Edition 49
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....

लेखन में अर्थ का वास्तविक घर

            ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का आठवां अध्याय… “लेखन में ‘अर्थ’ एक ऐसा घर जिसका पता हमेशा बदलता रहता है”।

लेखन को यदि केवल शब्दों की व्यवस्था मान लिया जाये, तो हम उसके बाहरी आवरण को ही देख रहे होते हैं। जैसे किसी वृक्ष को केवल उसकी छाल से पहचानना और यह भूल जाना कि भीतर रस का एक गुप्त प्रवाह है, जो उसे जीवित रखता है। लेखन भी वैसा ही है— बाहर शब्द, भीतर अर्थ का एक अदृश्य, निरंतर बदलता हुआ, कभी न ठहरने वाला प्रवाह।

हम अक्सर सोचते हैं अर्थ शब्दों में होता है। शब्द जैसे पात्र हैं और अर्थ उनमें भरा हुआ जल। परंतु यदि ध्यान से देखें, तो यह उपमा भी अधूरी है। क्योंकि पात्र स्थिर होता है, और जल भी उसमें कुछ क्षणों के लिए स्थिर हो सकता है। पर अर्थ न तो पात्र में स्थिर रहता है, न जल की तरह ठहरता है। वह तो एक ऐसी हवा है, जो छूते ही बदल जाती है; एक ऐसी रोशनी, जो जिस सतह पर पड़ती है, उसी के अनुसार रंग बदल लेती है।

लेखन में अर्थ को पकड़ने की जो आदत हमने बना ली है, वही हमें उसके सबसे गहरे आयामों से दूर ले जाती है। हम अर्थ को परिभाषित करना चाहते हैं— जैसे उसे बाँध लेना चाहते हों। पर अर्थ का स्वभाव ही बंधन के विरुद्ध है। वह जितना बाँधा जाता है, उतना ही अपनी असल प्रकृति से दूर चला जाता है।

शायद इसीलिए लेखन का सबसे सच्चा क्षण वह होता है, जब लेखक स्वयं नहीं जानता कि वह क्या कहने जा रहा है। जब शब्द आने से पहले ही अर्थ तय नहीं होता। जब लिखते-लिखते अचानक कुछ ऐसा प्रकट होता है, जिसे लेखक ने सोचा भी नहीं था। वह क्षण— जहाँ लेखक स्वयं चकित हो जाता है— वहीं अर्थ का सबसे जीवंत रूप जन्म लेता है।

यह जन्म किसी एक दिशा में नहीं होता। यह बहुदिशात्मक है— जैसे किसी झील में गिरा एक पत्थर, जिसकी तरंगें चारों ओर फैलती हैं। हर पाठक, हर संदर्भ, हर समय— उस तरंग को अलग ढंग से ग्रहण करता है। इसीलिए एक ही लेखन, समय के साथ बदलता हुआ प्रतीत होता है। जो अर्थ कभी स्पष्ट लगता था, वही बाद में धुँधला हो जाता है; जो कभी अनदेखा रह गया था, वही अचानक उजागर हो उठता है।

यहाँ एक गहरा रहस्य छिपा है— अर्थ का अस्तित्व स्थायी नहीं है। वह एक घटना है, जो घटती है और फिर विलीन हो जाती है। वह हर बार नये सिरे से जन्म लेता है। और इस जन्म की प्रक्रिया में न केवल शब्द, बल्कि पाठक की चेतना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

जब कोई पाठक किसी लेखन को पढ़ता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं पढ़ रहा होता— वह अपने अनुभवों, स्मृतियों और संवेदनाओं के साथ उस लेखन में प्रवेश कर रहा होता है। वह अपने भीतर के संसार को उस लेखन पर आरोपित करता है और उसी के आधार पर अर्थ निर्मित होता है। इस प्रकार लेखन का अर्थ लेखक से अधिक पाठक में जन्म लेता है।

पर क्या यह पूरा सत्य है? क्या अर्थ केवल पाठक में ही उत्पन्न होता है? या फिर कहीं ऐसा भी है कि अर्थ का कोई स्रोत शब्दों और पाठक दोनों से परे है— एक ऐसा क्षेत्र, जहाँ से अर्थ की संभावनाएँ उठती हैं?

यदि हम थोड़ी देर के लिए भाषा के शोर से हट जाएँ, और उस मौन को सुनें जहाँ से शब्द आते हैं, तो शायद हमें उस स्रोत की झलक मिल सके। वह मौन निष्क्रिय नहीं है; वह एक गहन संभाव्यता है। वहाँ अर्थ अपने बीज रूप में मौजूद है— अभी अव्यक्त, अभी अनाम, पर पूर्णतः जीवित।

लेखन उस मौन से संवाद है। शब्द उस संवाद के केवल संकेत हैं। असली प्रक्रिया उस अदृश्य क्षेत्र में घटती है, जहाँ अर्थ अभी शब्द नहीं बना है, पर बनने की संभावना से भरा हुआ है।

यहाँ पहुँचकर लेखन एक रहस्य बन जाता है। वह अब केवल अभिव्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि एक खोज बन जाता है— एक ऐसी खोज, जिसमें लेखक स्वयं को भी खोजता है और अर्थ को भी।

इस खोज में एक विचित्र बात होती है— जितना हम अर्थ को पकड़ने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही दूर चला जाता है। और जब हम उसे छोड़ देते हैं— तब वह स्वयं प्रकट होने लगता है। यह विरोधाभास लेखन की आत्मा है।

लेखन का सबसे गहरा आयाम शायद यही है कि वह हमें नियंत्रण से मुक्त करता है। हम सोचते हैं कि हम लिख रहे हैं, पर धीरे-धीरे यह अनुभव होने लगता है कि लेखन स्वयं हो रहा है। हम केवल एक माध्यम हैं— एक मार्ग, जिसके माध्यम से कुछ प्रकट हो रहा है।

यह अनुभव साधारण नहीं है। इसमें एक प्रकार की विस्मृति है— ‘मैं’ की विस्मृति। जब तक ‘मैं’ बहुत सक्रिय रहता है, लेखन सीमित रहता है। वह केवल विचारों का पुनरावर्तन बन जाता है। पर जैसे ही ‘मैं’ थोड़ा ढीला पड़ता है, लेखन में एक नई ऊर्जा आ जाती है—एक ऐसी ऊर्जा, जो कहीं गहरे से उठती है।

यह ऊर्जा क्या है? क्या यह केवल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, या इसमें कुछ और भी है—कुछ ऐसा, जो व्यक्तिगत चेतना से परे है?

शायद यह वही ऊर्जा है, जो ब्रह्मांड को गति देती है। वही ऊर्जा, जो हर सृजन के पीछे काम करती है। लेखन उस ऊर्जा का एक सूक्ष्म रूप है—एक ऐसी धारा, जो भीतर से बाहर की ओर बहती है।

इस धारा में अर्थ स्थिर नहीं रहता। वह लगातार बदलता है— जैसे जल अपने मार्ग के अनुसार आकार बदलता है। कभी वह स्पष्ट होता है, कभी धुँधला, कभी तीव्र, कभी धीमा। पर वह कभी रुकता नहीं।

यही अर्थ का सबसे गहरा, अनछुआ आयाम है— उसकी गतिशीलता। हम उसे स्थिर मान लेते हैं, पर वह वास्तव में एक प्रवाह है।

इस प्रवाह को समझने के लिए हमें भाषा की संरचनाओं से परे जाना होगा। हमें उन सीमाओं को ढीला करना होगा, जिनमें हमने अर्थ को बाँध रखा है। तभी हम देख पाएँगे कि अर्थ कोई वस्तु नहीं है, बल्कि एक प्रक्रिया है—एक सतत अनफोल्डिंग।

लेखन इस अनफोल्डिंग का दृश्य रूप है। वह उस अदृश्य प्रक्रिया को दृश्य बनाता है, पर पूरी तरह नहीं। उसमें हमेशा कुछ छूट जाता है—कुछ ऐसा, जो शब्दों में नहीं आ पाता। और शायद वही सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वही अनकहा, वही अछूता, वही अनाम—लेखन को जीवित रखता है। यदि सब कुछ कह दिया जाये, तो लेखन समाप्त हो जाएगा। पर जब कुछ बचा रहता है— कुछ जो शब्दों से परे है— तभी लेखन में रहस्य बना रहता है। यह रहस्य ही अर्थ का वास्तविक घर है।

और इस घर का कोई स्थायी पता नहीं है। वह हर बार बदल जाता है—हर लेखन में, हर पाठ में, हर अनुभव में। इसलिए लेखन को समझना संभव नहीं है। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है।

जब हम उसे अनुभव करते हैं, तो धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि अर्थ कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है। वह एक यात्रा है— एक ऐसी यात्रा, जिसका कोई निश्चित अंत नहीं है।

और शायद यही लेखन का सबसे बड़ा सौंदर्य है— कि वह हमें किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाता, बल्कि हमें निरंतर यात्रा में बनाये रखता है।

इस यात्रा में हम शब्दों के सहारे चलते हैं, पर धीरे-धीरे यह महसूस होने लगता है कि असली यात्रा शब्दों के पार है। वहाँ जहाँ भाषा समाप्त हो जाती है, और केवल अनुभव बचता है।

वही अनुभव अर्थ का अंतिम आयाम है—पर वह भी अंतिम नहीं है। क्योंकि वह भी बदलता रहता है।

इस प्रकार लेखन एक अनंत प्रक्रिया बन जाता है—जहाँ अर्थ हर बार नया जन्म लेता है, हर बार नया रूप धारण करता है, और फिर स्वयं को छोड़ देता है… और शायद, इसी में उसकी सबसे गहरी सच्चाई छिपी है।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय कन्या महाविद्यालय, भोपाल यानी नूतन कॉलेज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!