
- May 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....
एक शख़्स का जुनून यानी भारतीय सिनेमा की नींव
नमस्कार साथियो, हम उम्मीद करते हैं आप सबको विश्व सिनेमा के इतिहास की कहानियां पसंद आ रही होंगी। चलिए देखते हैं इस बार की दास्तान।
वैसे तो कहानी कहने का दस्तूर दुनिया भर में बहुत पुराना है। लेकिन भारत में अनुमानित तौर पर क़रीब 3000 या फिर क़रीब 5000 साल पहले से कहानी सुनने और सुनाने की प्रथा चली आ रही है। जैसे कि पहले के ज़माने में लोग रोज़ शाम आग जलाकर एक साथ बैठा करते थे और दिन भर की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। फिर एक दौर आया जब लोग काम की तलाश में दूर देशों को जाया करते थे, तो रास्ते में सफ़र की थकान और बोरियत दूर करने के लिए कहानी सुनाया करते थे।
तब कहानियां अक्सर देवता, दानव, पशु, पक्षी और जीवन जीने के हमारे नियमों और प्रथाओं पर आधारित हुआ करती थी। धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन गया और एक तरह से सबके मनोरंजन का ज़रिया। आज भी भारत में लगभग हर त्यौहार या उत्सव बिना कहानी के अधूरा है।
फिर एक दौर आया जब कुछ लोगों ने कहानी सुनाने का कारोबार शुरू किया, जिसमें एक व्यक्ति अपनी खोज और जानकारी और कई बार अपने अनुभवों को सुनाया करता था और लोग विशेष रूप से समय निकालकर उसके पास जाया करते थे। धीरे-धीरे यही प्रथा नाटक, नौटंकी, सिनेमा और साहित्य की बुनियाद बन गयी और वर्तमान में कहानी कहने और सुनने वालों के द्वारा रचित एक बेहद सफल कारोबार भी और अब भविष्य में इस प्रथा का दारोमदार एआई जैसी तकनीक के माध्यम से भी किया जा रहा है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक बहुत सामान्य बात है जैसे कहानी की शुरूआत कहने और सुनने से हुई थी, आज इक्कीसवीं सदी में हम वापस वहीं तो नहीं पहुंच रहे! अब कहानियां ऑडियो बुक के ज़रिये भी युवाओं में बेहद प्रचलित हैं। फ़र्क इतना है तब कहानी सुनने के लिए वक़्त निकालकर बैठना पड़ता था और अब आप चलते-फिरते भी कहानी का आनंद ले सकते हैं। तो देखा आपने कहानी ने कितने रूप बदले लेकिन हर रूप में एक बात कभी नहीं बदली और वो है “कहानी”, कहानी कहने की कला का सफ़र — आग के पास बैठकर सुनने से लेकर स्क्रीन पर देखने तक और कान में ईयर फ़ोन डालकर सुनने तक — एक निरंतर विकास है।

ख़ैर, तो जब कहानी को पर्दे पर दिखाने की बात हो, विश्व सिनेमा की बात हो और दादा साहेब फाल्के का नाम न आये, ऐसा नहीं हो सकता। जिस दौर में पूरी दुनिया सिनेमाई चकाचौंध में घिरी हुई थी, उस वक़्त भारत में एक नौजवान धुंडिराज गोविंद फाल्के उर्फ़ दादा साहेब फाल्के भारत में सिनेमा को उतारने की तैयारी कर रहे थे।
उन्नीसवीं सदी का भारत… ब्रिटिश राज की ग़ुलामी में जकड़ा हुआ था। जहाँ बड़े बदलाव तो हो रहे थे जैसे, रेलें चल रही थीं, शहर बदल रहे थे, लेकिन मनोरंजन की दुनिया अब भी लोककथाओं, रामलीलाओं और नौटंकियों के इर्द-गिर्द घूमती थी। तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन भारत की अपनी चलती तस्वीरें होंगी — अपनी कहानियाँ, अपने देवता, अपने नायक। लेकिन महाराष्ट्र के एक छोटे-से क़स्बे त्र्यंबकेश्वर में जन्मा एक लड़का चुपचाप यह सपना देख रहा था और इसे सच बनाने की तैयारियों में जुटा था।
30 अप्रैल 1870 को त्र्यंबकेश्वर के धार्मिक वातावरण में धुंडीराज गोविंद फाल्के का जन्म हुआ। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे। घर में धार्मिक कथाएँ, पुराण और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप थी। शायद यहीं से उनके भीतर भारतीय कथाओं के प्रति प्रेम पैदा हुआ। बचपन से ही अलग थे। उनकी माँ एक पारंपरिक मराठी ब्राह्मण परिवार से थीं और ज़्यादातर परिवार में ही अपना समय बिताती थीं।
बचपन से फ़िल्म तक
जहाँ दूसरे बच्चे खेलकूद और मौज-मस्ती में व्यस्त रहते, वहीं फाल्के हर चीज़ के प्रति जिज्ञासु थे। और अक्सर अपने सवालों की खोज में लगे रहते। बचपन से ही फाल्के को पढाई में ज़्यादा रुचि नहीं थी बल्कि चित्रकारी, फ़ोटोग्राफ़ी और विजुअल आर्ट्स आकर्षित करते थे। इसलिए उन्होंने बम्बई के सर जेजे स्कूल आफ़ आर्ट्स और बड़ौदा के कला भवन में ड्रॉइंग, फ़ोटोग्राफ़ी, आर्किटेक्चर की शिक्षा ली। जो आगे चलकर उनकी सिनेमा की दुनिया की नींव की तरह काम आयी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद फाल्के ने फ़ोटोग्राफ़ी में हाथ आज़माया। वो घंटों तक डार्क रूम में रहा करते और कुछ नया करने की कोशिश करते रहते। उसके बाद उनको प्रिंटिंग प्रेस के प्रति रुचि हुई और उन्होंने जर्मनी जाकर प्रिंटिंग सीखी। वापस आकर 1900-1901 के बीच प्रिंटिंग प्रेस का कारोबार शुरू किया। इतिहासकारों की मानें तो वह प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा की कंपनी लीथोग्राफ़ प्रिंटिंग वर्ल्ड से भी जुड़े। उस समय रवि वर्मा की पेंटिंग्स को प्रिंट के रूप में फैलाया जा रहा था। लेकिन फाल्के इस सबसे संतुष्ट नहीं थे, साथ ही साझेदारी में खोली गयी प्रिंटिंग प्रेस कारोबार में भी दिक्कतें आने लगी थीं।
समय बीतता गया और इसी दौरान प्लेग जैसी महामारी के चलते उनकी पहली पत्नी और एक बच्चे की मृत्यु हो गयी। इस महामारी ने सिर्फ़ उनके व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि व्यावसायिक जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित किया। बीमारी के चलते काम के लिए लोगों का मिलना मुश्किल हो गया। दूसरी तरफ़, देश में प्रिंटिंग की नयी तकनीकों के आ जाने से भी काम कम होने लगा। यह घटना फाल्के के जीवन की सबसे दुखद घटनाओं में से एक थी। कुछ समय तक उनका जीवन लगभग रुक-सा गया था।
फिर आयी 1910 की वो शाम जब फाल्के अपनी दूसरी पत्नी सरस्वती बाई के साथ बम्बई के एक थिएटर में पहली बार द लाइफ़ आफ़ क्राइस्ट नाम की एक मूक फ़िल्म देखने गये। इसमें यीशु मसीह (Jesus Christ) के जीवन को दिखाया गया था। परदे पर जीसस क्राइस्ट की ज़िंदगी चल रही थी और फाल्के के दिमाग़ में अपने देवी-देवताओं की जीवन गाथा का मंचन हो रहा था। वो सोच रहे थे जब विदेशी लोग अपने भगवान का ऐसा चलचित्र बना सकते हैं तो हम क्यों नहीं! वापस आकर फाल्के पूरी रात सो नहीं पाये। उनका दिमाग़ कुछ नया बुन रहा था। भारतीय सिनेमा की नींव रखी जा रही थी और शायद अब उनको अपना मक़सद मिल गया था।
ऐसे बनी पहली भारतीय फिल्म
यहाँ से शुरू हुआ सिनेमा के प्रति फाल्के का जुनून। उन्होंने फ़िल्ममेकिंग से जुड़ी किताबों का अध्ययन शुरू किया, फ़िल्म बनाना, प्रोजेक्शन, एडिटिंग, एक्टिंग सब कुछ सीखा, समझा। रात-रात भर एक्सपेरिमेंट करते, कैमरा, लाइटिंग, कहानी, सब पर घंटों सोचते, पढ़ते और फिर उन पर प्रयोग करते। घर धीरे-धीरे प्रयोगशाला बन गया। यहाँ तक सब ठीक था। लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी—पैसा। फ़िल्म बनाना उस समय भारत में लगभग असंभव काम था। फिर भी फाल्के ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपना व्यवसाय छोड़ा और पैसे जुटाये। फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए तो उन्होंने अपना घर और पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिये। लेकिन इस सब में फाल्के अकेले नहीं थे। उनकी पत्नी सरस्वती बाई हर क़दम उनके साथ थीं। वो फ़िल्म रील्स साफ़ करतीं, कॉस्ट्यूम्स तैयार करतीं, सबके लिए खाना बनातीं और प्रोडक्शन में मदद भी करती थीं। इस नाते उनको भारतीय सिनेमा की पहली महिला तकनीशियन कहना ग़लत नहीं होगा।
अपनी फ़िल्म बनाने से पहले फाल्के इंग्लैंड गये और वहां उन्होंने इक्विपमेंट ख़रीदे। फ़िल्म प्रोसेसिंग की तकनीक की जानकारी ली। वापस आकर भारत की पहली फ़िल्म का निर्माण कार्य शुरू हुआ लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी अभिनेता! महिलाएँ फ़िल्मों में काम करने को तैयार नहीं थीं। क्योंकि लोग सिनेमा को सम्मानजनक पेशा नहीं मान रहे थे। समस्या का हल था महिला पात्र भी पुरुष निभाएं।
यहां से शुरू हुआ भारत की पहली मूक फ़िल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण, जिसके लेखक, निर्देशक, एडिटर, कैमरामैन, सेट डिज़ाइनर और प्रोडूसर ख़ुद फाल्के थे। इतना ही नहीं, सेट पर एक्टर्स को एक्टिंग भी फाल्के ही सिखाते थे।
3 मई 1913 की गर्म शाम को Coronation Cinema, Bombay (Mumbai) में राजा हरिश्चंद्र फ़िल्म का पहला शो हुआ। क़रीब 40 मिनट लम्बी फ़िल्म के टिकट, जो लगभग 4 आने से लेकर 1 रुपये तक के रखे गये थे, हाथो-हाथ बिक गये। वो शाम कुछ ख़ास थी जब परदे पर पहली बार भारतीय कलाकार एक ऐतिहासिक चरित्र को जीवंत कर रहे थे।
लोग खुश थे, इमोशनल थे, लोग चप्पल उतारकर हाथ जोड़कर फ़िल्म देख रहे थे। ये सिर्फ़ सिनेमा नहीं था, लोगों की भावनाएं थीं, आस्था थी और दूसरी तरफ़ फाल्के के मन का विश्वास, जिसने आज के अरबों करोड़ों के फ़िल्म व्यवसाय की नींव रख दी थी। शायद उस वक़्त उनको अंदाज़ा भी नहीं था कि आने वाले समय में उनकी एक पहल दुनिया में एंटरटेनमेंट उद्योग में अपना परचम लहराएगी।
ग्लैमर नहीं समर्पण की कहानी
राजा हरिश्चंद्र फ़िल्म के बाद फाल्के रुके नहीं, उन्होंने एक के बाद एक फ़िल्में बनानी शुरू कीं और अपने जीवनकाल में क़रीब 100 से ज़्यादा फ़ीचर और लघु फ़िल्मों का निर्माण किया। उनकी कुछ चर्चित फ़िल्मों में मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री, लंका दहन, श्रीकृष्ण जन्म और गंगावतरण हैं। भारत में फाल्के सिर्फ़ सिनेमा ही नहीं बल्कि पौराणिक सिनेमा के भी जनक माने जाते हैं। सिर्फ़ 20 सालों में ही मूक फ़िल्मों से शुरू भारतीय फ़िल्मों का सफ़र बोलती फ़िल्मों तक आया।

1937 में आयी गंगावतरण फाल्के की पहली और आख़िरी टॉकी फ़िल्म मानी जाती है। इतना ही नहीं फाल्के ने हिंदुस्तान सिनेमा फ़िल्म्स कंपनी की शुरूआत की और उसमें बहुत से लोगों को काम दिया और सिनेमा बनाने और दिखाने के सपने दिये। उन्होंने सिनेमा की जो मशाल जलायी थी, उससे और भी बड़े-बड़े लोगों को रास्ता दिखने लगा। आज भी उनकी कुछ फ़िल्में पुणे स्थित राष्ट्रीय फ़िल्म आर्काइव और अन्य जगहों पर सुरक्षित हैं।
जब भारत में सिनेमा ने दस्तक दी थी, तब यहाँ कोई पुरस्कार प्रथा नहीं थी, लेकिन समय के साथ फ़िल्म उद्योग ने उनको भारतीय सिनेमा के जनक के रूप में स्थापित किया। और भारत सरकार ने 1969 में फाल्के के जन्म शताब्दी वर्ष में सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादासाहेब फाल्के के नाम पर ही शुरू किया।
फाल्के और उनकी दूसरी पत्नी सरस्वती बाई के अलावा उनके बच्चे भी शुरूआती समय में फ़िल्मों का हिस्सा बने और बतौर चाइल्ड एक्टर काम करते रहे। फाल्के के परिवार की कहानी ग्लैमर से ज़्यादा बलिदान की है। जब वह सिनेमा बना रहे थे— पूरा परिवार उस सपने को जी रहा था, जो किसी जोखम से कम नहीं था। आज जब लोग दादासाहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जनक कहते हैं तो लगता है जैसे उनका जीवन बहुत सफल और सम्मानित रहा होगा। लेकिन सच्चाई उससे कहीं ज़्यादा अलग थी। उनका जीवन लगातार आर्थिक जोखिम, क़र्ज़, अस्थिरता, और संघर्षों से भरा रहा।
1913 से 1937 तक लगभग 24 वर्षों तक वो सक्रियता के साथ फ़िल्में बनाते रहे। उसके बाद अपने अंतिम वर्षों में अपने पैतृक गांव नासिक में रहने लगे और 16 फरवरी 1944 को करीब 73 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। अपने आख़िरी समय में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहे।
कभी भारत की कहानियाँ सिर्फ़ आवाज़ों में जिया करती थीं… लेकिन उन्हें चलते हुए दिखाया दादा साहेब फाल्के ने। एक सपने से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहास आज पूरी दुनिया में अपनी चमक बिखेर रहा है। एक घर से शुरू हुआ फ़िल्म बनाने का काम आज करोड़ों लोगों और भारत के लगभग हर शहर में फैल चुका है और आज भी, जब भी किसी थिएटर में पर्दा उठता है, कहीं-न-कहीं दादा साहेब फाल्के फिर से जीवित हो उठते हैं क्योंकि कुछ लोग फ़िल्में नहीं बनाते… इतिहास बनाते हैं।

चारु शर्मा
फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680
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