
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
'ऐल्गी ट्री' बनेंगे शहरों के नये फेफड़े?
कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते जा रहे आधुनिक शहरों में अब सांसों पर संकट मंडराने लगा है। शहरों का एक्यूआई, ख़बर का हिस्सा बन चुका है। प्रदूषण की धूसर चादर ने हमारी सुबह की ताज़गी और शाम की ख़ामोशी को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। ऐसे में जब विकास और पर्यावरण के बीच का संतुलन पूरी तरह डगमगा चुका है, तब मध्य प्रदेश की हरी-भरी राजधानी भोपाल से उम्मीद की एक नयी और तकनीकी किरण फूटी है। भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में देश का पहला ‘ऐल्गी ट्री’ (Algae Tree) इंस्टॉल किया गया है।
यह विज्ञान और प्रकृति के मेल से तैयार किया गया एक ऐसा ‘कृत्रिम पेड़’ है, जो आने वाले समय में हमारी दूषित हो रही ‘आब-ओ-हवा’ को प्राकृतिक रूप से बदलने का दम रखता है।
सवाल उठना लाज़िमी है कि जब क़ुदरत ने हमें पेड़-पौधों की अनमोल सौगात दी है, तो इस तरह के यांत्रिक पेड़ों की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? इसका सीधा-सा जवाब है, स्थान की कमी और प्रदूषण की तीव्र रफ़्तार। जहाँ एक बड़े और घने पेड़ को विकसित होने में बरसों का समय लगता है, वहीं यह अकेला तकनीकी ‘ऐल्गी ट्री’ 25 बड़े और पुराने पेड़ों के बराबर हवा को साफ़ करने की क्षमता रखता है।
‘मशरूम वर्ल्ड ग्रुप‘ के पचास से अधिक शीर्ष इंजीनियरों और बायोटेक्नोलॉजिस्टों की दो साल की गहन रिसर्च का नतीजा यह ‘फ्यूचरिस्टिक ट्री’ आज पर्यावरण प्रेमियों के कौतूहल और प्रशंसा का केंद्र बना हुआ है।
तकनीक और जीवविज्ञान का अनूठा संगम: फ़ोटो-बायोरिएक्टर
तकनीकी भाषा में कहें तो यह कोई साधारण खंभा या दिखावटी ढांचा नहीं है, बल्कि एक हाई-टेक बायोलॉजिकल मशीन है, जिसे ‘फोटो-बायोरिएक्टर’ (Photo-Bioreactor) कहा जाता है। इसका बाहरी हिस्सा एक पारदर्शी एक्रिलिक सिलेंडर (Transparent Acrylic Cylinder) से बना है, जिसके भीतर लगभग 600 से 1000 लीटर पानी भरा होता है। इस पानी में अरबों की संख्या में सूक्ष्म ‘माइक्रो-ऐल्गी’ (यानी हरी काई के नन्हे जीव) होते हैं।
इस उपकरण की कार्यप्रणाली को दो मुख्य चरणों में समझा जा सकता है:
मैकेनिकल (wet Scrubbing): सड़क पर चलने वाले वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं और प्रदूषण को इस मशीन में लगे स्मार्ट सेंसर्स तुरंत भांप लेते हैं। इसके निचले हिस्से में लगे हैवी-ड्यूटी पंखे उस दूषित हवा को वैक्यूम की तरह अंदर खींचते हैं। इसके बाद एक विशेष ‘स्पार्जर’ (Sparger) के माइक्रो-होल्स के ज़रिये इस हवा को तेज़ दबाव के साथ पानी के टैंक में नीचे से ऊपर की ओर धकेला जाता है। पानी में लाखों सूक्ष्म बुलबुले बनते हैं और इस प्रक्रिया में हवा में मौजूद ख़तरनाक PM2.5 कण और धूल पानी में ही फंसकर रह जाते हैं। इंजीनियरिंग की दुनिया में इसे ‘वैट स्क्रबिंग’ कहते हैं, जो अकेले ही 55% धूल, प्रदूषण को सोख लेती है।

बायोलॉजिकल (Carbon Capture): धूल से मुक्त होने के बाद भी बुलबुलों के रूप में बची ज़हरीली कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) पानी में घुलने लगती है। यहाँ उन अरबों ज़िंदा माइक्रो-ऐल्गी का काम शुरू होता है। प्राकृतिक पेड़ों को अपनी ऊर्जा, जड़ें फैलाने और मज़बूत लकड़ी बनाने में ख़र्च करनी पड़ती है, लेकिन इन सूक्ष्म ऐल्गी को गुरुत्वाकर्षण या संरचना से कोई लड़ाई नहीं लड़नी होती। ये अपनी 100% ऊर्जा सिर्फ़ और सिर्फ़ CO_2 को अवशोषित करने में लगाते हैं। इनके भीतर का ‘बायोलॉजिकल पंप’ इस गैस को तेज़ी से खींचता है और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के ज़रिये बदले में शुद्ध और ताज़ी ऑक्सीजन हवा में छोड़ देता है।
चौबीस घंटे का अनवरत पहरा
इस तकनीक की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि यह प्राकृतिक पेड़ पौधों की तरह सिर्फ़ दिन के उजाले तक सीमित नहीं है। इसके शीर्ष पर लगे सोलर पैनल्स दिन भर सौर ऊर्जा को संचित करते हैं। रात के अंधेरे में, जब प्राकृतिक पेड़ ऑक्सीजन छोड़ना बंद कर देते हैं, तब इस टैंक के भीतर लगी विशेष रेड और ब्लू एलईडी लाइट्स (LED Lights) स्वचालित रूप से जल उठती हैं। ये लाइट्स उन सूक्ष्म ऐल्गी को यह भ्रम (Trick) दिलाती हैं कि अभी भी दिन का उजाला है। परिणामस्वरूप, यह मशीन 24 घंटे लगातार हवा को शुद्ध करती रहती है और सालभर में लगभग डेढ़ टन CO_2 को पर्यावरण से साफ़ कर देती है।
इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया के सह-उत्पाद (By-products) भी पूरी तरह उपयोगी हैं। जब टैंक में ऐल्गी की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो उस अतिरिक्त ‘ग्रीन स्लज’ (Green Sludge) को निकालकर उससे जैविक खाद और बायो-फ्यूल (Bio-fuel) बनाया जा सकता है, जो पर्यावरण को समृद्ध करने का ही काम करता है।
कहाँ-कहाँ पहुंचेगी यह तकनीक?
भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में सफलता का परचम लहराने के बाद, अब इस स्वदेशी और अत्याधुनिक तकनीक को देश के अन्य मेट्रो शहरों में भी स्थापित करने की योजना है, जहाँ प्रदूषण का स्तर बेहद चिंताजनक है। बहुत जल्द ये ‘ऐल्गी ट्री’ आपको मुंबई ,दिल्ली, बेंगलुरु जैसे शहरों के प्रमुख चौराहों और भारी ट्रैफिक वाले क्षेत्रों में भी नज़र आएंगे।
एक इंजीनियर और लेखक के तौर पर जब मैं इस तकनीक को देखता हूँ, तो मन में संतोष भी होता है और एक मूक चेतावनी भी दिखायी देती है। ‘ऐल्गी ट्री’ निश्चित रूप से उन शहरी व्यस्त चौराहों के लिए वरदान हैं, जहाँ हम चाहकर भी 25 बड़े पेड़ नहीं लगा सकते। यह विज्ञान की वह मेधा है, जो हमें घुटते हुए शहरों में खुलकर सांस लेने की मोहलत देती है।
परंतु, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक क़ुदरत की पूरक हो सकती है, उसका विकल्प नहीं। ये कृत्रिम फेफड़े हमारे शहरों को तात्कालिक जीवनदान तो देंगे, लेकिन धरती को हरी-भरी रखने की जो ज़िम्मेदारी हमारी है, वह पेड़ लगाने और उन्हें बचाने से ही पूरी होगी। अस्तु, विज्ञान के इस क़दम का स्वागत करें और साथ ही अपनी ‘आब-ओ-हवा’ को शुद्ध रखने के लिए अपनी धरती के प्रति अपने कर्तव्यों को भी याद रखें।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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