हिंदी पत्रकारिता, हिंदी पत्रकारिता दिवस, hindi jounalism, hindi jounalism day
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....

हिंदी पत्रकारिता की आब-ओ-हवा

             जो गुमनामी से थक जाऊंगा औ’ बदनामी चाहूंगा
             बनाता था ख़बर अख़बार था मैं सब बता दूंगा
             -दिलशाद

             पत्रकारिता, ख़ास तौर से हिंदी पत्रकारिता इस तरह बदनाम हो चुकी है, बदनामी का सबब हो चुकी है। बड़े संकट के दौर में है। यहां कुछ एक जो अपवाद हैं वो गुमनामी के लिए अभिशप्त हैं। इस सबके कारण, इतिहास और इसके वर्तमान परिप्रेक्ष्य के साथ ही निकट भविष्य… ऐसे विश्लेषण और चिंतन आब-ओ-हवा के इस अंक का प्राण हैं। मसलन, हिंदी मीडिया से मोहभंग खुलकर जता चुके अजय अपने विस्तृत निबंध में लिखते हैं:

“हिंदी पट्टी का बड़ा हिस्सा पत्रकार से सच नहीं, अपने पूर्वाग्रहों की पुष्टि चाहता है। अगर पत्रकार जाति पर लिखता है, तो जातीय दुश्मनी झेलेगा, धर्म पर लिखेगा तो धर्मद्रोही कहलाएगा, सत्ता पर लिखेगा तो देशद्रोही का तमग़ा लेकर राजनीतिक और कभी-कभी हिंसक शारीरिक हमले झेलेगा, अगर स्त्रियों, दलितों या आदिवासियों की बात करेगा तो उसे उसका एजेंडा कहकर ख़ारिज किया जाएगा। यानी हिंदी पत्रकारिता का बड़ा संकट सिर्फ़ सत्ता नहीं है, उसका अपना पाठक भी है।”

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अजय ने हिंदी पत्रकारिता की पूरी कुंडली अपने निबंध में बांच दी है और हमें झोंक दिया है चिंता की भट्टी में। हम अक्सर पूछते हैं हिंदी पत्रकारिता कहां से कहां आ गयी! लेकिन इस चिंतन से पाते हैं कहीं से कहीं नहीं पहुंची। पहले भी पत्रकारिता पूंजी से ही चलती थी। पूंजी ही न हो पाने के कारण पहले हिंदी पत्र उदन्त मार्तण्ड को कुछ ही महीनों में ठप होना पड़ा। लेकिन आज पूंजी और पत्रकारिता की सांठ-गांठ क्या है? कम्युनिस्ट चिंतन से वास्ता रखने वाले बादल सरोज अपने लेख में लिखते हैं:

“इस आवारा और सटोरिया पूँजी को विज्ञान और आधुनिक चेतना से संपन्न समाज की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उसका निषेध करना अब उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। कुपढ़, वहशी, हिंसक और टूटा–बिखरा अमानुषिक समाज उसकी आपराधिक कमाई के लिए मुफ़ीद भी होगा, मददगार भी। उस तरह का समाज बनाने के लायक़ अख़बार और मीडिया उसे चाहिए। उन्हें ही तैयार किया जा रहा है।”

यह समाज ही दरअसल अफ़सोस और चिंता के केंद्र में है। सत्ता, तंत्र और दबाव समूह तो पहले भी अपनी नैतिकताओं और नीयत को लेकर मुल्ज़िम की शक्ल में ही रहे हैं, लेकिन समाज हमेशा एक विक्टिम रहा है, ऐसा भी हम मानते रहे। जबकि अजय इस समाज, ख़ास तौर से हिंदीभाषी समाज का पर्दाफ़ाश बड़ी बेरहमी से करते हैं।

यह समाज जो अपने ही गोबर में लोटना चाहता है, अपने ही छद्म को ओढ़ना चाहता है और अपनी क़ब्र ख़ुद खोदना चाहता है, उसे पत्रकारिता की ज़रूरत भी क्या है और उससे सरोकार भी क्या है? एक बहुत हताशा का मोड़ आ जाता है जब हमारा समाज ही उम्मीद की हमारी दुनिया से बेदख़ल हो जाये। क्या अर्थ रह जाता है​ किसी भी क्रिया का…! तब शायर तंज़िया मुस्कान के साथ बोलता है:

बाज़ीच-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

फिर ऐसा भी लगता है सब नियति से बंधे हैं। या शायद अपनी क़ुदरत और अपनी फ़ितरत से। ये सत्ता, ये समाज, ये संस्थाएं ये सब बिच्छू हैं, जो तेज़ धार में मरे जा रहे हैं लेकिन पत्रकारिता और शायरी जैसे कुछ साधु हैं जो यह जानते हुए भी इन्हें बचाने का जतन करना चाहते हैं कि ये बचाने वाले हाथ पर ही डंक मारेंगे।

मुझे याद आता विनोद दुआ साहब ने 2007-08 में बातचीत (यह भी इस अंक में पढ़िए) के दौरान कहा था कि लोकतंत्र अपूर्ण होता है और इसलिए मीडिया भी कोई परफ़ेक्ट शय नहीं होती लेकिन संपूर्ण अराजकता एक तरफ़ हो तो इस अपूर्णता को ही चुनना पड़ेगा। मैं तब भी समझ पाया था कि इस अपूर्णता में, पूर्णता की तरफ़ लगातार बढ़ने का एक भाव, एक मंशा है इसलिए यह गतिशील भी है। अब लगने लगता है इसकी गति की दिशा क्या सच में ध्वंस की तरफ़ है! राकेश ने अपने लेख में 2007 के आसपास के टेलिविज़न को याद करते हुए लिखा है:

“उस दौर में राजनीतिक ख़बरें टेलिविज़न पर लगभग प्रतिबंधित थीं। अंधिवश्वास और अचरज भरी अजब-गजब ख़बरों के अलावा न्यूज़ टेलिविज़न मनोरंजन पर केंद्रित थे… अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है वो दौर आज से कहीं बेहतर था। कम से कम जनहित से जुड़े मुद्दों पर व्यवस्थित ढंग से झूठ फैलाने का काम नहीं होता था। जाति और सांप्रदायिकता न्यूज़ रूम से दूर थे। आज टेलिविज़न और तमाम डिजिटल माध्यम एक संगठित अपराध तंत्र का हिस्सा नज़र आते हैं…”

200 बरस का होते हुए मीडिया संगठित माफ़िया बन चुका है, इस कड़वे सच को क्या किसी राष्ट्रीय समारोह, किसी बड़े जश्न में ज़ोर से कहा जा सकता है? इन समारोहों के मंचासीन अतिथि इससे भी बड़े माफ़िया होंगे और ऐसे आयोजन, माफ़ियाओं की जुगलबंदी बनकर रह जाएंगे। और हिंदी पट्टी के समाज को हिंदी पत्रकारिता की उपलब्धियों की घुट्टी पिलायी जाएगी। यह नहीं बताया जाएगा ये माफ़िया कि किस तरह के नशे बेचने में लगे हैं।

और तो और, एआई और एल्गोरिदम जैसे शब्द मीडिया माफ़िया के नये ड्रग्स हैं। इनके असर में अभी और कुछ अरसे तक बहुत कुछ ऐसा होता रहेगा, जिसके लिए हम बाद में भी रोते रहेंगे। आप सोच रहे हैं कि बहुत अंधेरा है, कोई रोशनदान नहीं है तो ऐसा भी नहीं है। कीचड़ में कमल खिलते हैं, रात के बाद सुबह होती है तो कोई राह भी बनेगी या बशीर बद्र के अल्फ़ाज़ में कहें तो:

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है

इन उम्मीदों, राहों के बारे में हरीश शर्मा के पास काम की बातें कहने के लिए हैं। अपने लेख में हरीश शर्मा ने बतौर समाधान सुझाव भी पेश किये हैं। और भी बहुत कुछ है आब-ओ-हवा के इस 52वें अंक में, जो हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल कर रहा है। दरअसल यह अंक मन की बात वाला ढकोसला नहीं है बल्कि काम की और समझ की बात करने की ही एक कोशिश है। बाक़ी तो आप बताएंगे क्या है, क्या नहीं।

…………..

एक बात और

डॉ. बशीर बद्र चले गये। ईद के जश्न में भूल गया भोपाल और ख़ास तौर से शायरों का समाज कि वह दिन कुछ पल का तो मातम मांगता था। बरसों से डॉ. साहब की याद चली गयी थी। और अब जब वह गये तो शहर भोपाल की याद चली गयी कि इतना अहमतरीन शायर चला गया है, चलो कंधा दे आएं, एकमुश्त मिट्टी दे आएं… वह दौर रह-रहकर याद आता जा रहा है, जब ख़ूब मुलाक़ातें हुआ करती थीं। ढेरों यादें हैं, जिन्हें अगले ब्लॉग में सलीक़े से दर्ज करूंगा। इस ब्लॉग में हिंदी पत्रकारिता पर बात एक तो पहले से तय थी, प्रासंगिक भी और फिर डॉ. साहब पर हड़बड़ी में क्या लिखना। ज़रा शांत मन से ही लिखूंगा।

डॉ. साहब की शायरी हालात और हाले-हाज़रा पर तंज़ का तेवर न के बराबर ही अख़्तियार करती है। उनका अपना एक रूमान रहा है। उनके यहां एक शे’र मिल जाता है, जो उनके ढंग का ही है,​ फिर भी उसका एक सिरा और हाथ आता है। उन्हें बतौर ख़िराजे-अक़ीदत मैं इन्हीं मिसरों से बात अभी छोड़ रहा हूं:

मुझसे क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं

सहाफ़त यानी पत्रकारिता के लिए असल में ये मिसरे मौज़ूं दिख रहे हैं। यह इल्ज़ाम न तो अब सुनने-पढ़ने में नया है और न हैरान करता है, लेकिन कितना दुखद है कि जिसका शोर और पहुंच ज़्यादा है, वह मीडिया खरीदा जा चुका है। इस पूरे तंत्र में जो कथित ‘पत्रकार’ हैं, बिक चुके हैं। संपादक नाम की संस्था हो या फिर पत्रकारिता नाम की चीज़, सब ख़त्म हो चुका है। कुछ एक अपवाद ज़रूर हैं पर बात कहीं पहुंचने जैसी बात नहीं है। बड़े धड़े को सोने-चांदी के क़लम दे दिये गये हैं, जिनमें बस नर्मी है, बनाव-सिंगार है, कोई धार और कोई मार नहीं है। ज़ाहिर है ऐसे क़लम से सत्ताएं क्या लिखवाना चाह रही हैं।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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