
- June 4, 2026
- आब-ओ-हवा
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भवेश दिलशाद की कलम से....
पर्यावरण दिवस: हालात से वाकिफ़ हैं आप?
1— क्या आप जानते हैं वायु प्रदूषण से हर साल दुनिया भर में कितने लोग मारे जाते हैं? और भारत में कितने?
वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली मौतों को दुनिया भर का औसत 92 प्रतिवर्ष है और आपको हैरानी होगी यह जानकर कि भारत में औसतन 186 मौतें इस कारण से हर साल हो रही हैं।
2— अच्छा भारत के मौसम के बारे में तो आप जानते ही हैं। यह बताइए कि सबसे गर्म साल कौन से रहे हैं। याद कीजिए कहीं तो सुना, पढ़ा ही होगा। चलिए पिछले 100 सालों में से सबसे ज़्यादा गर्मी जिन सालों में पड़ी है, अगर ऐसे 15 सालों की बात की जाये तो वो कौन से हैं?
जेन-ज़ी तो छोड़िए, इन 15 में से 10 तो निश्चित रूप से ऐसे हैं जिनकी गवाह जेन-अल्फ़ा है।
3— अच्छा चलिए आपके घर में मरीज़ों की बात करते हैं। आप जानते हैं हर सातवां या आठवां भारतीय बीमार है! यानी बहुत संभव है कि एक औसत परिवार में कोई न कोई बीमार ही है। और क्या आप यह भी जानते हैं पिछले 30 सालों में बीमारी का बोझ भारत पर दोगुना हुआ है?
आप असहज कब होंगे?
5 जून विश्व पर्यावरण दिवस की तारीख़ है। और यह परेशान होने का दिन है। हम अपने परिवेश में लगातार दो शब्द बहुत तेज़ी से और बड़े प्रचार तंत्र के साथ सुन रहे हैं, विकास और लोकतंत्र। सवाल यह है कि क्या भारत के नागरिकों का कितना विकास हो पाया है! उनके यानी लोक के पास यह अधिकार है कि वह जीवनदाता यानी अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए तंत्र को जवाबदेह बना सकें?
‘विकसित भारत’ के लिए टूटा-फूटा जो भी है, एक ‘विज़न-2047’ चर्चा में है, पर नीतिगत स्तर पर भारत के पास पर्यावरण के लिए क्या कोई विज़न डॉक्युमेंट है, जो हमारी सांसों और सेहत की रक्षा सुनिश्चित करता हो..?
संविधान और तमाम तरह के ब्लू प्रिंट्स से पर्यावरण की गुमशुदगी पर आज के दिन बहस होनी ही चाहिए। बल्कि सिर्फ़ बहस नहीं, एक आंदोलन के रूप में हमें आवाज़ उठानी चाहिए ताकि अनियंत्रित, अनावश्यक विकास के अंधाधुंध दौड़ते घोड़े पर लगाम डाली जा सके।

आपको पता है इंदौर में हज़ारों-लाखों की संख्या में पेड़ कटने की कगार पर हैं। मध्य प्रदेश की हरियाली लगभग हर शहर में ख़तरे में है। यही नहीं, इंदौर में एक पूरे इलाक़े को मलबे में तब्दील कर दिया गया है, विकास के नाम पर। पत्रकार अर्जुन रिछारिया की रिपोर्ट बताती है कि वहां के रहवासी ख़ुद को छला हुआ महसूस रहे हैं क्योंकि उनके घर और दुकानें उन्हें विश्वास में लिये बग़ैर तोड़ दी गयीं।
इंदौर से लगे उज्जैन शहर में भी विकास का तांडव मचा हुआ है। राजधानी भोपाल की हरियाली को लूट लेने की ख़बरें गाहे-गाहे आ ही रही हैं… इन तमाम ख़बरों का समाधान अगर आप यह समझ रहे हैं कि दो-चार पौधे लगा देना ही आपकी ज़िम्मेदारी तो है, फिर सोचिए, तब तक सोचते रहिए जब तक ख़ून न खौल उठे। आब-ओ-हवा बिगड़ेगी, प्रदूषण से बीमारियां बढ़ेंगी तो सिर्फ़ पड़ोसी या पड़ोसी मोहल्ले में ही मातम नहीं होगा।
ख़तरनाक भविष्य कैसे समझें?
जलवायु, प्रदूषण, कृषि, बीमारियों, आपदाओं, विस्थापनों… आदि विषयों पर डाउन टू अर्थ का जून विशेषांक एक तथ्यात्मक ढंग से आया है। इस अंक में आंकड़ों और इस डेटा पर तैयार ग्राफ़िक्स की ज़ुबानी तमाम बातें कही गयी हैं। इस लेख के शुरू में 1 से 3 तक जो बिंदु रखे गये, उस तरह की सूचनाएं इस अंक में मिलती हैं और आप वाक़ई पाठक हैं तो चिंतित हो जाते हैं।
वायु प्रदूषण पर सूचनाएं इस अंक में कई पन्नों पर दर्ज हैं। मसलन, यह भी एक आंकड़ा है कि वायु प्रदूषण से दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में से एक चौथाई यानी हर चौथी मौत भारत में होती है। साल 2023 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में वायु प्रदूषण से क़रीब 79 लाख लोग मारे गये जिनमें से 20.1 लाख भारत में काल-कवलित हुए।
इसी तरह, भूजल संबंधी आंकड़ों से पता चलता है भारत में कम से कम 15 प्रदेशों का हाल यह है कि वहां भूजल जितना रिचार्ज हो पाता है, उससे कहीं ज़्यादा निकाल लिया जाता है।
यह भी समझें भी कि जब वनभूमि को जंगल के अलावा दूसरे कामों के लिए यानी दूसरे व्यवसायों/व्यापारों के लिए मुहैया करवा दिया जाता है, उसे वन भूमि का डायवर्जन कहते हैं। अब आंकड़े यह बताते हैं कि 18 प्रदेशों में जो कुल वनभूमि डायवर्जन हुआ है, उसका 60 प्रतिशत से ज़्यादा सिर्फ़ पिछले पांच सालों में हुआ है!
एक अन्य मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पब्लिक फोरम के एक हालिया सर्वे में पाया गया कि दिल्ली में 230 बस स्टॉप में से 17 प्रतिशत पर निर्धारित आश्रय सुविधा नहीं थी यानी मुसाफ़िरों के लिए शेड आदि की व्यवस्था। जबकि थर्मल कैमरा रीडिंग से पता चला कुछ स्थानों पर सतह का तापमान 65 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था..!
क्या ये सब जानकर आप चौंकते नहीं हैं? ग़ुस्सा नहीं होते? आपको लगता है रक्षा, वित्त, शिक्षा की तरह देश की पर्यावरण नीति भी सुनिश्चित होनी चाहिए? नागरिकों तक तमाम सूचनाएं पहुंचनी चाहिए? और कृषि, प्रकृति आधारित इस देश को राजनीतिक एजेंडों के नाम पर एक ख़तरनाक भविष्य की तरफ़ नहीं धकेला जाना चाहिए?
तो, यह आवाज़ उठाने का वक़्त है।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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