
- May 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
'दुनिया मुट्ठी में' या मुट्ठी से फिसलती दुनिया?
इंसानी ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा तब्दीलियां हो चुकी हैं। किसी वक़्त जब टेलीविज़न आया था तब यह चिंता जतायी जा रही थी कि टेलीविज़न इंसान के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा। वह दौर भी गुज़रा। उसके बाद जब मोबाइल का दौर आया तब एक नयी क्रांति का सूत्रपात हुआ। शायद यह सभी को याद होगा, जब मोबाइल की शुरूआत हुई थी तब धीरूभाई अंबानी जैसे उद्योगपति ने कहा था एक दिन पूरी दुनिया इंसान की मुट्ठी में होगी। उन्होंने इसी लिहाज़ से अपने मोबाइल के प्रचार का सूत्र वाक्य भी यही बनाया था, ‘कर लो दुनिया मुठ्ठी में’।
आज बेशक दुनिया इंसान की मुट्ठी में आ चुकी है। वह जिस वक़्त चाहे उस वक़्त सारी दुनिया को अपनी हथेली पर खड़ा कर सकता है, लेकिन इस आपाधापी में इंसानी रिश्तों की मुट्ठी से दुनिया फिसलती गयी। अब रिश्तों की मुट्ठी खुल चुकी है। संबंधों की मुट्ठी खुल चुकी है। एकता की मुट्ठी खुल चुकी है।
खुल गई मुट्ठी हमारी एकता की, प्यार की
बात होती फ़ोन पर तो बस यहां व्यापार की
अब एक घर के लोगों में सीधे बातचीत नहीं होती। मोबाइल पर बातें होती हैं। किसी को बुलाने के लिए ऊंची आवाज़ नहीं लगायी जाती, मिस कॉल दिया जाता है। अब ज़ोर से बोलना घरों में किसी को पसंद नहीं। खिलखिलाकर हंसना किसी को रास नहीं आता। हाथ में मोबाइल लेकर घंटों बैठे, अपने ही आप में मुस्कुराते रहना, ख़ुद ख़ुश हो लेना और दुनिया से बेपरवाह रहना इस वक़्त की बड़ी त्रासदी है। और तो और मोबाइल के कॉल भी इन रिश्तों के लिए कोई अहमियत नहीं रखने लगे। मधु मधुमन ने कहा है-
कहता था एक कॉल की दूरी पे है वो बस
वो एक कॉल भी तो नहीं है पहुँच में अब
अब एक कॉल करना भी इंसान के लिए परेशानी का सबब हो चुका है। अब आपके यहां किसी शुभ अवसर की पत्रिका देने के लिए शायद ही कोई आता हो। किसी ‘गुड मॉर्निंग मैसेज’ की तरह पत्रिका आपके मोबाइल पर आ जाती है। पत्रिका भेजने वाला एक कॉल करने की भी ज़ेहमत नहीं उठाता। अब आपमें शर्मिंदगी हो तो आप उनके यहां चले जाएं, और न भी जाएं तो वे गिला-शिकवा भी नहीं करेंगे। हद तो यह हो गयी कि अभी एक पत्रिका मिली, जिसमें पत्रिका भेजने वाले ने अपना क्यूआर कोड भी छाप रखा था। मतलब यह हुआ कि अगर आप समारोह में नहीं आ पा रहे हैं, तो इस कोड के ज़रिये अपनी भेंट उन तक पहुंचा सकते हैं। सोचिए, जो विवाह समारोह हमारे परिवार में ऐसी ख़ुशियां लाते थे, जिनकी यादें बरसो-बरस रहती थीं, वे अब इस मोबाइल तक सीमित हो चुके हैं। परवीन शाकिर ने कहा-
हैं फ़ोन पर किसके साथ बातें
और ज़ेहन कहां भटक रहा है
इस छोटे-से से उपकरण ने बड़े-बड़े लोगों को पछाड़ दिया है। इंसान ख़ुद का होकर भी ख़ुद का नहीं रहा। इसने सच्चे आदमी को भी झूठ बोलना सिखा दिया। अब हालत यह है कि बोलने वाला सच बोल रहा है या झूठ, यह या तो बोलने वाला ख़ुद जानता है या मोबाइल। आमने-सामने बात न करने वाले भी मोबाइल पर परम हितैषी की तरह बातें कर रहे हैं। हसीब सोज़ ने कहा भी-
वो फ़ोन करके मिरा हाल पूछ लेता है
नमक-हरामों की कैटेगरी भी होती है
बहरहाल, इस खिलौने ने ज़िन्दगी को बेतरतीब कर दिया है। इन बिखरे टुकड़ों को समेटने में न जाने कितने लम्हों का इंतज़ार करना पड़ेगा।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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