विक्की डोनर, vicky donor, ayushman khurana, yami gautam
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पाक्षिक ब्लॉग (भाग-10) मानस की कलम से ...

विक्की डोनर: एक फ़िल्म से बनी कई की राह

           हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्में सिर्फ़ सफल नहीं होतीं, वे एक नया रास्ता खोलती हैं। वे इंडस्ट्री के सोचने का तरीक़ा बदल देती हैं। विक्की डोनर ऐसी ही फ़िल्म थी। 2012 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म सिर्फ़ एक मनोरंजक कॉमेडी-ड्रामा नहीं थी, बल्कि उसने हिंदी सिनेमा में एक नये दौर की शुरूआत की — content-driven small-town social dramedies का दौर। एक ऐसा दौर, जहाँ बड़े सितारों से ज़्यादा अहमियत कहानी की होने लगी, (यहाँ तक कि इन फ़िल्मों ने स्टार बना दिये), जहाँ छोटे शहरों के किरदार बड़े पर्दे पर अपनी पूरी सच्चाई के साथ दिखायी देने लगे, और जहाँ सामाजिक वर्जनाओं पर हल्के-फुल्के लेकिन प्रभावशाली अंदाज़ में बात होने लगी।

इस फ़िल्म की सबसे दिलचस्प बात थी कि इसके पास पारंपरिक अर्थों में सफलता के कोई बड़े हथियार नहीं थे। दोनों मुख्य कलाकारों — आयुष्मान खुराना और यामी गौतम — की यह पहली हिंदी फ़िल्म थी। निर्माता के रूप में जॉन अब्राहम की भी यह पहली कोशिश थी। न कोई बड़ा सुपरस्टार, न भारी-भरकम मार्केटिंग अभियान। लगभग 4 करोड़ के छोटे बजट में बनी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर लगभग 68 करोड़ का व्यापार किया। यानी लागत से करीब सत्रह गुना अधिक कमाई। फिर भी इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि कमाई नहीं थी, बल्कि वह विश्वास था जो इसने निर्माताओं और निर्देशकों को दिया।

फ़िल्मकारों को बड़ी हिम्मत मिली। छोटे शहरों के घरों में क़ैद कहानियाँ अपने पिजड़ों से आज़ाद होने लगीं। विक्की डोनर के बाद हिंदी सिनेमा में एक ख़ास तरह का टेम्पलेट विकसित होने लगा:

  • छोटे शहर — अक्सर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या उत्तर भारत के क़स्बे।
  • स्थानीय बोलियों और हिंदी का मिश्रण — अवधी, ब्रज, बुंदेलखंडी या क्षेत्रीय लहजे में हिन्दी का मेल — ताकि कहानी में एक ज़मीनी सच्चाई महसूस हो और ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक पहुचे।
  • कुछ मंझे हुए करैक्टर आर्टिस्ट, जो एक रिलेटेबल मिडिल क्लास के किरदार में फ़िट हों, एक अच्छी हल्की-फुल्की कहानी, family-friendly treatment, चुटीले संवाद।
  • एक बोल्ड सोशल कॉन्सेप्ट, जिससे फ़िल्म को सोशल मैसेजिंग पर बनी फ़िल्म कहा जा सके- फ़िल्म विथ ए मैसेज के बास्केट में आ सके।

विक्की डोनर ने स्पर्म डोनेशन जैसे विषय को उठाया। यह वह दौर था, जब इस विषय पर खुलकर बातचीत करना भी असहज माना जाता था। ऐसे मुद्दे पर पूरी फ़िल्म बनाना साहस की बात थी। लेकिन फ़िल्म ने इसे किसी भाषण, नैतिक शिक्षा या सामाजिक अभियान में नहीं बदला। उसने हास्य, रिश्तों और भावनाओं के माध्यम से एक जटिल विषय को सहज बनाया।

शायद यही कारण है कि इसके बाद हिंदी सिनेमा में ऐसे विषयों की एक लंबी शृंखला बनने लगी…

  1. “दम लगा के हईशा” ने बॉडी शेमिंग, अरेंज मैरिज और “परफेक्ट पत्नी” की सामाजिक अपेक्षाओं को छुआ।
  2. “बरेली की बर्फ़ी” ने छोटे शहर की लड़की की individuality, patriarchal expectations और सामाजिक दिखावे पर व्यंग्य किया।
  3. “शुभ मंगल सावधान” ने पुरुष यौन स्वास्थ्य और masculinity पर बात की।
  4. “बधाई हो” ने प्रौढ़ आयु में गर्भधारण जैसी असहज मानी जाने वाली स्थिति को हास्य और संवेदनशीलता के साथ दिखाया।
  5. “ड्रीम गर्ल” ने अकेलेपन और नक़ली पहचान की संस्कृति को छुआ।
  6. “बाला” ने गंजेपन, सौंदर्य के मानकों और इनसे जुड़े आत्म-सम्मान को केंद्र में रखा।
  7. “शुभ मंगल ज़्यादा सावधान” और “बधाई दो” जैसी फ़िल्में LGBTQ+ पहचान और सामाजिक स्वीकृति जैसे विषयों को मुख्यधारा की चर्चा में लायीं।
  8. वहीं, “पीकू” ने कब्ज़ की शिकायत के बहाने पॉटी जोक्स और प्रॉब्लम को हास्य के माध्यम से खुलकर पर्दे पर दिखाया तो घर-घर की कहानी कहने का एक और रास्ता दिखा।

इन विषयों की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि अगर लेखक या निर्देशक संतुलन खो दे तो फ़िल्म तुरंत दो चरम सीमाओं में गिर सकती है — या तो अत्यधिक उपदेशात्मक बन जाती है, या इतनी गंभीर कि मनोरंजन खो बैठती है। विक्की डोनर की सबसे बड़ी सफलता यही थी कि उसने इस संतुलन को बेहद ख़ूबसूरती से साधे रखा।

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फ़िल्म को मज़बूती देने का बड़ा काम इसकी सहायक कलाकारों की शानदार टीम करती है। अन्नू कपूर ने डॉ. बलदेव चड्ढा के किरदार में अद्भुत ऊर्जा भरी। उनका किरदार स्पर्म को लेकर लगभग जुनूनी है। वह लोगों को “कन्फ़्यूज़्ड स्पर्म”, “कॉम्प्लिकेटेड स्पर्म” जैसी उपमाओं से संबोधित करते हैं और स्पर्म काउंट बढ़ाने के सुझाव देते रहते हैं। यह किरदार हास्य पैदा करता है, लेकिन कभी कैरिकेचर नहीं बनता। अन्नू कपूर के लिए यह फ़िल्म कमबैक साबित हुई।

डॉली अहलूवालिया ने पंजाबी मां के किरदार में घरेलू जीवन की परिचित ऊर्जा और हास्य को शानदार तरीक़े से पकड़ा। लेकिन फ़िल्म का सबसे यादगार किरदार कमलेश गिल का है। उनके वन-लाइनर्स, व्यंग्य और सहज अभिनय हर दृश्य में एक अलग चमक भर देता है। उनका शराब वाला दृश्य आज भी फ़िल्म के सबसे मनोरंजक हिस्सों में गिना जाता है।

सास-बहू के रिश्ते को फ़िल्म ने केवल घरेलू नोक-झोंक तक सीमित नहीं रखा। दोनों किरदारों की केमिस्ट्री में कई परतें हैं — सत्ता, दबाव, अनकही इच्छाएँ, अपनापन और साझा स्त्री अनुभव। दो पेग के बाद खुलती बातचीत अचानक उस पीढ़ी की महिलाओं की दबी हुई आवाज़ों को सामने ले आती है, जो अक्सर परिवार की ज़िम्मेदारियों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच कहीं दब जाती हैं।

फ़िल्म का एक और मज़बूत पक्ष इसका सांस्कृतिक टकराव है। पंजाबी और बंगाली परिवारों के बीच का हास्य सिर्फ़ कॉमेडी नहीं बनता, बल्कि भारतीय मध्यवर्गीय सामाजिक संरचना की विविधता को भी सामने लाता है। इस पूरे ढाँचे के भीतर एक प्रेम कहानी चलती है, जो आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं और समाज में बढ़ते तलाक़ के मामलों के बीच बेहद प्रासंगिक महसूस होती है।

निर्देशक शूजित सरकार ने जिस संवेदनशीलता के साथ इस विषय को संभाला, वह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने एक साहसी विचार को मनोरंजन के साथ संतुलित किया। फ़िल्म न यौन नैतिकता पर भाषण देती है, न सामाजिक सेवा का झंडा उठाती है। वह बस इंसानी रिश्तों और सामाजिक असहजताओं को ईमानदारी से दिखाती है। लेखिका जूही चतुर्वेदी की पटकथा फ़िल्म की असली रीढ़ है। लेखन बेहद सूक्ष्म है। हास्य परिस्थितियों से निकलता है, संवादों से नहीं थोपा जाता। विषय की संवेदनशीलता बनी रहती है, लेकिन फ़िल्म कभी भारी नहीं होती। संगीत भी कहानी के भीतर स्वाभाविक रूप से बहता है।

फ़िल्म को 60वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में “संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फ़िल्म” का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। फ़िल्मफ़ेयर में भी इसे कई श्रेणियों में नामांकन और पुरस्कार मिले। बाद में इसका तेलुगु और तमिल रीमेक भी बना।

लेकिन विक्की डोनर की असली विरासत पुरस्कार या बॉक्स ऑफ़िस नहीं। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने हिंदी सिनेमा को यह भरोसा दिलाया कि छोटी कहानियाँ भी बड़ी हो सकती हैं। छोटे शहरों में बंद पड़ी कहानियाँ भी लाखों लोगों तक पहुँच सकती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण — समाज जिन विषयों पर बात करने से हिचकता है, सिनेमा उन्हें मुस्कुराते हुए बातचीत का हिस्सा बना सकता है। यही विक्की डोनर के बहाने हिंदी सिनेमा की बड़ी जीत रही।

और यह ट्रिविया भी…

आयुष्मान खुराना ने वास्तव में 2004 में रोडीज़ टास्क के दौरान अपना स्पर्म डोनेट किया था। उन्होंने बाद में कॉफ़ी विद करण शो में इस बात का ख़ुलासा किया था।

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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