'आत्मसंभवा आण्डाल': भक्ति साहित्य में स्त्री-स्वर
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

'आत्मसंभवा आण्डाल': भक्ति साहित्य में स्त्री-स्वर

          आज जिस पुस्तक पर चर्चा है वह कथा साहित्य का हिस्सा नहीं है। बाइस-तेईस सौ वर्ष पूर्व से लेकर मध्यकाल तक का सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक इतिहास है, जिसकी पृष्ठभूमि में धार्मिक आस्थाएँ हैं, संघर्ष हैं और गहरी मानवीय संवेदना के स्त्री स्वर हैं। सुभाष राय की यह पुस्तक ईसा पूर्व दो-तीन सौ साल से लेकर आज तक के सामाजिक स्वरूप में भक्ति आंदोलन का इतिहास वृत्त प्रस्तुत करती है और पूरे कथारस के साथ इस अल्पचर्चित पक्ष को पाठकों के सामने एक प्रवाहमान कथा के रूप में सामने लाती है।

सुभाष राय हमारे समय के महत्वपूर्ण लेखक और पत्रकार हैं। उनकी मुख्य तौर पर पहचान एक सचेत, संवेदनशील कवि के रूप में रही है। उनके दोनों कविता-संग्रह ‘सलीब पर सच’ और ‘मूर्तियों के जंगल में’ चर्चित हुए। एक निबंध संग्रह ‘जाग मछंदर जाग ‘ और लेख संग्रह ‘अंधेरे के पार’ प्रकाशित हो चुके हैं। अनेक प्रतिष्ठित दैनिक पत्रों में शीर्ष पदों पर रहने के बाद पिछले कई वर्षों से लखनऊ से प्रकाशित दैहिक ‘जनसंदेश टाइम्स ‘के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं।

सुभाष राय की भक्ति काव्य में विशेष दिलचस्पी रही है और संत कवि दादूदयाल पर उनका शोध प्रबंध भी है। पिछले कुछ समय से उनका अध्ययन दक्षिण भारत के भक्ति काव्य पर केंद्रित हुआ है। 2024 में ‘दिगंबर विद्रोहिणी अक्क महादेवी’ पर उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई, जो बारहवीं सदी में कर्नाटक की भक्त कवयित्री के जीवन, दर्शन और रचना संसार पर है। इस वर्ष उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक ‘आत्मसंभवा आण्डाल’ प्रकाशित हुई है। तमिल भक्त कवयित्री आण्डाल के जीवन और काव्य की इसमें विस्तार से चर्चा की गयी है और उनके गीतों को हिन्दी में प्रस्तुत किया है।

यह पुस्तक महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह दक्षिण के भक्ति आंदोलन के उदय और विकास के साथ तमिल समाज और इतिहास पर भी विस्तार से चर्चा करती है और आलवार संतों के भक्ति काव्य का समुचित परिचय मिलता है।

'आत्मसंभवा आण्डाल': भक्ति साहित्य में स्त्री-स्वर

ईसा पूर्व लगभग दो सौ साल पहले से लेकर तीसरी चौथी शताब्दी तक दक्षिण में भी जैन और बौद्ध धर्म का वर्चस्व था। राज्याश्रय मिलने तथा अनेक राजाओं के जैन और बौद्ध धर्म का अनुयायी होने से वैदिक धर्म के साथ टकराव स्वाभाविक था। कहते हैं ‘भक्ती द्राविड़ उपजी’- यानि भक्ति आंदोलन का सूत्रपात दक्षिण की तमिल भूमि पर हुआ। भारत के अन्य क्षेत्रों (विशेष रूप से उत्तर भारत) के समान यहाँ भी पाँच-छह सौ वर्षों तक वैदिक समाज-संस्कृति के साथ बौद्ध और जैन धर्म भी प्रमुखता में थे। उत्सवधर्मी होने और यज्ञादि कर्मकांडों के चलते जनता में परंपरागत वैदिक धर्म ही लोकप्रिय था। राज्याश्रयी होने के कारण इनके बीच टकराव स्वाभाविक था और कभी-कभी यह विरोध क्रूर और हिंसक भी होता था।

तमिलनाडु के इतिहास में यह ‘अंधयुग’ कहलाया जब यज्ञादि कर्मकांडों पर पाबंदियाँ लगीं। छठी शताब्दी के अंत में पल्लव, पाण्ड्य और चालुक्य शासकों ने उत्तर तमिलनाडु से लेकर मदुरै अंचल और बादामी में कलभर शासकों का अंत किया। उत्तर भारत में भी ईसा पूर्व कुछ समय पहले सम्राट अशोक के बाद तीसरी पीढ़ी के राजा बृहद्रथ की हत्या ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी थी और राजगद्दी पर बैठकर पुनः वैदिक-ब्राह्मण धर्म स्थापित कर बड़े पैमाने पर बौद्धों का संहार कराया।

तमिलनाडु में अब शैव नायनार और वैष्णव आलवार अपने आराध्यों के भक्ति गीतों के साथ सामने आये। शैव और आलवार संतों ने जैन और बौद्धों के सैद्धांतिक और भौतिक विरोध के साथ ही नृत्य, संगीत और गृहस्थ जीवन के सुख का गान किया। यह भक्ति साहित्य के साथ ही तमिल प्रदेश के सांस्कृतिक, लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का अभिनव काल भी माना जाता है।कहते हैं राजकीय संरक्षण में वैष्णव संस्कृति, कला, साहित्य के साथ नृत्यकला का अद्भुत विकास हुआ। लोकनाट्य मंचन के साथ मंदिर तर्कशास्त्र, खगोल विद्या और औषधि विज्ञान के केंद्र भी बने।

दलितों, शूद्रों के साथ स्त्रियाँ भी जीवन के गीत गाते हुए घर की चारदीवारी से बाहर निकलीं। आलवार भक्त, विष्णु भक्ति के गायक, उन्होंने भगवान से मानवीय प्रेम का रिश्ता क़ायम कर उसे अब सखा, सेवक कभी माँ तो कभी प्रिय के सगुण रूप में देखा।

आलवारों का भक्ति दर्शन प्रेम ही था। सामाजिक क्रांति के साथ सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इस भक्ति आंदोलन ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी के आते-आते उत्तर भारत तक जन-मानस को प्रभावित किया।

आलवार संतों की काव्य परंपरा में शामिल स्त्री भक्त कवि आण्डाल की विभिन्न छवियाँ कई शताब्दियों तक जनमानस में रही हैं। आण्डाल के जन्म से लेकर उनके युवा होने, विष्णु भगवान के प्रति उनके उत्कट प्रेम भाव, उनको वरण करने से लेकर मृत्यु तक की यात्रा अनेक कथाओं और मिथकीय कल्पनाओं से जुड़ी है।

कहते हैं, आठवीं-नवीं शताब्दी में तमिलनाडु के प्राचीन नगर पुदुवै में एक संत कवि और मंदिर के पुजारी विष्णुचित्त रहते थे। उनको अपने बग़ीचे में एक बहुत सुंदर शिशु कन्या मिली जिसे वो अपने घर ले आये और नाम रखा ‘गोदा’। घर में वे उसे ‘कोदै’ बुलाते, यानि सुगंधित केशों वाली लड़की। कोदै भगवान विष्णु को चढ़ाने के लिए बनी माला खुद पहन लेती जिसे विष्णुचित्त अलग कर देते। उसने बचपन से ही स्वयं को विष्णु की पत्नी मान लिया था। एक दिन विष्णुचित्त के सपने में भगवान विष्णु आये और उन्होंने कोदै की पहनी हुई माला ही उन्हें चढ़ाने का आग्रह किया। विष्णुचित्त को समझ में आ गया कि भगवान विष्णु भी कोदै को प्रेम करते हैं। उन्होंने उसे आण्डाल नाम दिया यानि विष्णु पर राज करने वाली। कोदै छोटी उम्र से ही काव्य रचना करने लगी थी। उसके गीतों में प्रिय की याद, उन्हें पाने की तीव्र आकांक्षा, विरह की मारक यातना, जो लौकिक प्रेम के रूप में भी है, अंकित होता है।

कहते हैं यह विष्णु ही उनका कृष्ण भी था। अनेक गीतों में कृष्ण की भावभूमि वृन्दावन की कल्पना भी है। कृष्ण के रंग-रूप श्री रंगनाथ ने विष्णुचित्त को सपने में आण्डाल के लिए निर्देश दिया कि वह उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार है।

कहते हैं, “आण्डाल को दिव्य वस्त्र और स्वर्णाभूषणों से सजाकर वधू रूप में श्रीरंगम ले जाया गया। तत्कालीन नरेश श्री वल्लभदेव स्वयं बारात का नेतृत्व कर रहे थे। वहाँ पहुँचकर वो डोली से उतरी, श्रीरंगनाथ की मूर्ति के पास गयीं, उनका आलिंगन किया और उसी में समा गयीं। उस समय उनकी उम्र सोलह वर्ष की थी।”

कहते हैं अपने जन्म से कुछ सौ साल बाद लोक में संत रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थीं यद्यपि इस मान्यता पर विद्वानों की पूर्ण सहमति का अभाव भी रहा। तेरहवीं शताब्दी के परवर्ती काल में बारह आलवार संतों की मूर्तियों में आण्डाल को भी शामिल कर लिया गया।

इस पुस्तक में लेखक ने प्रचलित भक्ति आंदोलन, भक्ति की अवधारणा, अवतारवाद और देवी-देवताओं के स्वरूप का विवेचन उपलब्ध साक्ष्यों के प्रकाश में किया है, जो अध्ययन को वैज्ञानिक आधार देता है। आण्डाल की कविताएँ प्रेम का विराट रूपक हैं। प्रेमिका के रूप में आण्डाल ने अपने अद्वितीय रूप का वर्णन किया तो परवर्ती कवियों ने उसकी प्रशंसा और रूप वर्णन में सारी सीमाएँ लाँघ दीं। पन्द्रहवीं शताब्दी के नरेश कवि कृष्णदेव राय ने अपने मशहूर ग्रंथ आमुक्त माल्यदा में आण्डाल के सौंदर्य का अकल्पनीय वर्णन किया है।

यह पुस्तक एक लयबद्ध कथावस्तु की तरह प्रवाहमय भाषा में इस शोधकार्य को प्रस्तुत करती है और भक्तिकाल के अनेक अनछुए अचर्चित हिस्सों पर इतिहास सम्मत संदर्भों के साथ प्रकाश डालती है। इस महत्वपूर्ण कृति के लिए सुभाष राय को बहुत बधाई।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

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