
- June 5, 2026
- आब-ओ-हवा
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सुदिन श्रीवास्तव की कलम से....
सुमन कल्याणपुर: जैसे अपने ही सुरों में लीन
भारतीय फ़िल्म संगीत के एक युग के बारे में सोचकर लगता है, जैसे उस युग के तमाम लोग किसी दूसरे लोक से हमारी धरती पर उतरे और एक जादू-सा बिखेर गये। फ़िल्म निर्देशक व्ही. शांताराम जी, विमल राय साहब, मेहबूब ख़ान साहब, गुरुदत्त जी, संगीतकार अनिल विश्वास जी, नौशाद साहब, बर्मन दादा, रौशन साहब, मदन जी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी, ओ.पी. नैयर साहब, सलिल दा, गीतकार साहिर साहब, मजरूह साहब, राजेन्द्र कृष्ण जी, शैलेन्द्र जी, आनंद बख़्शी साहब, शकील बदायूंनी साहब और गायकों में रफ़ी साहब, किशोर दा, मन्ना दा, मुकेश जी, तलत साहब, यशुदास जी तो गायिकाओं में लता जी, आशा जी, शमशाद जी, मुबारक बेगम जी, गीता जी और सुमन जी। सबके सब नायाब। इस युग की आख़िरी आवाज़ सुमन कल्याणपुर जी ने भी अब हमसे विदा ले ली।
साहिर साहब अपने एक गीत “न सिर झुका के जियो” में लिखते हैं “घटा में छुप के सितारे फ़ना नहीं होते”। लगता है ये मिसरा सुमन जी के लिए ही लिखा गया हो। 1945 से लेकर 1990 तक फ़िल्म संगीत का जो कालखंड रहा, वह लता जी और आशा जी के नाम हो चुका है। इस कालखंड में सुमन जी की उपस्थिति ने श्रोताओं को न केवल चौंकाया, वरन मंत्रमुग्ध किया।

ऐसे शुरू हुई गायकी की यात्रा
शौक़िया तौर पर जो लोग गाते हैं, उनकी आवाज़ यदि किसी फ़िल्मी गायक या गायिका से मिलती है, तो समाज में उसे विशेष पहचान मिलती है लेकिन फ़िल्म संगीत की पेशेवर दुनिया में किसी गायक या गायिका से बहुत मिलती-जुलती आवाज़ सफलता में कितनी बड़ी बाधा है, सुमन जी इसका बड़ा उदाहरण रहीं।
1937 में सेंट्रल बैंक में कैशियर श्री शंकरराव हिमाड़ी के घर में सुमन जी का जन्म कलकत्ता में हुआ। बचपन में आरंभिक शिक्षा के लिए सुमन जी को सेंट कोलंबिया में दाख़िल कराया गया। नन्हीं सुमन की विशेष रुचि पेंटिंग में देखकर पिता शंकरराव ने उन्हें जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाख़िला दिलाया। शंकरराव जी के घनिष्ठ मित्र थे संगीतज्ञ श्री केशवराव फुले साहब। एक दिन केशवराव जी ने घर में गुनगुनाती सुमन को सुना तो उन्होंने सुमन जी के पिता से बात की और तबसे केशवराव जी सुमन जी के आरंभिक गुरु बने।
फ़िल्मों में मिली पहचान
केशवराव जी ने ही सन 1952 में सुमन जी को बाल कलाकार के रूप में आकाशवाणी में गाने का अवसर दिया। इसके बाद सुमन जी ने मास्टर नवरंग और ख़ान अब्दुल रहमान ख़ान साहब से भी गायन सीखा। सुमन जी की आवाज़ सुगम संगीत के लिए बहुत उपयुक्त आवाज़ थी। सुमन जी मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां जी और मराठी गायिका ज्योत्सना बोले के गायन से प्रभावित रहीं। 1952 में आकाशवाणी पर गायन का यह परिणाम हुआ कि 1953 में मराठी फिल्म शुक्राची चांदनी में सुमन जी को पार्श्व गायन का अवसर मिला।
इस मराठी गीत के बाद हिन्दी फ़िल्म “मंगू” में उन्होंने ओ.पी. नैयर साहब के संगीत निर्देशन में “कोई पुकारे धीरे से तुझे ओ आंखों के तारे” गाकर हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की शुरूआत की। इसके बाद नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में सुमन जी ने तलत महमूद साहब के साथ युगल गीत गाकर अपनी विशेष पहचान बना ली।
बेहद संकोची स्वभाव की सुमन जी अपने बारे में कम ही बात करना पसंद करती रहीं। शंकर शंभू जी के संगीत निर्देशन में “मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा” में सुमन जी की आवाज़ अपने पूरे उभार में है। उनके पसंदीदा संगीतकार रौशन साहब थे।
लता जी और सुमन जी
एक बार रेडियो पर एक गीत बजा “ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे”। गीत के बाद उद्घोषक ने गायिका का नाम “लता मंगेशकर” बताया, तो सुमन जी की सुपुत्री ने आकाशवाणी केन्द्र पर फ़ोन करके बताया कि गायिका सुमन कल्याणपुर हैं।
लता जी और सुमन जी की आवाज़ और शैली में इतनी समानता थी कि जब लता जी व्यस्त होती थीं या जिन फ़िल्मकारों का बजट कम होता था, वे सुमन कल्याणपुर जी से गीत गवा दिया करते थे। इसलिए सुमन जी को ‘ग़रीबों की लता’ भी कहा गया। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि सुमन जी की वजह से कई ऐसे गुणी संगीतकारों की प्रतिभा को अवसर मिला जो बड़े गायकों से नहीं गवा पाते थे।
लता जी और सुमन जी की तुलना भी हमेशा की जाती रही। ऐसे विद्वानों और रसिकों की संख्या कभी कम नहीं रही, जो सुमन जी को बेहतर गायिका मानते रहे और यह भी मानते रहे कि लता जी स्थापित हो जाने के कारण ही सुमन जी को वो अवसर सुलभ नहीं हुए, जिनकी वे हक़दार थीं।
अपने ही सुर में लय…
सुमन जी ने हिंदी के अलावा, गुजराती, मराठी, भोजपुरी, राजस्थानी, असमी, मैथिली, पंजाबी भाषा में भी गीत गाये। उन्हें फ़िल्म संगीत में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दादासाहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फ़िल्म ‘सांझ और सवेरा’ में रफ़ी साहब के साथ गाये उनके गीत “अजहूं न आये बालमा” की बात की जाये या फिर उनके अन्य गीतों जैसे — अगर आंख तुमसे मिलायी न होती/न तुम हमें जानो/यही है वो सांझ और सवेरा/आपको प्यार जताने की बुरी आदत है/ यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना… आदि के लिए हमेशा याद किया जाएगा।
सुमन जी पहली गायिका रहीं, जिन्हेंने बीबीसी रेडियो पर गाया। 1969 में उन्होंने वेस्टइंडीज़, न्यूयॉर्क, आदि में अपने शो भी किये। सुमन जी के निधन से सुरीले सफ़र का एक और अध्याय समाप्त हो गया। उनकी बहुत क़रीबी रहीं मंगला खड़ीकर जी ने बताया अपने आख़िरी दिनों में सुमन जी अपने ही गीत सुनती रहती थीं। यों कहें तो वे अपने ही सुर में लीन हो गयीं।

सुदिन श्रीवास्तव
कवि और संगीत मर्मज्ञ। संगीत के अध्यापक और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों के आयोजक के रूप में सुपरिचित। ग़ज़लों का एक संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार। पत्र, पत्रिकाओं, मंचों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर कवि के रूप में उपस्थिति। संपर्क: 98262 43337
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याद को नमन।