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नियमित ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

हिन्दी को बनाने दीजिए मुहब्बत का पुल

           ज़ुबानें दिलों के बीच एक राब्ता कायम करती हैं। इंसानों को इंसानों-सा बोलने का सलीक़ा सिखाती हैं। ज़ुबानें कभी भेद नहीं करतीं बल्कि वे हर भेद को मिटाती हैं। दुर्भाग्य यह है कि जब हम किसी ज़ुबान की बात करते हैं तो हम दूसरी जुबानों को हिकारत की नज़र से देखते हैं। हिन्दी के साथ भी हम लगभग यही करते हैं। हिन्दी की जब-जब भी बात होती है हम दीगर भाषाओं से परहेज़ करने की बात करते हैं। जबकि हिन्दी दुनिया की ऐसी भाषा है, जिसने तमाम भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर समाहित किया है। आज हिन्दी में दुनिया की कई भाषाओं के शब्द शामिल हैं। वे शब्द हमारी ज़िन्दगी में भी शामिल हो चुके हैं, जिन्हें हम अलग करने की बात अब सोच भी नहीं सकते। एक महासागर की तरह हिन्दी भाषा है। कवि त्रिलोचन कहते हैं:

भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है

भाषा जितनी समृद्ध होती है, उसमें उतनी ही हलचल होती है, उतनी ही क्रिया होती है और उतना ही बल भी होता है। हिन्दी में यह समृद्धि है। पता नहीं क्यों लोग हिन्दी को सीमित करना चाहते हैं!

दुनिया की भाषाओं के शब्दकोशों में हर साल कई नये शब्द जोड़ने पर चिंतन होता है मगर हम अपनी भाषा से कितने शब्द निकालना है, इस पर बहस किया करते हैं। शकील जमाली कहते भी हैं:

हिन्दी के शब्दकोश से उर्दू निकाल दें
वो चाहते हैं फूल से ख़ुशबू निकाल दें

हिंदी कभी किसी से परहेज़ की बात नहीं करती। हिंदवी से लेकर आधुनिक हिंदी तक के सफ़र पर नज़र डालें तो हिंदी में तत्सम और तद्भव शब्दों का अपना महत्व तो है ही लेकिन अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द इसके भीतर इस तरह व्यवस्थित हो गये हैं, जैसे इसी भाषा के हों। इस लिहाज़ से हिंदी इन तमाम भाषाओं के बीच एक पुल बनाती है। वह पुल जो इंसानियत की बात करता है, जो भाषाई भेदभाव को मिटाता है। जो लोगों के बीच मुहब्बत पैदा करता है। कवि शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं:

वो अपनों की बातें, वो अपनों की ख़ू-बू
हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू
ये कोयल-ओ-बुलबुल के मीठे तराने
हमारे सिवा इनका रस कौन जाने!

हमारे यहां मुश्किल यह है कि हमने हर बात को सियासी रंग में रंग दिया है। हिन्दी भी उसी का शिकार है। हिन्दी को लेकर देश भर में कहीं कोई बैर-भाव नहीं है लेकिन जब सियासी नज़रों से इसे देखा जाता है तो हिन्दी का कई जगह विरोध हो जाता है। हिन्दी से उर्दू को अलग करने की बात की जाती है। हिन्दी पर अंग्रेज़ी के हावी होने पर चिंता जतायी जाती है। कई क्षेत्रों में हिन्दी विरोधी आंदोलन होते हैं। यह सब सियासत के दख़ल के कारण होता है, वरना इंसान तो हर भाषा को सीखने, समझने और अपनाने के लिए सदियों से बेताब रहा है और आज भी बेताब है। सदा अम्बालवी ने मानीखेज़ बात कही है:

अपनी उर्दू तो मोहब्बत की ज़बाँ थी प्यारे
उफ़ सियासत ने उसे जोड़ दिया मज़हब से

और इस भेदभाव का असर भाषाओं पर ही नहीं भाषाओं को मानने वाले लोगों पर भी पड़ता है। सियासतें पहले भाषाओं को अलग करती हैं, उसके बाद उन भाषाओं से जुड़ी विधाओं को अलग करती है। किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना, उस भाषा के दायरे को कम करने के समान है। आज के दौर में हम अगर चाहें कि हिन्दी से हम दूसरी भाषाओं के शब्दों को निकाल दें तो हिन्दी सम्पन्न नहीं होगी और विपन्न हो जाएगी।

यही कारण है भाषाओं के अलगाव की जब बात की जाती है तो इनसे जुड़ी विधाओं को भी धर्म के सांचे में ढाल दिया जाता है। यहां यह शेर मौज़ू है:

नफ़रतें दोनों तरफ़, दोनों का ईमां हो गयी
गीत हिन्दू हो गये, ग़ज़ल मुसलमां हो गयी

ऐसी बातों का जब समाज में प्रसार होता है तो फिर लोगों के भीतर भाषाई आधार पर भेद पनपने लगता है। एक भाषा बोलने वाले एक तरफ़ हो जाते हैं और दूसरी भाषा बोलने वाले दूसरी तरफ़। एक तरफ़ वाला अगर दूसरी भाषा को बोलने लगे तो वह अपनों के बीच में ग़ैर माना जाता है और दूसरी भाषा बोलने वाला अगर पहली भाषा का इस्तेमाल करे तो वह भी अपने दायरे में अलग-अलग पड़ जाता है।

हिन्दी कभी ऐसा करना नहीं सिखाती है, लेकिन वक़्त और हालात ऐसी परिस्थितियों को पैदा करते रहे हैं। अशोक मिज़ाज का शेर इसी बात की ताईद करता है:

मेरे कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जिनकी सोच में ख़म है
उन्हें हिंदू का उर्दू बोलना अच्छा नहीं लगता

हिंदी ने सदैव यह सिखाया है कि अपना हृदय विशाल रखो। हर शब्द को अपनाओ और उसे अपनी भाषा में इस तरह समाहित कर लो जैसे वह अपनी ही भाषा का हो। विद्वान यह कहते हैं कि किसी भाषा को जानना उतना ही मुश्किल है जितना इस कायनात को समझना। फिर किसी एक भाषा के दायरे को निरंतर छोटे करते जाना उस भाषा के साथ अन्याय करने के समान है। कवि विनोद कुमार शुक्ल इस बात को किस ख़ूबसूरती से कहते हैं:

अपनी भाषा में शपथ लेता हूँ
कि मैं किसी भी भाषा का अपमान नहीं करूँगा
और मेरी मातृभाषा हर जन्म में बदलती रहे
इसके लिए मैं बार-बार जन्म लेता रहूँ

भाषाएं सीखने के लिए कई जन्म भी कम हैं। हिन्दी की हिमायत करने वाले ठीक से हिन्दी भी नहीं जानते हैं और दूसरी भाषाओं पर तोहमत लगाकर हिन्दी की उपेक्षा की बात करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि समृद्ध होती हिन्दी को सागर की तरह और विशाल होने दीजिए। भाषा की ख़ूबसूरती उसके विशाल होने में है। किसी भाषा की सुंदरता को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उसे महसूस किया जा सकता है। जोश मलीहाबादी भाषा की ख़ूबसूरती को इस अंदाज़ में व्यक्त करते हैं:

दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बम
चादर शब-ए-नुजूम की, शबनम का रख़्त-ए-नम
तितली का नाज़-ए-रक़्स, ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम
मोती की आब गुल की महक, माह-ए-नौ का ख़म
इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू

भाषा इसी तरह पैदा होती है और अपनी जड़ें फैलाती हैं। भाषा की जड़ों को अपनी जड़ों से एकरूप करना ज़रूरी है। कवि कुंवर नारायण की चिन्ता यहां सचेत करती है:

भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में आग
यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी जहाँ
ठूँठ हो चुकी होंगी अपनी ज़मीन से
रस खींच सकने वाली शक्तियाँ

हिन्दी की समृद्धि के लिए हमें उसकी जड़ों की ही चिंता करना चाहिए। भाषाएं किसी के बनाने से नहीं बनती हैं और किसी के मिटाने से मिटती भी नहीं है। भाषाएं मनुष्य ही बनाते हैं। हिन्दी भाषा को भी हम मनुष्यता के रंग में रंगने दें, वह अपनी रक्षा ख़ुद कर लेगी।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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