हास्य-व्यंग्य का शाहकार इब्न-ए-इंशा की यह किताब
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

हास्य-व्यंग्य का शाहकार इब्न-ए-इंशा की यह किताब

      “उनकी प्रवाहमयी गद्य शैली ने अनगिनत सुंदर, लेकिन अब अप्रचलित और भुला दिये गये शब्दों में नयी जान और ऊर्जा भर दी है। उर्दू हास्य में उनकी शैली और लय न केवल नवीन है, बल्कि अद्वितीय भी है।” -मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

“इब्न-ए-इंशा एक स्वाभाविक हास्यकार हैं। वे जितना अधिक लिखते हैं, उनकी शैली उतनी ही अधिक निखरती है।” -ख़ालिद अख़्तर

इब्न-ए-इंशा का हास्य केवल शब्दों, चुटकुलों या हास्यास्पद पात्रों का हेरफेर मात्र नहीं है, बल्कि उनका हास्य कल्पना की एक सृजन है।” -सहर अंसारी

“उर्दू की आख़िरी किताब” मुहम्मद हुसैन आज़ाद की “उर्दू की पहली किताब” की एक दिलचस्प पैरोडी (व्यंग्य-नक़ल) है। पैरोडी शब्द ग्रीक शब्द ‘parodia’ से आया है, जिसका अर्थ है “जवाबी गीत”। उर्दू साहित्य में व्यंग्य और हास्य की यह युक्ति सीधे तौर पर अंग्रेजी साहित्य से ली गयी है। इसमें किसी शब्द या रचना का उपहास, शब्दों की नक़ल करके या शब्दों को बदलकर किया जाता है। उर्दू साहित्य में इस किताब को एक सफल पैरोडी माना जाता है, क्योंकि इब्न-ए-इंशा पैरोडी की कला को भली-भांति समझते हैं।

इब्न-ए-इंशा से पहले “पतरस बुखारी” भी आज़ाद की इस किताब पर अपनी क़लम चला चुके थे। लेकिन उनका उद्देश्य कुछ बुनियादी सबक़ देना था; और दूसरी बात यह कि इन दोनों व्यंग्यकारों के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर है। पतरस का दृष्टिकोण विशुद्ध रूप से मनोरंजन-प्रधान है, जबकि इब्न-ए-इंशा सामाजिक असमानताओं और अन्याय को अपना निशाना बनाते हैं, और उनका उद्देश्य समाज-सुधार है।

हास्य-व्यंग्य का शाहकार इब्न-ए-इंशा की यह किताब

‘उर्दू की आखिरी किताब’ की शैली बहुत ही प्रवाहपूर्ण और सहज है। इब्न-ए-इंशा ने आज़ाद की शैली को अपनाने की कोशिश की है, और यह मूल रूप से इब्न-ए-इंशा का अपना काव्य-स्वभाव है। इसलिए, उनके गद्य में लय, शब्दों की पुनरावृत्ति और संगीतात्मकता का गहरा बोध मिलता है। उन्होंने किताब के कवर पर ही “रिजेक्टेड टेक्स्टबुक बोर्ड” जैसा शीर्षक देकर हँसी का माहौल बना दिया है। पूरी किताब में नज्मी द्वारा बनाये गये 101 कार्टूनों के रूप में एक नयी बहार देखने को मिलती है। इन कार्टूनों की वजह से किताब की रोचकता और आकर्षण और भी बढ़ गया है। इसलिए, ख़ालिद अहमद को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा, “उर्दू की आख़िरी किताब के लेखक दो हैं— एक इब्न-ए-इंशा और दूसरे नज्मी।

यह किताब वास्तव में शिक्षा-प्रणाली, सामाजिक दृष्टिकोणों और पाठ्यपुस्तकों की शैली पर किया गया एक दिलचस्प व्यंग्य है। इब्न-ए-इंशा ने इस किताब में बच्चों की पाठ्यपुस्तकों की नक़ल करते हुए एक अत्यंत हास्यपूर्ण शैली अपनायी है, जो पाठकों का मनोरंजन भी करती है और साथ ही समाज की कमियों को भी उजागर करती है।

इस किताब की भाषा अत्यंत सरल, चुटीली और आकर्षक है। इब्न-ए-इंशा ने रोज़मर्रा के विषयों का वर्णन इस अंदाज़ में किया है कि पाठक हँसने पर मजबूर हो जाता है। इस किताब में नक़ली पाठ (mock lessons), हास्यपूर्ण प्रश्न, दिलचस्प लेख और व्यंग्यपूर्ण कहानियाँ शामिल हैं। इनके माध्यम से लेखक ने रटने वाली शिक्षा-पद्धति, सामाजिक पाखंड और कुछ आधिकारिक रवैयों की आलोचना की है।

‘उर्दू की आख़िरी किताब’ को उर्दू हास्य-साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति (masterpiece) माना जाता है। यह किताब न केवल मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि पाठकों को सोचने-विचारने का अवसर भी देती है। आज भी, यह किताब छात्रों और उर्दू साहित्य के प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

यह किताब कई अलग-अलग, आकर्षक, व्यंग्यपूर्ण और मज़ेदार वाक्यों से भरी हुई है। इसलिए, किताब के शुरूआती अध्यायों में दिये गये सवालों, शिक्षाप्रद कहानियों, गणित के नियमों, जानवरों के विवरण, पक्षियों के बारे में जानकारी, रामायण और महाभारत के समय से लेकर महाराजा रणजीत सिंह के समय तक के इतिहास, भूगोल के पाठ, प्राकृतिक दृश्यों के ज़िक्र, शुरूआती विज्ञान और व्याकरण को नज़रअंदाज़ नहीं किया गया है। और तो और मौलाना शेख़ सादी की कहानियों को भी नहीं छोड़ा गया है।

उद्धरण-1 : “दुनिया गोल है…!

गोल होने का फ़ायदा यह है कि जब लोग पूरब से जाते हैं, तो वे पश्चिम में पहुँच जाते हैं। कोई उन्हें पकड़ नहीं सकता। तस्करों और अपराधियों के लिए यह बहुत आसान हो गया है। हिटलर ने धरती को चपटा करने की कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ। फिर गैलीलियो नाम का एक आदमी आया और उसने धरती को सूरज के चारों ओर घुमाना शुरू कर दिया। पादरी बहुत नाराज़ हुए कि उसने हमें इतनी बड़ी मुसीबत में डाल दिया! उन्होंने गैलीलियो को सज़ा दी और उसे भविष्य में ऐसी चीज़ें करने से रोक दिया। हालाँकि, वे धरती को नहीं रोक पाये; वह अब भी घूम रही है।”

उद्धरण-2 : “गाय”

हे ईश्वर, तेरा शुक्र है भाई
जिसने हमारी गाय बनाई

“यह कविता मौलवी इस्माइल मेरठी की है। शेख़ सादी वग़ैरह की नहीं। यह भी एक अच्छा जानवर है। यह दूध कम देती है, लेकिन सम्मान ज़्यादा पाती है। पुरानी सोच वाले हिंदू इसे ‘माताजी’ कहते हैं। वैसे, बछड़ों के साथ भी इसका वैसा ही रिश्ता होता है।

सही सोच वाले हिंदू गाय का दूध पीते हैं, उसके गोबर को अपने पैरों पर लगाते हैं, लेकिन उसे मारना पाप मानते हैं। उनकी मान्यता के अनुसार, जो कोई भी गाय को मारता है और उसे खाता है, वह सीधे नरक में जाता है। रास्ते में वह कहीं भी साँस नहीं लेता। यही कारण है कि जब कोई गाय दूध देना बंद कर देती है, तो हिंदू उसे कसाई को बेच देते हैं। कसाई मुसलमान होता है; वह उसे मारता है और दूसरे मुसलमानों को खिलाता है। इस तरह वे सब नरक में जाते हैं। बेचने वाले को आध्यात्मिक संतुष्टि मिलती है। और पैसे उसे अलग से मिल जाते हैं।

जिन गायों को कसाई नहीं लेता, उन्हें गौशालाओं में रखा जाता है; जहाँ वे भूखी रहकर तपस्या करती हैं। और कौवे उन्हें चोंच मारते हैं। लोग उनके सहारे अपनी ज़िंदगी बेहतर बना रहे हैं। विदेशी पर्यटक उनकी तस्वीरें खींचते हैं। वे किताबों में छपती हैं। उनकी खालें निर्यात की जाती हैं। विदेशी मुद्रा कमायी जाती है। शास्त्रों में लिखा है यह दुनिया गाय के सींगों पर टिकी है। लेकिन गाय खुद किस चीज़ पर खड़ी है? उसका गोबर कहाँ गिरता है और उसका मूत्र कहाँ जाता है? ये सारी बातें शास्त्रों में इसलिए नहीं लिखी गयी हैं, क्योंकि ऐसा करने से शास्त्र बहुत लंबे हो जाते।”
…………

किताब में व्याकरण का पाठ एक सफल पैरोडी है। बयान करने के अंदाज़ में कोई कड़वाहट नहीं है, और भाषा तथा बयान की चंचलता का इस्तेमाल हास्यकारों की युक्तियों के बीच किया गया है। लेकिन मुहावरों का इस्तेमाल घिसे-पिटे तरीक़े से किया गया है, जिससे हास्य का एक अनोखा रूप सामने आता है।

एक ‘ज़रूरी क्रिया’ वह है जिसे करना ज़रूरी हो, उदाहरण के लिए: किसी अफ़सर को ख़ुश करना, सरकार से डरना, अपनी पत्नी से झूठ बोलना, वग़ैरह।

“एक ‘संक्रामक क्रिया’ आम तौर पर किसी संक्रामक बीमारी की तरह फैलती है। उदाहरण के लिए: एक व्यक्ति परिवार की देखभाल करता है, तो दूसरे भी ऐसा ही करते हैं। एक व्यक्ति रिश्वत लेता है, तो दूसरे उससे भी ज़्यादा लेते हैं।”

सिर्फ़ तुकबंदी वाली गद्य-रचना ही नहीं, बल्कि तुकबंदी या दिलचस्प अनुप्रास का भी इस्तेमाल किया गया है… “जो बहुत ज़्यादा गन्ना खाएगा, उसे डायबिटीज़ हो जाएगी; उसे सुइयाँ लगवानी पड़ेंगी और उसे मार भी पड़ेगी।”

“ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है; इसलिए एक स्कूल खोलो, ज्ञान का अध्ययन करो, फ़ीस चुकाओ और धन कमाओ। फ़ीस तो फ़ीस ही है— पढ़ाई के लिए बीस, बस के लिए तीस और यूनिफ़ॉर्म के लिए चालीस।”

“सब्ज़ियों का ख़्याल छोड़ दो, विटामिनों से मुँह मोड़ लो; दाल-सब्ज़ी मत खाओ, बस जो मुँह में आये, वही खा लो।”

एक नज़र : इब्न-ए-इंशा

उनका असली नाम शेर मुहम्मद ख़ान था। उनका जन्म 15 जून, 1927 को जालंधर के पास हुआ था। उन्होंने 1946 में BA और 1953 में कराची विश्वविद्यालय से MA किया। 1962 में उन्हें नेशनल बुक काउंसिल का निदेशक नियुक्त किया गया। एक स्तंभकार के तौर पर, उन्होंने दैनिक ‘जंग’ और ‘इमरोज़’ में हल्के-फुल्के और हास्यपूर्ण स्तंभ लिखना जारी रखा। उन्होंने यात्रा-वृत्तांत लिखे और एक अनोखी शैली की कविताएँ रचीं। उन्होंने चीनी कविताओं का पद्य रूप में अनुवाद भी किया। उनकी रचनाओं की सूची इस प्रकार है:

कविता: इस शहर के एक कोने में, चाँद नगर, दिल वहशी, बल्लो का बस्ता (बच्चों के लिए कविताएँ)।
यात्रा-वृत्तांत: एक घुमक्कड़ की डायरी, दुनिया गोल है, इब्न बतूता की तलाश में, अगर आप चलें तो चीन जाएँ, नगरी नगरी और फिर यात्रा।
लेख: आपसे क्या पर्दा, खमार गंदुम।
पत्र: तो ख़त इंशा जी।
हास्य-व्यंग्य: उर्दू की आख़िरी किताब
अनुवाद: अंधा कुआँ।

भारत के विभाजन के बाद, वे पाकिस्तान चले गये और जल्द ही अपनी साहित्यिक प्रतिभा के कारण उर्दू जगत में एक विशिष्ट स्थान बना लिया। वे एक कवि, हास्यकार, यात्रा-लेखक और स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध हुए।

उनकी रचनाओं में हास्य के साथ-साथ जीवन की कड़वी सच्चाइयों की भी झलक मिलती है। उन्होंने उर्दू गद्य और पद्य, दोनों में अपनी एक अलग पहचान बनायी। उनकी कविताएँ प्रेम, अकेलेपन, उदासी और मानवीय भावनाओं को ख़ूबसूरती से दर्शाती हैं। उनकी प्रसिद्ध ग़ज़ल “कल चौदहवीं की रात थी” आज भी बहुत लोकप्रिय है। उर्दू साहित्य की एक बहुमुखी और अद्वितीय हस्ती थे।

देहांत 11 जनवरी 1978 को लन्दन में हुआ। कराची में दफ़नाये गये। 1978 में तमग़ा हुस्न-ए-कारकर्दगी मिला।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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