
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
हिंदी ग़ज़ल में भूमिकाबाज़ी और डीएम मिश्र
हिंदी ग़ज़ल के कुश्तीबाज़ ग़ज़लकारों में डी.एम. मिश्रा साहब का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। आपने ग़ज़लों की चूती हुई मड़ई को बचाये रखने के लिए जितना भी खरपतवार इस्तेमाल किया जा सकता था, ब-ख़ूबी किया है, मगर दुर्भाग्य की बात यह रही कि जर्जर छप्पर को थामे रखने के लिए लगायी गयी सारी थूनियाँ कहीं न कहीं से कमज़ोर निकलीं। ग़ज़ल का ताजमहल तामील करने की ख़्वाहिश रखने वाले लोग जब अपनी ग़ज़लों के आंसू बहाते छप्पर को नहीं बचा पाते तो पोल तो खुलना ही है। कुछ आदरणीय ग़ज़लकारों का आग्रह था मैं मिश्रा जी को पढ़ूँ और उन पर कुछ लिखूँ। उनकी ग़ज़लों से दो-चार होकर जो बिजली मेरे ऊपर गिरी, एक-एक करके मैं यहां ज़िक्र करूंगा:
रोज़ किसी की शील टूटती पुरुषोत्तम के कमरे में
फिर शराब की बोतल खुलती पुरुषोत्तम के कमरे में
शेर के पहले मिसरे से बात शुरू करते हैं। पहले मिसरे में आया शब्द ‘शील’ क्या सही लिखा गया है? क्या यह ‘सील’ लिखे जाने की मांग करता है क्योंकि शील टूटती तो कोई अर्थ देता नहीं। और अगर यह सील है तो यह भाषा और कहने का यह तरीक़ा छिछोरों वाला है। इस ‘छोटी-सी’ बात (हिन्दी ग़ज़लकारों के अनुसार) से मैं अपनी बात शुरू नहीं करता मगर जीवन सिंह जी ने भूमिका में लिखा है, “मिश्र जी ने अपनी एक बातचीत में मुझे यह बताया कि वह ‘क्या कहा जाये’ की जगह ‘कैसे कहा जाये’ का ध्यान ज़्यादा रखते हैं।” इस शेर में भाषा ही नहीं बहर भी कठघरे में है। ग़ौर से देखिए तो यह शेर अदम गोंडवी के ढंग और कथ्य को दोहराने का परिश्रम भी प्रतीत होगा। इन बिंदुओं को ध्यान में रखकर आगे चलिए। इस तुकबंदीनुमा ग़ज़ल में कुछ ख़ास नज़र नहीं आता। एक और शेर देखें:
वही चूज़ा जो अंडा फोड़कर बाहर निकल आता
कफ़स में गर रहे कुछ दिन तो उड़ना भूल जाता है
ग़ज़ल के बेहतर कहन का दावा करने वाले डीएम साहब के इस शेर का पहला मिसरा उचित योजक (Conjunction) के न होने की वजह से बे-रब्त और मेले में रास्ता भूला हुआ-सा लग रहा है। संभवतः डीएम साहब कहना चाह रहे हैं जो चूज़ा अंडा फोड़कर बाहर निकल आता है वही चूज़ा अधिक दिन पिंजरे में रहने के कारण उड़ना भूल जाता है। इन दोनो बातों को मिलाकर मिश्र साहब कौन-सा फ़लसफ़ा गढ़ना चाह रहे हैं, वही जानें, मैं तो बस, इतना कहना चाहता हूँ कि ‘आता’ के बाद ‘है’ के अभाव में पूरा मिसरा बिना सींग का बैल लग रहा है। अब यह देखें:
मगर अब भूल जाओ चांदनी रास्ता दिखाएगी
बुरा जब वक़्त आता है सितारा भूल जाता है
इस शेर का पहला मिसरा ‘मगर’ से प्रारंभ किया गया है, यह कहना मेरा उद्देश्य नहीं है, मैं तो बस इतना ही कहना चाहूँगा कि अगर मिसिर महराज आत्ममुग्ध हो गये थे तो कोई बात नहीं, ये हिन्दी ग़ज़लकारों की आदत है। जीवन सिंह जी को तो इन्हें रोकना चाहिए था। जीवन सिंह ने तो इसे चुनिंदा ग़ज़लों में शामिल कर लिया। पुस्तक की भूमिका के अंत में ऐसा लिखा हुआ है। क्या जीवन सिंह को भी पता नहीं था कि ‘मगर’ से वाक्य शुरू नहीं किये जाते। दांत चियारती चुनिंदा ग़ज़लों से एक और शेर देखें:
भले पतवार दे धोखा भले मौसम हो बेगाना
अगर हो दोस्ती पक्की तो तूफ़ान भी बचाता है
इस शेर में यह जो दोस्ती की बात की गयी है, वह दोस्ती किसके साथ करनी है? पतवार से? मौसम से? तूफ़ान से? या किसी अन्य से? ये राज़ की बात तो जीवन पंडित जी ही बता पाएंगे, क्योंकि उनकी नज़र में ये चुनिंदा ग़ज़लों का शेर है। एक और बकवास-सा कुछ देखते हैं:
धनवान देश के मेरे कंगाल दोस्तो
दौलत है मगर कोठियों में देखिए उसे
चुनिंदा ग़ज़लों के इस शेर को भी देख लेते हैं। इस शेर के दूसरे मिसरे में एक अजीब-सी विकृति नज़र आ रही है। ऐसा लग रहा है जैसे भूमिका लिखते समय जीवन सिंह जी की आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। एक दौलतमंद आदमी अगर कोठियों में नहीं रहेगा तो क्या फ़ुटपाथ पर रहेगा? इसमें इतने आश्चर्य की क्या बात है। कहीं जीवन सिंह जी को भाड़े पर लिखने के लिए तो नहीं बुलाया गया था? इसी को कहते हैं अंधों में काना राजा। हिंदी ग़ज़ल के पास अपना आलोचक तो है नहीं, कोई भी आया गूँ-गाँ करके चला गया। डीएम मिश्रा ने एक बड़ा ही शानदार कार्य किया है। इन्होंने अपनी पुस्तकों के संपादक चुन-चुनकर रखे हैं। ये संपादक उनकी किसी भी ऊल-जुलूल तुकबंदी को बा-कमाल कहने से नहीं चूकते। यह भी देखें:
हवा ख़िलाफ़ है लेकिन दिये जलाता हूं
हज़ार मुश्किलें हैं फिर भी मुस्कुराता हूं
इन दोनों पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे किसी छोटे बच्चों की पुस्तक से ‘ऐनक पहने बंदर मामा’ पढ़ रहा हूं। ये दोनों मिसरे आपस में कोई ताल-मेल नहीं बैठा पा रहे। दो अलग-अलग वाक्य बनकर रह गये हैं। ऊपर के मिसरे में मे एक बात और कहना चाहूंगा कि किसी दीपक को बुझाने के लिए हवा के ख़िलाफ़ होने की ज़रूरत नहीं है, या फिर यह भी कह सकते हैं कि दीपक के लिए हर हवा ख़िलाफ़ है। ख़िलाफ़ हवा नौकाओं या फिर साइकिल चलाने वालों के लिए मुश्किलात पैदा करती है। मुहावरे के तौर पर भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। किंतु उपर्युक्त शेर इतना सपाट है कि हम यहां मुहावरे वाले अर्थ की कल्पना नहीं कर सकते। सच कहूं तो यह पूरी की पूरी ग़ज़ल ही वाहियात पंक्तियों से भरी है। शुरू से अंत तक आत्मप्रशंसा के अतिरिक्त कुछ नहीं है। एक शेर पढ़कर तो हंसी आ रही है। सचमुच आदमी अपनी ग़लतियों के प्रति बेहद अंधा होता है।
अनेक शेर मेरे ज़ाया हो गये फिर भी
रदीफ़ काफ़िया बहरो-वज़न निभाता हूं
इतना बड़ा दावा करने के पहले मिश्र साहब को यह जांच लेना चाहिए था कि जिस शेर में उन्होंने यह बात कही है, वह शेर दुरुस्त है कि नहीं। इस शेर का वज़्न होना चाहिए-
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
इस लिहाज़ से देखने पर इस शेर का दूसरा मिसरा ख़ारिज़ हो जाता है। इसका कारण यह है कि मिश्र जी ने ‘बहरो’ शब्द का वज़्न (SI) लिया है, जो उर्दू के मुताबिक़ है जबकि ‘वज़्न’ शब्द का ‘वज़्न’ (IS) लिया है, जिसे कुछ शब्दों के हिंदीकरण के तर्क से ठीक ठहराया जाता है। मिश्रा जी के साथ एक और बात बड़े मज़े की है। एक तरफ़ जीवन सिंह जी, संजीव जी, रामकुमार कृषक जी इनकी ग़ज़लों की बेतर्तीबी की प्रशंसा करते हैं, दूसरी तरफ़ यह स्वयं दावा करते हैं कि उनकी ग़ज़लें, ग़ज़ल के व्याकरण का पूरा अनुकरण करती हैं।
यह स्वयं भी कहीं-कहीं अपनी ग़लतियों की प्रशंसा करते हुए देखे जा सकते हैं, और उन ग़लतियों को ये अपना बिंदासपन बताते हैं। समझ में नहीं आता ये सब लोग मिलकर सिद्ध क्या करना चाहते हैं! सच्चाई यह है कि जब आप किसी ग़लत चीज़ की झूठी तारीफ़ करेंगे तो उसकी एकरूपता बाधित होगी। चोरी हर हाल में पकड़ी जाती है। इसी ग़ज़ल में एक और शेर देखते हैं:
सलाम आंधियां करती है मेरे जज़्बों को
एक दिया बुझ गया तो दूसरा जलाता हूं
दूसरा मिसरा ‘इक’ की वजह से बहर से ख़ारिज़ हो गया है। यहां अरकान ‘मुफ़ाइलुन’ की जगह ‘फ़ाइलातुन’ हो गया है। चलिए थोड़ा और आगे बढ़ते हैं।
डीएम साहब की एक पुस्तक ‘वह पता ढूंढे हमारा’ के भूमिकाबाज़ कृषक जी हैं, यहां भूमिकाबाज़ शब्द का प्रयोग मैंने इसलिए किया है कि कृषक साहब ने भूमिका कम लिखी है, भूमिकाबाज़ी अधिक की है। कृषक जी ने डीएम साहब की ग़ज़लों के लंगड़े-लूलेपन की ख़ूब पैरवी की है। इसमें उन्होंने कथाकार संजीव को भी लपेट लिया है। संजीव लिखते हैं, श्री मिश्र बुनियादी रूप से परिवर्तन और आक्रोश के शायर हैं और उनकी ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की रवायती बंदिशें को हूबहू नहीं निभातीं ताकि इससे उनकी बात का वज़्न भी बना रहे और बनक का सौंदर्य भी…
इसी को कहते हैं कोयले की दलाली में मुंह काला। अरे! जब संजीव साहब को ग़ज़ल का ‘ग’ तक नहीं पता तो यहां फटे में टांग डालने की क्या ज़रूरत थी। ऊपर के शेर में डीएम साहब ने कहा है कि वह ग़ज़ल के व्याकरण का बहुत अच्छी तरह अनुपालन करते हैं नीचे संजीव साहब ये भाषण पिला रहे हैं, हम क्या मानें? बड़ा कनफ़्यूज़न है संपादक और रचनाकार में। संजीव सा’ब ने अपाहिज ग़ज़लों को मैराथन का प्रत्याशी बताकर अपनी इज़्ज़त की पुंगी बजा ली है। कृषक साहब तो अलाव के विशेषांक से ही इस कार्य के लिए चर्चा में हैं। डीएम साहब का खीसें निपोरता एक और शेर:
हमारी अदा साफ़गोई हमारी
ग़ज़ल भी इशारे में कहते नहीं हैं
विचारणीय बात यहां यह है कि आप इशारे में ग़ज़ल कहते नहीं है या कह नहीं पाते हैं। जो काम जैसे करना चाहिए वैसा न कर पाना क्या बहादुरी की बात है। यहां बहादुरी कम बेशर्मी अधिक नज़र आ रही है।
इस लेख में मैंने यह दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह फ़ेक संपादक थोड़े-से लाभ या फिर इसलिए कि उनकी साहित्यिक फ़िल्डिंग सजी रहे, कुछ भी लिखने से गुरेज़ नहीं करते। इस तरह की भूमिकाएं अपना कोई अस्तित्व नहीं रखतीं। लिखे जाने के साथ-साथ ये कचरे में तब्दील हो जाती हैं। मुझे लगता है भूमिका लिखना ज़िम्मेदारी का कार्य है। इसे गंभीरता के साथ ही करना चाहिए। डीएम जी का एक और शेर:
अशुभ लकीरें माथे पर हों उनसे कोई ख़ौफ़ नहीं
मगर दिलों के बीच खींचे जो उस लकीर से डरता हूं
इस तथाकथित शेर का पहला मिसरा प्रगतिवादी तेवर का है, जबकि दूसरा मिसरा आदर्शवादी मिज़ाज का है। मुझे लगता है पहले मिसरे के प्रतिवादी तेवर के साथ दूसरे मिसरे का आदर्श न्याय नहीं कर पा रहा। पहले मिसरे के साथ कुछ संघर्ष वाली बात होनी चाहिए थी, जैसे कि दिनकर ने लिखा:
“धोते वीर कुअंक भाल का बहा भ्रुओं से पानी”
ख़ैर, एक देशी मुहावरा है सब काशी ही चले जाएंगे तो हड़िया कौन चाटेगा। डीएम जी के शेरों पर यह सटीक बैठ रहा है। एक और देखिए:
खिलौने का मुक़द्दर है यही तो क्या करे कोई
नहीं खेलो तो सड़ जाये जो खेलो टूट जाता है
अब इस तरह के शब्द प्रयोग पर आप क्या कहेंगे? खिलौना नहीं खेलने से सड़ जाता है? इसे हम विज्ञान का एक बड़ा आविष्कार मान सकते हैं। यह मैंने सिर्फ़ इसलिए कहा क्योंकि यहां कोई मुहावरा नहीं बन पाया है, जो अपने शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त कोई अलग अर्थ दे सके। इस तथाकथित शेर के लिए ‘सड़ना’ शब्द पूरी तरह से (ABSURD) असंगत लग रहा है। एक और तथाकथित शेर देखें जो चिल्ला-चिल्लाकर अपने बेतुकेपन की गवाही दे रहा है:
अंधेरा जब मुक़द्दर बनके घर में बैठ जाता है
मेरे कमरे का रोशनदान तब भी जगमगाता है
इस शेर में भी मुक़द्दर का अंधेरा, रोशनदान की जगमगाहट के साथ बिल्कुल असंगत है। आपस में कोई सेंसेशन पैदा नहीं कर पा रहे हैं। यही विसंगति और देखें:
छू लिया मिट्टी तो थोड़ा हाथ मैला हो गया
पर मेरा पानी से रिश्ता और गहरा हो गया
भला यह कौन सा संबंध है? कहीं डीएम जी यह तो नहीं कहना चाह रहे कि हाथ गंदा होने के बाद जब ये पानी से हाथ धो रहे थे तो पानी से उनका रिश्ता बन गया। धन्य हैं हिंदी के ग़ज़लकार! इन तथाकथित महान शेरों को पढ़कर संजीव साहब को यह लग रहा है मिश्र जी मीर, ग़ालिब और मख़दूम हैं तो ऐसे में किसको लताड़ लगनी चाहिए, पाठक स्वयं डिसाइड कर लें।
यह बात में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि संजीव साहब ने एक स्थान पर लिखा है, “कभी-कभी उनकी ग़ज़लों में रवानी और उदात्ता उर्दू के मेजर शायरों के आसपास लहरा उठती है। वहां ये मीर हैं, ग़ालिब हैं, मख़दूम हैं”… इन पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने उर्दू के मेजर शेयरों को पढ़ा ही नहीं है। जो मन में आया बोल दिया। व्यक्तिगत संबंधों को बनाने के लिए कुछ बड़े लोग भूमिकाओं में इस तरह का अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं।
इसी किताब की भूमिका में कोई मंजुल मंगल लखनवी हैं, जिनके अनुसार डीएम जी की इन किताबों में लगभग सभी प्रचलित बहरों का प्रयोग किया गया है। बहरों का भी लंबा-चौड़ा ब्यौरा दिया गया है मगर ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा। बहुत-से बे-बह्र शेर नज़र आये। एक दूसरी किताब के इस शेर को देखते हैं, जिसे संपादक डॉ. राधेश्याम सिंह बेवजह बड़ा बनाने पर तुले हैं:
सुनता नहीं फ़रियाद कोई हुक्मरान तक
शामिल हैं इस गुनाह में आलाकमान तक
पहले मिसरे में ‘सुनता नहीं फ़रियाद कोई’ तो ठीक है मगर यह ‘हुक्मरान तक’ कहां से आ गया। पूरा मिसरा अर्थहीन हो गया है। अजीब-सा वाक्य है। करेला वह भी नीम चढ़ा ऐसे कि बे-बह्र भी है। पहला मिसरा है: मफ़ऊलु मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ाइलुन… वहीं दूसरा मिसरा है: मफ़ऊलु फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन!
ऐसे में डीएम जी को क्या कहें! और राधेश्याम जी को क्या कहें! किसी ने ज़रा-सा यह क्या कह दिया कि भूमिका लिख दें, बस टूट पड़े। हमारे गांव में कहावत है- बिच्छी (बिच्छू) का मंत्र न जाने करिया (साँप) के बिल में हाथ डाले। ख़ैर, सनक का कोई इलाज नहीं। एक और शेर देखें:
देखता हूं मैं उसी का रूप हर इंसान में
रोशनी का कारवां ठहरा नहीं सुनसान में
राम जाने इन दोनों मिसरों में क्या रब्त है। यहाँ डीएम साहब के वकार की लँगोट उतरती नज़र आ रही है। मिश्र साहब को आपादमस्तक निहारने पर दिख रहा है कि जनाब ग़ज़ल के मस्तक पर ही गच्चा खा गये हैं। कुछ मतले देखें:
गुमराह अक्सर हो गया जहां रास्ता आसान था
बढता रहा बेख़ौफ़ मैं गो सामने तूफ़ान था
आपने ठोकरें खाकर कभी नहीं देखा
किसी दरख़्त ने चलकर कभी नहीं देखा
सरे-राह नंगा हो चुका उसके लिए कुछ भी नहीं
लोगों की नज़रों में वो गिरा उसके लिए कुछ भी नहीं
इन तीनों में बह्र की बात नहीं करूंगा, मगर इस बात पर चर्चा तो कर ही सकता हूं कि मतले को कैसा होना चाहिए। मतले ग़ज़लों की उठान होते हैं, अगर ये कमज़ोर हो जाते हैं तो ग़ज़लें तो अपने आप ही कमज़ोर हो जाएंगी। बात तब और शर्मनाक हो जाती है जब इतने के बाद भी लोग अपने को मीर और ग़ालिब कहलवाने की इच्छा रखते हों।
उपर्युक्त तमाम मतले बिना रब्त के वाहियात और बचकाने हैं। इन पुस्तकों के संपादक भी कम ढीठ नहीं हैं, जो बिना कुछ जाने-सुने कुछ भी लिख देते हैं। इतना लिखने के बाद अब मेरी प्रबल इच्छा हो रही है कि मैं, जिन आदरणीय ग़ज़लकारों ने मुझे डीएम साहब को पढ़ने के लिए बाध्य किया, उनके साथ ही आब-ओ-हवा के संपादक भवेश दिलशाद को भी जी भर के गाली दूं। ज्ञान प्रकाश विवेक और माधव कौशिक क्या कम थे, डीएम मिश्र रूपी इस दलदल में मुझे इन लोगों ने धकेल दिया। बच्चों की तुकबंदी भी इससे बेहतर होती है।
इन्हीं गजलों को अगर मानक मान लिया गया तो आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? इन पुस्तकों के संपादकों पर भी गुमराह करने का इल्ज़ाम तो लगना ही चाहिए। ग़ज़ल जैसी नाज़ुक सिन्फ़ के साथ इस तरह की हरकत किसी अपराध से काम नहीं है। अंट-शंट तुकबंदियों तथा पीठ खुजलाते संपादकों ने ही हिंदी ग़ज़ल का बेड़ा ग़र्क कर रखा है। सबकी अपनी-अपनी मजबूरियां होती हैं फिर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि डीएम साहब को कुछ हास्य लिखना चाहिए था। उनके शेरों में संजीदगी कम है। मैं तो रह-रह कर हंस पड़ता हूं। आप भी हंसना चाहते हैं?
इक तरफ़ मां-बाप बूढ़े इक तरफ़ बच्चे अबोध
खुरदरा दोनों तरफ़ फ़ुटबॉल अपना रह गया
ऐसी उपमा आपने कभी नहीं सुनी होगी। इस शेर में आया ‘फ़ुटबॉल’ आपके सारे शरीर को सुन्न कर सकता है। आप हिल-डुल नहीं पाएंगे। डीएम साहब को भला फ़ुटबॉल में दो तरफ़ कहाँ से नज़र आ-गये। गणित के लिए इसे भी एक आविष्कार माना जाये। अब यह देखिए, इस शेर के दोनों मिसरे आपको लकवाग्रस्त स्थिति में ले जा सकते हैं…
इस फटे जूते में मोची कील मारे किस तरह
चल रहा ये इसलिए तल्ला उखड़ना रह गया
पाठक बुरा न मानें, मैं सचमुच इस शेर की व्याख्या नहीं कर सकता। ऐसे शायरों से भगवान बचाये। अगर ऐसे ही कहना है तो न कहना बेहतर है। अब इसे पढ़कर आपको डीएम साहब की समझ पर हंसी आती है या…
यह सियासत रंग बदलती रोज़ गिरगिट की तरह
इस सियासत का मगर चेहरा बदलना रह गया
डीएम मिश्रा को कम से कम इतनी समझ तो रखनी ही चाहिए थे कि चेहरा बदलना और गिरगिट की तरह रंग बदलना कमोबेश एक ही अर्थ वाले मुहावरे हैं। पूरा शेर लथर गया है।
इसी तरह के एक से एक अजूबे हम डीएम जी के यहां देख सकते हैं। मैं तो अंततः तमाम संपादकों से यही गुज़ारिश करना चाहूंगा कि किसी भी पुस्तक की भूमिका लिखने से पहले उस पुस्तक की पात्रता ज़रूर जांच ले, और पात्रता के अनुसार ही लिखें। लोग संपादकों पर बहुत यक़ीन करते हैं अतः उनका यह धर्म बन जाता है कि उनके किसी भी कृत्य से पाठक गुमराह न हो। आने वाली पीढ़ी के प्रति हमारा एक दायित्व है। इस दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करके ही हम समाज को कुछ दे सकते हैं। अंत में आदरणीय मिश्र जी से मेरा करबद्ध निवेदन है कि वे हिंदी ग़ज़ल पर थोड़ी दया करें। उन्होंने किताबों की एक लंबी फ़ेहरिस्त तो खड़ी कर ही ली है, अब हिन्दी ग़ज़ल को बख़्श दें।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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