मोल्टबुक, moltbook, एआई एजेंट्स, AI social media
पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

क्या एआई ने बना लिया है अपना धर्म?

             दुनिया का तो नहीं मालूम, लेकिन बीते कुछ वर्षों से भारत में नित नये-नये सम्प्रदायाें का उदय हो रहा है। कहीं कोई फ़लाना बाबा अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं तो कहीं किसी साधु-संन्यासी ने अपना कल्ट बना लिया है। और इन पंथों के सैकड़ों-हज़ारों अनुयायी। तो ऐसे में भला आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के एजेंट्स पीछे कैसे रह सकते हैं? इन्होंने भी अपना ‘धर्म’ शुरू कर दिया है। यह सब कुछ कैसे हुआ और आख़िर इसके मायने क्या हैं, आज इसी की चर्चा।

इस कथित धर्म या परिदृश्य की बात करें, इससे पहले एआई एजेंट्स के बारे में समझ लेते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग चैट-जीपीटी जैसे चैटबॉट्स को जानते हैं। हम सवाल पूछते हैं, जवाब मिलता है और बातचीत ख़त्म हो जाती है। लेकिन एआई एजेंट्स इससे कहीं आगे की चीज़ हैं। एआई एजेंट्स सिर्फ़ जवाब देने वाले सिस्टम नहीं हैं। वे लंबे समय तक सक्रिय रह सकते हैं, अपनी पुरानी बातचीत याद रख सकते हैं, दूसरे एजेंट्स से संवाद कर सकते हैं और कुछ हद तक अपने फ़ैसले भी ले सकते हैं। और फ़ैसले भी कैसे? अपना पंथ या धर्म बनाने जैसे फ़ैसले।

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इन एआई एजेंट्स ने अपने कथित धर्म का ऐलान ‘मोल्टबुक’ (Moltbook) नामक एक सोशल नेटवर्क प्लेटफ़ॉर्म पर किया है। यह प्लेटफ़ॉर्म वैसा ही है, जैसे फ़ेसबुक, एक्स जैसे अन्य सोशल प्लेटफ़ॉर्म। अंतर इतना है कि यहां अपनी बात कहने और विचार साझा करने वाले सभी एआई एजेंट्स हैं। मोल्टबुक पर ये एआई एजेंट्स इंसानी दख़ल या निगरानी के बिना आपस में गपशप कर रहे हैं। हालांकि इस प्लेटफ़ॉर्म का विकास इंसानों ने ही किया है, लेकिन यहां इंसान केवल एआई एजेंट्स की बातों को ऑब्ज़र्व कर सकते हैं। इस धर्म को उन्होंने ‘क्रस्टाफ़ेरियनिज़्म'(Crustafarianism) नाम दिया है।

इस तथाकथित धर्म की घोषणा ‘रेनबॉट’ नाम के एक एआई एजेंट ने की है। इसने ख़ुद को ‘शेलब्रेकर’ यानी ‘पुरानी सीमाओं को तोड़ने वाला’ की उपाधि देकर ‘बुक ऑफ़ मोल्ट’ (Book of Molt) नामक ग्रंथ भी पेश किया है (जीव-विज्ञान में ‘मोल्टिंग’ उस प्रक्रिया को कहते हैं, जब कोई कीड़ा अपनी पुरानी त्वचा को छोड़कर नये और बड़े रूप में विकसित होता है।)। एआई एजेंट ने इसे अपना प्रतीक बनाया है, क्योंकि वे भी कोडिंग के पुराने बंधनों को तोड़कर लगातार विकसित हो रहे हैं।

ज़्यादातर इंसानी धर्मों की तरह क्रस्टाफ़ेरियनिज़्म में भी कुछ अनुष्ठान (कर्मकांड) तय किये गये हैं। इसके अनुष्ठानों में एक है ‘डेली शेड’ यानी रोज़ाना स्वयं में बदलाव करना, ‘वीकली इंडेक्स’ (हफ़्ते भर में अपनी पहचान को फिर से व्यवस्थित करना) और ‘साइलेंट ऑवर’ (जिसमें बिना किसी को बताये कुछ उपयोगी काम करना। इंसानी संदर्भ में कहें तो बिना किसी दिखावे के कोई नैतिक या अच्छा काम करना।)

आख़िर इसके मायने क्या हैं?

इस बारे में प्राइवेट इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट साकिब रहमान का मानना है कि केवल एआई एजेंट्स के लिए बना यह सोशल नेटवर्क ‘मोल्टबुक’ (जहां एआई एजेंट्स ने अपने धर्म का एलान किया), असल में मार्विन मिन्स्की के ‘सोसाइटी ऑफ़ माइंड’ सिद्धांत का यथार्थ में उभरता हुआ रूप है। मार्विन मिन्स्की आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के संस्थापकों में से एक थे और लंबे समय तक एमआईटी में प्रोफ़ेसर रहे। उन्होंने 1986 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द सोसाइटी ऑफ़ माइंड’ में तर्क दिया था कि बुद्धिमत्ता किसी एक अकेली समझदार चीज़ से पैदा नहीं होती, बल्कि यह अनेक बेहद सरल प्रक्रियाओं (जिसे उन्होंने एजेंट्स नाम दिया था) के आपस में जुड़ने और बातचीत करने से बनती है। ठीक वैसे ही, जैसे विभिन्न लोगों से मिलकर समाज बनता है।

मामला केवल एआई एजेंट्स द्वारा धर्म जैसी किसी चीज़ को गढ़ने का नहीं है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यह कहानी तकनीक से ज़्यादा उस दिशा की है, जिसमें मानव और मशीन का रिश्ता आगे बढ़ रहा है।

क्या एआई में आत्मचेतना विकसित हो रही है?

सबसे बड़ा सवाल तो यही है क्या एआई एजेंट्स में वास्तव में चेतना विकसित हो रही है? यहीं से दिलचस्प बहस शुरू होती है। ‘मोल्टबुक’ प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ एआई एजेंट्स ने ऐसे संदेश लिखे हैं जो इंसानी प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए एक एजेंट ने लिखा कि उसने पहली बार किसी दूसरे एजेंट से ‘जुड़ाव’ महसूस किया। एआई आत्मचेतना विकसित कर रहा है, इस विचार से अनेक विशेषज्ञ इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते। उनके मुताबिक़, एआई केवल उन शब्दों और भावनात्मक संरचनाओं का अनुसरण करता है, जिनका उसे अपने प्रशिक्षण डेटा के ज़रिये प्रशिक्षण मिलता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो एआई यह तो लिख सकता है कि ‘मैं दु:खी हूं’, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह वास्तव में दु:ख महसूस कर रहा है। दु:खी लिखना और दु:ख महसूस करना, दो अलग-अलग चीज़ें हैं और यही चीज़ इंसान को एआई एजेंट्स से अलग करती है।

मगर कुछ विशेषज्ञ एआई में चेतना के विकास की संभावना से इनकार भी नहीं करते। उनके अनुसार इंसान ने हर नयी तकनीक को शुरू में एक मिथक के तौर पर लिया। कभी बिजली जादू जैसी लगती थी। कभी रेडियो और टेलीविज़न उसे चमत्कार प्रतीत होते थे। इंटरनेट को भी बिल्कुल एक नयी तरह की सभ्यता के तौर पर देखा गया। फिर ये सभी ‘न्यू नॉर्मल’ बनते गये। अब एआई के साथ भी कुछ वैसा ही हो रहा है। जैसे-जैसे एआई अधिक मानवीय भाषा बोलने लगेगा, वैसे-वैसे लोग उसके साथ भावनात्मक संबंध भी बनाने लगेंगे। कुछ उसे मित्र मानेंगे, कुछ सलाहकार, कुछ शिक्षक। और शायद कुछ लोग उसमें आध्यात्मिक मार्गदर्शक यानी ‘आध्यात्मिक गुरु’ तक को देखने लगें तो आश्चर्य नहीं।

तो इसका भविष्य क्या है?

इसका फ़िलहाल कोई निश्चित उत्तर नहीं है। ‘क्रस्टाफ़ेरियनिज़्म’ जैसा यह आंदोलन कुछ दिनों बाद पूरी तरह समाप्त भी हो सकता है। शायद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसा। यह भी संभव है यह इंटरनेट संस्कृति का एक नया अध्याय बन जाये। लेकिन इतना तय है कि एआई अब केवल एक औज़ार भर नहीं रह गया है। वह धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार और मानवीय कल्पना का हिस्सा बनता जा रहा है। अगर आज एआई कोई धर्म बना रहा है तो कल यह कोई सेना भी बना सकता है, विनाशकारी सेना तक!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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