती से चलती लिखती पढ़ती आगे बढ़ती रहीं ।अपने माता पिता और बहन का ख्याल रखा अपने को भुलाकर ।अपने जीवन को आप ने दूसरी स्त्रियों की चिंता में उनका दुख बांटते हुए जिया ।उनसे मिलीं ,उनकी पीड़ा को सुना, संवेदना के साथ लिखा ,यह हिम्मत का काम है ।साहस का काम है ।आपने किया ।हमें आप पर गर्व है ।

  17. निजी जीवन संघर्षमय होने के बावजुद अन्य पीडित स्त्रीओं के लिए काम किया, भाई पवन और बादमें बहन लवलीना के जाने के बाद एक शून्य का सामना किया और बिखरी जिंदगी को फिर से संजोया, अकेलेपन को एकांत में ढाला….यह आपकी विशेष क्षमता है, अमूमन कोई स्त्री या पुरुष भी इतना कुछ न कर पाते. जीवन का लेखाजोखा आपको विशेष श्रेणी में स्थान देता है. दुनिया जिसे सफलता कहेती है उससे परे आपने मानवी मूल्यों को निभाते आत्मसंतोष पाया है जो बहुत कम लोग पा सकतें हैं.

  18. दिव्या जैन की आत्मकथा का प्रथम भाग पढ़ा। दिव्या जी एक संघर्षशील महिला पत्रकार, लेखिका, एक साहित्यकार, संगिनी की सम्पादिका, कुछ पुस्तको की लेखिका, महिलाओ की समस्याओं के प्रति सम्वेदनशील एवं साहसी एकाकी महिला हैं।

    मैं इनसे कई बार मिला हूँ। जब भी मुम्बई जाने का अवसर मिलता हैं, एक साहित्यकार के नाते मै इनसे मिलने का प्रयास करता हूँ। समय समय पर मोबाईल पर इनकी कुशलक्षेम पूछता रहता हूँ।

    दिव्या जी ने अपने जीवन काल का अधिकांश समय पढ़ने – लिखने, पत्रकरिता, महिलाओं की तकलीफों को निकट से जानने में लगाया हैं। साथ ही अपने माता – पिता एवं एक जन्म से दिव्यांग बहिन की देखभाल में भी व्यस्त रही हैं। दिव्या जी आज इस उम्र में भी अपने एककी जीवन मे निरन्तर साहित्य सेवा में संलग्न हैं। यह बहुत सराहनीय बात है

    इनकी उत्कृष्ट समाज सेवा, सहित्य सेवा एवं दुखी पीड़ित, प्रताड़ित महिलाओ के सम्बन्ध में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए विभिन्न संस्थाओ द्वारा इनको सम्मानित/पुरष्कृत किया गया हैं।

    मैं एक लेखक एवं कवि हूँ। मेरे जीवन काल में मैने अनेक समाजिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया हैं। मेरे लेख, कविताएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।
    मैने माहेश्वरी समाज के राष्ट्रीय, प्रादेशिक एवं जिला स्तर के संगठनों में विभिन्न पदों पर 60 वर्षो तक सेवाएं दी हैं। इसके अतिरिक्त भी अनेक सेवाभावी संगठनों से जुड़ाव रहा हैं। 80+ की उम्र में आज भी निरन्तर अध्ययन, सामाजिक समस्याओ के सम्बन्ध में चिंतन – मनन, चर्चा में व्यस्त रहता हूँ।

    दिव्या जी से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इनकी लेखनी में दम हैं। इन्होंने अपना जीवन दलित, पीड़ित महिलाओं के उत्थान में लगा दिया।
    मै इनके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घ आयु की कामना करता हूँ।

    मैं आब-ओ-हवा के संपादक एवं प्रकाशक की भी सराहना करता हूँ जिन्होंने विभिन्न साहित्यकारों की उत्कृष्ट रचनाओ को प्रकाशित कर पाठको के पठन हेतु उपलब्ध करवायी हैं।धन्यवाद के पात्र है।

    -राधेश्याम परवाल,
    “परवाल विला”
    डी – 62, वैशाली नगर, जयपुर – 302021
    मोबाइल – 9414061636

  19. दिव्या जैन की आत्मकथा का प्रथम भाग पढ़ा। दिव्या जी एक संघर्षशील महिला पत्रकार, लेखिका, एक साहित्यकार, संगिनी की सम्पादिका, कुछ पुस्तको की लेखिका, महिलाओ की समस्याओं के प्रति सम्वेदनशील एवं साहसी एकाकी महिला हैं।

    मैं इनसे कई बार मिला हूँ। जब भी मुम्बई जाने का अवसर मिलता हैं, एक साहित्यकार के नाते मै इनसे मिलने का प्रयास करता हूँ। समय समय पर मोबाईल पर इनकी कुशलक्षेम पूछता रहता हूँ।

    दिव्या जी ने अपने जीवन काल का अधिकांश समय पढ़ने – लिखने, पत्रकरिता, महिलाओं की
    तकलीफों को निकट से जानने में लगाया हैं। साथ ही अपने माता – पिता एवं एक जन्म से
    दिव्यांग बहिन की देखभाल में भी व्यस्त रही हैं। दिव्या जी आज इस उम्र में भी अपने
    एककी जीवन मे निरन्तर साहित्य सेवा में संलग्न हैं। यह बहुत सराहनीय बात है

    इनकी उत्कृष्ट समाज सेवा, सहित्य सेवा एवं दुखी पीड़ित, प्रताड़ित महिलाओ के सम्बन्ध में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए विभिन्न संस्थाओ द्वारा इनको सम्मानित/पुरष्कृत किया गया हैं।

    मैं एक लेखक एवं कवि हूँ। मेरे जीवन काल में मैने अनेक समाजिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया हैं। मेरे लेख, कविताएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।
    मैने माहेश्वरी समाज के राष्ट्रीय, प्रादेशिक एवं जिला स्तर के संगठनों में विभिन्न पदों पर 60 वर्षो तक सेवाएं दी हैं। इसके अतिरिक्त भी अनेक सेवाभावी संगठनों से जुड़ाव रहा हैं। 80+ की उम्र में आज भी निरन्तर अध्ययन, सामाजिक समस्याओ के सम्बन्ध में चिंतन – मनन, चर्चा में व्यस्त रहता हूँ।

    दिव्या जी से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इनकी लेखनी में दम हैं। इन्होंने अपना जीवन दलित, पीड़ित महिलाओं के उत्थान में लगा दिया।
    मै इनके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घ आयु की कामना करता हूँ।

    मैं आब-ओ-हवा के संपादक एवं प्रकाशक की भी सराहना करता हूँ जिन्होंने विभिन्न साहित्यकारों की उत्कृष्ट रचनाओ को प्रकाशित कर पाठको के पठन हेतु उपलब्ध करवायी हैं।धन्यवाद के पात्र है।

    -राधेश्याम परवाल,
    “परवाल विला”
    डी – 62, वैशाली नगर, जयपुर – 302021
    मोबाइल – 9414061636

  20. १४/६/२६ के दिन- परसों- लिखी हुई मेरी प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दे रही. कृपया गौर करें।

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