
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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हिंसा पीड़ित मणिपुर का जाएज़ा लेने गयी थीं, भोपाल निवासी कवि और 'समय के साखी' की संपादक डॉ. आरती, उनकी डायरी एक पुस्तिका के रूप में हाल ही Notnul पर उपलब्ध हुई है। पिछले तीन सालों में हमने कितने ही त्योहार और राष्ट्रीय पर्व मणिपुर को याद न करते हुए मनाये हैं! इस स्वतंत्रता दिवस पर देश के इस कोने को याद और संवेदना में ज़रूर रखें, पढ़ें इस डायरी से कुछ महत्वपूर्ण अंश...
"मणिपुर जल रहा है"
मई-2023 की शुरूआत में ही मणिपुर के दो प्रमुख समुदायों के बीच हिंसा भड़की थी। हिंसा के क़रीब ढाई साल तक प्रधानमंत्री मोदी मणिपुर नहीं गये और मुख्यमंत्री को बदलने में तो और भी वक़्त लगा। आलम यह कि अब भी वहां हिंसा रुकी नहीं है। हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर की ये यादें प्रासंगिक हैं और हिंदी के पाठकों के लिए समझ का रास्ता भी।
“…अब से पहले जितने भी दंगे और नरसंहार हुए उनमें हिंसक भीड़ के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। पुलिस और अर्द्ध-सैनिक दलों के पास थे। ये आज़ाद भारत में अपनी तरह का पहला सिविल वॉर, या गृहयुद्ध का प्रयोग था। इसे दंगे और नरसंहार कहना ग़लत होगा। हमें आरती का आभारी होना चाहिए कि वह मणिपुर गयीं और वहाँ से आकर हिंसा के हर पहलू को क़लमबंद किया। इस किताब में उन्होंने आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक यहाँ तक कि जेंडर के पहलू इस तरह पिरोये हैं कि हर तह खुलती चली जाती है।”

सितंबर 2023 में मणिपुर प्रवास के संस्मरणों पर लिखी गयी डायरी की भूमिका में प्रख्यात विज्ञानी, साहित्यकार व सोशल एक्टिविस्ट गौहर रज़ा ने उपर्युक्त शब्द लिखे हैं। आब-ओ-हवा के लिए विशेष रूप से डायरी के ये अंश…
झुलसी हुई बस्तियों की ओर…
शाम के क़रीब पांच बजे होंगे, जब हम अभी-अभी अपने ही देश में रिफ़्यूजी बन चुके कूकियों के कैंप में पहुंचे थे। यह उनके खाने का समय था। खाना बन चुका था। स्त्री- पुरुष-बच्चे जहां-तहां बैठकर, खड़े होकर खाना खा रहे थे।
कुछ यात्राएं सुखद होती हैं। हर पल मन में उत्साह पैदा करती हैं और कुछ भीतर ही भीतर डराती हैं कि अब आगे क्या देखने को मिलेगा? यहां से हमारी यात्रा लगभग ऐसी ही थी। मेरा मन कर रहा था कि मैं कुछ तस्वीरें उन दृश्यों की लूं लेकिन दूसरी तरफ़ मेरी आत्मा मुझे ख़ुद को धिक्कार रही थी कि इस तरह खाना खाते लोगों की तस्वीर कैसे ली जा सकती है! ये मुसीबतज़दा लोग हैं, ये अपने घर में बैठकर इत्मीनान से खाना नहीं खा रहे हैं, ये सब अपनी पसंद का भी खाना नहीं खा रहे, इन्हें दानदाताओं की तरफ़ से जो मिल गया है वह खा-पीकर गुज़ारा कर रहे हैं। एक कमरे में दस से पंद्रह लोग रह रहे हैं या डाल दिये गये हैं, जानवरों की तरह ही तो! उनके खाने-पीने की, उनके उठने-बैठने की, उनके रोने की, उनके बुझे हुए चेहरों की, उन कमरों की, जिसमें वे रेलवे स्टेशन के यात्रियों की तरह पड़े हुए हैं; कैसे तस्वीरें ली जाएं?
यह सब सोचते हुए मैंने यही बात हमारे साथी मनोज कुलकर्णी से कही। उन्होंने भी कहा- ‘हां यही सवाल मेरे दिमाग़ में भी उठ रहे हैं कि उनकी इजाज़त के बिना हम उनकी तस्वीरें कैसे ले सकते हैं? लेकिन दूसरी तरफ़ सोचा जाये तो ये तस्वीरें ही यहां से निकलकर बाहरी दुनिया में जाकर उनकी कहानी कहेंगी, वरना लोग कैसे जानेंगे? उनकी संवेदनाओं को लोगों तक पहुंचाने का यही सबसे त्वरित माध्यम भी है।’

और यह सच भी है। अपनी आंखों से देखे हुए उन्हीं दृश्यों को दोबारा जब मैंने आशा मिश्रा के द्वारा ली गयी तस्वीरों में देखा तो उसका एहसास मुझे कहीं और गहरे मन की भीतरी परतों तक झकझोर गया। कला का यह माध्यम फ़ोटोग्राफ़ी भी मनोरंजन या शौक़ नहीं है। किसी भी माध्यम का उपयोग हम कैसे करते हैं, यह उपयोग करने वाले के सोचने के तरीक़े पर निर्भर करता है। हर माध्यम सामाजिक ज़िम्मेदारी और कार्रवाई बन सकता है बल्कि निश्चित ही वह होता भी है।
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सेनापति मणिपुर का एक ज़िला है और क़स्बा भी। कूकियों के सभी रिफ़्यूजी कैंप इसी ज़िले में हैं। इस तरह से समझा जाये कि यह कूकी बहुल इलाक़ा भी है। मणिपुर को भौगोलिक नज़र से देखें तो सेनापति पहाड़ी इलाक़े में है।
चार मई को जब कूकी- मैतेई दंगों की शुरूआत होती है और दर्जनों कूकियों के गांवों में आग लगा दी जाती है, जब इस दंगे में कई हज़ार लोग बेघरबार हो जाते हैं; वे अपना सामान, घर, गांव छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिये जाते हैं। लेकिन यह कैंप, जो कि एक सरकारी स्कूल है, उस स्कूल को ख़ाली कराकर पांच तारीख़ को ही लोगों को यहां लाकर पहुंचा दिया गया। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक दिन में इतने इंतज़ामात कैसे कर लिये गये! और यह एक अकेला कैंप नहीं है क़रीब 12000 कूकियों के रहने के लिए कई कैंप सेनापति ज़िले में बने हुए हैं।
हिंदी प्रदेशों में जब-जब इस तरह के दंगे-फ़साद हुए हैं, लोगों को प्राथमिक सुविधाएं मुहैया कराने में भी सरकार और समाजिक संस्थाओं को महीनों लग जाते हैं। लेकिन प्रारंभिक आवश्यकताओं के नज़रिये से देखा जाये तो इस कैंप में खाने-पीने की सुविधा थी। यह कैंप जो सेनापति ज़िले के साइतुल क्षेत्र में था, यह सबसे बड़ा कैंप है। क़रीब 800 लोग इस कैंप में रह रहे हैं। हम चार महीने बाद इनके बीच थे और तब तक ये लोग आकस्मिक आ पड़े दुख से उबरने की कोशिश में कुछ कामयाब हो चुके थे। बच्चों को आसपास के स्कूलों में दाख़िला दिलवा दिया गया था। चर्च और अन्य सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से किताबें, यूनिफ़ॉर्म आदि की व्यवस्थाएं लगातार की जा रही थीं। स्कूलों ने भी बच्चों को किताबों आदि के इंतज़ाम करने में मदद की थी। जिन बच्चों के बोर्ड एग्ज़ाम थे, उन्हें सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोग आकर ट्यूशन दे रहे थे।
इस साइतुल कैंप से पहले हम एक छोटे-से कैंप में जाकर लोगों से मिले। वहां मैदान में बच्चे खेल रहे थे। कितना ख़ूबसूरत होता है बचपन। ग़म तो इन बच्चों को भी था कि उनका घर छूट गया। स्कूल छूट गया। साथी तितर-बितर हो गये लेकिन वे खेल रहे थे, हंस रहे थे, एक-दूसरे को छेड़ रहे थे। उनके माता-पिता ऐसा नहीं कर पा रहे थे। उन्हें अपने घर के छूट जाने का ग़म ही नहीं बहुत सारी चिंताएं थीं। उम्र और चेतना एक ऐसा संवेदनात्मक बैरिकेड होती है, जो ख़ुश होने के कारण मिल भी जाएं तब भी संतुष्ट नहीं होने देती। बड़े, बच्चे नहीं बन सकते दोबारा और अफ़सोस कि बच्चे भी कल को बड़े हो जाएंगे।
इस कैंप के व्यवस्थापकों ने हमें कई बातें बतायीं। अलग-अलग प्रदेशों से मिलने वाली मदद की सूचियां दिखायीं। उनके पास प्रदेशवार मिलने वाली मदद का ब्यौरा था। हमने मध्य प्रदेश को खोजने की कोशिश की, वह नहीं मिला। अलबत्ता यहां से कुछ सामाजिक संस्थान ज़रूर थे, जिन्होंने अपने स्तर पर मदद की थी। एक बात साफ़ दिख रही थी कि भाजपा-शासित प्रदेशों से इन कैंपों को कोई मदद नहीं दी गयी। जबकि छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से कई लाख रुपये मणिपुर के रिफ़्यूजी कैंपों को मदद बतौर भेजे गये थे। सामाजिक संस्थाओं ने भी पैसों के बंदोबस्त के साथ ही सामान आदि इकट्ठा करके इन कैंपों को भेजने की पहल जारी रखी हुई है।

कोई भी समाज कितना ज़िंदा है, यह बात ऐसे मौक़ों पर ही साबित होती है। अपने निजी प्रलोभनों से इतर सामूहिकता एक ज़रूरी दायित्व-बोध के रूप में उसके भीतर धड़कती है या नहीं? यह भी सामाजिक विकास के सूचकांक को समझने का एक ज़रूरी पैमाना होना चाहिए।
ये हकीकतें हैं, फसाने न समझें
(एक)
चार साल का बच्चा अपने पिता को याद करके रो रहा है। उसके पिता किसी दूसरे कैंप में थे। लगभग 28-30 साल की बोइनेंग अभी-अभी जन्मे दूसरे बच्चे को संभालने और इस चार साल के बच्चे को समझाने की कोशिश कर रही है कि हम जल्दी ही उसके पापा के पास चलेंगे।
दरअसल बोईनेंग कूकी है और उसने मैतेई लड़के से शादी की थी। तीन-चार मई को जब ये घटनाएं शुरू हुईं, उस समय बोईंनेंग सात माह के गर्भ को संभाले हुए थी। आप कल्पना करिए कि कैसे एक गर्भवती स्त्री अपनी जान बचाकर अपने परिवार के साथ भागी होगी! चूंकि पति मैतेई था इसलिए वे पहले मैतेई कैंप में गये। लेकिन कूकी पत्नी को उन्होंने कैंप में रहने की अनुमति नहीं दी और तब मजबूरन बोईनेंग को कूकियों के कैंप में अपने माता-पिता के परिवार के पास आना पड़ा।
मैतेई और कूकियों के विवाह आपस में होते आये हैं। यहां एक ख़ास बात की ओर भी ध्यान देना होगा कि यहां के मैतेई हों या कूकी या नागा या अन्य आदिवासी- यहां प्रेम विवाह ही होता है।
बोइनेंग की मां ने बताया कि बच्चा अक्सर रोता है अपने पिता और दादा-दादी से मिलने की ज़िद करता है। चार महीने बाद स्थितियां थोड़ा ठीक होने से वे उसकी बात फ़ोन पर करवा पाते हैं। एक रिफ़्यूजी कैंप में बच्चे को जन्म देना, उसका पिता से दूर होना, मन को बहुत ही व्यथित कर देने वाली घटना है। बोईनेंग ने बहुत ही उदास और बुझे मन से कहा कि- हमारा परिवार बहुत सुखी था। अब हम शायद ही कभी मिल पाएंगे!
वे वाक्य जिन्हें कहते हुए ‘शायद’ या ‘काश’ का प्रयोग करना पड़े, उन्हें बोलने में भले कुछ सेकंड लगें, लेकिन वे जीवन से भी लंबा अंतराल अपने भीतर समेटे हुए होते हैं।
(दो)
एक दूसरे कमरे में वह बीमार व्यक्ति छत की ओर टकटकी लगाये देख रहा है। ज़मीन पर पड़े हुए उनके बिस्तर के चारों तरफ आधा घर और आधा अस्पताल फैला हुआ है। मामंग चोंगोई नाम है उनका। उम्र 67 साल है। इन दिनों उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है। हालांकि कैंप में इमरजेंसी में डॉक्टर आते हैं लेकिन डॉक्टर की देख-रेख के बाद भी वे स्वस्थ नहीं हो पा रहे। उनकी दवाइयों के डोज़ बढ़ गये हैं। डॉक्टर उन्हें मन को शांत रखने की कोशिश करने की समझाइश पर ज़ोर डाल रहे थे।
उन्होंने कहा, वह सब कुछ भूलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कुछ भी नहीं भूल पा रहे। सोने की कोशिश करते हुए उनके आंखों के सामने नंगे हथियार लहराने लगते हैं। आग का समंदर अपनी ओर बढ़ता देखकर कैसे नींद आ सकती है! हां, मुझे पता है इस घटना को चार महीने बीत चुके हैं लेकिन मैं कोशिश करके भी नहीं भूल पा रहा हूं। मेरी आंखों के सामने मेरा घर जल रहा है। हमारी मुर्ग़ियां, बतख़ सब जल गये होंगे। मैं कुछ भी नहीं भूल पा रहा हूं। यहां से निकलने का कोई रास्ता भी तो नहीं दिख रहा। सरकारें हमें दुश्मन समझती हैं। हमारे बारे में कोई बात नहीं करतीं।
उनकी सांस भर आयी थी। दो घूंट पानी पीकर वे फिर कहते हैं कि- हम सब तो मिलकर साथ रहते थे। पता ही नहीं चला, कैसे एक-दूसरे के दुश्मन बन गये?
सच भी है यह, कठोर सच, जिसने अपना घर अपनी आंखों के सामने जलते देखा होगा, उसका ब्लड प्रेशर कैसे शांत हो सकता है! हमने उन्हें ज्यादा बात न करने की एक और समझाइश दी। हम भी कितने हिप्पोक्रेट्स हैं। एक तो लोगों से उनके ज़ख़्मों को कुरेदकर ज़्यादा जानने की कोशिश कर रहे हैं, और दूसरी तरफ़ उनसे कह रहे हैं कि वे शांत रहें, सब कुछ भूल जाएं। अचानक आ पड़ी इस अप्राकृतिक त्रासदी को कोई कैसे भूल सकता है!
सब कुछ ठीक होने के बाद भी ये हादसे भूलना मुश्किल होगा! अपने जीवन में तिनका-तिनका जोड़कर बनाया हुआ घर छूट गया, बरबाद हो गया। आगे आने वाली पीढ़ी का भविष्य चौपट है; ऐसे में कोई भी शारीरिक या मानसिक रोगी हो सकता है। अभी तो हम यहां केवल शरीर के रोगों और बाहर दिखने वाले दुखों की बात कर रहे हैं।
(तीन)
यह सेनापति के एक छोटे से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का परिसर था। हमारी टीम ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर वहां के लोगों से भी बात की।
यहां कुछ सरकारी क्वार्टर थे। वे या तो ख़ाली रहे होंगे या उन्हें ख़ाली करवाकर वहां भी एक छोटा-मोटा कैंप बना दिया गया था। लगभग पचास या साठ लोग वहां ठहराये गये थे। स्वास्थ्य केंद्र के सामने ही एक चाय की दुकान थी। मेरा मन चाय पीने को कर रहा था। हमारे सभी साथी डॉक्टर-नर्सों से बात करने के लिए भीतर चले गये थे। मैं वहीं थोड़ी देर के लिए रुक गयी। वहां कई लोग बैठे हुए थे। उसमें से कुछ लोग दवाइयां लेने आये थे और कुछ इसी कैंप में रह रहे थे। मैंने धीरे-से उनसे बात करनी शुरू की।
वहां एक बुज़ुर्ग कूकी बैठे हुए थे। मैंने मई कांड की चर्चा की और प्रतिक्रिया के लिए उनकी ओर देखा। उनकी आंखें बुझी और कहीं खोयी हुई-सी थीं। उनकी आंखों में स्थायी रूप से दहशत और इस अकूत ग़म की परछाईं को महसूसा जा सकता था। उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज़ में बताया- उन्हें एक बार अटैक आ चुका है और दिल्ली से इलाज चल रहा था। अभी चार महीनों से चेक-अप के लिए जाना नहीं हो सका और अब वे (कूकी) इम्फाल की तरफ़ जा भी नहीं सकते।
मणिपुर को देश से जोड़ने वाला रास्ता मुख्य रूप से इम्फाल ही है। हवाई अड्डा भी वहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी दवाइयां भी सेनापति में नहीं मिल पातीं। डॉक्टर कोशिश कर रहे हैं कि ज़रूरी दवाइयां मंगवायी जाएं लेकिन अभी मुश्किल है।
वहां साथ ही एक नवयुवक भी बैठा हुआ था। वह मणिपुर की राजधानी इम्फाल से ग्रैजुएशन कर रहा था। यह उसका चौथा सेमेस्टर था, जिसकी परीक्षाएं दो महीने बाद ही होनी थीं। उसने बताया कि जिस तरह के हालात अभी हैं और जल्दी नहीं सुधरे तो वह परीक्षा नहीं दे सकेगा।
उसने यह भी बताया कि- अधिकांश कूकी पुरुष अपने गांवों में रात को पहरेदारी के लिए जाते हैं। उन्हें डर है कि कहीं सेना या मैतेई उनके गांवों पर कब्ज़ा न कर लें। लेकिन उन सबकी सपरिवार वापस की हिम्मत नहीं हो रही।
उन्होंने यह भी बताया कि- जब गांव में हमले हुए, उसके पहले मैतेइयों ने पुलिस कैंप में हमला कर हथियार लूट लिये थे। उन हथियारों से ही उन्होंने कूकी गांवों पर हमला किया।
किसी आपदा में चाहे वह प्राकृतिक हो या मानव-निर्मित सिर्फ़ घर ही नहीं टूटते-बिखरते, समूचे जीवन ही बिखर जाते हैं। ज़िंदा रहना एक अलग बात है।
ऐसे न जाने कितने नौजवानों का भविष्य मंझधार में ही डूब गया। इन सबके पास दुख ज़्यादा है और शब्द कम हैं। भाषा के पास भी उस दर्द को कह सकने की सामर्थ्य नहीं होती।
(चार)
एक वाक्य बार-बार याद आ रहा है। जी हां, वाक्य। उस एक वाक्य के भीतर छिपी हुई दृढ़ता ग़ज़ब की थी। ऑल इंडिया ट्राईबल्स एक संगठन है। यह वही संगठन है, जिसके द्वारा तीन मई को मणिपुर में मैतेइयों को मिले अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया गया था। हमारी मुलाक़ात सेनापति में ही उनके अध्यक्ष से हुई। उन्होंने मौजूदा हालात की पूरी जानकारी दी। वे किस तरह से कैंप में लोगों को सुविधा पहुंचा रहे हैं, उन्हें किन चीज़ों की और ज़रूरत है और कैसे उनका इंतज़ाम हो पा रहा है; इन सवालों के बारे में खुलकर जवाब दिया…
उन्होंने उस सात महीने के बच्चे की तस्वीर को बार-बार दिखाया, जिसकी हत्या मैतेईयों के द्वारा की गयी थी। लेकिन जो सबसे संवेदनशील बात थी, वह इस प्रकार थी कि- हमारे साथियों में से ही किसी ने सवाल किया कि राज्य सरकार क्या मदद कर रही है? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने ग़ुस्से से दिया।
उन्होंने कहा- मदद नहीं, यह सरकार की ज़िम्मेदारी है। यह सरकार का ही दायित्व है कि वह पुनर्वास का काम जल्दी और ज़िम्मेदारी के साथ करें। लोगों को सुरक्षा दे। सरकार इस काम को ठीक तरह से नहीं कर रही इसलिए हमें सामने आना पड़ रहा है।
इस एक वाक्य में संविधान की वह मूलभूत अवधारणा छिपी हुई है जिसके तहत स्टेट लोगों के लिए बनाया गया है, न कि लोग स्टेट के लिए।
यहां पीड़ित-शोषित लोगों से, उन्हें मदद कर रहे समाजकर्मियों से बात करते हुए एक बात और निकलकर आयी कि इस पूरी पुनर्वास/राहत प्रक्रिया में यहां के चर्च अधिकाधिक मदद कर रहे हैं। यह धार्मिक सद्भावना का भी मामला है, क्योंकि अधिकांश कूकी ईसाई हैं।

(पांच)
जैसे सुबह का चित्र बनाते हुए चित्रकार आधा सूरज, दो-चार चिड़ियाएं, एक नदी, एक पेड़ और थोड़ी घास बना देते हैं, किंतु सुबह के उल्लास को कला प्रेमी ख़ुद महसूस करते हैं, अलग-अलग ढंग से। उसी तरह इस दृश्य को पूरी तरह कह पाना नामुमकिन है। हालांकि मैंने ‘सुबह’ का उदाहरण दिया, यह बिल्कुल ग़लत है। इसे तो गहरी रात कहना चाहिए था। मणिपुर रात की वीरानी, ख़ामोशी और भयानकता के बीच न जाग रहा है न सो रहा है। वह मूर्छा की अवस्था में है।
ये कुछ कहानियां थीं, जो अब किंवदंतियां बन गयी हैं। इन्हें हमने कूकियों के कैंप में देखा। वहां अनगिनत कहानियां बिखरी हुई थीं। हमारी मुट्ठियों में इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि हम उन्हें समेट सकें। शाम को ही हम यहां से निकलकर इम्फाल की तरफ़ बढ़ चुके थे। इम्फाल और सेनापति के प्रवेश मार्ग का अलग ही नज़ारा था। इम्फाल के प्रवेश द्वार पर सेना लगी हुई थी। बंकर बनाये गये थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किन्हीं दो देशों के बॉर्डर को पार कर रहे हों। हमारी चेकिंग हुई। हमसे उन्होंने बातचीत की। इसके बाद ही आगे जाने दिया गया।
एक चीज़ और ध्यान देने की है कि यहां सेना के जवानों के साथ कूकी नौजवान भी देखने को मिले। वह बिल्कुल सेना की तरह ही काम कर रहे थे। उन्होंने ही इशारा किया तब हमें इम्फाल की तरफ़ आगे बढ़ने को मिला। इससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि इधर काम कर रही सेना के ऊपर कूकियों का दबाव है। यह एक तरह से बहुसंख्यवाद का दबाव भी है।
(छह)
क़रीब तीन बजे हम मैतेईयों के कैंप के बाहर खड़े थे। राजनीति और मीडिया के गलियारों में जिस तरह की चर्चाएं थीं, उससे हमारी सोच थोड़ी तो ऐसी बनी हुई थी कि मैतेईयों की हालत कूकियों से बेहतर होगी। लेकिन इस जगह को देखकर हम चौंक गये।
यह तो एक बड़ा हॉल था, जहां भेड़-बकरियों की तरह कनात लगाकर मैतेईयों को ठूंस दिया गया था… बाक़ी व्यवस्थाएं अन्य कैंपों की तरह ही थीं… सार्वजनिक रसोईघर थे, जहां यही लोग बारी-बारी से खाना पकाया करते थे… शौचालय की कमी का वैसा ही (कूकियों के कैंपों की तरह ही) हाल था… कुछ लोग बाहर से आकर और कुछ पढ़े-लिखे लोग कैंप के भीतर से ही बच्चों की पढ़ाई का काम देख रहे थे। आस-पास के स्कूलों में उनका दाख़िला करवा दिया गया था।
काजल भी अपने भाइयों के साथ यहां के इंटरमीडिएट तक के बच्चों को पढ़ाती थी। हां, काजल मुझे यहीं मिली थी। अब भी उसका उदास चेहरा और भावहीन आंखें याद आ रही हैं। झिझकते हुए यहां हमने प्रवेश किया। जब भी हम किसी कैंप के भीतर जाते तो लगभग मन में ऐसे ही भाव आते जैसे कि डोरबेल बजाये या कुंडी खटकाये बिना ही किसी के घर में घुसते चले जा रहे हैं। ख़ैर, हमारे साथी शरणार्थियों को तलाशते हुए आगे निकल गये। मैं भी किसी की तलाश ही कर रही थी कि उससे यहां के हालात के बारे में बात कर सकूं। थोड़ी दूर कुछ बच्चे बैठे हुए थे। उनके हाथों में किताबें थीं। वे पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। आठवीं से बारहवीं के बीच के विद्यार्थी लग रहे थे। कनात के भीतर लोगों की आहटें मिल रही थीं लेकिन एक अजीब क़िस्म का सन्नाटा था। मुर्दा सन्नाटा। जिस जगह सैकड़ों लोग हों, वहां इतनी शांति का होना आश्चर्य नहीं, भय पैदा करता है। सामने से दो उम्रदराज़ महिलाओं को अपनी ओर आता देखकर मैंने नमस्ते में हाथ जोड़े। मेरे नमस्ते का जवाब उन्होंने भी नमस्ते में दिया। वे मुझे रोककर किसी को पुकारने लगीं। चूंकि वे मणिपुरी में बात कह रही थीं, इसलिए मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया। एक लड़की आयी, उन्होंने मणिपुरी में कहा कि मैं उससे बात करूं। वह काजल थी।
काजल ने एक साल पहले ही ग्रैजुएशन किया था। यहां वह अपनी मां और दो भाइयों के साथ थी। जब दंगे भड़के यानी दंगाइयों ने गांव में प्रवेश किया, उस समय ये खाना खाने की तैयारी कर रहे थे। थोड़े-बहुत जो पैसे घर में पड़े थे, वही लेकर तीनों बच्चों के साथ मां भीड़ की राह चली और आज वे सब यहां हैं। काजल और उसके दोनों भाई पढ़ाई करते थे। उनकी मां दस्तकारी का काम करती थी। मां-पिता पहले ही अलग हो चुके थे। पिता के बारे में काजल ने नहीं बताया, न ही मैंने पूछा। इस तरह देखा जाये तो काजल की मां एकल अभिभावक थीं और मेहनत करके अपने बच्चों का भविष्य बना रही थीं। काजल बहुत संजीदा और समझदार लड़की थी। यहां मैंने सिर्फ़ उसी से बात की, लेकिन उससे ज़्यादा बाक़ी लोगों के बारे में बात की।
(सात)
ऐनम अपनी मां, दादी और एक सात साल के भाई के साथ रह रही थी। उसने बताया कि उसके पिता की मृत्यु बचपन में ही हो चुकी थी। दादा भी अभी चार साल पहले नहीं रहे। लेकिन जैसा कि सभी मणिपुरी महिलाएं घरेलू और कामकाजी महिलाएं होती हैं, तो बेशक यहां की सभी महिलाएं ख़ुद की और अपने बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा सकने की क्षमता सामाजिक अनुकूलन से ही पा जाती हैं। पति के बिना अकेले रहना वहां उत्तर भारत जैसा अपमानजनक या बेचारगी वाली स्थिति नहीं है।
ऐनम की मां एक छोटा-सा होटल चलाती थीं, जहां वह पढ़ाई के बाद उनकी मदद करने के लिए जाती थी। ये मैतेई हैं। और धार्मिक रूप से ईसाइयत को मानते हैं। जब उनके गांव में प्रतिक्रियात्मक रूप से कूकियों का हमला हुआ तो वे अपना सब कुछ छोड़कर भागे। ऐनम बताती है कि- उस समय उसकी मां के पास डेढ़ हज़ार के क़रीब रुपये थे। मैंने जानना चाहा कि- उत्तर भारतीयों की तरह उनके पास सोने-चांदी के गहने होते हैं, जिन्हें विपत्ति के समय उपयोग के लिए रखे हों? उसने बताया कि यहां गहनों का कम रिवाज है। अधिकांश उच्च-वर्ग में गहनों का चलन है। ऐनम की मां के पास ऐसे कोई ख़ास गहने या कोई संपत्ति नहीं थी। वो सिर्फ़ अपने बच्चों को सहेजती, गांव वालों के साथ जीविका का एकमात्र सहारा अपना होटल छोड़कर निकल पड़ी और आज इम्फाल के रिफ़्यूजी कैंप में चार महीनों से रह रही हैं। अब इनके पास एक बड़े-से हाॅल का एक कोना, जुटायी गयी मदद में मिले दो गद्दे और बच्चों का अनिश्चित भविष्य है।
(मणिपुर की तस्वीरें: डॉ. आरती के ही सौजन्य से)
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