
- August 14, 2026
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आज जब हम हर शब्द के मायने भूल रहे हैं, हर शब्द अपना अर्थ खोता जा रहा है तब ‘आज़ादी’ शब्द के अर्थ को क़ायम रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है। 'आज़ादी का ऑडिट' अंक में एक नज़र 'आज़ादी' के उन नग़मों पर, जो एक समय देश के दिल से होंठों तक गूंजते रहे...
नियमित ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
सात दशक बाद भी रही आस की आस
आज जब देश को आज़ादी मिले सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, तब लगता है आज़ादी के मायने बादल गये हैं। आज़ादी की ख़ातिर जान गँवाने वालों को यह रंज अब तक होगा कि यह उनके ख़्वाबों का हिदोस्तां नहीं है। हमने आज़ादी हासिल की, अपना संविधान बनाया, अपने कर्तव्य तय किये, अपने अधिकारों की व्याख्या की मगर अपने मुल्क के प्रति आदर का भाव हमारे जीवन से कम होता गया। जिन सपनों को देखा गया था वे धीरे-धीरे ओझल होते गये और आज स्थिति बद से बदतर हो गयी है।

आज की पीढ़ी तो आज़ादी के मायने समझ भी रही है, मगर आने वाली पीढ़ी तो आज़ादी को समझने की कोशिश भी शायद ही करे। आज यह आश्चर्यजनक लग सकता है कि आज़ादी की लड़ाई में शब्दों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। शब्दों ने ग़ुलाम भारत की ज़मीन में ऐसे क्रांतिबीज बोये, जिनने इस ज़मीन पर उम्मीदों की फसल उगायी और एक बयार पूरे देश में आज़ादी के प्रति बहने लगी जिसकी परिणति आज़ाद भारत के रूप में मिली।
उस वक़्त के क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन को देखा जाये तो पता चलता है उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्व वैचारिक स्तर पर भी एक लड़ाई लड़ी। इन सेनानियों ने अपनी कविताओं, लेखों, भाषणों और शायरी के माध्यम से आम जनमानस को जागृत करने का कार्य किया। इनके शब्दों में इतनी तासीर थी कि एक नारा पूरे देश की फ़िज़ा में देशभक्ति की भावना प्रसारित कर देता था। वरना भगतसिंह की आवाज़ में गूंजा ‘इन्क़लाब ज़िदाबाद’ का नारा पूरे देश में क्रांति का सूत्रपात न करता। यह नारा तो आज तक हर आंदोलनकारी के मन में जोश भरता है। रामप्रसाद बिस्मिल, जिन्हें दोहराते नहीं थकते थे, ये अशआर देखें:
चर्चा अपने क़त्ल की अब यार की महफ़िल में है
देखना है यह तमन्ना कौन सी मंज़िल में है
देश पर क़ुरबान होते जाओ तुम ऐ हिन्दियो
ज़िन्दगी का राज़ मुज़मिर खंज़रे-क़ातिल में है
हर एक शब्द जैसे दिल के भीतर छिपी सुप्त देशप्रेम की भावना को जगाने के लिए काफ़ी है। उस दौर के कई ज्ञात-अज्ञात ऐसे रचनाकार रहे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से पूरे देश में देशभक्ति की लहर पैदा की। ऐसे ही शायर फ़िरोज़ुद्दीन ‘मंसूर’ की इस ग़ज़ल में एक ललकार गूंजती है:
माँगा पहले अब न माँगेगे मगर लेंगे ज़रूर
हक्क़े-आज़ादी के हम हक़दार हैं साइल नहीं
ज़िन्दगी आज़ादगी, आज़ादगी है ज़िन्दगी
मौत बेहतर है अगर आज़ादि-ए-कामिल नहीं
कर गया चट तेरी मेहनत का समर सरमायादार
तुझको फ़ाके के सिवा मज़दूर कुछ हासिल नहीं
जाग ऐ मंसूर देखो वो निदा आने लगी
क़ौम की दौलत है ये, दौलते-काहिल नहीं
आज़ादी के परवानों ने अपना लक्ष्य एकमात्र तय कर रखा था। यही कारण था कि उस दौर में कलम जो भी कहती थी वह देश के हित में प्राणों का उत्सर्ग करने की प्रेरणा देती थी। उस दौर के शब्दों की ही यह ताक़त थी कि देशभक्तों के जत्थे एक आवाज़ पर मर-मिटते थे। मुंशी गौरीशंकर ‘अख़्तर’ के इन अशआर में वतन के लिए सब कुछ न्यौछावर करने की सीख मिलती है:
उठाएँ ज़ुल्म कब तक और कब तक सख्तियाँ झेलें
सहें कब तक जफ़ा-ए-ग़ैर ताकि रंजो-गम झेलें
हम उठने भी न पाएंगे कि दुनिया काँप जाएंगी
फलक़ चक्कर में आएगा, जमीं भी थरथराएगी
न घबराते हैं न तोपों से, न तलवारों से डरते हैं
हम अपनी धुन के पक्के हैं जो कहते हैं, वो करते हैं
कहे देते हैं इतना तो ज़ियादा कह नहीं सकते
किसी से दबके ज़ेरे-आस्मां अब रह नहीं सकते
जब तीर और तलवार असर नहीं करते है, वहाँ शब्द ऐसा असर डालते हैं कि दुश्मन तिलमिला उठता है। अंग्रेज़ों को यह शब्दों की मार सबसे भारी लगी। ताक़त में अंग्रेज़ अधिक सम्पन्न थे, और योजना बनाने में भी माहिर। देश के लोगों को भ्रमित करने में भी उन्हें महारत हासिल थी। कई भारतीयों को उन्होंने अपना मुख़बिर बना रखा था। वे प्रलोभन देने में भी पारंगत थे। उनके पास आधुनिक हथियार थे। सन् 1857 की भारतीय विफलता ने अंग्रेज़ों को भीतर से भी ताक़तवर बना दिया था। मगर एक यही मोर्चा था, जहाँ अंग्रेज़ भारतीयों से कमतर थे। शब्दों के ज़रिये भारतीयों में जो अलख हमारे सेनानी जगा रहे थे, वह उनके बस में नहीं था। माहिर की यह गज़ल इस बात को सम्बल प्रदान करती है:
होती हैं आज़ाद क़ौमें सर कटा देने के बाद
खौफ़ दिल से एकदम बिल्कुल हटा देने के बाद
मिल नहीं सकती है आज़ादी बिना कीमत दिये
रोक सकता कौन है, क़ीमत चुका देने के बाद
फ़र्ज़ है होना फ़ना आज़ादगी के वास्ते
ग़म है फलता, फूलता हस्ती मिटा देने के बाद
टूट जाएगी ग़ुलामी की कड़ी दम भर में आज
हिन्दू-ओ-मुस्लिम के बस कंधा सटा देने के बाद
आज़ादी के दौर में जहाँ वीरता के नये अध्याय लिखे गये, वहीं साहित्यकारों और पत्रकारों ने अपनी पैनी कलम से अंग्रेज़ों को लहूलुहान कर दिया। उस दौर के साहित्यकारों और पत्रकारों में देशभक्ति का भाव कूट-कूटकर भरा हुआ था। यही कारण था कि साहित्यकार और पत्रकार में ज़्यादा भेद नहीं रहा। अधिकांश साहित्यकार पत्रकारिता में सक्रिय रहे। यही वह माध्यम था, जिसके ज़रिये क्रांति की रचनाएँ जन-मानस को उद्वेलित करती रहीं। यदि इन क्रांति गीतों को सिर्फ़ क्रांति का भाव जगाने वाला कहा जाये तो अनुचित ही होगा।

इन रचनाओं ने भारतवासियों के मन में आत्मसम्मान का भाव जगाया। उन्होंने लोगों को देश से प्रेम करना सिखाया। इन रचनाकारों ने यह बताया कि आज़ादी पाने के लिए हम सभी को एकजुट होना ही होगा। इन्होंने ही आज़ादी के मर्म को समझाया था। आज़ादी मिलने पर ही हमारे दुःख-दर्द दूर हो सकते हैं और हम आज़ाद भारत में ख़ुशहाल रह सकते हैं। यही मंशा जताते हुए जब इन रचनाओं ने जनमानस में पैठ बनायी, तब आम हिन्दुस्तानियों के मन में देश के प्रति मौजूद आदर भाव में वृद्धि हो सकी। स्वर्ण सहोदर की एक रचना:
हम विद्रोही, हम क्रांति दूत, हम हैं विप्लववादी
तूफ़ानों से ही लड़ने के हम हैं हरदम आदी
है धर्म हमारा दिलों के दुःखों को पी लेना
है कर्म हमारा फटे हुए सीनों को सी देना
है लक्ष्य हमारा मानवता का करना परिपालन
है ध्येय हमारा दानवता का करना प्रक्षालन
हम देख नहीं सकते मानवता की अवनति, बरबादी
हम विद्रोही, हम क्रांति दूत, हम हैं विप्लववादी
उस दौर के हर रचनाकर के मन में एक आग धधक रही थी। वह चाहे किसी भी दल को मानने वाला हो, हर रचनाकार ने अपने परिवेश को गंभीरता से देखा। देखा ही नहीं, उस पीड़ा को अभिव्यक्त भी किया। आले हसन के ये अशआर:
मक़तल बना हुआ है हिन्दोस्तां हमारा
सड़कों पे बह रहा है ख़ूने-रवां हमारा
किस नींद में हो जागो, किस ख़्वाब में हो चौंको
आलस से मिट रहा है, नामो-निशां हमारा
हिन्दोस्ताँ में कैसी ये आग लग रही है
दोज़ख़ बना हुआ है जन्नत निशाँ हमारा
आज़ादी के सात दशक बाद ये शब्द आश्चर्यजनक लग सकते हैं। उन रचनाकारों की रचनाएँ अतिरंजना भी समझी जा सकती है। मगर इन रचनाओं में धधकते आक्रोश को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इन शब्दों के भीतर छुपी आग को ठण्डा नहीं माना जा सकता। इन शब्दों के माध्यम से जो क्रांतिबीज रचनाकारों ने बोये थे, उन्हें निष्फल नहीं कहा जा सकता। आज के दौर में ऐसे शब्द, ऐसे शब्द साधक और ऐसे निस्वार्थ मसिजीवी शायद ही मिलें। मगर इन रचनाकारों के शब्द हमारी थाती हैं। उस दौर के रचनाकारों की कई रचनाएँ ज़ब्त हो गयीं। कई नष्ट कर दी गयीं। फिर भी हमारे सामने बहुत-सी रचनाएँ मौजूद हैं। हमारी कोशिश होना चाहिए कि इन रचनाओं को हम अपनी नयी पीढ़ी तक पहुँचाएँं।
कोई धर्म, मज़हब, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग बाधा नहीं, ये देशभक्ति के जज़्बात हैं। देशभक्ति के गीत हम सिर्फ़ राष्ट्रीय अवसरों पर ही सुनते हैं, वह भी रस्म-अदायगी की तरह। यदि इन अप्रचारित रचनाओं को बच्चों तक पहुँचाया जाये, युवा पीढ़ी को समझाया जाये तो हो सकता है, देश के प्रति आदर-भाव में वृद्वि हो सके। यह दौर नैराश्य और स्वयं तक सीमित रहने का है। इसमें देश की बात, देश के प्रति प्रेम की बात समझाना आवश्यक है। ये रचनाएँ आज भी क्रांतिबीज की तरह हमारी सूख चुकी देशभक्ति की ज़मीन पर उगने के लिए बेताब हैं। ज़रूरत इन्हें रोपने, हवा पानी देने और सहेजने की है। शहीदे-आज़म आज भी हमें आवाज़ दे रहे हैं, आज भी उनके कहे गये शब्द, उनकी पत्रकारिता, उनके वक्तव्य भारत की बिगड़ती परिस्थतियों में नवजीवन का संचार करने के लिए काफ़ी है।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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