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श्रीकांत आप्टे की कलम से....

पंजाब निकाय चुनावों में 'कमल' हारा या ईवीएम?

           ‘अगले पचास साल तक देश में कमल खिला रहेगा’ का दावा करने वाले अमित शाह कहां हैं? हाल में पंजाब में हुए निकाय चुनावों में बीजेपी के बुरे हाल पर वो शर्म से कहीं मुंह छुपाये पड़े होंगे, ऐसा सोचने की आप ग़लती मत करिएगा। बीजेपी का शर्म से रिश्ता कभी रहा ही नहीं। ताज़ा उदाहरण शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का देश के सामने है।

ख़ैर, लौटते हैं पंजाब में निकायों के 1977 वार्डों के चुनाव पर। ये चुनाव बैलेट पेपर से हुए। केंद्र में मोदी-शाह के रहते दिल्ली से सटे एक राज्य में चुनाव बैलेट पेपर से हो गये। यह तो अनहोनी ही कही जाएगी। बीजेपी ने बैलेट पेपर से चुनाव का विरोध हाईकोर्ट में किया। लेकिन हाईकोर्ट ने अपील में देरी बताते हुए अपील ख़ारिज कर दी।

नतीजे घोषित हुए तो 50 साल बाद मुरझाना था जिसे वह कमल सन् 2026 में ही मुरझा गया।

पंजाब के 1977 वार्डों के बैलेट पेपर से हुए चुनावों के आंकड़े:

  • बीजेपी को केवल 172 वार्डों (मात्र 8.70%) में जीत हासिल हुई।
  • यही नहीं, बीजेपी के 1742 उम्मीदवारों (88.11%) की ज़मानत ज़ब्त हो गयी।
  • 958 वार्डों में आम आदमी पार्टी विजयी रही।
  • 397 वार्डों में कांग्रेस और 192 वार्डों में शिरोमणि अकाली दल को जीत मिली।

पंजाब का शिरोमणि अकाली दल, बीजेपी का सबसे पुराना सहयोगी दल था, जिसे मोदी-शाह वाली बीजेपी ने कुचक्रों की मदद से तहस-नहस कर दिया। आज बीजेपी उसी पंजाब के निकाय चुनावों में इस दल से भी पिछड़ गयी है। कहावत भी है जो दूसरों के लिए गढ़्ढा खोदते हैं, वो ख़ुद उसी में गिरते हैं।

मोदी-शाह की राजनीति तिकड़मों से येन-केन प्रकारेण चुनावों में जीत हासिल करने की राजनीति है। चुनाव लोकसभा, विधानसभा, पंचायत, नगर-निगम किसी का भी हो।

आपको याद ही होगा सिकंदराबाद के नगर-निगम चुनाव के लिए भी प्रधानमंत्री मोदी ने रैली की थी। दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब का मामला तो और भी अनोखा था। क्लब के अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए बीजेपी के केंद्रीय मंत्री रहे बिहार के आर.के. सिंह ने नामांकन दाख़िल किया। अमित शाह उस पद पर अपनी पसंद का आदमी चाहते थे। अमित शाह ने बीजेपी के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ भी ख़ुद की पसंद का बीजेपी का ही उम्मीदवार खड़ा किया और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बीजेपी के उम्मीदवार को बीजेपी के उम्मीदवार से ही हरवा दिया।

ये दो उदाहरण बताते हैं जीत के लिए मोदी-शाह की नज़र में चुनाव सिर्फ़ चुनाव होता है और चुनावों की जीत-हार ही राजनीति का सार है।

अब, पंजाब में बैलेट पेपर से हुए चुनावों में मोदी-शाह की कलई खुल गयी है।

अंधभक्त और गोदी मीडिया के शोर के बावजूद यह सच है कि नरेंद्र मोदी पच्चीस साल के राजनीतिक जीवन के कठिन दौर में हैं। पहले महाराष्ट्र, फिर बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारी जीत का डंका बीजेपी चाहे जितना बजा ले लेकिन जनता को उन चुनाव परिणामों पर भरोसा नहीं है। इस परिस्थिति में पंजाब के निकाय चुनावों में इस हार के बीजेपी के लिए गहरे अर्थ हैं।

ईवीएम से चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाने वालों का उपहास करने वालों के लिए बैलेट पेपर से एक राज्य के निकाय चुनावों के ये परिणाम आईना हैं।

श्रीकांत आप्टे, shrikant apte

श्रीकांत आप्टे

चार दशकों से व्यंग्य लेखन में सक्रिय। रंगमंच पर भी लेखन, अभिनय और निर्देशन। 150 से अधिक रेडियो नाटक प्रसारित। फ़िल्मों के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन के साथ कविताओं एवं साहित्य के पोस्टरों पर भी काम। संपर्क: 91799 90388।

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