
- August 14, 2026
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डॉ. अस्मिता सिंह की कलम से....
अप-संस्कृति और हिंदी-लेखन
यह अप-संस्कृति का दौर है। संस्कृति का स्वरूप हर युग में बदलता रहा है। हर नये युग में संस्कृति कुछ पुराने, कुछ नये को मिलाकर अपना विकास करती हुई एक नया रूप अख़्तियार करती आयी है।
आज पूंजीवाद का प्रभाव सर्वत्र फैल चुका है और असर हमारे जीवन के हर पहलू पर घातक ढंग से पड़ा है। प्रभाव इतना ज़्यादा है कि मनुष्यता ही नहीं बल्कि मानव अस्तित्व ही ख़तरे में आ गया है। और इस दरमियान संस्कृति जो बनी है, पनपी है, उसने पिछले सारे मानवीय मूल्यों को ध्वस्त करती हुई इंसान और इंसानियत की परिभाषा ही बदलकर रख दी है। वर्तमान संस्कृति को अप-संस्कृति कहा जाने लगा है, पर कोई भी संस्कृति एक दिन में नहीं बनती। भारत में इस अप-संस्कृति के पनपने की शुरूआत 90 के दशक में होती है, जब जर्जर अर्थव्यवस्था को सुधारने के नाम पर यहां पूंजीवादी मुक्त-अर्थव्यवस्था को अपनाने की आवश्यकता हो गयी और सत्ता ने भारत में उसे लागू कर दिया। यही नहीं इसके लिए अवाम को सब्ज़बाग़ ऐसे दिखाये गये, मानो हर तरह से तरक़्क़ी का रास्ता खुल जाएगा। भूख, बेरोज़गारी, अशिक्षा समाप्त हो जाएगी। एक तरह से देखा जाये तो अप-संस्कृति बीज-वपन काल यही था।
संस्कृति के विकास और प्रचार और प्रसार का एक सशक्त माध्यम साहित्य है। पूंजीवादी अर्थतंत्र ने साहित्य का भी व्यवसायीकरण कर दिया है। इसकी शुरूआत पश्चिम से हुई ज़रूर पर आज भारत तथा अन्य देशों में भी पूरी तरह साहित्य व्यवसाय का रूप ले चुका है। हालांकि इसका प्रयास शीत-युद्ध के बाद ही शुरू हो चुका था, जब तत्कालीन समय के पश्चिमी लेखकों ने यह प्रचारित करवाना शुरू किया था कि ‘साहित्य का कोई सार्थक संबंध वक़्त की सच्चाई के साथ नहीं है। इसे एक सिद्धांत के रूप में स्थापित करने के लिए पश्चिम के कई बड़े लेखक इसका चेहरा बने। भारत में इसके झंडाबरदार ‘अज्ञेय’ बने और अच्छे-ख़ासे लेखकों की फ़ौज भी तैयार करते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐतिहासिक भूमिका निभायी। धर्मवीर भारती, इलाचंद्र जोशी, जैनेन्द्र जैसे दिग्गज लेखक इस अभियान में शामिल रहे पर फिर भी यह प्रयास नाम और प्रतिष्ठा को मूल रूप से बढ़ाने के लिए किया गया था, जिसे सत्तर के दशक में प्रतिबद्ध लेखकों ने एक भ्रम की तरह तोड़कर साहित्य को प्रतिबद्धता और सार्थकता का सिद्धांत दिया और साहित्य को जनसरोकार से जोड़ने का सफल प्रयास किया। पर अस्सी के दशक में इसके बिखराव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिसके पीछे देश की ख़स्ताहाल आर्थिक स्थिति का बहुत बड़ा हाथ रहा और देश के सत्ताधारियों को उदारीकरण की वैश्विक नीति को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए।
90 का दशक और सोवियत यूनियन का टूटकर बिखरना एक विश्व-व्यापी ऐतिहासिक घटना की तरह था। दुष्प्रभाव विश्व भर के अनेक देशों पर पड़ा और भारत जैसे विकासशील देश भी इससे गहरे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सके। सोवियत यूनियन के बिखरने से झटका विश्व भर की समाजवादी शक्तियों को लगा और पूंजीवादी शक्तियो ने धीरे-धीरे समाजवादी शक्तियों को कुचलना और कमज़ोर करना शुरू कर दिया ताकि समानांतर पूंजीवाद द्वारा वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था को सामाजिक स्वीकृति अर्जित करने से रोक सकें।

इस अभियान में सबसे बड़ा पत्थर सोवियत यूनियन था। सोवियत के बिखरते ही लगातार समाजवादी शक्तियां कमज़ोर पड़ती गयीं और पूंजीवादी ताक़तों का बढ़ता प्रभुत्व आज मनुष्य को एक संख्या बनाकर सिर्फ़ व्यपार की वस्तु के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। और इसी प्रक्रिया में एक-एक करके मानवीय मूल्य ध्वस्त होते गये और इंसान बेबस और इंसानियत ख़तरे में पड़ती गयी।
अपनी जर्जर होती जा रही अर्थ-व्यवस्था को सुधारने के नाम पर मुक्त-व्यापार नीति को स्वीकार करना पड़ा, जिसे देश की तकनीकी तरक़्क़ी, शिक्षा का प्रसार, बेकारी और ग़रीबी को ख़त्म करने का ज़रिया जनता जनार्दन को बताया गया। आज उसके विनाशकारी परिणाम से सब अवगत हैं।
मनुष्य को आर्थिक ग़ुलाम बनाने के साथ-साथ उसकी सोच को, स्वतंत्र चिंतन को ख़त्म करने के लिए उसका ध्यान संस्कृति की तरफ़ गया। वर्तमान युग में संस्कृति के निर्माण में साहित्य की अहम भूमिका है। प्रसिद्धि आलोचक आनंद प्रकाश संस्कृति के निर्माण में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका को इस प्रकार कहते हैं, “संस्कृति के उत्पादन और प्रसार का माध्यम अब साहित्य है। यूं ही नहीं है विश्व स्तर पर अब पूंजीवादी अर्थतंत्र द्वारा अरबों-खरबों रुपये साहित्य पर ख़र्च किये जाते हैं। पुस्तकों की संख्या, उसकी ख़रीद-फ़रोख़्त और संचार माध्यमों में होने वाली चर्चा से इस चीज़ का पता चलता है।”(सांस्कृतिक निबंध,पृ-27)
व्यवसायिकता का पहला धर्म है पूंजी में इज़ाफ़ा। पिछले 50-60 वर्षों में हमारा समाज पूरी तरह पूंजीवादी ढांचे में ढल चुका है। अब स्थिति यह हो गयी है कि उसको दरकिनार करके हम आगे का रास्ता तय नहीं कर सकते। इस बीच संस्कृति ने जो स्वरूप पकड़ा उससे हम सभी खिन्न हैं और उसे अप-संस्कृति कहकर अपने को संतुस्ट कर रहे हैं। उसके प्रभाव में साहित्य और साहित्यकार हैं। नतीजा हमारे लेखन का मूल सिद्धांत ही बदल गया है। ‘प्रतिबद्धता और सार्थकता’ का मानदण्ड बदल गया है। प्रतिबद्धता के साथ अब सार्थकता नहीं व्यक्तिवाद हावी हो गया है। और साहित्य जैसे-जैसे व्यवसाय बनता गया, वैसे-वैसे अपने मूल मक़सद से दूर होता गया और उसी अनुपात में प्रभावहीन भी।
आज पहले के बनिस्पत ज़्यादा लेखन हो रहा है। नये-नये प्रकाशन संस्थान उग रहे हैं और उसी अनुपात में लेखक समाज भी बढ़ रहा है। लेखन के प्रति लोगों का रुजहान बढ़ता ही जा रहा है। परिणामत: बहुत बृहद मात्रा में साहित्य लिखा और पढ़ा जा रहा है। सच कहा जाये तो साहित्य का वस्तु की तरह उत्पादन हो रहा है। पर आख़िर क्या वजह है कि साहित्य जन-मानस को प्रभावित करने में पूरी तरह असफल है? अपनी बदहाल हो चुकी ज़िंदगी से निजात पाने के लिए जो भी संघर्ष कर रहा है, साहित्य का योगदान उसमें नहीं है? उसके संघर्ष को दिशा और निर्देश देने में असमर्थ क्यों साबित हो रहा है?
इसके पीछे मूल वजह बाज़ारवाद ही है, इसमें कोई शक नहीं। और आज इस बाज़ारवादी ने जब लेखन को एक व्यवसाय बना दिया है तब लेखक भी लाभ-हानि की ताल पर अपनी कलम चला रहा है और उसके लेखन में सार्थकता की जगह व्यक्तिवाद हावी है। मौजूदा बाज़ारवाद इंसान को इंसान न समझकर उसे एक आंकड़ा बनाता है, व्यापार की वस्तु समझकर अपनी व्यवहार शैली बना चुका है। परिणामस्वरूप आज समाज में व्यक्ति पहचान का संकट झेल रहा है, जिसकी चाहना और भावना हर इंसान में सहज रूप से होती है।
हिंदी साहित्य में, पूर्व में इस पूंजीवादी बृहद् प्रोग्राम को नयी कहानी, नयी कविता और अ-कहानी, अ-कविता ने अपनी व्यक्ति-केन्द्रित सोच को प्रसिद्धि पाने का माध्यम बनाया और हिंदी साहित्य को उसके मूल धर्म से भटकाकर अप संस्कृति को पनपने की भूमिका तैयार कर दी। आज समाज पूरी तरह अप-संस्कृति के दायरे में चल रहा है। शासन-प्रशासन, समाज, परिवार और व्यक्ति सब के सब इस अप-संस्कृति के हिसाब से ही आचरण करने लगे हैं। हिंदी के अधिकांश लेखक इसी अप-संस्कृति के प्रभाव में हैं। जन-जीवन का हर क्षेत्र इससे भयंकर रूप से ग्रसित है, ऐसे में साहित्य की ही अहम भूमिका की दरकार है।
प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है, पर उसकी भूमिका समाज में कारगर प्रभाव डालने में असमर्थ सिद्थ हो रही है। इस तथ्य से हिंदी का प्रत्येक लेखक अवगत है। कुछ लेखक शोषक तबक़े की मुख़ालफ़त और साथ ही शोषितों की वकालत भी पुरज़ोर तरीक़े से कर रहे है, पर विडम्बना है कि स्वार्थ-वश इस क़दर गुटबाज़ी के शिकार हैं कि छोटे-छोटे गिरोह में बंटकर अपने ही अस्तित्व की रक्षा में उलझकर रह गये हैं। वक़्त के साथ-साथ जाति, क्षेत्र और पार्टी के जाल में फंसकर रह गये हैं। जबकि समय की मांग है उनके एकजुट हौकर प्रयास करने का।
बाज़ारवाद वही लिखने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जो वह पाठक वर्ग को पढ़वाना चाह रहा है। कहने की ग़रज़ कि वह पाठक बना भी रहा है और उसकी सोच की दिशा भी तय कर रहा है ताकि पाठक की स्वतंत्र चिंतन की प्रवृति को क्रमश: नष्ट करते हुए उसे पूरी तरह अपनी सोच और सहूलियत के हिसाब से कंट्रोल में रख सके।
अब लेखन भी एक बड़े व्यवसाय का रूप ले चुका है और साहित्य में अप-संस्कृति का असर उसी अनुपात में देखा जा सकता है। अब अधिसंख्य लेखक लेखन की सार्थकता को नहीं, प्रसिद्धि पाने को ही ध्येय मान रहे हैं और प्रसिद्धि पाने के लिए पुरस्कार प्राप्ति की होड़ में शामिल हो गये हैं। इस रास्ते को प्रशस्त कर रहे हैं पत्रिकाएं, गोष्ठियां, समीक्षाएं, परस्पर प्रशंसा और सरकारी, अर्ध सरकारी संस्थानों में साझेदारी, जिसके दायरे में लेखक सिमट चुके हैं।
पुरस्कारों ने लेखक जमात को बुरी तरह पतनोमुख किया है। बिना पुरस्कार पाये प्रसिद्धि नहीं मिल सकती और प्रसिद्ध होने के लिए पुरस्कार प्राप्ति ही एकमात्र रास्ता जैसे बना दिया गया है। उसके बाद ही प्रकाशक उनकी किताबों को छापेंगे भी और प्रचारित भी करेंगे, अपने मुनाफ़े के लिए। और लेखक भी नाम के साथ-साथ आर्थिक लाभ का हक़दार हो जाता है। फिर बिना पुरस्कार पाये प्रसिद्धि नहीं मिलेगी और न ही प्रकाशक उसका मूल्य समझेगा। और लेखक गुमनामी के अंधेरे में गुम हो जाएगा।
लाभ-लोभ के साहित्यिक परिवेश के कारण नये लोगों में लेखक बनने की चाहत पैदा हुई है और इस लालसा ने लेखकों की एक बहुत बड़ी जमात खड़ी कर दी है। इसके साथ-साथ वैसे लोग भी शामिल हैं, जो पावर में हैं और किताबों की ख़रीद-फ़रोख़्त में मददगार हो सकते हैं।
और ऐसी विनाशक स्थिति ने लेखक को अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए बाज़ारवाद की शर्तों पर लेखन करने को मजबूर कर दिया हो, तब सोचने वाली बात यह है कि लेखन अपने मूल धर्म से विचलित न हो तो कैसे?
अब साहित्य को सामाज के लिए कैसे उपयोगी बनाया जाये?
अप संस्कृति के रोग से जन-मानस को कैसे मुक्त किया जाये?
क्योंकि किसी भी संस्कृति के निर्माण में साहित्य की अहम भूमिका होती ही है। आपा-धापी के इस माहौल में कैसे एक रास्ता निकला जाये कि साहित्य प्रतिबद्धता और सार्थकता को साथ लेकर अपनी महत्ता और आवश्यकता को बरकरार रखने में समर्थ हो सके?
आज वो सभी साहित्यकार जो साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार मानते हैं, वो साहित्य के बेअसर साबित होने को लेकर परेशान हैं। आलोचक आनंद प्रकाश का मानना है अब व्यवसाय हमारे दौर के साहित्य का ‘परिवेश’ न होकर उसकी अंतर्वस्तु बन चुका है, वह साहित्य को भीतर से, उसकी रचनाशीलता और दृष्टि को परिचालित करने लगा है। स्थिति ऐसी हो गयी है कि प्रकाशक उन्हीं किताबों को छाप रहे हैं, जिन्हें बेचकर मुनाफ़ा कमा सकें। इसमें ऐसे लेखक भी बड़ी मात्रा में शामिल हैं जो या तो धनी हैं या फिर पावर में हैं, जो प्रकाशकों की बिक्री बढ़ाने में सहयोग करते हैं, जो मात्र प्रसिद्धि पाने के लिए ही लेखक बने हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अप-संस्कृति ने हिन्दी लेखन क्षेत्र ने पूरी तरह पैठ बना ली है। अब अधिसंख्य लेखकों के सामने मूल विषय श्रम के स्तर पर संगठित और एकीकृत मनुष्यता का ध्येय नहीं रह गया है। आज वो दैशिक, क्षेत्रीय, भाषिक आदि अलग-अलग अस्मिताओं में उलझकर विभाजित हो चुके हैं। जीवन के केंद्रीय मामलों पर सोचने और लिखने के बजाय व्यक्तिपरक सोच के तहत लिख-पढ़ रहे हैं।
यही व्यक्तिवाद क्रमश: लेखकों के समाज को कमज़ोर और अलग-थलग किये हुए है। जाने-अनजाने इस तरह वे बाज़ारवाद को पोषित और पल्लवित करते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप लेखकों का नैतिक पतन, साहित्य में पुन: व्यक्तिवाद की स्थापना, मानव-मूल्यों का ह्रास, अलगाव, निर्वासन जैसी स्थितयां उत्पन्न होने के रूप में देखा जा सकता है। पर सच यह भी है कि जब किसी वस्तु का व्यापार होने लगता है, तब उसमें सबसे पहले लाभ-हानि का हिसाब ही देखा जाता है।
जब पूंजीवाद ने साहित्य को व्यापार की वस्तु बनाया तो उसके पीछे उसके अपने ऐजेंडे रहे, जिसमें वह पूर्ण सफलता भी हासिल कर चुका है। साहित्य में बाज़ारवाद के प्रवेश ने जन-मानस को कितना दूषित किया है, स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसका प्रमाण लेखकों की बढ़ती जा रही संख्या और मास-लेवल पर लेखन सामग्री का उत्पादन और खपत से पता चलता है।
इतिहास गवाह है साम्राज्यवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ अनेक देश जब मुक्ति-संघर्ष कर रहे थे तब उस संघर्ष की चेतना जगाने में साहित्य की कितनी अहम भूमिका रही। प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू में साहित्य रचकर किस तरह साहित्य को समाज से जोड़कर एक नयी मिसाल क़ायम करने के साथ ही साहित्य को एक नयी पहचान और सार्थकता दी। आज प्रेमचंद की परम्परा को कितने लेखक विकसित कर पा रहे हैं? मुश्किल से दो-चार पर इससे न तो साहित्यिक परिदृश्य बदल रहा है, न सामाजिक। अब सवाल यह है कि साहित्य को फिर से उसकी सही भूमिका में लाने के लिए क्या तरीक़े अपनाने होंगे और कैसे?
सबसे पहले तो क्रमश: बढ़ती जा रही गुटबाज़ी को यथासंभव तोड़ने का प्रयास करना होगा क्योंकि गुटबाज़ी व्यक्तिपरक सोच को बढ़ावा देती है, जो एकता के विरुद्ध है।
उन कारक तत्वों को समझना होगा और दरकिनार करना होगा, जिन्हें आधार बनाकर अलग-अलग लेखकीय गुट बनते-बिगड़ते रहते हैं और जिनके कारण हमारा लिखना बे-असर साबित हो रहा है।

लेखकीय ज़िम्मेदारी के साथ ही भाषा, क्षेत्र और जाति की भावना से मुक्त होकर कोई नया रास्ता निकाला जा सकता है। एक सार्थक दिशा में मोड़कर साहित्य को सामाजिक क्रान्ति के लिए उपयोगी साबित किया जा सकता है।
बाज़ारवाद के उपलब्ध साधनों का युक्तियुक्त ढंग से इस्तेमाल करते हुए एक नया रास्ता तलाशना होगा। सबसे ज़रूरी है एकता- विचारों की एकता को, एकजुटता से पोषित करना होगा। आलोचक आनंद प्रकाश लिखते हैं “अप-संस्कृति के इस नये दौर में हमें नये पाठक का निर्माण भी करना है और उसी तरह सार्थक मनुष्य केन्द्रित रचना को भी व्यापक सोच-विचार और योजना के तहत बनाना है।” (सांस्कृतिक निबंध पृ-34)
अप-संस्कृति के विरुद्ध यह संघर्ष लम्बा और कठिन है। पहली चुनौती ‘मैं’ को ‘हम’ में तब्दील करना ही होगी।

अस्मिता सिंह
कहानीकार एवं आलोचक। लंबे समय तक मगध यूनिवर्सिटी और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी-साहित्य का अध्यापन। प्रमुख पुस्तकों में 'रंग से बेरंग होती ज़िंदगी', 'इन्तज़ार तो ख़त्म हुआ' (कहानी-संग्रह), 'फुलिया' (उपन्यास), 'शमशेर: अभिव्यक्ति की कशमकश (आलोचना पुस्तक), नारी मुक्ति: दशा एवं दिशा (नारी विमर्श), दलित अनुभव का सच (दलित-विमर्श) हैं। साथ ही, लू-शुन के पत्रों के अनुवाद और अन्य संकलित व संपादित पुस्तकें भी। बहुपठित एवं बहुप्रकाशित लेखक अस्मिता सिंह इन दिनों एस.ए. डांगे इंस्टीट्यूट आफ सोशलिस्ट स्टडीज़ एंड रिसर्च में निदेशक-प्रमुख हैं।
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