
- August 22, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
ख़बरनामा:200... हर शनिवार, इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत...
अजय शर्मा की कलम से....
हिंदी पत्रकारिता और ज्ञान-विरोध
हिंदी पत्रकारिता के दो सौवें साल में हिंदी मीडिया तक़रीबन 50 से 70 करोड़ लोगों तक किसी न किसी रूप में पहुँचता है। पर इन सालों में क्या ये असुविधाजनक सवाल हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में पूछे गये हैं-
- क्या हिंदी पत्रकारिता ने अपने पाठकों-दर्शकों को लोकतंत्र का जागरूक नागरिक बनाया?
- उन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक, ऐतिहासिक-राजनीतिक समझ के ढाँचे उपलब्ध करवाये?
- क्या उसने ऐसे नागरिक तैयार किये, जो अपनी भाषा में समाज, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, इतिहास, तकनीक और इस दुनिया को समझते हों?
- क्या हिंदी पत्रकारिता ने ज्ञान का सार्वजनिक क्षेत्र (public sphere of knowledge) खड़ा किया या केवल पहचानों का विस्तार क्षेत्र खड़ा किया और अपना समय नेताओं, पार्टियों, चुनावों, सरकारों, धर्मों, जातियों और चुनावी संघर्षों की व्याख्या में लगाया?
- हिंदी पत्रकारिता ने क्या पाठकों को नागरिक बनने की क्षमता दी, या महज़ राजनीतिक दर्शक बनने की आदत सिखायी? क्या उसने उन्हें प्रश्न पूछना सिखाया या केवल पक्ष चुनना सिखाया?
पिछला लेख: हिंदी पत्रकारिता का भारत-बोध
ये प्रश्न असुविधाजनक हैं क्योंकि हिंदी पत्रकारिता की आत्मकथा में ‘ज्ञान-विज्ञान’ की चर्चा ज़रूर आती है, पर उसके व्यावहारिक प्रयोगों में ऐसा दिखता नहीं है।

हिंदी पत्रकारिता किस ऐतिहासिक ज़रूरत से जन्मी?
19वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्तर भारत में देवनागरी को प्रशासनिक और शैक्षणिक मान्यता दिलाने की लड़ाई चल रही थी। हिंदी को फ़ारसी के प्रभाव वाली उर्दू और उसकी स्क्रिप्ट दोनों से अलग खड़ा करने की कोशिश चल रही थी। उत्तर भारत में उभरता शहरी हिंदू मध्यवर्ग संस्कृत को आधार बनाकर अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान गढ़ना चाहता था। इसलिए शुरूआती हिंदी पत्रकारिता का केंद्रीय प्रश्न था हिंदी। यानी भाषा स्वयं में विषय थी।
इतिहासकार फ्रांसेस्का ऑर्सिनी ने अपनी किताब The Hindi Public Sphere (2002) में दिखाया है कि 1857 के विद्रोह के बाद हिंदी सार्वजनिकता बुनियादी तौर पर भाषा, धर्म, साहित्य और समुदाय की पहचान के सवालों के इर्द-गिर्द खड़ी होनी शुरू हुई। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के प्रसार की सोच उसमें गौण थी। यही वह प्रस्थान बिंदु है, जहाँ से हिंदी पत्रकारिता का आधारभूत नज़रिया अंग्रेज़ी और अपनी समानधर्मा भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता से अलग होता है।
यूरोप में आधुनिक पत्रकारिताओं (अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, जर्मन आदि) का उदय वहाँ हुए रेनेसां, वैज्ञानिक खोजें, समुद्री अभियानों और औद्योगिक विस्तार के साथ हुआ। भारत में क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि धीरे-धीरे 19वीं सदी में ज्ञान-विज्ञान की इन यूरोपीय धाराओं के लिए खुली हुई थीं और उनमें इसके लिए पाठकों की भूख और माँग भी थी। तो औपनिवेशिक शासन के दौरान दूसरी भारतीय भाषाओं में अपनी सांस्कृतिक धारा में भी लेखन हो रहा था और यूरोप से आती ज्ञान की बयार का भी अनुवाद किया जा रहा था।
साहित्य बनाम ज्ञान
अगर हम 1826 से 1900 के बीच की प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ देखें, तो उनके प्रमुख विषय क्या हैं? कविता, निबंध, धर्म, नैतिकता, समाज-सुधार, भाषा, साहित्य। हमें वहाँ भौतिकी, जीवविज्ञान, चिकित्सा, सांख्यिकी, अर्थशास्त्र, अंतरराष्ट्रीय व्यापार या औद्योगिक तकनीक पर लेखन बहुत कम मिलता है।
ख़ास बात यह है कि इसी दौरान यूरोप और अमेरिका में विज्ञान के लगभग हर क्षेत्र में और अर्थशास्त्र में लगातार नये विचार, सिद्धांत और उपकरण विकसित हो रहे थे। डार्विन, मैक्सवेल, पाश्चर, फ़्रायड और 20वीं सदी में आइंस्टाइन, नील्स बोर और उनके काम से जुड़ी ख़बरें सार्वजनिक चर्चा का विषय बन रही थीं। तब हिंदी का सार्वजनिक डिस्कोर्स भाषा, धर्म और नैतिकता के प्रश्नों में उलझा था।
1858 में लखनऊ में स्थापित हुई नवल किशोर प्रेस तब हिंदी-उर्दू-फ़ारसी भाषाओं की किताबों की सबसे बड़ी और अहम प्रकाशक थी। अगर उसके प्रकाशन देखें तो उनमें भी हिंदी में 90 फ़ीसद से ज़्यादा किताबें धार्मिक ग्रंथ और उनकी टीकाएँ, पुराण, कथा-साहित्य, नैतिक साहित्य आदि पर थीं। हिंदी के शुरूआती दिन थे, तो पाठक की इस माँग को समझा जा सकता है। वह पाठक जो अंग्रेज़ी भाषा और शिक्षा से नहीं जुड़ा था, पर अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को लेकर चिंतित था।
पत्रकार और साहित्यकार: एक ही शख़्स
1903 में जब महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती का संपादन सँभाला, तो हिंदी पत्रकारिता में एक नया बौद्धिक अनुशासन दिखा। विरोधाभास यह था कि द्विवेदी पत्रकार कम और आचार्य अधिक थे। उन्होंने भाषा व्यवस्थित की, लेखन अनुशासित किया, लेखकों की पीढ़ी तैयार की। मगर उन्होंने पत्रकारिता को ज्ञान पर आधारित पेशे में नहीं बदला।
उनकी पत्रिका में समाज, राष्ट्र, चरित्र, नैतिकता और सुधार पर लेख भरे हैं, पर वैज्ञानिक शोध, आर्थिक मामले, विश्वविद्यालयी बहसें या आधुनिक समाज विज्ञान की सामग्री नदारद है। और यही वह मॉडल है, जो दशकों तक हिंदी पत्रकारिता पर छाया रहा। जिसमें पत्रकार एक प्रकार का शिक्षक और नैतिक मार्गदर्शक था। उसका काम सूचना देना नहीं, दिशा देना था। समाचार की जगह विचार को ऊपर रखा गया और पत्रकारिता को मिशन की तरह देखना शुरू हुआ।
हिंदी पत्रकारिता को पेशेवर पत्रकारों ने नहीं, साहित्यकारों ने साकार किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, बाद में प्रेमचंद। ये सभी पत्रकारिता से जुड़े थे, पर इनकी मूल पहचान पत्रकार की नहीं थी।
ख़बरों का चुनाव और रिपोर्टिंग की संस्कृति शुरू से ही बहुत कमज़ोर थी। समाचारों की जगह निबंध, तथ्यों की जगह मत-मतांतर, रिपोर्टिंग की जगह व्याख्या लिये जाते थे। तथ्यों को लेकर आग्रह न के बराबर था और अगर लेख लिखने के लिए तथ्य चुने भी जाते, तो उन्हें अपनी बात सिद्ध करने के लिए या पाठक को चौंकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यह परंपरा अभी तक कमोबेश जारी है। अब इसे ट्रिविया कहते हैं जिसमें सेलेक्टिवली तथ्य रखे जाते हैं पर वो जो चौंकाते हों, दिलचस्पी जगाते हों, रोचक हों, या सनसनी पैदा करते हों।
विश्वविद्यालयों के साथ रिश्ता
19वीं सदी में कई विश्वविद्यालयों की नींव रखी जा चुकी थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में क़ानून, दर्शन और इतिहास पर काम चल रहा था। भावी नौकरशाह, न्यायविद् और शिक्षाविद् यहीं से निकले। जगदीश चंद्र बोस (रेडियो तरंगों पर शोध), प्रफुल्ल चंद रे (कैमिस्ट्री), रबींद्रनाथ टैगोर (साहित्य), आशुतोष मुखर्जी (शिक्षा) पर काम कर रहे थे और बंगाल पुनर्जागरण के लिए कलकत्ता बड़ा केंद्र था। बंबई विश्वविद्यालय रानडे (आर्थिक विकास और औद्योगिकीकरण), आर जी भंडारकर (भारतीय इतिहास), गोपाल कृष्ण गोखले और गर्सन दा कुन्हा (पुरातत्व) जैसे लोग काम कर रहे थे। मद्रास विश्वविद्यालय यूवी स्वामीनाथ अय्यर (प्राचीन तमिल पांडुलिपियों को खोजा), एस सुब्रहमण्य अय्यर, रॉबर्ट कॉडवेल (द्रविड़ भाषाओं पर अध्ययन) काम हो रहा था। ख़ुद हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों में गंभीर काम होता रहा है। लेकिन हिंदी अख़बारों में वह कितना प्रतिबिंबित हो रहा था। लगभग शून्य। इनमें से थोड़ा-बहुत दूसरी भारतीय भाषाओं में छपा-पढ़ा जा रहा था और बहुत कुछ अंग्रेज़ी के पत्रकारों के ज़रिये चर्चा में आ रहा था, पर हिंदी पत्रकारिता को इससे ख़ास लेना-देना नहीं था।
आज़ादी के बाद भारत में बहुत-से विश्वविद्यालय खुले। 1947 में भारत में क़रीब 20 विश्वविद्यालय थे, जो 1960 तक 45 से ज़्यादा हो गये और 1990 तक यह संख्या 180 से ऊपर पहुँच गयी। इनके अलावा एक के बाद एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR), परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, इसरो विकसित हुए।
हिंदी पत्रकारिता विश्वविद्यालयों को ज्ञान के बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा के संस्थान के रूप में देखती रही है। उसकी दिलचस्पी इस बात में कम रही कि विश्वविद्यालयों में क्या सोचा, खोजा, लिखा और शोध किया जा रहा है, बल्कि ज़्यादा इस बात में रही कि विश्वविद्यालय किसे नौकरी, दर्जा, पद और सामाजिक सम्मान दिला सकते हैं या दिला रहे हैं। मिसाल के लिए किसी विश्वविद्यालय में यदि कोई इतिहासकार भारतीय कृषि इतिहास पर अहम शोध कर रहा है, कोई अर्थशास्त्री ग्रामीण ऋण व्यवस्था पर नयी समझ विकसित कर रहा है, कोई वैज्ञानिक नया प्रोटोटाइप बना रहा है, तो यह सब हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि में अमूमन ख़बर नहीं बनता। पहले तो नहीं ही था, अब भी ये ख़बरों की श्रेणी में नहीं हैं। और यह अंतर मामूली नहीं है।
इसी हिंदी क्षेत्र की अंग्रेज़ी पत्रकारिता में इसी हिंदी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों और मीडिया के बीच संवाद की परंपरा रही है। प्रोफ़ेसर अख़बारों में लिखते हैं, पत्रकार शोध-पत्र पढ़ते हैं और उन्हें अपने मीडिया प्लेटफॉर्म पर जगह देते हैं। सार्वजनिक बौद्धिकों की मौजूदगी हमेशा रहती है। अपनी टेढ़ी-मेढ़ी प्राथमिकताओं की वजह से हिंदी में यह पुल नहीं बना है। वहाँ विश्वविद्यालय एक अलग संसार बने और हिदी मीडिया दूसरा। दोनों एक-दूसरे को संदेह की नज़र से देखते रहे हैं।
2010 के बाद विश्वविद्यालयों की मीडिया में मौजूदगी बढ़ी, पर अच्छी वजहों से नहीं। असल में विश्वविद्यालयों को बुद्धिजीवियों का क्षेत्र मानकर उन पर बाक़ायदा हिंदी पत्रकारों और उनके पाठकों ने हमले किये। जेएनयू विवाद (2016), हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और रोहित वेमुला (2016), जादवपुर विश्वविद्यालय विवाद, टीआईएसएस विवाद, छात्र राजनीति आदि। हिंदी के पत्रकार के लिए आमतौर पर विश्वविद्यालय ख़बर तब बनते हैं, जब छात्र आंदोलन हो, चुनाव हो, आरक्षण विवाद हो, हिंसा हो, पुलिस प्रवेश करे या राष्ट्रवाद का विवाद हो। यानी विश्वविद्यालय छात्र राजनीति और संघर्ष के मंच के रूप में देखे गये और यही पैटर्न आज तक क़ायम है।
राजनीतिक विमर्श की दाल-रोटी
1910 के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन ने हिंदी पत्रकारिता को बड़ा उद्देश्य दिया, औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का, स्वराज्य की माँग और राष्ट्रीय चेतना का निर्माण। इन उद्देश्यों ने हिंदी पत्रकारिता को ऊर्जा दी। 1947 तक आते-आते हिंदी पत्रकारिता एक शक्तिशाली सार्वजनिक मंच बन गयी थी, जिस पर भाषा, देश, चरित्र निर्माण, राष्ट्रवाद और सामाजिक सुधार पर ख़ूब चर्चा होती थी।

स्वतंत्रता के बाद पहली बार हिंदी पत्रकारिता के सामने वह ऐतिहासिक अवसर था, जो उसे पहले कभी नहीं मिला था। उसके सामने औपनिवेशिक शासन नहीं था, भाषा आंदोलन नहीं था, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नहीं था। वह आधुनिक भारत के निर्माण के लिए सार्वजनिक विमर्श का प्लेटफ़ॉर्म बन सकती थी। अर्थशास्त्र, प्रौद्योगिकी, कृषि, स्वास्थ्य, शहरीकरण और सामाजिक परिवर्तन की भाषा विकसित कर सकती थी। अर्थशास्त्र पर थोड़ी-बहुत रिपोर्टिंग दिखती है पर महँगाई, राशन, सरकारी योजना के चश्मे से। पंचवर्षीय योजनाएँ, सार्वजनिक क्षेत्र, हरित क्रांति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम उस तरह रिपोर्ट नहीं बने जैसा एक लोकतांत्रिक विमर्श में एक बड़ी भाषा में उतरना चाहिए था। इसकी वजह भी समझ आती है। उपभोक्ता नाम के जीव का अस्तित्व न होना और बड़ी तादाद में सरकारी नौकरीपेशा कर्मचारियों और किसानों से बना उत्तर भारतीय समाज।
हिंदी पत्रकारिता के पास वो टूलकिट भी नहीं था, जिससे वह लोकतंत्र में ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करने के लिए ख़ुद को आगे कर पाये। न ऐसी तैयारी थी और न विमर्श के लिए गुंजाइशें। यह ऐसी प्रवृत्ति थी, जिसमें ज्ञान-विज्ञान की ख़बरों का खुला विरोध तो नहीं था, पर उनके लिए कोई प्राथमिकता या आग्रह भी नहीं था।
नतीजा यह कि हिंदी पत्रकारिता ने ख़ुद को इंसान के जीवन के सभी पहलुओं से जोड़ने के बजाय सिर्फ़ राजनीतिक सांस्कृतिक संस्था के रूप में पहचानना शुरू कर दिया। उसने राजनीतिक विमर्श को अपनी दाल-रोटी बनाया। और ऐसे में बाक़ी सब चीज़ें या तो गौण हो गयीं या हाशिये पर चली गयीं।
हिंदी पत्रकारिता की बुनावट में राजनीति के विषय का अनुपात जितना पहले था, उतना ही अब भी है, बस राजनीति के साथ अब अर्थनीति, मनोरंजन और जुड़ गये हैं।
1960 के दशक तक संसद, चुनाव, कांग्रेस, जनसंघ, विपक्ष मुख्य विषय थे। 1970 के दशक में हिंदी की समूची पत्रकारिता इंदिरा गांधी, जेपी आंदोलन, आपातकाल के घेरे में थी। 1980 के दशक में पंजाब, असम, राम जन्मभूमि, मंडल कमीशन, 1990 के दशक में उदारीकरण, बाज़ार, कश्मीर और उत्तर पूर्व के हिंसक अलगाववादी आंदोलन, 2000 के दशक में गुजरात दंगे, घरेलू आतंकवाद, आर्थिक मंदी, 2010 के दशक में अन्ना आंदोलन, निर्भया कांड, मोदी का उदय और भाजपा। इसका मतलब यह नहीं कि ये विषय ग़ैर-ज़रूरी थे। ये अपने समय की सबसे बड़ी घटनाएँ हैं, मगर 80 साल के दौरान 40 करोड़ से 140 करोड़ तक फले-फूले देश में सिर्फ़ यही नहीं चलता रहा है।
1991 के बाद बाज़ार खुले तो विदेशी पूँजी आयी, उपभोक्ता उत्पाद, सेवाएँ और विचार भी बाज़ार में आये। टेलीविज़न आया, फिर इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन और आधुनिकतम गैजेट आये। 2000 से 2025 के बीच भारत ने सबसे बड़ी डिजिटल क्रांतियों में से एक देखी। साथ ही भारत की औसत उम्र कम हुई तो युवा पाठकों में ख़बरों की भूख बढ़ी। कई बड़े हिंदी अख़बारों और टेलिविज़न और हिंदी डिजिटल ने व्यापार और अर्थव्यवस्था पर प्रस्तुतियाँ देनी शुरू कीं। हिंदी पत्रकारों ने युवाओं के लिए तकनीकी रिपोर्टिंग को तो अपने यहाँ जगह दी मगर वह उन्हें मोबाइल, कंप्यूटर, गैजेट्स, ऐप्स की समीक्षाओं से ज़्यादा कुछ उपलब्ध नहीं करा पाती, न ही उनके ज्ञान संसार को समृद्ध बनाने में सक्षम है।
हिंदी पत्रकारिता में विज्ञान अमूमन दो-तीन तरह के समाचारों में दिखता है, अंतरिक्ष प्रक्षेपण और चमत्कारनुमा वैज्ञानिक ख़बरें। वैज्ञानिक पद्धति, नयी खोजों, वैज्ञानिकों, प्रयोगशालाओं और वहाँ हो रहे कामकाज पर रिपोर्टिंग नदारद थी। सामाजिक ख़बरों का अर्थ अमूमन जातीय संघर्षों, दंगों से लिया जाता रहा है। सामाजिक रिपोर्टिंग के आधार लगभग अदृश्य रहे, जैसे परिवार के ढांचे में बदलाव, शहरीकरण, प्रवासन, औरतों का श्रम, सामाजिक गतिशीलता, शिक्षा, सेहत।
हिंदी टेलिविज़न का रहस्य-रोमांच
1990 के दशक में निजी समाचार चैनल खड़े होने शुरू हुए, आज तक, ज़ी न्यूज़, स्टार न्यूज़, एबीपी, नेटवर्क18, इंडिया टीवी, न्यूज़ 24 जैसे चैनल आये। यहीं हिंदी पत्रकारिता के चरित्र में एक निर्णायक बदलाव हुआ। अख़बार में कम-से-कम पाठक को पढ़ना पड़ता था। टेलीविज़न में उसे केवल देखना था इसलिए सूचना धीरे-धीरे दृश्य प्रदर्शन में बदलने लगी।
टीवी ने पत्रकारिता का नया व्याकरण रचा। वहाँ प्रश्न यह नहीं था कि “क्या महत्वपूर्ण है?” टीवी संपादकों के सामने प्रश्न था कि “क्या दिखाया जा सकता है जो रेटिंग्स ला सके?” नतीजा यह कि ट्रिविया, परलोक, सनसनी, अंध राष्ट्रवाद, धर्म और बहसें बढ़ती गयीं।
ज्ञान बनाम सामान्य बुद्धि
हिंदी पत्रकारिता का एक स्थायी आग्रह रहा है, जो आम आदमी सोचता है, वही सच है। यह लोकतांत्रिक लग सकता है, पर इसके भीतर एक समस्या छिपी है- क्या विशेषज्ञता हमेशा ही संदेहास्पद है, क्या शोध हमेशा ही संदिग्ध है, क्या विश्वविद्यालय सिर्फ़ अच्छी नौकरी के लिए जगह हैं और वहाँ हो रहा काम अप्रासंगिक है?
2000 के दशक में टीवी बहसें हिंदी सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। ध्यान दीजिए कि इन बहसों में नियमित रूप से कौन दिखायी देता है- नेता, पार्टी प्रवक्ता, धर्मनेता, पूर्व नौकरशाह, टीवी टिप्पणीकार। कौन कम दिखायी देता है– वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, शोधकर्ता। और यह केवल संयोग नहीं है। हिंदी पत्रकार को पता है अच्छा वक्ता संघर्ष की बात करके शो की रेटिंग्स बढ़ा सकता है, जो कोई भी विशेषज्ञ नहीं कर सकता।
इसीलिए हिंदी पत्रकारिता के सबसे महत्वपूर्ण पैटर्न में से एक है अगर किसी विषय पर दो जानकार उपलब्ध हैं, तो हिंदी पत्रकार अक्सर ऐसे व्यक्ति को चुनेगा जो विवादित बातें कर सके। विशेषज्ञ जटिलता को सामने रखता है, नेता या वक्ता शीर्षक देता है। विशेषज्ञ संदर्भ देता है, जो हिंदी पत्रकारिता को नहीं चाहिए। हिंदी पत्रकारिता ने शुरू से ही शीर्षक को प्राथमिकता दी है।
‘बुद्धिजीवी’ का पतन
आज़ादी के शुरूआती दशकों में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में ‘बुद्धिजीवी’ सम्मानजनक शब्द था। मगर 1970 के बाद और विशेषकर 1980 के दशक में इसका अर्थ बदलने लगा। धीरे-धीरे ‘बुद्धिजीवी’ का अर्थ बनने लगा किताबी, अव्यावहारिक, ज़मीनी नहीं, आम आदमी से कटा हुआ। यानी ज्ञान की प्रतिष्ठा घटने लगी, राय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी और इसी वजह से राय-बहादुरों की बाढ़ आयी। यह रूढ़िगत बदलाव बाद के दशकों में और गहरा होता गया है।
2000 के दशक और उसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ शब्द धीरे-धीरे एक तटस्थ या सम्मानजनक शब्द से व्यंग्यात्मक शब्द में बदल गया। विशेषकर टीवी और सोशल मीडिया में यह शब्द अब कई बार लगभग अपमानसूचक अर्थ में इस्तेमाल होता है। जैसे एयरकंडीशंड बुद्धिजीवी, लुटियंस बुद्धिजीवी, छद्म बुद्धिजीवी, तथाकथित बुद्धिजीवी। ख़ास बात यह है कि यह केवल भाषा में बदलाव नहीं है। इसका एक इतिहास है और उस इतिहास का एक मनोविज्ञान है।
पाठक भी ज़िम्मेदार
2019 में ऑक्सफ़ैम इंडिया और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट का एक अप्रत्यक्ष निष्कर्ष यह भी रहा कि हिंदी मीडिया नेतृत्व का सामाजिक और शैक्षणिक दायरा सीमित होने की वजह से विषयों का दायरा भी सीमित रहता है। कुछ मीडिया अध्ययन बताते हैं कि समाचार उपभोग में राजनीति और अपराध की ख़बरों का हिस्सा लगातार बहुत बड़ा बना हुआ है, जबकि विज्ञान, शोध और शिक्षा अपेक्षाकृत हाशिये पर हैं।
तो क्या केवल हिंदी मीडिया दोषी है या उसका पाठक भी इसका भागीदार है? हिंदी पट्टी की पत्रकारिता लंबे समय तक मध्यवर्ग की प्राथमिकताओं को ही प्रतिबिंबित करती रही है, सरकारी नौकरी, प्रतियोगी परीक्षा, राजनीति, धर्म और जाति। ज्ञान-विज्ञान शायद ही कभी जन-आकांक्षा का केंद्रीय विषय बना हो। यह बात कड़वी लग सकती है, पर समाचार का बाज़ार आख़िर पाठकों से भी आकार लेता है।
2015 के बाद पहली बार स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों ने विज्ञान, इतिहास, पर्यावरण, तकनीक, डेटा पत्रकारिता पर काम करना शुरू किया है। यूट्यूब पर एक्सप्लेनर पत्रकारिता उभरी है, फिर भी इसे हिंदी पत्रकारिता की भोजन की थाली में रखी चटनी ही समझिए।

जर्मन दार्शनिक युर्गेन हैबरमास ने पब्लिक स्फ़ियर की अवधारणा दी थी। उसके मुताबिक़ आधुनिक यूरोप में 18वीं–19वीं सदी के दौरान ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र बना, जिसमें नागरिक राज्य और बाज़ार से इतर हटकर सार्वजनिक मामलों पर तर्कपूर्ण और आलोचनात्मक बहस करते थे। अगर हम इस कसौटी पर हिंदी पत्रकारिता को रखें, तो पाएँगे कि दो सौ साल की पत्रकारिता के दौरान राजनीति, चुनाव, धर्म-जाति का बहुत बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र तो बना लेकिन वह ज्ञान का सार्वजनिक क्षेत्र बनाने में वह नाकाम रही है।
200 साल बाद भी हिंदी के समाचार संसार में टीवी स्क्रीन पर ग़ैर मुद्दों पर तमाशा विश्वविद्यालय में चल रही खोजों से बड़ी और ब्रेकिंग ख़बर है, नेता का बयान वैज्ञानिक शोध से अहम है, चुनावी समीकरण आर्थिक संरचना से अधिक जगह पाता है।
हिंदी पत्रकारिता मतदाताओं, राजनीतिक समर्थकों और नेताओं के बारे में तो बताती रही है, लेकिन वह इन दो सौ साल में छोटी-सी मायनॉरिटी या एक कोना भी तैयार नहीं कर पायी है, जहाँ राजनीति के इतर भी कुछ पढ़ने-गुनने को मिले। यह अधूरापन उसके पाठक के वर्ल्ड व्यू को तो सीमित करता ही है, उसे पंगु भी बनाता है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उसकी भागीदारी को कमज़ोर करता है, उसके भारत-बोध को सीमित करता है, उसे आधुनिक नहीं बस उपभोक्ता बनाता है और आख़िर में उसके लोकतंत्र-बोध को संकुचित कर उसे स्वयं-केंद्रित करता है।

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
