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पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-7

             पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया, जिसे पाठकों ने पसंद किया। रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर के लेखकों के भी ऐसे प्रसंग पेश किये जा चुके हैं। इस बार पढ़िए फिर हिंदी पट्टी के चर्चित नामों से जुड़ी कुछ रंग-बिरंगी यादें। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए…

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लौट के…

जिस समय सारिका के लिए ‘दिल्ली के लेखकों की तस्वीर’ मनोहर श्याम जोशी लिख रहे थे, उसी समय कलकत्ता के एक लेखक प्रियदर्शी प्रकाश दिल्ली चले आये। तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली के लेखकों में उनकी तस्वीर न जा सकी। लेकिन थे वे भी बड़े हठी! लेखकों में अपनी तस्वीर दिलवानी थी, सो फिर कलकत्ता जा पहुंचे।

वहां जाने पर पता चला कि ‘कलकत्ता के लेखकों की तस्वीर’ कुछ कारणों से अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी है।

प्रियदर्शी प्रकाश बनारस पहुंचे। पद्मधर त्रिपाठी ने कहा, “मैं तो लेखकों की तस्वीर भेज चुका हूं।” अभी भी उम्मीद बाक़ी थी। भागे-भागे लखनऊ पहुंचे। वहां उन्हें जवाब मिला, “जनाब! हम आपके जज़्बात की क़द्र करते हैं, लेकिन आपकी तस्वीर कैसे लखनऊ वालों के साथ दे सकते हैं, जब आप लखनऊ के हैं ही नहीं।”

प्रियदर्शी प्रकाश निराश होकर दिल्ली लौट आये। और फिर ‘सारिका’ संपादक के पास ख़त लिखा “सबसे आख़िर में आप किस शहर के लेखकों की तस्वीर प्रकाशित करेंगे? सूचित करें। जिससे मैं अभी से उस शहर में जाकर अपना अड्डा जमा लूं।”

लौटती डाक से संपादक ने जवाब दिया, “निराश न हों।” “पुनश्चः- ‘दिल्ली के लेखकों की एक और तस्वीर’ श्री मनोहर श्याम जोशी लिखने वाले हैं उनसे संपर्क स्थापित करें।”

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इंटरव्यू

डॉ. रणवीर रांग्रा ने नौकरी के लिए कहीं प्रार्थना-पत्र भेजा। प्रार्थना-पत्र के अंत में उन्होंने लिखा, “आशा है, आप मेरी योग्यताओं पर ध्यान देते हुए मुझे इंटरव्यू के लिए अवश्य बुलाएंगे।”

कुछ दिन बाद जवाब आया, “खेद है कि हम आपको इंटरव्यू के लिए बुलाने की स्थिति में नहीं है, आप जब यशपाल, जैनेंद्र, नगेंद्र, अज्ञेय आदि महान लोगों के इंटरव्यू ले चुके हैं, तो भला हम आपका इंटरव्यू कैसे ले सकते हैं!”

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खोलकर देख

विश्व हिंदी सम्मेलन की तीन दिन की गहमागह‌मी के बाद कुछ लेखक-मित्रों ने रामटेक घूमने का कार्यक्रम बनाया; उनमें बालकवि बैरागी, बरसानेलाल चतुर्वेदी, अमृतराय, जगदीश गुप्त, श्रीकांत जोशी, धर्मवीर भारती, महावीर अधिकारी आदि थे।

अधिकारी ने पहली बार जगदीश गुप्त को देखा था और बड़े मुदित थे। बार-बार उनकी विपुल काया को देख उनकी तन्दुरुस्ती पर आश्चर्य करते।

बैरागी ने एक पुराना मंदिर दिखाकर कहा, “और अधिकारी जी, इस मंदिर का चमत्कार यह है कि इन पत्थरों की चिनाई नहीं हुई है। न चूना न सीमेंट, किन्तु एक-पर-एक पत्थर सैकड़ों साल से ऐसे ही रखे हैं।”

अधिकारी एकदम चिल्लाकर जगदीश जी की ओर इशारा करके बोले, “अरे देख देख, इन्हें खोलकर देख। चिनाई हुई है या यूं ही एक-पर-एक रख दिया गया है।”

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कोणार्क का मंदिर

बात उस ज़माने की है जब शहर इलाहाबाद में कलयुग नहीं आया था। ‘परिमल’ ने वार्षिक पर्व के अवसर पर जगदीश चन्द्र माथुर का ‘कोणार्क’ खेलने की योजना बनायी और तय किया गया कि उसमें सभी साहित्यकार ही अभिनय करेंगे और निर्देशन करेंगे श्री सुमित्रानंदन पंत। सभी साहित्यकार मन-ही-मन डर रहे थे कि स्टेज पर कहीं हूट न कर दिये जाएं, लेकिन फिर भी हिम्मत बांधे हुए थे। यहां तक कि डॉ. जगदीश गुप्त भी तैयार हो गये कि यदि सभी मंच पर उतरेंगे, तो वे भी पीछे नहीं हटेंगे।

उनकी विशाल काया के प्रति अत्यन्त आमोद पूर्ण आदर का भाव सबके मन में था और सभी इस बात के लिए इच्छुक हो उठे कि डॉ. जगदीश गुप्त ज़रूर अभिनय करें।

जिस दिन निर्देशक श्री सुमित्रानंदन पंत ने भूमिकाएं बांटने के लिए सबको बुलाया उस दिन सभी का दिल धड़-धड़ कर रहा था। एक-एक पात्र का नाम लिया जाता, लेखक आगे आते और पंतजी उन्हें उनका पार्ट बता देते। डॉ.बाहरी, विजय देव नारायण साही, केशव चन्द्र वर्मा, धर्मवीर भारती…

हर बार एक आदमी आगे आता और हर बार जगदीशजी दो क़दम और पीछे हट जाते। भारती जी ख़ास तौर से जगदीशजी के द्वारा हिन्दी रंगमंच के उत्थान के लिए व्याकुल थे। हर बार एक भूमिका बंटे कि वे बोलें “पंतजी! जगदीशजी कौन-सी भूमिका करेंगे?” पंतजी उन्हें हाथ के इशारे से कहें, “ठहरिए!”

होते-होते सब भूमिकाएं बंट गयीं और जगदीश जी अछूते बच गये। अब जगदीश जी के चेहेरे पर विजय का उल्लास। भारती जी ने आख़िरी बार निराश स्वर में कहा “पंतजी! जगदीश जी को कोई पार्ट नहीं दिया आपने!”

पंतजी मुस्कराये और बहुत मधुरता से जगदीश जी की ओर देखकर खड़े होकर बोले- “सबसे महत्वपूर्ण पार्ट इन्हीं का होगा”, और दोनों हाथों से गोलाकार शिखर बनाते हुए बोले- “जगदीश जी ही तो कोणार्क का मन्दिर बनेंगे!”

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विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

शिक्षा से सिविल इंजीनियर। पेशे से अध्यापक रहे। "क़िस्से बदरंग कोराना के संग", "बैताल कथाएं", "बेमतलब की" जैसे कॉलम थोड़े बहुत चर्चा में रहे। छुटपुट कहानी, कविता आकाशवाणी से प्रसारित होती रही और प्रकाशित भी होती रहती है। कोई पुस्तक, कोई पुरस्कार नहीं।

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